भारतकोश
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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पाँचवां उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २६ इसके बाद अहिंसा-रूप परम पुष्प, इन्द्रिय-निग्रह-रूप पुष्प, दया-रूप पुष्प, क्षमा-रूप पुष्प और ज्ञान-रूप पुष्प—ये पाँच पुष्प प्रदान करे (१४६) । इस प्रकार पन्द्रह भाव-रूप पुष्पों से पूजा करे। फिर सुधा-सागर, मांस-पर्वत, भर्जित-मत्स्य का पर्वत अर्थात् प्रभूत मत्स्य, मांस, मुद्रा की राशि, उत्तम अन्न, घृताक्त पायस, कुलामृत अर्थात् शक्ति-घटित अमृत-विशेष, स्त्री-पुष्प और पीठ-क्षालन-वारि और स्त्रियों के अंग-विशेष का प्रक्षालन-जल मन-ही-मन देवी को देता हुआ विघ्न-कारक काम और क्रोध की बलि देकर जप आरम्भ करे। कुण्डली-सूत्र में गुथी हुई माला को जप-माला कहा है (१५०-१५२) । यथा— पहले विन्दु-सहित अकार से लेकर अन्तिम लकार तक के वर्णों का उच्चारण कर मूल-मन्त्र का उच्चारण करे। यह जप—'अं ह्रीं क्रीं परमेश्वर्यै स्वाहा, आं ह्रीं क्रीं' इत्यादि क्रम से करने से अनुलोम जप कहा जाता है (१५३) । फिर विन्दु-युक्त लकार से अकारतक एवं प्रत्येक वर्ग के एक-एक वर्ण को लेकर आठ वर्णों को विन्दु- युक्त जप करने से विलोम जप कहा जाता है। 'क्ष'—मेरु-स्वरूप है (१५४) । तदनन्तर 'अष्ट-वर्गों के अर्थात् स्वर-वर्ण, ककारादि पञ्च, चकारादि पञ्च, टवर्ग-तवर्ग-पवर्ग के पञ्च-पञ्च वर्ण, यकारादि चार वर्ण, शकारादि पंच-वर्ण के अन्तिम वर्ण के साथ मूल-मन्त्र को योग कर एक सौ आठ बार जप कर निम्न मन्त्र से जप को समर्पित करे (१५५-५६)— सर्वान्तरात्म-निलये स्वान्तर्ज्योतिः-स्वरूपिणि ! गृहाणान्तर्जपं मात्राद्ये कालि ! नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् हे सर्वान्तःकरण-वासिनि ! हे अन्तरात्म-ज्योति-स्वरूपे ! हे मात: ! हे आद्ये कालिके ! तुमको प्रणाम करता हूँ। मेरे इस मानस जप को ग्रहण करो। इस प्रकार जप समर्पित कर मन-ही-मन भगवती को साष्टांग प्रणाम करे। अब बाह्य पूजा आरम्भ करे (१५७) । पहले विशेषार्घ्य का संस्कार बताता हूँ, सुनो। जिसके स्थापन मात्र से देवता प्रसन्न होता है (१५८), ब्रह्मा आदि देव-गण, योगिनी-गण और भैरव-गण अर्घ्य-पात्र का दर्शन कर नृत्य करने लगते हैं और प्रसन्न हृदय से सिद्धि प्रदान करते हैं (१५६) । अपनी बाईं ओर, सम्मुख स्थल पर, सामान्यार्घ्य के जल से एक त्रिकोण-मण्डल, उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं', फिर त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक गोलाकार मण्डल और उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे । (रेखाचित्र सं० १) इस पर 'ह्रीं आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से आधार-शक्ति की पूजा करे (१६०-१६१) । फिर उक्त मण्डल के ऊपर धुला हुआ आधार स्थापित कर उसमें 'मं वह्नि-मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' मन्त्र से पूजा कर 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को धोकर उस आधार पर स्थापित करे (१६२-६३) । फिर 'अं अर्क-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः' से हे अम्बिके ! उस पात्र में पूजा करे। तदनन्तर मूल-मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को पूरित करे (१६४) । साधक अर्घ्य-पात्र का तीन भाग मद्य से और शेष भाग जल से पूर्ण कर उसमें गन्ध-पुष्प छोड़े। फिर 'रक्षा-मन्त्र' से उसमें पूजा करे (१६५) । 'उं चन्द्र-मण्डलाय षोडश-कलात्मने नमः' से पूजा कर बिल्व-पत्र, रक्त चन्दन लगी हुई दूर्वा (दूब), पुष्प और आतप तण्डुल एकत्र कर उस पात्र के अग्र भाग में स्थापित करे (१६६-१६७) । तब मूलमन्त्र से उसमें तीर्थों का आवाहन कर देवी का ध्यान कर गन्ध-पुष्प से पूजन करे। फिर बारह बार मल-मन्त्र का जप करे (१६८) । इसके बाद साधक धेनु और योनि मुद्राँ दिखाकर धूप-दीप दिखावे।

३० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तब उस जल में से कुछ प्रोक्षणी-पात्र में डालकर उस जल को अपने ऊपर और समस्त देय द्रव्यों पर छिड़के। मन्त्रज्ञ व्यक्ति पूजा के समाप्त होने तक विशेषार्घ्य पात्र को हिलावे नहीं (१६९-७०) । हे निर्मल-स्मिते ! यह विशेषार्घ्य का संस्कार कहा, अब धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के देनेवाले यन्त्र- राज के लिखने की विधि बताता हूँ (१७१) । एक त्रिकोण-मण्डल बनाकर उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं' लिखे । उसके बाहर दो गोलाकार मण्डल बनाए । इन दोनों गोलाकार मण्डलों के मध्य में दो-दो करके सोलह के शर बनाए (१७२)। इस वृत्त-द्वय के बाहर अष्टदल पद्म लिखे । इस पद्म के बाहर चतुर्द्वार-युक्त सरल रेखा- वाला सुन्दर भूपुर बनाए (१७३) । (रेखाचित्र सं० २) कुण्ड-गोल (शक्ति-विशेष के पुष्प) द्वारा या स्वयम्भू कुसुम (अन्यान्य शक्ति-घटित पुष्प) द्वारा लिप्त, चन्दन, अगरु और कुंकुम द्वारा या केवल रक्त-चन्दन द्वारा लिप्त सुवर्ण-मय पात्र में, रजत-मय पात्र में या ताम्र- मय पात्र में स्वर्ण-शलाका या बिल्व-कण्टक द्वारा मूल-मन्त्र का उच्चारण करते-करते देवता-भाव की सिद्धि के लिए उक्त यन्त्र-राज को लिखे अथवा स्फटिक-निर्मित पात्र में या प्रवाल-निर्मित पात्र में या वैदूर्य-निर्मित पात्र में उत्तम शिल्प-कार कारीगर द्वारा मन्त्र-रेखाएँ खुदवाकर प्रतिष्ठा-पूर्वक घर के अन्दर इसे स्थापित करे। ऐसा करने से इस यन्त्र के प्रसाद से दुष्ट भूत-गण, ग्रह-समुदाय और रोग, भय आदि सब दूर होते हैं। वह घर पुत्र, पौत्र, सुख और ऐश्वर्य के प्रभाव से आनन्दित होता है और स्वयं वह व्यक्ति इस यन्त्र के प्रसाद से दाता, भर्त्ता और यशस्वी होता है (१७४-७८) । उक्त प्रकार यन्त्र बनाकर अपने सम्मुख रत्न-सिंहासन पर उसे स्थापित कर पीठ-न्यासोक्त विधि से पीठ देवताओं की पूजा कर कर्णिका के मध्य में मूल-देवता की पूजा करे (१७९) । अब कलश-स्थापन और चक्रानुष्ठान को बताता हूँ, जिसके करने मात्र से निश्चय ही देवता को बड़ी प्रसन्नता होती है, मन्त्र-सिद्धि होती है और इच्छा-सिद्धि होती है (१८०) । विश्वकर्मा द्वारा देवताओं का एक-एक अंश लेकर इसकी रचना होती है, इसी से इसे 'कलश' कहते हैं (१८१) । यह ३६ अंगुल अर्थात् डेढ़ हाथ चौड़ा, सोलह अंगुल ऊँचा होता है, चार अंगुलि इसके कण्ठ का परिमाण है । मुख का विस्तार छः अंगुलि और तल-देश का परिमाण पाँच अंगुलि है-कलश-निर्माण की यही विधि है (१८२) । देवता की प्रीति के लिए सुवर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, मृण्मय, पाषाण या काच का बनवाए । घट को अभग्न और अच्छिद्र बनवाए । इसमें धन की कंजूसी न करे (१८३) । सुवर्ण-कलश भोग प्रदान करता है, रजत-मय कलश मोक्ष-प्रद होता है, ताम्र-मय कलश प्रीति-कर होता है। कांस्य-मय कलश पुष्टि-वर्द्धक होता है। काच-मय कलश वशीकरण में प्रशस्त कहा गया है। पाषाण से बना कलश स्तम्भन-कार्य में और मृण्मय कलश सभी कार्यों में प्रशस्त है। पूर्वोक्त द्रव्यों द्वारा निर्मित सभी प्रकार के ही कलश देखने में सुन्दर और सुडौल होने चाहिए (१८४) । अपने बाईं ओर एक षट्-कोण-मण्डल, उसके मध्य में एक शून्य और उक्त षट्कोण के बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए (१८५) । (रेखाचित्र सं० ३) इस प्रकार सिन्दूर-रज या रक्त-चन्दन से मण्डल बनाकर उस पर आधार-देवता की पूजा करे (१८६) । यथा-ह्रीं आधार-शक्तये नमः (१८७) । इसके बाद 'नमः' से धोकर आधार (मृत्पिण्डादि) मण्डल के ऊपर स्थापित करे । फिर 'फट्' से कुम्भ को धोकर उसे आधार के ऊपर स्थापित करे (१८८) । मन्त्रज्ञ व्यक्ति 'क्ष' से लेकर अकार तक विपरीत क्रम

पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । ३१ में वर्ण-समुदाय को विन्दु-युक्त कर उच्चारण कर मूल-मन्त्र का. उच्चारण करते हुए कारण (मद्य) द्वारा कुम्भ को पूरित करे (१५६) । कुलाचारज्ञ व्यक्ति देवी-भाव-परायण होकर आधार में वह्नि-मण्डल का, कुम्भ में सूर्य- मण्डल का और कुम्भ-स्थित मद्य में चन्द्र-मण्डल का पूजन करे (१६०)। फिर रक्त चन्दन, सिन्दूर, रक्त माला, आदि से अनुलेपन कर कलश को विभूषित कर 'पञ्चीकरण' करे (१६१) । यथा— ‘फट्’ का उच्चारण करते हुए कुश द्वारा कलश पर 'ताडना' कर 'हुं' का उच्चारण कर अवगुण्ठन मुद्रा द्वारा कलश को अवगुण्ठित करे । फिर 'ह्रीं' का उच्चारण करते हुए अपलक दृष्टि से कलश को अच्छी तरह देखकर 'नमः' का उच्चारण करते हुए जल से कलश को अभ्युक्षित करे । मूलमन्त्र से कलश में तीन बार चन्दन छिड़के । इसी को 'पञ्चीकरण' कहते हैं (१६२) । फिर कलश को प्रणाम कर उसमें स्थित सुरा को रक्त पुष्प प्रदान कर निम्न मन्त्रों से सुरा का शोधन करे (१६३)— एकमेव परं ब्रह्म स्थूल-सूक्ष्म-मयं ध्रुवम् । कचोद्भवं ब्रह्म-हत्यां तेन ते नाशयाम्यहम् ॥ अर्थात् परं ब्रह्म अद्वितीय स्थूल और सूक्ष्म तथा नित्य है। मैं उसके द्वारा कच-जनित ब्रह्म-हत्या का नाश करता हूँ (१६४) । सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे वरुणालय-सम्भवे ! अमा-वीज-मये देवि ! शुक्र-शापाद् विमुच्यताम् ॥ अर्थात् हे देवि ! हे सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे ! हे समुद्र-गर्भ-सम्भूते ! हे अमा-वीज-मयि ! तुम शुक्राचार्य के शाप से मुक्त हो जाओ (१६५) । वेदानां प्रणवो वीजं ब्रह्मानन्द-मयं यदि । तेन सत्येन ते देवि ! ब्रह्म-हत्या व्यपोहतु ॥ अर्थात् ब्रह्मानन्द-मय प्रणव वेदों का वीज-स्वरूप है। हे देवि ! उस सत्य द्वारा तुम्हारी ब्रह्म-हत्या नष्ट हो जाय (१६६-६७) । ह्रीं हंसः शुचिसद् वसुरन्तरिक्ष-सद्धोता, वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृसद्वर सद्गत-सद्-व्योम-सदब्जा गोजा, ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ अर्थात् परमहंस तेजोमय स्वर्ग में रहता है; वसु-रूप में स्वर्ग व पृथ्वी के मध्य अन्तरिक्ष में वह घूमता है। पृथ्वी पर वह वैदिक अग्नि और 'होता'-रूप में है। उसकी पूजा अतिथि-रूप में होती है। वह गृहस्थ की अग्नि में, मनुष्य की चेतनता में है और सत्य-लोक में रहता है। सत्य व आकाश में वह स्थित है। वरुण-वीज 'वं' में क्रमशः छः दीर्घ स्वर लगाकर 'ब्रह्म-शाप' शब्द के बाद 'विमोचितायै' कहे, फिर 'सुधा-देव्यै नमः' कहे। इस मन्त्र का सात बार पाठ करने से ब्रह्म का शाप दूर होता है। पूरा मन्त्र है (१६८)- वां वीं वूं वें वों वः ब्रह्म-शाप-विमोचितायै सुधा-देव्यै नमः । अंकुश अर्थात् 'क्रों' में छः दीर्घ स्वर लगाकर श्री-वीज 'श्रीं' और 'माया-वीज 'ह्रीं' जोड़े। फिर 'सुधा' शब्द के बाद 'कृष्ण-शापं मोचय अमृतं स्रावय स्रावय' कहकर अन्त में 'स्वाहा' कहे (१६६) । इस प्रकार शाप-मोचन कर एकाग्र-हृदय से उसमें आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की पूजा करे (२००) । 'सहक्ष-मल' पद के बाद 'वरयूं' के साथ मिलाकर 'आनन्द-भैरवाय' कहे और अन्त में 'वषट्' रहेगा। यह आनन्द-भैरव का मन्त्र है (२०१) । आनन्द-भैरवी की पूजा के समय 'सहक्षमलवरयूं' इस मन्त्र के 'आस्य' अर्थात् मुख के दो वर्णों को विपरीत अर्थात् 'हस' पड़े और 'श्रवण' अर्थात् उकार के स्थान पर 'वाम-लोचना'

३२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् ईकार पाठ करे, बाद में 'सुधा-देव्यै वौषट्' इन दो पदों का प्रयोग करे । (इस प्रकार पूरा मन्त्र हुआ— सहक्षमलवरयीं आनन्द-भैरव्यै वौषट्) । उसी कलश में आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की सम-रसता का ध्यान कर उनके अमृत द्वारा उसे संसिक्त भावना कर उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (२०२-३) । तत्र देवता-बुद्धि से उस मद्य के ऊपर मूल-मन्त्र का पाठ करते हुए तीन बार पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । फिर घण्टा-ध्वनि के साथ उसे धूप-दीप दिखाये (२०४) । देव-पूजा, व्रत, होम, विवाह और अन्य उत्सवों में इसी प्रकार सुरा का संस्कार करे (२०५) । सम्मुख स्थित त्रिकोण-मण्डल के ऊपर मांस-पात्र को लाकर 'फट्' से अभ्युक्षित कर वायु-बीज (यं) और वह्नि-बीज (रं) द्वारा उसे तीन बार अभिमन्त्रित करे (२०६) । फिर कवच अर्थात् 'हूं' का पाठ करते हुए अव- गुण्ठन-मुद्रा से उसे अवगुण्ठित कर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' से उसकी रक्षा करे । तब 'वं' मन्त्र पढ़कर धेनु-मुद्रा से उसे अमृतीकृत कर निम्न मन्त्र पढ़े (२०७)— विष्णोर्वक्षसि या देवी या देवी शङ्करस्य च । मांसं मे पवित्री-कुरु कुरु तद्-विष्णोः परमं पदम् ॥ अर्थात् जो देवी विष्णु के वक्षःस्थल पर और जो देवी शङ्कर के वक्षःस्थल पर विराजती हैं, वह मेरे इस मांस को पवित्र करे; वह मेरे सम्बन्ध में विष्णु का प्रधान पद निश्चित करे । यह मांस-शोधन-विधि है (२०८) । इसी प्रकार कुल-धर्मज्ञ व्यक्ति मत्स्य-पात्र को लाकर उक्त मांस-शोधन- मन्त्रों से उसे शोधित कर निम्न मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे (२०६)— त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥ अर्थात् जैसे सूर्य को देखते हैं, वैसे ही विष्णु का परम पद सदा दिखाई देता है। जो अपने मन को वश में रखता है और जागता रहता है, वह विष्णु के परम पद का दर्शन करता है । हे प्रिये ! इसके बाद मुद्रा-पात्र को लाकर उसी प्रकार शोधित कर निम्न मन्त्रों से अभिमन्त्रित करे— ॐ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः, दिवीव चक्षुराततम् । ॐ तद् विप्रासो विपण्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् । अर्थात् उस त्र्यम्बक (शिव) की हम पूजा करते हैं, जो पुष्टि-कारक और सुगन्धिवाला है । उर्वारुक का फल जैसे अपने आप गिर जाता है, उसी प्रकार हम बन्धनों से छूट जायें और अन्त में मुक्त होकर परमात्मा में लय हो जायें । अथवा मूल-मन्त्र द्वारा ही पञ्च-तत्त्वों का शोधन करे । जिसे मूल-मन्त्र पर श्रद्धा है, उसे शाखा-पल्लव से क्या प्रयोजन (२१२) ? केवल मूल-मन्त्र से जो द्रव्य शोधित होता है, वही देवता की प्रीति के लिए सबसे अधिक प्रशस्त है, यह मैं कहता हूँ (२१३) । जिस समय साधक को अवसर न हो, तब सभी द्रव्यों को मूल-मन्त्र से ही शोधित कर महा-देवी को निवेदित करे (२१४) । मूल-मन्त्र से शोधित सभी तत्त्वों को देवी को निवेदन करने से कोई दोष नहीं होगा, किसी अङ्ग के कम होने का दोष नहीं होगा । यह सत्य है, सत्य है, पुनः कहता हूँ कि यह सत्य है, यह शङ्कर का शासन है (२१५) । ❁

छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि श्री देवी ने जिज्ञासा की—हे नाथ ! आपने पूजादि कर्म के समय मुझे ‘पञ्च-तत्त्व’ बताए हैं। इस समय यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो उन्हें विशेष रूप से बताइए (१)। श्री सदाशिव ने कहा—उत्तम सुरा तीन प्रकार की है : १. गौड़ो, २. पेष्टी और ३. माध्वी। यह सुरा ताल और खर्जूर से बनने से विविध रूप की कही गई है। देश-भेद से और विभिन्न द्रव्य-भेद से सुरा अनेक प्रकार को है। यह सभी सुरा देवी की अर्चना के लिए प्रशस्त हैं (२)। यह सुरा जिस किसी रूप से समुत्पन्न हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा लाई गई हो, शोधित होने पर सब सिद्धियाँ प्रदान करती है। सुरा के सम्बन्ध में जाति का विचार नहीं है (३)। मांस तीन प्रकार का है—१. जलचर, २. भूचर और ३. खेचर। यह मांस जिस किसी स्थान से आया हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया हो, वह सभी देवता को प्रसन्न करता है, इसमें सन्देह नहीं (४)। देवता को देय वस्तु के सम्बन्ध में साधक की इच्छा ही बलवती है। जो वस्तु अपने को प्रिय है, वही इष्ट-देवता को प्रदान करे (५)। हे देवि ! बलि-दान में पुरुष पशु ही विहित है। महादेव के शासन के कारण स्त्री-पशु का हनन न करे (६)। शाल, बोयाल और रोहू—यही तीन प्रकार की मत्स्य उत्तम हैं (७)। अन्य कण्टक-हीन मत्स्य मध्यम और बहुत कण्टकवाली मत्स्य अधम हैं। बहुत कण्टकवाली मत्स्य को भी अच्छी तरह भूनकर देवी को दे सकते हैं (८)। मुद्रा भी उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार की है। जो चन्द्र-बिम्ब के समान शुभ्र है, जो शालि- तण्डुल से प्रस्तुत की गई है अथवा जो यव या गेहूँ द्वारा बनी है और जो घी में पकी तथा मनोहर है, वही मुद्रा उत्तम है। जो भ्रष्ट धान्य से बनी है, वह मध्यम मुद्रा है। जो अन्य प्रकार की वनस्पति--शाक द्वारा प्रस्तुत है, वह अधम मुद्रा कही गई है (६-१०)। देवी को सुधा देते समय जो मांस, मत्स्य, मुद्रा, फल-मूल आदि दिया जाता है, उस सबको ‘शुद्धि’ कहते हैं (११)। शुद्धि के बिना देवी को सुरा देकर पूजा या तर्पण करने से सारा कर्म निष्फल होता है और देवता प्रसन्न नहीं होती (१२)। शुद्धि के बिना मद्य-पान करने से वह केवल विष-पान होता है और ऐसा व्यक्ति चिर- रोगी तथा स्वल्पायु होकर शीघ्र ही मर जाता है (१३)। हे महेशानि ! कलि के प्रबल होने पर शेष-तत्त्व का शोधन एकमात्र सर्व-दोष-विवर्जिता स्वकीया पत्नी से ही सम्पन्न होगा (१४)। हे प्राण-वल्लभे ! मैंने जो स्वयम्भू-कुसुमादि की बात कही है, उनके प्रतिनिधि के स्थान पर ‘रक्त-चन्दन’ को बताया है (१५)। उक्त पञ्च-तत्त्व एवं फल-मूल, पत्र बिना शोधन किए देवी को न दे, अन्यथा करनेवाला नरक-गामी होगा (१६)। [ ३३ ] फा०-५

