महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ । हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र इस प्रकार समर्पण कर पृथिवी पर प्रणाम करे। तब हाथ जोड़कर 'स्तव' और 'कवच' का पाठ करे (१७४-१७६)। फिर प्रदक्षिणा करके विलोम मन्त्र का उच्चारण करते हुए संस्थापित विशेषार्घ्य से विलोमार्घ्य प्रदान कर निम्न मन्त्र से आत्म-समर्पण करे- इतः पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्माधिकारतः, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्त्यवस्थासु, मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यां उदरेण शिश्नया यत् कृतं, यत् स्मृतं, यदुक्तं, तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु । मां मदीयं सकलं आद्या-काली- पदाम्भोजे अर्पयामि ॐ तत् सत् । अर्थात् इसके पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्म के अधिकार में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में मन, वाक्य, कर्म, दोनों हाथों, दोनों पैरों, उदर और उपस्थ द्वारा यथा-सम्भव जो कुछ किया गया, स्मरण हुआ और कहा गया-वह सभी ब्रह्म को अर्पित हो। मैं और वह सभी वस्तु, जो मेरी कहकर अभिमान होता है, आद्या-काली के श्रीचरण-कमलों में अर्पित करता हूँ। यही 'आत्म-समर्पण मन्त्र' है (१७७-१८१)। इसके बाद हाथ जोड़कर इष्ट-देवता से प्रार्थना करे- ह्रीं श्रीआद्ये कालिके ! यथा-शक्त्या पूजितासि, क्षमस्व । इस प्रकार विसर्जन कर संहार-मुद्रा से गृहीत पुष्प को सूंघ कर इष्ट-देवता को अपने हृदय में स्थापित करे (१८२-८३)। तब ईशान-कोण में एक सुन्दर त्रिकोण-मण्डल बनाकर उस पर निर्माल्य पुष्प और जल द्वारा निम्न मन्त्र से निर्माल्य-वासिनी देवी की पूजा करे (१८४)—ह्रीं निर्माल्य-वासिन्यै नमः । इसके बाद साधक ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि सभी देव-गण को नैवेद्य बांट कर फिर स्वयं ग्रहण करे (१८५)। अपने बाईं ओर भिन्न आसन पर अपनी शक्ति को बैठाकर अथवा उसके साथ एक ही आसन पर बैठकर पानादि मनोरम पात्र स्थापित करे (१८६) । पात्र का परिमाण पाँच तोले से अधिक और तीन तोले से कम न हो। स्वर्ण, रजत, काच या नारिकेल का पात्र बनवाए। शुद्धि-पात्र के दाईं ओर आधार के ऊपर उसे स्थापित कर साधक महा-प्रसाद को लाकर स्वयं या भाई या पुत्र द्वारा ज्येष्ठता के क्रम से पात्रों में उसे रखवाए (१८७- १८८) । पान-पात्र में सुधा और शुद्धि-पात्र में शुद्धि (मांस-मत्स्यादि) प्रदान करे। तब देवी-पूजा के समय आए हुए लोगों के साथ पान-भोजन करे (१८९)। पहले आस्तरण के लिए उत्तम शुद्धि ग्रहण करे। फिर सभी कुल-साधक अत्यन्त आनन्द-चित्त से उत्कृष्ट मद्य से पूरित अपने-अपने पात्र लेकर मूलाधार से जिह्वा तक व्याप्त चैतन्य-स्वरूपा 'कुल-कुण्डलिनी' का ध्यान कर उसके मुख-कमल में, मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए, एक-दूसरे की अनुमति लेकर परमामृत को होम करे । (१९१-९३)। कुल-स्त्रियों के लिए मद्य की गन्ध का ग्रहण करना ही अलि-पान है। गृहस्थ साधकों के लिए पञ्च-पात्र तक मद्य-पान करना अलि-पान कहा गया है। कुल-साधकों के लिए अतिरिक्त पान करना सिद्धि-हानि- कारक होता है (१९४-९५)। जब तक दृष्टि में चंचलता न हो, तभी तक पान करना चाहिए। इससे अधिक पान पशु-पान के समान है (१९६) । पान करने से जिसके चित्त में व्याकुलता हो और जो शक्ति-साधक से घृणा करे, वह किस प्रकार यह कह सकता है कि 'मैं आद्या काली का भजन करता हूँ (१९७)?' जिस प्रकार ब्रह्म को समर्पित अन्नादि के छूने में दोष नहीं है (अर्थात् जाति-भेद वर्जित रहता है), उसी प्रकार तुम्हारे प्रसाद के सम्बन्ध में जाति-भेद का विचार न करे (१९८)। इसी प्रकार विधि के अनुसार पान-भोजन करे। तुम्हारे नैवेद्य के सेवन में हाथ धोने की विधि नहीं है। वस्त्र या जल से हस्त-लेप को दूर करे (१९९) । तदनन्तर बुद्धिमान साधक मस्तक पर निर्माल्य-पुष्प को धारण कर लेप-द्रव्य को भ्रू-मध्य में धारण करे और देव-तुल्य होकर भू-तल पर विचरण करे (२००)।