महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तब उस जल में से कुछ प्रोक्षणी-पात्र में डालकर उस जल को अपने ऊपर और समस्त देय द्रव्यों पर छिड़के। मन्त्रज्ञ व्यक्ति पूजा के समाप्त होने तक विशेषार्घ्य पात्र को हिलावे नहीं (१६९-७०) । हे निर्मल-स्मिते ! यह विशेषार्घ्य का संस्कार कहा, अब धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के देनेवाले यन्त्र- राज के लिखने की विधि बताता हूँ (१७१) । एक त्रिकोण-मण्डल बनाकर उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं' लिखे । उसके बाहर दो गोलाकार मण्डल बनाए । इन दोनों गोलाकार मण्डलों के मध्य में दो-दो करके सोलह के शर बनाए (१७२)। इस वृत्त-द्वय के बाहर अष्टदल पद्म लिखे । इस पद्म के बाहर चतुर्द्वार-युक्त सरल रेखा- वाला सुन्दर भूपुर बनाए (१७३) । (रेखाचित्र सं० २) कुण्ड-गोल (शक्ति-विशेष के पुष्प) द्वारा या स्वयम्भू कुसुम (अन्यान्य शक्ति-घटित पुष्प) द्वारा लिप्त, चन्दन, अगरु और कुंकुम द्वारा या केवल रक्त-चन्दन द्वारा लिप्त सुवर्ण-मय पात्र में, रजत-मय पात्र में या ताम्र- मय पात्र में स्वर्ण-शलाका या बिल्व-कण्टक द्वारा मूल-मन्त्र का उच्चारण करते-करते देवता-भाव की सिद्धि के लिए उक्त यन्त्र-राज को लिखे अथवा स्फटिक-निर्मित पात्र में या प्रवाल-निर्मित पात्र में या वैदूर्य-निर्मित पात्र में उत्तम शिल्प-कार कारीगर द्वारा मन्त्र-रेखाएँ खुदवाकर प्रतिष्ठा-पूर्वक घर के अन्दर इसे स्थापित करे। ऐसा करने से इस यन्त्र के प्रसाद से दुष्ट भूत-गण, ग्रह-समुदाय और रोग, भय आदि सब दूर होते हैं। वह घर पुत्र, पौत्र, सुख और ऐश्वर्य के प्रभाव से आनन्दित होता है और स्वयं वह व्यक्ति इस यन्त्र के प्रसाद से दाता, भर्त्ता और यशस्वी होता है (१७४-७८) । उक्त प्रकार यन्त्र बनाकर अपने सम्मुख रत्न-सिंहासन पर उसे स्थापित कर पीठ-न्यासोक्त विधि से पीठ देवताओं की पूजा कर कर्णिका के मध्य में मूल-देवता की पूजा करे (१७९) । अब कलश-स्थापन और चक्रानुष्ठान को बताता हूँ, जिसके करने मात्र से निश्चय ही देवता को बड़ी प्रसन्नता होती है, मन्त्र-सिद्धि होती है और इच्छा-सिद्धि होती है (१८०) । विश्वकर्मा द्वारा देवताओं का एक-एक अंश लेकर इसकी रचना होती है, इसी से इसे 'कलश' कहते हैं (१८१) । यह ३६ अंगुल अर्थात् डेढ़ हाथ चौड़ा, सोलह अंगुल ऊँचा होता है, चार अंगुलि इसके कण्ठ का परिमाण है । मुख का विस्तार छः अंगुलि और तल-देश का परिमाण पाँच अंगुलि है-कलश-निर्माण की यही विधि है (१८२) । देवता की प्रीति के लिए सुवर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, मृण्मय, पाषाण या काच का बनवाए । घट को अभग्न और अच्छिद्र बनवाए । इसमें धन की कंजूसी न करे (१८३) । सुवर्ण-कलश भोग प्रदान करता है, रजत-मय कलश मोक्ष-प्रद होता है, ताम्र-मय कलश प्रीति-कर होता है। कांस्य-मय कलश पुष्टि-वर्द्धक होता है। काच-मय कलश वशीकरण में प्रशस्त कहा गया है। पाषाण से बना कलश स्तम्भन-कार्य में और मृण्मय कलश सभी कार्यों में प्रशस्त है। पूर्वोक्त द्रव्यों द्वारा निर्मित सभी प्रकार के ही कलश देखने में सुन्दर और सुडौल होने चाहिए (१८४) । अपने बाईं ओर एक षट्-कोण-मण्डल, उसके मध्य में एक शून्य और उक्त षट्कोण के बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए (१८५) । (रेखाचित्र सं० ३) इस प्रकार सिन्दूर-रज या रक्त-चन्दन से मण्डल बनाकर उस पर आधार-देवता की पूजा करे (१८६) । यथा-ह्रीं आधार-शक्तये नमः (१८७) । इसके बाद 'नमः' से धोकर आधार (मृत्पिण्डादि) मण्डल के ऊपर स्थापित करे । फिर 'फट्' से कुम्भ को धोकर उसे आधार के ऊपर स्थापित करे (१८८) । मन्त्रज्ञ व्यक्ति 'क्ष' से लेकर अकार तक विपरीत क्रम