३४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र गुण-शीला अपनी पत्नी से श्रीपात्र का स्थापन करे और उस पत्नी को कारण या सामान्यार्घ्य के जल से अभिषिक्त करे (१७)। अभिषेक का मन्त्र यह है— पहले ‘बाला’ (‘ऐं क्लीं सौः’) कहे, फिर ‘त्रिपुरायै’ का उच्चारण कर ‘नमः’ अन्त में कहे। तब ‘इमां- शक्तिं’ कह कर ‘पवित्री कुरु’—इस शब्द के बाद ‘नमः शक्तिं कुरु स्वाहा’ कहे (१८-१९)। यदि नारी अदीक्षिता हो, तो उसके कान में माया-बीज ‘ह्रीं’ का उच्चारण करे। मैथुन-तत्त्व के सम्पादन के लिए अन्य जो परकीया शक्ति हों, उन सबका पूजन करे (२०)। फिर अपने और यन्त्र के मध्य में एक त्रिकोण- मण्डल लिखकर उसके मध्य में माया-बीज ‘ह्रीं’ लिखे। इस त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक षट्कोण-मण्डल लिख कर उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे (२१)। (चित्र सं० ४) तदनन्तर उत्तम साधक चतुष्कोण-मण्डल के चार कोणों में १. पूं पूर्ण-शैलाय पीठाय नमः, २. उं उड्डीयानाय पीठाय नमः, ३. जां जालन्धराय पीठाय नमः, ४. कां काम-रूपाय पीठाय नमः' से क्रमशः पूर्ण- शैल, उड्डीयान, जालन्धर और कामरूप पीठों का पूजन करे (२२)। फिर षट्कोण के छः कोणों में ‘ह्वां नमः, ह्रीं नमः, ह्रू नमः, ह्रैं नमः, ह्रौं नमः, ह्रः नमः’ इन छः मन्त्रों से षट्-कोण की अधिष्ठात्री देवताओं को पूजा करे। तब त्रिकोण-मण्डल में ‘ह्रीं आधार-शक्तये नमः' से आधार-देवता की पूजा करे (२३)। इसके बाद ‘नमः' से प्रक्षालित आधार को पूर्ववत् उस स्थान पर स्थापित कर उसमें आदि अक्षर के उच्चारण-सहित वह्नि की दश कलाओं की पूजा करे (२४)। दश कलाओं के नाम हैं—१. धूम्रा, २. अर्चिः, ३. ज्वालिनी, ४. सूक्ष्मा, ५. ज्वालिनी, ६. विस्फुलिङ्गिनी, ७. सुश्री, ८. सुरूपा, ६. हव्यवाहा, १०. कव्यवाहा (२५)। इन सब नामों में चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्त में ‘नमः' जोड़कर वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे (२६)। तब ‘मं वह्नि- मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' से वह्नि-मण्डल की पूजा करे (२७)। फिर ‘फट्’ कार से विशोधित अर्घ्य-पात्र लाकर आधार पर स्थापित कर ‘क भ' से 'ठ ङ' तक के वर्ण-बीजों को पहले उच्चारण कर सूर्य की द्वादश कलाओं का पूजन करे (२८)। द्वादश कलाओं के नाम हैं—१. तपनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७ सुषूम्ना, ८. भोगदा, ६. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी, १२. क्षमा (२६)। तब अर्घ्य-पात्र में ‘अं सूर्य-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः’ इस मन्त्र से सूर्य-मण्डल की पूजा करे (३०)। फिर मन्त्रज्ञ व्यक्ति क्षकार से अकार तक विलोम-मातृका वर्ण और उनके अन्त में मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए कलशस्थ सुरा से अर्घ्य-पात्र के तीन भाग को पूर्ण करे (३१)। इसके बाद एकाग्र-चित्त से विशेषार्घ्य के जल से अर्घ्य-पात्र के शेष भाग को पूर्णकर सोलह स्वर-बीजों के अन्त में चतुर्थ्यन्त नाम का उच्चारण कर अन्त में ‘नमः’ शब्द का प्रयोग कर चन्द्रमा की षोडश कलाओं की पूजा करे (३२)। षोडश कलाओं के नाम हैं—१. अमृता, २. मानदा, ३. पूज्ञा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति, ८. शशिनो, ६. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री, १३. प्रीति, १४. अङ्गदा, १५. पूर्णा और १६. पूर्णामृता। ये सोलह कलायें काम-दायिनी अर्थात् अभीष्ट कामना को पूर्ण करनेवाली हैं (३३)। फिर उक्त अर्घ्य-पात्र के जल में ‘उं सोम-मण्डलाय षोडश- कलात्मने नमः' से सोम-मण्डल की पूजा करे (३४)। तब दूर्वा, अक्षत, रक्त-पुष्प, बबंरा-पत्र, अपराजिता-पुष्प— ये सब लेकर ‘ह्रीं’ मन्त्र से पात्र में छोड़कर उसमें तीर्थों का आवाहन करे (३५)। फिर ‘हूँ’ बीज से अवगुण्ठन- द्वारा अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा का अवगुण्ठन कर अस्त्र-मुद्रा द्वारा उसकी रक्षा करे। तब धेनु-मुद्रा से उसे अमृतीकृत कर उसे मत्स्य-मुद्रा से आच्छादित करे (३६)। फिर उस अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा के ऊपर दस बार मूल-मन्त्र का जप कर उसमें इष्ट-देवता का आवाहन कर पुष्पाञ्जलि देकर निम्न पाँच मन्त्रों से सुधा को अभिमन्त्रित करे (३७)—

छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ३५ अखण्डैक-रसानन्दाकरे पर-सुधात्मनि ! स्वच्छन्द-स्फुरणामुत्र निधेहि कुल-रूपिणि ॥१॥ हे कुल-रूपिणि ! तुम इस परम सुधा-मयी वस्तु से अखण्ड एकमात्र सान्द्र रस और सान्द्रानन्द-प्रदायिनी हो । तुम स्वाधीन स्फूर्ति प्रदान करो (३८) । अनङ्गस्थामृताकारे शुद्ध-ज्ञान-कलेवरे ! अमृतत्त्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्न-रूपिणि ॥२॥ तुम अनङ्गस्थ अमृत-स्वरूपा हो, विशुद्ध ज्ञान ही तुम्हारा शरीर है । तुम क्लिन्न-रूप इस वस्तु में अमृतत्व स्थापित करो (३६) । तद्-रूपेणैकरस्यं च कृत्वाध्यं तत्-स्वरूपिणि ! भूत्वा कुलामृताकारं मयि विस्फुरणं कुरु ॥३॥ हे सुरा-स्वरूपिणि ! तुम प्रधान माधुर्य-रस-रूप में इस पूजार्घ्य-रूप मद्य को ऐकरस्य अर्थात् प्रधान माधुर्य-विशिष्ट कर कुलामृत-स्वरूप होकर हमारी स्फूर्ति का साधन करो (४०) । ब्रह्माण्ड-रस-सम्भूत मशेष-रस-सम्भवम् । आपूरितं महा-पात्रं पीयूष-रसमावह ॥४॥ सुधा से पूर्ण यह महा-पात्र ब्रह्माण्ड-रस से युक्त, अशेष रस का आकर है, इसे पीयूष-रस-मय करो (४१) । अहन्ता-पात्र-भरितमिदन्ता-परमामृतम् । पराहन्ता-मये वह्नौ होम-स्वीकार-लक्षणम् ॥५॥ आत्म-भाव-रूप पात्र में धारित इदं-भाव-रूप परम अमृत को परात्म-रूप वह्नि में अहन्तादि पात्र को इदन्तादि के सहित स्वीकार करने के लक्षण वाली होमाहुति प्रदान करा (४२) । इस प्रकार सुरा को अभिमन्त्रित कर शिव और शिवानी की समरसता का ध्यान-पूजन कर धूप-दीप दिखाये (४३) । कुल-पूजा-विषय में यह 'श्रीपात्र-संस्कार' तुमसे कहा गया । मन्त्रज्ञ व्यक्ति यदि इस प्रकार संस्कार नहीं करता, तो वह पाप-भागी होता है और उसकी पूजा निष्फल होती है (४४) । ज्ञानी व्यक्ति घट और श्रीपात्र के मध्य स्थान में गुरु-पात्र, भोग-पात्र, शक्ति-पात्र, योगिनी-पात्र, वीर-पात्र, बलि-पात्र, आचमन-पात्र और पाद्य-पात्र-श्रीपात्र को मिलाकर ये नौ पात्र स्थापित करे । सामान्यार्घ्य-स्थापन की विधि के अनुसार पात्र-स्थापन करना चाहिए (४५-४६) । फिर इन सभी पात्रों का तीन भाग कलशस्थ सुधा से भरकर इन सब पात्रों में माष-बराबर शुद्धि-खण्ड छोड़े (४७) । तब बाएँ हाथ के अंगुष्ठ और अनामिका से पात्र-स्थित अमृत शुद्धि-खण्ड के सहित लेकर तत्त्व-मुद्रित दाएँ हाथ से सभी पात्रों से तर्पण करे । इस तर्पण की विधि बाद में कहूँगा (४८) । श्रीपात्र से शुद्धि-सहित परम विन्दु अर्थात् सुधा-बिन्दु लेकर आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी का तर्पण करे (४६) । फिर गुरु-पात्रस्थ अमृत से गुरु-समूह का तर्पण करे । ब्रह्म-रन्ध्र में स्थित सहस्र-दल-कमल में पत्नी के साथ अपने गुरु का तर्पण कर वाग्भव बीज 'ऐं' को आदि में जोड़कर गुरु-चतुष्टय अर्थात् १ गुरु, २ परम गुरु, ३ परापर गुरु और ४ परमेष्ठी गुरु के नामों को उच्चारण करते हुए तर्पण करे (५०) । मन्त्रज्ञ व्यक्ति, इसके बाद, अपने हृदय-कमल में भोग-पात्रस्थ अमृत से पहले 'आत्म-बीज'-'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा' फिर 'आद्यां कालीं तर्पयामि' और अन्त में 'स्वाहा'-इस मन्त्र से तीन बार इष्ट-देवता का तर्पण करे । इसी प्रकार शक्ति-पात्र के अमृत से अङ्ग-देवताओं और आवरण-देवताओं का तर्पण करे (५१-५२) ।

३६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र योगिनी-पात्रस्थ अमृत से अस्त्र एवं परिकर के सहित वर्तमान आद्या कालिका का तर्पण कर बटुकादि को पंच-बलियां प्रदान करे (५३) । १- सुधी व्यक्ति अपने बाईं ओर एक सामान्य चतुष्कोण-मण्डल बनाए । फिर उसकी पूजा कर उस पर मद्य-युक्त सामिष अन्न स्थापित करे (५४) । वाक्—'ऐं', माया—'ह्रीं', कमला—'श्रीं' और 'वं' के बाद 'बटुकाय नमः'—इस मन्त्र से मण्डल के पूर्व-भाग में बटुक को बलि दे (५५) । २—तदनन्तर 'यां योगिनीभ्यः स्वाहा' इस मन्त्र से मण्डल के दक्षिण में योगिनियों को बलि दे (५६) । ३—फिर छः दीर्घ-स्वर-युक्त सम्वर्त्त (क्ष) अर्थात् 'क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः' के बाद 'क्षेत्र-पालाय नमः' इस मन्त्र से मण्डल के पश्चिम में क्षेत्रपाल को बलि दे (५७) । ४—छः दीर्घ स्वर-युक्त 'ख' वर्ण के अन्त के बीज (ग) अर्थात् 'गां गीं गूं गैं गौं गः' का उद्धार कर चतुर्थी के एक-वचनान्त 'गणपति' शब्द—'गणपतये' का उच्चारण कर वह्निजाया—'स्वाहा' कह कर इस मन्त्र से मण्डल की उत्तर दिशा में गणेश को बलि दे । ५—इसी प्रकार मण्डल के मध्य भाग में यथा-विधि सर्व-भूत को बलि दे (५८) । 'ह्रौं श्रीं सर्व' इस पद का उच्चारण कर 'विघ्न-कृद्भ्यः' पद का उच्चारण करे । फिर 'सर्व-भूतेभ्यः' यह पद कहकर 'हूँ फट् स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करे ! यही सर्व-भूत का बलि-मन्त्र कहा गया है (५६-६०) । इसके बाद निम्न मन्त्र पढ़कर यथा-विधि शिवा को एक बलि प्रदान करे— गृह्ण देवि ! महा-भागे ! शिवे ! कालाग्नि-रूपिणि ! शुभाशुभं फलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव 'मूलं' (ह्रीं श्रीं इत्यादि) एष बलिः शिवायै नमः । अर्थात् हे देवि ! हे महा-भागे ! हे शिवे ! हे कालाग्नि-रूपिणि ! ग्रहण करो ! मेरे शुभ-अशुभ को स्पष्ट रूप से बताओ । अपनी बलि ग्रहण करो । यह बलि शिवा को देता हूँ । हे शिवे ! यह मैंने चक्रानुष्ठान तुमसे बताया है (६१-६२) । तदनन्तर चन्दन, अगरु, कस्तूरी द्वारा अति सुगन्धित पुष्प को कच्छप-मुद्रा-युक्त दोनों हाथों में लेकर अपने हृदय-पद्म में परात्परा काली को लाकर ध्यान करे (६३-६४) । फिर सुषुम्ना-रूप ब्रह्म-पथ से भगवती को सहस्रार के महा-पद्म में ले जाकर निर्मल सुधा से उसे आनन्दित कर गहरे निःश्वास-रूप पथ के द्वारा जैसे एक दीप से दूसरा दीप प्रज्वलित होता है, उसी प्रकार भगवती को अपने हाथों में स्थित उक्त पुष्प में संक्रमित करते हुए उसे यन्त्र में स्थापित कर मन्त्रज्ञ व्यक्ति गहरी भक्ति के साथ हाथ जोड़कर इष्ट-देवता से प्रार्थना करे (६५-६६)— देवेशि ! भक्ति-सुलभे ! परिवार-समन्विते ! यावत् त्वां पूजयिष्यामि तावत् त्वं सुस्थिरा भव ॥ अर्थात् हे देवेशि ! हे भक्ति-सुलभे ! हे बहु-परिवार-वृते ! मैं जब तक तुम्हारी पूजा करूँ, तब तक तुम सुस्थिर होकर रहो (६७) । 'क्रीं आद्ये कालिके देवि ! परिवारादिभिः सह इहागच्छ इहागच्छ ।' यह कहकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करे— इह तिष्ठ इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि, इह सन्निरुद्धस्व, मम पूजां गृहाण ।

छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ३७ इस प्रकार देवी का आवाहन कर प्राण-प्रतिष्ठा करे (६८-७०) । यथा- आं ह्रीं क्रों श्रीं स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः प्राणा इह प्राणाः, आं ह्रीं क्रों श्रीं स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः जीव इह स्थितः, आं ह्रीं क्रों श्रीं स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः सर्वेन्द्रियाणि, आं ह्रीं क्रों स्वाहा आद्या-काली-देवतायाः वाङ्-मनो-नयन-घ्राण-श्रोत्र-त्वक्- प्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा । अर्थात् आद्या काली के प्राण इस स्थान में प्राण, आद्या काली की जीवात्मा इस स्थान में रहे, आद्या काली की सभी इन्द्रियाँ, आद्या काली के वाक्य, मन, चक्षु, नासा, कर्ण, त्वक् और प्राण यहाँ आकर बहु काल तक सुख से रहें (७१-७४) । इस प्रकार प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र का तीन बार पाठ कर लेलिहान-मुद्रा से यन्त्र के मध्य में देवी को प्राण- प्रतिष्ठा कर हाथ जोड़कर निम्न मन्त्रों से उनका स्वागतादि करे (७५)— आद्ये कालि ! स्वागतं ते सुस्वागतमिदं तव । आसनं चेदमत त्वयाऽऽस्यतां परमेश्वरि ! अर्थात् हे आद्ये कालि ! तुम्हारा स्वागत है, यह तुम्हारा सुस्वागत है। यह तुम्हारा आसन है। हे परमेश्वरि ! तुम यहाँ विराजो (७६) । फिर देवता-शुद्धि के निमित्त तीन बार मूल-मन्त्र का उच्चारण कर विशेषार्घ्य-जल से देवी को प्रोक्षित करे । तब षडङ्ग-मन्त्र से सकलीकरण करे । देवता के अङ्गों में षडङ्ग-न्यास करना ही सकलीकरण है। इसके बाद षोडश उपचारों से देवी की पूजा करे (७७) । १. पाद्य, २. अर्घ्य, ३. आचमनीय, ४. स्नान, ५. वसन, ६. भूषण, ७. गन्ध, ८. पुष्प, ६. धूप, १०. दीप, ११. नैवेद्य, १२. पुनः आचमनीय, १३. अमृत, १४. ताम्बूल, १५. तर्पण, १६. नमस्कार-देवी-पूजा के समय यही षोडश उपचार प्रयोग करे (७८-७६) । आद्या-बीज-'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा'-'इदं पाद्यं आद्यायै काल्यै नमः।' इस मन्त्र से दोनों चरणों में पाद्य प्रदान करे । फिर इसी प्रकार ('नमः' पद में परिवर्तन करते हुए) अन्त में 'स्वाहा' लगाकर मस्तक पर अर्घ्य निवेदित करे । ज्ञानी साधक इसी प्रकार अन्त में 'स्वधा' लगाकर मुख में आचमनीय और उक्त मन्त्र से देवी के मुख-कमल में मधुपर्क प्रदान करे । इसी मन्त्र के अन्त में ('स्वधा' के स्थान पर) 'निवेदयामि' लगाकर देवी के सर्वाङ्ग में स्नानीय, वस्त्र, भूषण-ये सब प्रदान करे (८०-८२) । सर्व-प्रथम मन्त्र के समान अन्त में 'नमः' जोड़कर मध्यमा-अनामिका से देवी के हृदय-कमल में गन्ध लगावे । फिर 'नमः' के स्थान में 'वौषट्' लगाकर पुष्प प्रदान करे (८३) । तब धूप, दीप को सामने स्थापित कर प्रोक्षणादि से उन्हें संशोधित कर मन्त्र के अन्त में ('वौषट्' के स्थान में) 'निवेदयामि' लगाकर उन्हें देकर ज्ञानी व्यक्ति निम्न मन्त्र से घण्टा की पूजा करे- जय-ध्वनि-मन्त्र-मातः स्वाहा । फिर बाँएँ हाथ से घण्टा बजाते हुए दाएँ हाथ से धूप लेकर देवी की नासिका के निकट रखकर दीपक को देवी के सम्मुख नेत्रों तक दस बार घुमावे (८४-८६) ।

३८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तब पान-पात्र एवं शुद्धि (मांसादि) दोनों हाथों में ले मूल मन्त्र का उच्चारण करते हुए यन्त्र के मध्य में निवेदित कर, निम्न मन्त्र से प्रार्थना करे (८७)। यथा- परमं वारुणी-कल्पं कोटि-कल्पान्त-कारिणि ! गृहाण शुद्धि-सहितं देहि मे मोक्षमव्ययम् । अर्थात् हे कोटि-कल्पान्त करनेवाली ! इस श्रेष्ठ वारुणो-कल्प को शुद्धि के साथ ग्रहण करो और मुझे अक्षय मुक्ति प्रदान करो (८८)। इसके बाद सामान्य विधि से अपने सामने मण्डल लिखकर उस पर नैवेद्य-पूर्ण पात्र को स्थापित करे (८६) फिर 'फट्' से नैवेद्य का प्रोक्षण, 'हुं' से अवगुण्ठन, 'फट्' से रक्षाकरण, 'वं' से अमृतीकरण कर मूलमन्त्र से सात बार उसे अभिमन्त्रित कर अर्घ्य-जल द्वारा उसे निवेदित करे (६०) । यथा- मूलं एतत्तु सिद्धान्नं सर्वोपकरणान्वितम् । निवेदयामीष्ट-देव्यै जुषाणेदं हविः शिवे ! अर्थात् सभी सामग्रियों से युक्त पके हुए अन्न को इष्ट-देवता के लिए निवेदन करता हूँ । हे शिवे ! इस 'हवि' (भोज्य-पदार्थ) को ग्रहण करो (६१) । इसके बाद प्राणादि पञ्च-मुद्राएँ दिखाकर देवी को हवि (भोज्य पदार्थ) को खिलावे (६२)। फिर बाएँ हाथ से प्रस्फुटित पद्माकृति वाली नैवेद्य-मुद्रा दिखाये । तब मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए पीने के लिए तीर्थ (सुरा) से पूर्ण कलश एवं पुनराचमनीय निवेदन कर श्रोपात्र के अमृत से तीन बार तर्पण करे (६३-६४) । साधक मूल-मन्त्र से देवी के शिर, हृदय, मूलाधार, दोनों चरणों और सर्वाङ्ग में पांच पुष्पाञ्जलियाँ अर्पित कर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे। यथा- तव आवरण-देवान् पूजयामि नमः । अर्थात् तुम्हारे आवरण देवताओं की पूजा करता हूँ (६५-६६) । यन्त्र के अग्नि, नैऋत्य, वायु, ईशान कोणों में, सामने और पीछे के भाग में क्रमशः षडङ्ग-पूजा कर गुरु-पंक्ति की अर्चना करे (६७)। गुरु, परम-गुरु, परापर-गुरु और परमेष्ठि-गुरु-इन सब कुल-गुरुओं की पूजा करे (६८) । गुरु-पात्र के अमृत से तीन-तीन बार इनका तर्पण करे। तर्पण मन्त्र - ॐ गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परमं-गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परापर-गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परमेष्ठि-गुरुं तर्पयामि नमः । इसके बाद अष्ट-दलों के मध्य में अष्ट-नायिकाओं की पूजा करे (६६) । १. मङ्गला, २. विजया, ३. भद्रा, ४. जयन्ती, ५. अपराजिता, ६. नन्दिनी, ७. नारसिंही और ८. कौमारी-ये ही अष्ट-मातायें हैं (१००)। पूजन-मन्त्र - 'ॐ मङ्गलायै नमः' इत्यादि । साधक-श्रेष्ठ दलों के अग्र-भाग में १. असिताङ्ग, २. रुरु, ३. चण्ड, ४. क्रोधोन्मत्त, ५. भयङ्कर, ६. कपाली, ७. भीषण और ८. संहार-इन अष्ट-भैरवों की पूजा करे (१०१-१०२) । भूपुर के मध्य में इन्द्रादि दश दिक्पालों की पूजा करे और उसके बहिर्भाग में दिक्पालों के अस्त्रों की पूजा करे। फिर दिक्पालों का तर्पण करे (१०३) । इसी प्रकार एकाग्र-चित्त से पाद्यादि सभी उपचारों से देवी की पूजा कर बलि प्रदान करे (१०४) । १. मृग, २. छाग, ३. मेष, ४. महिष, ५. शूकर, ६. शल्लकी, ७. शशक, ८. गोधा, ६. कूर्म, १०. गण्डार ये दस

छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि | ३६ पशु (बलि के लिए प्रशस्त) कहे गये हैं (१०५) । साधक की इच्छानुसार अन्यान्य पशुओं की भी बलि दी जा सकती है (१०६) । मन्त्रज्ञ साधक रोगादि-शून्य सुलक्षण पशु को देवी के सम्मुख स्थित कर अर्घ्य जल से उसका प्रोक्षण और धेनु-मुद्रा से अमृतीकरण कर 'छागाय पशवे नमः' मन्त्र से यथा-सम्भव गन्ध, सिन्दूर, पुष्प, नैवेद्य और जल से उसकी पूजा कर पशु के दाएँ कान में पशु-पाश-विमोचनी पशु-गायत्री का जप करे (१०७-१०८) । यथा— पशु-पाशाय विद्महे, विश्व-कर्मणे धीमहि, तन्नो जीवः प्रचोदयात् । तब श्रेष्ठ साधक खड्ग को लेकर कूर्च-बीज 'हूँ' से क्रमशः खड्ग के अग्र, मध्य और मूल प्रदेश में वागी- श्वरी-ब्रह्मा, लक्ष्मी-नारायण और उमा-महेश्वर की पूजा करे (१०६-११२) । फिर निम्न मन्त्र से खड्ग की पूजा करे (११३)— ब्रह्म-विष्णु-शिव-शक्ति-युताय खड्गाय नमः । तदनन्तर महा-वाक्य द्वारा पशु का उत्सर्ग कर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (११४)— यथोक्तेन विधानेन तुभ्यमस्तु समर्पितम् । इस प्रकार विधि-पूर्वक निवेदन कर पशु को भूमि पर स्थित करे (११५) देवी-भक्ति-परायण होकर तीक्ष्ण प्रहार से पशु का छेदन करे । पशु-छेदन स्वयं, भ्राता, भ्रातु-पुत्र, सुहृद् या सपिण्ड इन सबके द्वारा कर्तव्य है । शत्रु-पक्ष को इस कार्य में कभी न लगाए (११६) । फिर 'एष कवोष्ण-रुधिर-बलिः ॐ बटुकेभ्यो नमः' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए कुछ उष्ण (तुरन्त निकले हुए) रुधिर की बलि प्रदान करे और 'एष स-प्रदीप शीर्ष-बलिः ॐ ह्रीं देव्यै नमः' से देवी को शीर्ष-बलि प्रदान करे (११७) । कौलिकों के कुलार्चन में इसी प्रकार बलि-विधि कही गई है । इसे किए बिना देवता की प्रीति कदापि नहीं मिलती (११८) । हे प्रिये ! इसके बाद होम करे । उसकी विधि बताता हूँ, सुनो (११९) । श्रेष्ठ साधक अपनी दाईं ओर बालुका-राशि से चार हाथ लम्बा-चौड़ा चतुष्कोण-मण्डल बनाकर मूल-मन्त्र से वीक्षण, अस्त्र (फट्) से ताड़न, उसी से प्रोक्षण और कूर्च-बीज 'हूँ' से अवगुण्ठन कर देवता-नाम का उच्चारण करते हुए 'स्थण्डिलाय नमः' से स्थण्डिल की पूजा करे (१२०-१२१) । फिर स्थण्डिल में प्रादेश-बराबर तीन पूर्वाग्र और तीन उत्तराग्र रेखाएँ बनाए और उन पर निम्न देवताओं की पूजा करे (१२२) । पूर्वाग्र तीन रेखाओं में मुकुन्द, ईश, पुरन्दर और उत्तराग्र तीन रेखाओं में ब्रह्मा, वैवस्वत और इन्दु की क्रमशः पूजा करे (१२३) । फिर साधक स्थण्डिल के मध्य में त्रिकोण-मण्डल बनाए, जिसके मध्य में 'ह्रौं:' लिखे । त्रिकोण-मण्डल के बाहर षट्कोण, उसके बाहर वृत्त और उसके बाहर अष्ट-दल पद्म तथा उसके बाहर भूपुर लिखे । इस प्रकार उत्तम यन्त्र की रचना करे (१२४) । फिर मूल-मन्त्र से पुष्पाञ्जलि देकर यन्त्र की पूजा कर प्रणव से होम-द्रव्य का प्रोक्षण करे । अष्ट-दल पद्म की कर्णिका में माया-बीज 'ह्रीं' से आधार-शक्तियों की एक बार में पूजा करे या अलग-अलग उनकी पूजा करे (१२५) । यन्त्र के अग्नि आदि चार कोणों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य की और पूर्वाद चार दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य की क्रमशः पूजा कर साधक मध्य में अनन्त, पद्म, कला-सहित सूर्य और सोम-मण्डलों की पूजा कर प्रागादि केशरों में क्रमशः अग्नि की जिह्वाओं की पूजा करे—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा, धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा, ज्वलिनी (१२६-१२८) । सर्वत्र देवताओं के नाम के आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः' लगाकर पूजा करे ।

४० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र 'रं वह्नेरासनाय नमः' इस मन्त्र से वह्नि के आसन को पूजा करे (१३०)। फिर साधक ऋतु-स्नाता, नील-नलिनी-लोचना, वागीश्वर-युता वागीश्वरी देवी का ध्यान कर उक्त वह्न्यासन में माया-बीज 'ह्रीं' से उन वागीश्वर और वागीश्वरी की पूजा करे। तब विधि-पूर्वक अग्नि को लाकर मूल-मन्त्र से उसका वीक्षण और 'फट्' से आवाहन करे (१३१-१३२)। 'ॐ वह्नेर्योग-पीठाय नमः' से वह्नि-पीठ की पूजा कर पीठ पर पूर्वादि चार दिशाओं में वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका की क्रमशः पूजा करे (१३३)। तब 'अमुक्या देवतायाः स्थण्डिलाय नमः' से स्थण्डिल की पूजा कर उसके मध्य में मूल-रूपिणी वागीश्वरी देवी का ध्यान कर वह्नि-बीज 'रं' का उच्चारण कर अग्नि को उठाकर 'मूलं हूं फट् क्रव्यादेभ्यो स्वाहा' से राक्षस-गण को देय अंश दक्षिण दिशा में डाल दे। तदनन्तर अस्त्र-बीज 'फट्' से अग्नि का वीक्षण कर, कूर्च-बीज 'हूं' से अवगुण्ठन (तर्जनी घुमाकर वह्नि- वेष्ठन) करे (१३४-१३६)। धेनु-मुद्रा से अमृतीकरण कर दोनों हाथों से अग्नि को उठाकर प्रदक्षिण-क्रम से स्थण्डिल के ऊपर उसे तीन बार घुमाकर अग्नि को शम्भु-वीर्य समझते हुए, घुटनों से भूमि को स्पर्श करते हुए, निजाभिमुख कर योनि-यन्त्र के ऊपर स्थापित करे (१३७-१३८)। इसके बाद साधक 'ह्रीं वह्नि-मूर्तये नमः' से और 'रं वह्नि-चैतन्याय नमः से वह्नि-मूर्ति और वह्नि- चैतन्य की पूजा करे। 'नमः' मन्त्र से वह्नि-मूर्ति और वह्नि-चैतन्य की भावना मन ही मन करते हुए निम्न मन्त्र से अग्नि को प्रज्वलित करे (१३६-४०)— ॐ चित्पिङ्गल हन हन, दह दह, पच पच, सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा । इसी मन्त्र से अग्नि जलाने का निर्देश है। फिर हाथ जोड़कर अग्नि की वन्दना करे (१४१-४२)— अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् । सुवर्ण-वर्णममलं समिद्धं सर्वतोमुखम् ॥ अर्थात् प्रज्वलित, सुवर्ण-तुल्य, निर्मल, प्रदीप्त और सर्वतोमुख, जातवेद, हुताशन की मैं वन्दना करता हूँ (१४३)। इस प्रकार अग्नि की वन्दना कर कुश से स्थण्डिल को आच्छादित करे। फिर अपने इष्ट-देवता का नाम लेकर वह्नि-नाम का उच्चारण कर अभ्यर्थना करे (१४४)। यथा— ॐ वैश्वानर ! जातवेद ! इहावहावह लोहिताक्ष ! सर्व-कर्माणि साधय स्वाहा । तब हिरण्यादि सात जिह्वाओं का पूजन करे (१४५)। फिर बुद्धिमान साधक 'सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः' से हृदयादि वह्नि-षडङ्ग की पूजा कर वह्नि-मूर्ति की पूजा करे (१४६-४७)। जातवेद आदि वह्नि की अष्ट-मूर्तियाँ पहले ही बताई हैं (१४८)। फिर ब्राह्मी आदि अष्ट-शक्तियों की पूजा कर पद्मादि अष्ट-निधियों की पूजा कर इन्द्रादि दिक्-पतियों की पूजा करे (१४६)। इसी प्रकार दिक्-पतियों के वज्रादि अस्त्रों की पूजा कर प्रादेश- बराबर दो कुश-पत्र लेकर घृत के मध्य में स्थापित करे (१५०)। घृत के बाईं ओर इडा, दाईं ओर पिंगला ओर मध्य में सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान कर एकाग्र-चित्त से दाईं ओर से घी लेकर निम्न मन्त्रों से अग्नि के दाएँ नेत्र में आहुति प्रदान करे (१५१)- ॐ अग्नये स्वाहा । फिर बाईं ओर से घी लेकर अग्नि के बाएं नेत्र में आहुति दे (१५२-१५३)-ॐ सोमाय स्वाहा । तब मध्य भाग से घी लेकर अग्नि के ललाट में आहुति दे-ॐ अग्नी-षोमाभ्यां स्वाहा । इसके बाद 'नमः' से दाएँ भाग से पुनः घी लेकर अग्नि के मुख में होम करे-

छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ४१

ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। फिर तीन व्याहृतियों से होम करे (१५४-१५६)। यथा- ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा। तदनन्तर निम्न मन्त्र से तीन आहुतियां प्रदान करे (१५७)- ॐ वैश्वानर ! जातवेद ! इहावहावह लोहिताक्ष ! सर्व-कर्माणि साधय स्वाहा। इसके बाद अग्नि में अपने इष्ट-देवता का आवाहन कर पीठादि-सहित उसकी पूजा कर स्वाहान्त मूल- मन्त्र (मूलं स्वाहा) से अग्नि के मध्य में पचीस आहुतियां प्रदान करे और अपनी बुद्धि द्वारा वह्नि, देवी एवं अपनी आत्मा के ऐक्य-भाव का चिन्तन करता हुआ मूल-मन्त्र से ग्यारह आहुतियां अंग-देवता के उद्देश्य से प्रदान करे। तदनन्तर अपनी कामना-पूर्ति के लिए तिल, घृत और मधु-मिश्रित पुष्प, बिल्व-दल अथवा यथा- विहित वस्तु द्वारा यथा-शक्ति आहुतियों से होम करे। आठ से कम आहुतियां न दे (१५८-१६१)। अन्त में स्वाहान्त मूल-मन्त्र से अग्नि में फल और ताम्बूल से युक्त पूर्णाहुति प्रदान करे। फिर संहार- मुद्रा से देवी को अग्नि से लाकर हृदय-कमल में स्थापित करे (१६२)। तब 'अग्ने क्षमस्व' कहकर अग्नि का विसर्जन करे। फिर दक्षिणा देकर अच्छिद्रावधारण करे (१६३)। इसके बाद हवन से शेष द्रव्य अर्थात् घृत- मिश्रित भस्म को दोनों भौंहों के मध्य में धारण करे (१६४)। सभी आगम-कर्मों में इसी प्रकार होम की विधि कही है। होम-कर्म समाप्त कर साधक जप करे (१६५)। हे देवेशि ! जिस प्रकार विद्या प्रसन्न होती है, मैं उस प्रकार के जपानुष्ठान का विधान बताता हूँ, सुनो। मन-ही-मन देवता, गुरु और मन्त्र के ऐक्य का चिन्तन करे (१६६)। मन्त्र-वर्ण को देवता कहा गया है और देवता गुरु-रूपिणी है। जो व्यक्ति इन तीनों में अभेद जानता हुआ पूजा करता है, उसे उत्तम सिद्धि मिलती है (१६७)। मस्तक में गुरु का ध्यान कर हृदय-कमल में देवता का और जिह्वा में तेजोरूपा मूल-मन्त्रात्मिका विद्या का ध्यान कर गुरु, देवता और मूल-मन्त्र-इन तीनों के तेज द्वारा एकीकृत आत्मा का ध्यान करे (१६८)। मूल-मन्त्र को प्रणव से सम्पुटित कर उसका सात बार जप करे। फिर मातृका से पुटित कर उसे सात बार स्मरण करे (१६६)। चतुर साधक अपने शिरोदेश में माया-बीज 'ह्रीं' का दस बार जप करे। उसी प्रकार अपने मुख में दस बार प्रणव का जप करे। पुनः हृदय-कमल में सात बार माया-बीज का जप कर प्राणायाम करे (१७०)। तदनन्तर प्रवाल (मूंगा) आदि से बनी माला लेकर निम्न मन्त्र से उस माला की पूजा करे- माले ! माले ! महा-माले ! सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥ अर्थात् हे माले ! हे माले ! हे महा-माले ! हे सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों वर्ग तुममें विन्यस्त हैं। इसलिए तुम मुझे सिद्धि प्रदान करो। इस मन्त्र से माला की पूजा कर मूलमन्त्र का उच्चारण कर श्रीपात्र के अमृत से तीन बार माला का तर्पण कर स्थिर-चित्त से एक सहस्र आठ या एक सौ आठ बार मूल-मन्त्र का जप करे (१७१-१७३)। तब प्राणा- याम कर श्रीपात्र के जल और पुष्प द्वारा देवी के बाएँ कर-कमल में निम्न मन्त्र से तेजोरूप जप-फल समर्पित करे- गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि ! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि ॥ अर्थात् हे देवि ! हे महेश्वरि ! तुम गुह्या, अति गुह्या और रक्षा-कर्त्री हो। तुम मेरे किए हुए जप को ग्रहण करो। तुम्हारे प्रसाद से मुझे सिद्धि मिले। फा०-६

