महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । ३१ में वर्ण-समुदाय को विन्दु-युक्त कर उच्चारण कर मूल-मन्त्र का. उच्चारण करते हुए कारण (मद्य) द्वारा कुम्भ को पूरित करे (१५६) । कुलाचारज्ञ व्यक्ति देवी-भाव-परायण होकर आधार में वह्नि-मण्डल का, कुम्भ में सूर्य- मण्डल का और कुम्भ-स्थित मद्य में चन्द्र-मण्डल का पूजन करे (१६०)। फिर रक्त चन्दन, सिन्दूर, रक्त माला, आदि से अनुलेपन कर कलश को विभूषित कर 'पञ्चीकरण' करे (१६१) । यथा— ‘फट्’ का उच्चारण करते हुए कुश द्वारा कलश पर 'ताडना' कर 'हुं' का उच्चारण कर अवगुण्ठन मुद्रा द्वारा कलश को अवगुण्ठित करे । फिर 'ह्रीं' का उच्चारण करते हुए अपलक दृष्टि से कलश को अच्छी तरह देखकर 'नमः' का उच्चारण करते हुए जल से कलश को अभ्युक्षित करे । मूलमन्त्र से कलश में तीन बार चन्दन छिड़के । इसी को 'पञ्चीकरण' कहते हैं (१६२) । फिर कलश को प्रणाम कर उसमें स्थित सुरा को रक्त पुष्प प्रदान कर निम्न मन्त्रों से सुरा का शोधन करे (१६३)— एकमेव परं ब्रह्म स्थूल-सूक्ष्म-मयं ध्रुवम् । कचोद्भवं ब्रह्म-हत्यां तेन ते नाशयाम्यहम् ॥ अर्थात् परं ब्रह्म अद्वितीय स्थूल और सूक्ष्म तथा नित्य है। मैं उसके द्वारा कच-जनित ब्रह्म-हत्या का नाश करता हूँ (१६४) । सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे वरुणालय-सम्भवे ! अमा-वीज-मये देवि ! शुक्र-शापाद् विमुच्यताम् ॥ अर्थात् हे देवि ! हे सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे ! हे समुद्र-गर्भ-सम्भूते ! हे अमा-वीज-मयि ! तुम शुक्राचार्य के शाप से मुक्त हो जाओ (१६५) । वेदानां प्रणवो वीजं ब्रह्मानन्द-मयं यदि । तेन सत्येन ते देवि ! ब्रह्म-हत्या व्यपोहतु ॥ अर्थात् ब्रह्मानन्द-मय प्रणव वेदों का वीज-स्वरूप है। हे देवि ! उस सत्य द्वारा तुम्हारी ब्रह्म-हत्या नष्ट हो जाय (१६६-६७) । ह्रीं हंसः शुचिसद् वसुरन्तरिक्ष-सद्धोता, वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृसद्वर सद्गत-सद्-व्योम-सदब्जा गोजा, ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ अर्थात् परमहंस तेजोमय स्वर्ग में रहता है; वसु-रूप में स्वर्ग व पृथ्वी के मध्य अन्तरिक्ष में वह घूमता है। पृथ्वी पर वह वैदिक अग्नि और 'होता'-रूप में है। उसकी पूजा अतिथि-रूप में होती है। वह गृहस्थ की अग्नि में, मनुष्य की चेतनता में है और सत्य-लोक में रहता है। सत्य व आकाश में वह स्थित है। वरुण-वीज 'वं' में क्रमशः छः दीर्घ स्वर लगाकर 'ब्रह्म-शाप' शब्द के बाद 'विमोचितायै' कहे, फिर 'सुधा-देव्यै नमः' कहे। इस मन्त्र का सात बार पाठ करने से ब्रह्म का शाप दूर होता है। पूरा मन्त्र है (१६८)- वां वीं वूं वें वों वः ब्रह्म-शाप-विमोचितायै सुधा-देव्यै नमः । अंकुश अर्थात् 'क्रों' में छः दीर्घ स्वर लगाकर श्री-वीज 'श्रीं' और 'माया-वीज 'ह्रीं' जोड़े। फिर 'सुधा' शब्द के बाद 'कृष्ण-शापं मोचय अमृतं स्रावय स्रावय' कहकर अन्त में 'स्वाहा' कहे (१६६) । इस प्रकार शाप-मोचन कर एकाग्र-हृदय से उसमें आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की पूजा करे (२००) । 'सहक्ष-मल' पद के बाद 'वरयूं' के साथ मिलाकर 'आनन्द-भैरवाय' कहे और अन्त में 'वषट्' रहेगा। यह आनन्द-भैरव का मन्त्र है (२०१) । आनन्द-भैरवी की पूजा के समय 'सहक्षमलवरयूं' इस मन्त्र के 'आस्य' अर्थात् मुख के दो वर्णों को विपरीत अर्थात् 'हस' पड़े और 'श्रवण' अर्थात् उकार के स्थान पर 'वाम-लोचना'