४२ । हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र इस प्रकार समर्पण कर पृथिवी पर प्रणाम करे। तब हाथ जोड़कर 'स्तव' और 'कवच' का पाठ करे (१७४-१७६)। फिर प्रदक्षिणा करके विलोम मन्त्र का उच्चारण करते हुए संस्थापित विशेषार्घ्य से विलोमार्घ्य प्रदान कर निम्न मन्त्र से आत्म-समर्पण करे- इतः पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्माधिकारतः, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्त्यवस्थासु, मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यां उदरेण शिश्नया यत् कृतं, यत् स्मृतं, यदुक्तं, तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु । मां मदीयं सकलं आद्या-काली- पदाम्भोजे अर्पयामि ॐ तत् सत् । अर्थात् इसके पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्म के अधिकार में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में मन, वाक्य, कर्म, दोनों हाथों, दोनों पैरों, उदर और उपस्थ द्वारा यथा-सम्भव जो कुछ किया गया, स्मरण हुआ और कहा गया-वह सभी ब्रह्म को अर्पित हो। मैं और वह सभी वस्तु, जो मेरी कहकर अभिमान होता है, आद्या-काली के श्रीचरण-कमलों में अर्पित करता हूँ। यही 'आत्म-समर्पण मन्त्र' है (१७७-१८१)। इसके बाद हाथ जोड़कर इष्ट-देवता से प्रार्थना करे- ह्रीं श्रीआद्ये कालिके ! यथा-शक्त्या पूजितासि, क्षमस्व । इस प्रकार विसर्जन कर संहार-मुद्रा से गृहीत पुष्प को सूंघ कर इष्ट-देवता को अपने हृदय में स्थापित करे (१८२-८३)। तब ईशान-कोण में एक सुन्दर त्रिकोण-मण्डल बनाकर उस पर निर्माल्य पुष्प और जल द्वारा निम्न मन्त्र से निर्माल्य-वासिनी देवी की पूजा करे (१८४)—ह्रीं निर्माल्य-वासिन्यै नमः । इसके बाद साधक ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि सभी देव-गण को नैवेद्य बांट कर फिर स्वयं ग्रहण करे (१८५)। अपने बाईं ओर भिन्न आसन पर अपनी शक्ति को बैठाकर अथवा उसके साथ एक ही आसन पर बैठकर पानादि मनोरम पात्र स्थापित करे (१८६) । पात्र का परिमाण पाँच तोले से अधिक और तीन तोले से कम न हो। स्वर्ण, रजत, काच या नारिकेल का पात्र बनवाए। शुद्धि-पात्र के दाईं ओर आधार के ऊपर उसे स्थापित कर साधक महा-प्रसाद को लाकर स्वयं या भाई या पुत्र द्वारा ज्येष्ठता के क्रम से पात्रों में उसे रखवाए (१८७- १८८) । पान-पात्र में सुधा और शुद्धि-पात्र में शुद्धि (मांस-मत्स्यादि) प्रदान करे। तब देवी-पूजा के समय आए हुए लोगों के साथ पान-भोजन करे (१८९)। पहले आस्तरण के लिए उत्तम शुद्धि ग्रहण करे। फिर सभी कुल-साधक अत्यन्त आनन्द-चित्त से उत्कृष्ट मद्य से पूरित अपने-अपने पात्र लेकर मूलाधार से जिह्वा तक व्याप्त चैतन्य-स्वरूपा 'कुल-कुण्डलिनी' का ध्यान कर उसके मुख-कमल में, मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए, एक-दूसरे की अनुमति लेकर परमामृत को होम करे । (१९१-९३)। कुल-स्त्रियों के लिए मद्य की गन्ध का ग्रहण करना ही अलि-पान है। गृहस्थ साधकों के लिए पञ्च-पात्र तक मद्य-पान करना अलि-पान कहा गया है। कुल-साधकों के लिए अतिरिक्त पान करना सिद्धि-हानि- कारक होता है (१९४-९५)। जब तक दृष्टि में चंचलता न हो, तभी तक पान करना चाहिए। इससे अधिक पान पशु-पान के समान है (१९६) । पान करने से जिसके चित्त में व्याकुलता हो और जो शक्ति-साधक से घृणा करे, वह किस प्रकार यह कह सकता है कि 'मैं आद्या काली का भजन करता हूँ (१९७)?' जिस प्रकार ब्रह्म को समर्पित अन्नादि के छूने में दोष नहीं है (अर्थात् जाति-भेद वर्जित रहता है), उसी प्रकार तुम्हारे प्रसाद के सम्बन्ध में जाति-भेद का विचार न करे (१९८)। इसी प्रकार विधि के अनुसार पान-भोजन करे। तुम्हारे नैवेद्य के सेवन में हाथ धोने की विधि नहीं है। वस्त्र या जल से हस्त-लेप को दूर करे (१९९) । तदनन्तर बुद्धिमान साधक मस्तक पर निर्माल्य-पुष्प को धारण कर लेप-द्रव्य को भ्रू-मध्य में धारण करे और देव-तुल्य होकर भू-तल पर विचरण करे (२००)।

सातवाँ उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन महा-फल-जनक, सौभाग्य और मोक्ष-प्रद, ब्रह्म-ज्ञान के लाभ का अद्वितीय साधन आद्या-काली का मन्त्रो- द्धार, प्रातःकृत्य, स्नान, सन्ध्या, सम्विदा-शोधन, बाह्य और मानस-भेद से न्यास एवं पूजा-विधान, बलिदान, होम, भैरवी और तत्त्व-चक्रानुष्ठान तथा महा-प्रसाद-ग्रहण को सुनकर प्रसन्न-चित्ता पार्वती देवी ने विनय से झुककर शंकर से कहा (१-३)— हे सदाशिव ! हे जगन्नाथ ! हे जगत् के हितकर्त्ता ! हे देव ! तुमने कृपा के वशीभूत होकर मुझसे प्राणियों के लिए हितकर, भोग और मोक्ष के अद्वितीय साधन—विशेषकर कलियुग में जीवों के लिए शीघ्र सिद्धि-दायक परमा प्रकृति का साधन बताया है (४-५) । तुम्हारे वाक्य-रूपी अमृत-सागर में क्रमशः निमग्न-प्राय मेरा मन कुछ-कुछ ऊपर उठने के लिए चेष्टा नहीं करता, अपितु पुनः उसे प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता है (६) । महादेवी की पूजा-विधि में स्तोत्र और कवच-पाठ की सूचना दी है किन्तु उन्हें प्रकाशित नहीं किया है। हे देव ! इस समय उन्हें प्रकट करें (७) । श्री सदाशिव ने कहा—हे जगद्-वन्द्ये ! हे देवि ! यह सर्वोत्तम स्तोत्र कहता हूँ, सुनो, जिसका पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति सर्व-सिद्धियों का ईश्वर होता है (८) । इसके द्वारा असौभाग्य का नाश और सुख-सम्पत्ति का वर्द्धन होता है। यह अकाल-मृत्यु को दूर करता है और आपत्तियों का निवारण करता है (९) । हे शिवे ! इस स्तोत्र से आद्या कालिका देवी का सुख-दायक सान्निध्य प्राप्त होता है। मैं इसी स्तोत्र के फल-स्वरूप 'त्रिपुरारि' हुआ हूँ (१०) । हे देवि ! इस स्तोत्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका और विनियोग धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के हेतु बताया गया है (११) । यथा— विनियोग : अस्य स्तोत्रस्य ऋषिः सदाशिवः, छन्दो अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका, धर्मार्थ-काम- मोक्षेषु विनियोगः । स्तोत्र : ह्रीं काली श्रीं कराली च क्रीं कल्याणी कलावती । कमला कलि-दर्पघ्नी कपर्दीश-कृपान्विता ॥१॥ कालिका काल-माता च कालानल-सम-द्युतिः । कपर्दिनी करालास्या करुणामृत-सागरा ॥२॥ कृपा-मयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा । कृशानुः कपिला कृष्णा कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी ॥३॥ काल-रात्रिः काम-रूपा काम-पाश-विमोचनी । कादम्बिनी कलाधारा कलि-कल्मष-नाशिनी ॥४॥ कुमारी-पूजन-प्रीता कुमारी-पूजकालया । कुमारी-भोजनानन्दा कुमारी-रूप-धारिणी ॥५॥ कदम्ब-वन-सञ्चारा कदम्ब-वन-वासिनी । कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा कदम्ब-पुष्प-मालिनी ॥६॥ [ ४३ ]

४४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र किशोरी कल-कण्ठा च कल-नाद-निनादिनी । कादम्बरी-पान-रता तथा कादम्बरी-प्रिया ॥७॥ कपाल-पात्र-निरता कङ्काल-माल्य-धारिणी । कमलासन-सन्तुष्टा कमलासन-वासिनी ॥८॥ कमलालय-मध्यस्था कमलामोद-मोदिनी । कल-हंस-गतिः क्लैव्य-नाशिनी काम-रूपिणी ॥६॥ काम-रूप-कृतावासा काम-पीठ-विलासिनी । कमनीया कल्पलता कमनीय-विभूषणा ॥१०॥ कमनीय-गुणाराध्या कोमलाङ्गी कृशोदरी । कारणामृत-सन्तोषा कारणानन्द-सिद्धिदा ॥११॥ कारणानन्द-जापेष्टा कारणार्चन-हर्षिता । कारणार्णव-सम्मग्ना कारण-व्रत-पालिनी ॥१२॥ कस्तूरी-सौरभामोदा कस्तूरी-तिलकोज्ज्वला । कस्तूरी-पूजन-रता कस्तूरी-पूजक-प्रिया ॥१३ कस्तूरी-दाह-जननी कस्तूरी-मृग-तोषिणी । कस्तूरी-भोजन-प्रीता कर्पूरामोद-मोदिता ॥१४ कर्पूर-मालाभरणा कर्पूर-चन्दनोक्षिता । कर्पूर-कारणाल्हादा कर्पूरामृत-पायिनी ॥१५ कर्पूर-सागर-स्नाता कर्पूर-सागरालया । कूर्च-बीज-जप-प्रीता कूर्च-जाप-परायणा ॥१६ कुलीना कौलिकाराध्या कौलिक-प्रिय-कारिणी । कुलाचारा कौतुकिनी कुल-मार्ग-प्रदर्शिनी ॥१७ काशीश्वरी कष्ट-हर्त्री काशीश-वर-दायिनी । काशीश्वर-कृतामोदा काशीश्वर-मनोरमा ॥१८ कल-मञ्जीर-चरणा क्वणत्-काञ्ची-विभूषणा । काञ्चनाद्रि-कृतागारा काञ्चनाचल-कौमुदी ॥१६ काम-बीज-जपानन्दा काम-बीज-स्वरूपिणी । कुमतिघ्नी कुलीनाति-नाशिनी कुल-कामिनी ॥२० क्रीं ह्रीं श्रो-मन्त्र-वर्णेन काल-कण्टक-घातिनी । इत्याद्या-कालिका-देव्याः शतनाम प्रकीर्त्तितम् ॥२१ ककार-कूट-घटितं काली-रूप-स्वरूपकम् ॥२२॥ फल-श्रुति पूजा-काले पठेद्यस्तु कालिका-कृत-मानसः । मन्त्र-सिद्धिर्भवेदाशु तस्य कालो प्रसीदति ॥ बुद्धिं विद्यां च लभते गुरोरादेश-मात्रतः । धन-वान् कीर्त्ति-मान् भूयाद् दान-शीलो दयान्वितः ॥ पुत्र-पौत्र-सुखैश्वर्यैर्मोदते साधको भुवि । भौमावस्या निशा-भागे म-पञ्चक-समन्वितः ॥ पूजयित्वा महाकालीमाद्यां त्रि-भुवनेश्वरीम् । पठित्वा शत-नामानि साक्षात् काली-मयो भवेत् ॥ नासाध्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किञ्चन । विद्यायां वाक्-पतिः साक्षात् धने धनपतिर्भवेत् ॥ समुद्र इव गाम्भीर्ये बले च पवनोपमः । तिग्मांशुरिव दुष्प्रेक्ष्यः शशि-वत् शुभ-दर्शनः ॥ रूपे मूर्त्ति-धरः कामो योषितां हृदयङ्गमः । सर्वत्र जयमाप्नोति स्तवस्यास्य प्रसादतः ॥ यं यं कामं पुरस्कृत्य स्तोत्रमेतदुदीरयेत् । तं तं काममवाप्नोति श्रीमदाद्या-प्रसादतः ॥ रणे राज-कुले द्यूते विवादे प्राण-सङ्कटे । दस्यु-ग्रस्ते ग्राम-दाहे सिंह-व्याघ्रावृते तथा ॥ अरण्ये प्रान्तरे दुर्गे ग्रह-राज-भयेऽपि वा। ज्वर-दाहे चिर-व्याधौ महा-रोगादि-संकुले ॥

सातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन । ४५ बाल-ग्रहादि-रोगे च तथा दुःस्वप्न-दर्शने । दुस्तरे सलिले वापि पोते वात-विपद्-गते ॥ विचिन्त्य परमां मायामाद्यां कालीं परात्पराम् । यः पठेच्छत-नामानि दृढ-भक्ति-समन्वितः ॥ सर्वापद्भ्यो विमुच्येत देवि सत्यं न संशयः । न पापेभ्यो भयं तस्य न रोगेभ्यो भयं क्वचित् ॥ सर्वत्र विजयस्तस्य न कुत्रापि पराभवः । तस्य दर्शन-मात्रेण पलायन्ते विपद्-गणाः ॥ स वक्ता सर्व-शास्त्राणां स भोक्ता सर्व-सम्पदाम् । स कर्त्ता जाति-धर्माणां ज्ञातीनां प्रभुरेव सः ॥ वाणी तस्य वसेद् वक्त्रे कमला निश्चला गृहे । तन्नाम्ना मानवाः सर्वे प्रणमन्ति ससम्भ्रमाः ॥ दृष्ट्वा तस्य तृणायन्ते ह्यणिमाद्यष्ट-सिद्धयः । आद्या-काली-स्वरूपाख्यं शत-नाम प्रकीर्त्तितम् ॥ अष्टोत्तर-शतावृत्त्या पुरश्चर्याऽस्य गीयते । पुरस्क्रियान्वितं स्तोत्रं सर्वाभीष्ट-फल-प्रदम् ॥ शतनाम-स्तुतिमिमामाद्या-काली-स्वरूपिणीम् । पठेद् वा पाठयेद् वापि शृणुयाच्छावयेदपि ॥ सर्व-पाप-विनिर्मुक्तो ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ॥ अर्थात् १ ह्रीं-रूपा काली, २ श्रीं-रूपा कराली और ३ क्रीं-रूपा कल्याणी । ४ कलावती, ५ कमला, ६ कलि-दर्प-नाशिनी, ७ महादेव के प्रति कृपा-वती । ८ कालिका, ६ काल-माता अर्थात् काल की भी आदि-भूता, १० कालानल-सम-द्युति अर्थात् जिनका तेज प्रलय-कालीन अग्नि के समान है, ११ कपर्दिनी, १२ कराल-वदना, १३ करुणा-रूप अमृत के समुद्र के तुल्य अर्थात् जिनकी करुणा अपार, अपरिमेय और अक्षय है । १४ कृपा-मयी, १५ कृपाधारा, १६ कृपापारा, १७ कृपागमा अर्थात् जिनकी अपनी कृपा से ही जिन्हें जान सकते हैं । १८ कृशानु अर्थात् अग्नि-रूपा, १६ कपिला, २० कृष्णा, २१ कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी । २२ काल-रात्रि, २३ काम-रूपा, २४ काम-पाश-विमोचनी अर्थात् काम के बन्धन को काटनेवाली, २५ कादम्बिनी (मेघ-माला-रूपी), २६ कलाधारा, २७ कलि-पाप-हारिणी । २८ कुमारी-पूजन-प्रीता अर्थात् जो कुमारी-पूजन से प्रसन्न होती हैं, २६ कुमारी-पूज- कालया अर्थात् कुमारी-पूजन करनेवाले के निकट ही रहती हैं । ३० कुमारी-भोजनानन्दा अर्थात् कुमारियों को भोजन कराने से आनन्दित होती हैं, ३१ कुमारी-रूप-धारिणी । ३२ कदम्ब-वन-सञ्चारा अर्थात् कदम्ब-वन में विचरण करती हैं, ३३ कदम्ब-वन-वासिनी, ३४ कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा अर्थात् कदम्ब के पुष्प से सन्तुष्ट होती हैं, ३५ कदम्ब-पुष्प-मालिनी अर्थात् जो कदम्ब के फूलों की माला पहिने हैं । ३६ किशोरी, ३७ कल-कण्ठा अर्थात् जिनका कण्ठ-स्वर बड़ा मधुर है, ३८ कल-नाद-निनादिनी अर्थात् कोयल के समान सुन्दर स्वरवाली, ३६ काद- म्बरी-पान-रता अर्थात् मद्य-पान करती हैं, ४० कादम्बरी-प्रिया । ४१ कपाल-पात्र-निरता अर्थात् जिनका पान- पात्र नर-कपाल है, ४२ कङ्काल-माल्य-धारिणी अर्थात् जो अस्थि-माला पहिने हैं । ४३ कमलासन-सन्तुष्टा अर्थात् ब्रह्मा से सन्तुष्ट, ४४ कमलासन-वासिनी अर्थात् पद्मासीना । ४५ कमलालया-मध्यस्था, ४६ कमलामोद-मोदिनी अर्थात् कमल की सुगन्ध से जो आनन्दित होती हैं । ४७ कल-हंस-गति अर्थात् राज-हंस के समान सुन्दर चालवाली, ४८ क्लैव्य-नाशिनी अर्थात् भक्तों के दुःख को दूर करनेवाली, ४६ काम-रूपिणी, ५० काम-रूप-कृतावासा अर्थात् कामरूप-प्रदेश में जिनका निवास है, ५१ काम-पीठ-विलासिनी, ५२ कमनीया, ५३ कल्प-लता अर्थात् जो कल्प- लता के समान साधकों के अभीष्ट को पूर्ण करती है, ५४ कमनीय-विभूषणा । ५५ कमनीय-गुणाराध्या अर्थात् सुन्दर गुणों से जिनकी आराधना हो सकती है। ५६ कोमलाङ्गी, ५७ कृशोदरी, ५८ कारणामृत-सन्तोषा अर्थात् मद्य-रूप अमृत से जो सन्तुष्ट होती हैं । ५६ कारणानन्द-सिद्धिदा अर्थात् कारण के पान से जो आनन्दित होती

४६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं, भाव यह है कि जो यथार्थ कुल-साधक हैं, उन्हें सिद्धि देती हैं। ६० कारणानन्द-जापेष्टा अर्थात् कुल-साधक जपादि द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, ६१ कारणार्चन-हर्षिता अर्थात् कारण द्वारा पूजा करने से जो प्रसन्न होती हैं, ६२ कारणार्णव-संमग्ना अर्थात् त्रिलोकाधार कारण-समुद्र के अन्दर जो विद्यमान हैं, ६३ कारण-व्रत-पालिनी। ६४ कस्तूरी-सौरभामोदा अर्थात् कस्तूरी की सुगन्ध से जो प्रसन्न होती हैं, ६५ कस्तूरी-तिलकोज्ज्वला अर्थात् कस्तूरी का तिलक लगाने से जिनको कान्ति विलक्षण है, ६६ कस्तूरी-पूजन-रता अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजन करने से जो बहुत सन्तुष्ट होती हैं, ६७ कस्तूरी-पूजक-प्रिया अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजा करनेवाला उन्हें प्रिय है। ६८ कस्तूरी-दाह-जननी, ६६ कस्तूरी-मृग-तोषिणी, ७० कस्तूरी-भोजन-प्रीता, ७१ कर्पूरामोद-मोदिता अर्थात् कपूर की सुगन्ध से आनन्दित होती हैं, ७२ कर्पूर-मालाभरणा अर्थात् कपूर से सुगन्धित माला धारण करती हैं, ७३ कपूर-चन्दनोक्षिता अर्थात् जो कपूर-मिश्रित चन्दन लगाए हैं। ७४ कर्पूर-कारणाल्हादा अर्थात् कपूर-मिश्रित सुरा से जिन्हें आनन्द मिलता है। ७५ कर्पूरामृत-पायिनी अर्थात् जो कपूर से सुवासित सुरा का पान करती हैं। ७६ कर्पूर-सागर-स्नाता अर्थात् जो कपूर से सुवासित जल-राशि से स्नान करती हैं, ७७ कर्पूर-सागरालया अर्थात् जो कपूर के सागर मे रहती हैं। ७८ कूर्च-बीज-जप-प्रीता अर्थात् जो 'हूँ' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं। ७६ कूर्च-जप-परायणा, ८० कुलीना, ८१ कौलिकाराध्या अर्थात् कौलिकों द्वारा उपास्या हैं, ८२ कौलिक-प्रिय- कारिणी अर्थात् जो कौलिकों के प्रिय कार्यों को सिद्ध करती हैं। ८३ कुलाचारा, ८४ कौतुकिनी, ८५ कुल-मार्ग- प्रदर्शिनी। ८६ काशीश्वरी, ८७ कष्ट-हर्त्री, ८८ काशीश-वर-दायिनी अर्थात् शिव को वर देनेवाली। ८६ काशी- श्वर-कृतामोदा अर्थात् महादेव जिन्हें आनन्दित करते हैं, ६० काशीश्वर-मनोरमा अर्थात् शिव के मन को मोहित करनेवाली। ६१ कल-मञ्जीर-चरणा अर्थात् जिनके दोनों पैरों में मधुर शब्द करनेवाले नूपुर विराजमान हैं, ६२ क्वणत्-काञ्ची-विभूषणा अर्थात् शब्दायमान करधनी पहने हैं। ६३ कांचनाद्रि-कृतागारा अर्थात् सुमेरु-पर्वत- वासिनी, ६४ कांचनाचल-कौमुदी अर्थात् सुमेरु पर्वत की ज्योत्स्ना के स्वरूपवाली। ६५ काम-बीज-जपानन्दा अर्थात् जो 'क्लीं' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं, ६६ काम-बीज-स्वरूपिणी। ६७ कुमतिघ्नी अर्थात् दुर्बुद्धि- नाशिनी, ६८ कुलीनात्ति-नाशिनी अर्थात् कुलाचारी लोगों के दुःख दूर करती हैं, ६६ कुल-कामिनी। १०० 'क्रीं ह्रीं श्रीं' मन्त्र-वर्णों के प्रभाव से काल-कण्टक-घातिनी अर्थात् यम के भय को नष्ट करनेवाली। हे देवि ! ककार-राशि से घटित काली-रूप के समान आद्या-कालिका देवी का यह शतनाम-स्तोत्र कहा गया है। जो व्यक्ति कालिका को मन अर्पित कर पूजा-काल में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शीघ्र ही मन्त्र- सिद्धि मिलती है और काली उस पर प्रसन्न होती हैं। गुरु के उपदेश मात्र से उसे बुद्धि और विद्या का लाभ होता है अर्थात् उसे परिश्रम नहीं करना पड़ता। वह धनवान, यशस्वी, दाता और दयालु होता है। और वह साधक पृथिवी पर पुत्र-पौत्र-सुख-ऐश्वर्य से आनन्दित रहता है। मंगलवार अमावास्या के निशा-काल में मद्य आदि पञ्च-तत्त्वों के सहित त्रिभुवनेश्वरी आद्या काली की पूजा कर शतनाम-स्तोत्र का पाठ करने से साक्षात् काली-स्वरूप होता है। त्रिभुवन में उसे कुछ भी असाध्य नहीं रहता। विद्या में साक्षात् बृहस्पति, धन में कुबेर, गम्भीरता में समुद्र और बल में पवन के समान होता है। सूर्य के समान दुर्दर्शनीय और चन्द्रमा के समान सौम्य-दर्शन होता है। इस प्रकार मूर्तिमान कामदेव के समान होकर स्त्रियों के हृदय में वह शोभा पाता है। इस स्तव के फल-स्वरूप सर्वत्र विजय पाता है। जो-जो कामना करके इस स्तव का पाठ करेगा, श्री आद्या कालिका की कृपा से वह-वह अभीष्ट फल प्राप्त होगा। युद्ध में, राज-सभा में, द्यूत-क्रीड़ा में, विवाद (मुकदमा) में, प्राण-सङ्कट के समय में, ग्राम में आग लगने पर, दस्यु-पूर्ण स्थान में, सिंह-व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं से भरे स्थान में, दुर्ग में, ग्रह का भय होने पर, राज-भय होने पर,ज्वर-

सातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्व के लक्षणों का कथन | ४७ दाह में, पुरानी व्याधि में, महा-रोग का आक्रमण होने पर, बाल-ग्रहादि के योग में, दुःस्वप्न देखने पर, दुस्तर समुद्र में अथवा तूफान से आई विपत्ति से ग्रस्त जहाज में, विपत्ति में जो व्यक्ति परात्परा, परमा माया, आद्या काली का ध्यान कर दृढ़ भक्ति के साथ इस शतनाम स्तोत्र का पाठ करेगा, वह सचमुच ही सभी विपत्तियों से मुक्ति पाएगा। हे देवि, इसमें संदेह नहीं। उसे किसी भी स्थान में पाप का भय, रोग का भय नहीं होगा। उसकी सर्वत्र जय होगी, कहीं भी उसकी पराजय नहीं होगी और उसके दर्शन मात्र से विपत्तियाँ दूर हो जायेंगी। वह व्यक्ति सब शास्त्रों का वक्ता होगा, वह सभी सम्पत्तियों का भोग करेगा। वह जाति और धर्म का कर्त्ता होगा और जातियों का स्वामी होगा। सरस्वती उसके मुख में और लक्ष्मी स्थिर होकर उसके घर में वास करेंगी। सभी मनुष्य उसके नाम को सुनकर ही सादर उसे प्रणाम करेंगे। अणिमादि सिद्धियाँ उसके दर्शन-मात्र से ही तृण-वत् प्रतीत होंगी अर्थात् ऐसे पुरुष के दर्शन मात्र से अणिमादि अष्ट सिद्धियां या उनसे भी अधिक कोई भी विषय सुलभ होगा। यह 'आद्या काली स्वरूप' नामक शतनाम स्तोत्र कहा गया। इस स्तोत्र का पुरश्चरण १०८ बार पाठ करने से होता है। पुरश्चरण करने से यह स्तोत्र सभी अभीष्ट फलों को देता है। जो व्यक्ति इस आद्या-काली-स्वरूपिणी शतनाम-स्तुति का पाठ करता है, या इसका पाठ कराता है; इसे सुनता है या सुनवाता है, वह सब पापों से छूटकर ब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त करता है। श्री सदाशिव ने कहा कि हे देवि ! तुमसे परंब्रह्म-स्वरूप प्रकृति का महत् स्तोत्र मैंने कहा। (१२-५४) अब आद्या श्री कालिका के 'कवच' को सुनो। इस 'त्रैलोक्य-विजय कवच' के ऋषि शिव, छन्द अनु- ष्टुप्, देवता आद्या काली, बीज माया (ह्रीँ), शक्ति रमाँ-बीज (श्रीँ), कीलक 'क्रीँ' और विनियोग काम्य-सिद्धि के लिए है (५५-५७)— आद्यायाः श्रीकालिकायाः कवचं श्रृणु साम्प्रतम् । विनियोग-त्रैलोक्य-विजयस्य कवचस्य शिवः ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या काली देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रीं कीलकं, काम्य-सिद्धौ विनियोगः । ह्रीमाद्या मे शिरः पातु श्रीं काली वदनं मम । हृदयं क्रीं परा-शक्तिः पायात् कण्ठं परात्परा ॥१ नेत्रे पातु जगद्धात्री कर्णौ रक्षतु शङ्करो । घ्राणं पातु महा-माया रसनां सर्व-मङ्गला ॥२ दन्तान् रक्षतु कौमारी कपोलौ कमलालया । ओष्ठाधरी क्षमा रक्षेत् चिबुकं चारु-हासिनी ॥३ ग्रीवां पायात् कुलेशानी ककुत् पातु कृपा-मयी । द्वौ बाहूबाहुदा रक्षेत् करौ कैवल्य-दायिनी ॥४ स्कन्धौ कर्पादिनी पातु पृष्ठं त्रैलोक्य-तारिणी । पार्श्वे पायादपर्णा मे कटिं मे कमठासना ॥५ नाभौ पातु विशालाक्षी प्रजा-स्थानं प्रभावती । ऊरू रक्षतु कल्याणी पादौ मे पातु पार्वती ॥६ जयदुर्गाऽवतु प्राणान् सर्वाङ्गं सर्व-सिद्धिदा । रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च ॥७ तत् सर्वं मे सदा रक्षेदाद्या काली सनातनी । इति ते कथितं दिव्यं त्रैलोक्य-विजयाभिधम् ॥८ कवचं कालिका-देव्या आद्यायाः परमाद्भुतम् ॥ फल-श्रुति पूजा-काले पठेद् यस्तु आद्याधिकृत-मानसः । सर्वान् कामानवाप्नोति तस्याद्या सुप्रसीदति ॥६

४८ : हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र मन्त्र-सिद्धिर्भवेदाशु किङ्कराः क्षुद्र-सिद्धयः । अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी प्राप्नुयाद् धनम् ॥१० विद्यार्थी लभते विद्यां कामी कामानवाप्नुयात् । सहस्रावृत्ति-पाठेन वर्मणोऽस्य पुरस्क्रिया ॥११ पुरश्चरण-सम्पन्नं यथोक्त-फलदं भवेत् । चन्दनागरु-कस्तूरी-कुंकुमै रक्त-चन्दनैः ॥१२ भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा साधकः कटौ ॥१३ तस्याद्या कालिका वश्या वांच्छितार्थं प्रयच्छति । न कुत्रापि भयं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ॥१४ अरोगी चिर-जीवो स्यात् बलवान् धारण-क्षमः । सर्व-विद्यासु निपुणः सर्व-शास्त्रार्थ-तत्त्व-वित् । १५ वशे तस्य मही-पाला भोग-मोक्षौ कर-स्थितौ । कलि-कल्मष-युक्तानां निःश्रेयस-करं परम् ॥१६ अर्थात् 'ह्रीं'-रूपा आद्या मेरे मस्तक को और 'श्रीं'-रूपा काली मेरे मुख की रक्षा करे । 'क्रीं'-रूपा परा-शक्ति हृदय की और परात्परा कण्ठ की रक्षा करे । जगद्धात्री दोनों नेत्रों की रक्षा करे, शङ्करी दोनों कानों की रक्षा करे । महामाया नासिका को और सर्व-मङ्गला जिह्वा को रक्षा करे । कौमारी दन्त-श्रेणी की और कमलालया दोनों कपोलों की रक्षा करे । क्षमा ओष्ठाधर की और चारु-हासिनी चिबुक (ठोडी) की रक्षा करे । कुलेशानी गर्दन की और कृपा-मयी ककूत् (कन्धे) की रक्षा करे । बाहुदा दोनों बाहों की और कैवल्य-दायिनी दोनों हाथों की रक्षा करे । कर्पादिनी दोनों कंधों की और त्रैलोक्य-तारिणी पीठ की रक्षा करे । अपर्णा मेरे दोनों पार्श्वों की और कमठासना मेरे कटि-देश की रक्षा करे । विशालाक्षी मेरे नाभि-देश की और प्रभावती प्रजा- स्थान को रक्षा करे । कल्याणी दोनों ऊरुओं की और पार्वती मेरे दोनों पैरों की रक्षा करे । जयदुर्गा पञ्च-प्राणों की और सर्व-सिद्धिदा मेरे सर्वाङ्ग की रक्षा करे । जो स्थान कवच में वर्जित और रक्षाहीन हैं अर्थात् उल्लिखित अङ्ग-प्रत्यङ्ग के सिवा अन्य स्थानों की रक्षा सनातनी आद्या काली सदा करें । हे देवि ! तुमसे आद्या देवी कालिका का 'त्रैलोक्य-विजय' नामक दिव्य कवच कहा । जो व्यक्ति पूजा-काल में आद्या-मय चित्त से इस परमाद्भुत कवच का पाठ करता है, उसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और आद्या काली उस पर बहुत प्रसन्न होती हैं। उसे शीघ्र मन्त्र की सिद्धि होती है । क्षुद्र अणिमादि सिद्धियां उसकी सेविका होती हैं। पुत्र-हीन व्यक्ति पुत्र पाता है, धनार्थी धन पाता है और विद्यार्थी विद्या पाता है, कामी व्यक्ति काम्य फलों को पाता है। एक सहस्र बार पाठ करने से इस कवच का पुरश्चरण होता है । पुरश्चरण से सम्पन्न इस कवच से यथोक्त फल होता है । यदि साधक अगरु, चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम या रक्त-चन्दन से भूर्ज-पत्र पर इस कवच को लिखकर, भूर्ज-पत्र-रूपा गुटिका को स्वर्णस्थ करके अपनी शिखा, दाईं भुजा, कण्ठ या कटि-देश में धारण करे, तो आद्या काली उसके वशीभूत होकर उसे वांछित फल देती हैं। कहीं भी उसे भय नहीं होता । वह सभी स्थानों में विजयी, कवि, अरोगी, बलवान, धारण-क्षम, चिर-जीवी, सर्व विद्याओं में निपुण और सर्व-शास्त्रार्थ- तत्त्व का मर्मज्ञ होता है । राजा उसके वशीभूत होते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं। यह कवच कलि-काल में पाप-युक्त मनुष्यों के लिए मोक्ष-दायक है, अतः अत्यन्त श्रेष्ठ है । (५८-७४) श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने कृपा करके स्तोत्र और कवच बताए । हे विभो ! अब पुरश्चरण की विधि सुनने की इच्छा करती हूँ (७५) । श्री सदाशिव ने कहा—ब्रह्म-मन्त्र के पुरश्चरण की जो विधि है, वही आद्या कालिका के मन्त्र की भी कही है (७६) । हे देवि ! साधक जप, पूजा, होमादि करने में यदि असमर्थ हों, तो संक्षेप से पूजा और पुरश्चरण