भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 139 में से

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सातवाँ उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन महा-फल-जनक, सौभाग्य और मोक्ष-प्रद, ब्रह्म-ज्ञान के लाभ का अद्वितीय साधन आद्या-काली का मन्त्रो- द्धार, प्रातःकृत्य, स्नान, सन्ध्या, सम्विदा-शोधन, बाह्य और मानस-भेद से न्यास एवं पूजा-विधान, बलिदान, होम, भैरवी और तत्त्व-चक्रानुष्ठान तथा महा-प्रसाद-ग्रहण को सुनकर प्रसन्न-चित्ता पार्वती देवी ने विनय से झुककर शंकर से कहा (१-३)— हे सदाशिव ! हे जगन्नाथ ! हे जगत् के हितकर्त्ता ! हे देव ! तुमने कृपा के वशीभूत होकर मुझसे प्राणियों के लिए हितकर, भोग और मोक्ष के अद्वितीय साधन—विशेषकर कलियुग में जीवों के लिए शीघ्र सिद्धि-दायक परमा प्रकृति का साधन बताया है (४-५) । तुम्हारे वाक्य-रूपी अमृत-सागर में क्रमशः निमग्न-प्राय मेरा मन कुछ-कुछ ऊपर उठने के लिए चेष्टा नहीं करता, अपितु पुनः उसे प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता है (६) । महादेवी की पूजा-विधि में स्तोत्र और कवच-पाठ की सूचना दी है किन्तु उन्हें प्रकाशित नहीं किया है। हे देव ! इस समय उन्हें प्रकट करें (७) । श्री सदाशिव ने कहा—हे जगद्-वन्द्ये ! हे देवि ! यह सर्वोत्तम स्तोत्र कहता हूँ, सुनो, जिसका पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति सर्व-सिद्धियों का ईश्वर होता है (८) । इसके द्वारा असौभाग्य का नाश और सुख-सम्पत्ति का वर्द्धन होता है। यह अकाल-मृत्यु को दूर करता है और आपत्तियों का निवारण करता है (९) । हे शिवे ! इस स्तोत्र से आद्या कालिका देवी का सुख-दायक सान्निध्य प्राप्त होता है। मैं इसी स्तोत्र के फल-स्वरूप 'त्रिपुरारि' हुआ हूँ (१०) । हे देवि ! इस स्तोत्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका और विनियोग धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के हेतु बताया गया है (११) । यथा— विनियोग : अस्य स्तोत्रस्य ऋषिः सदाशिवः, छन्दो अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका, धर्मार्थ-काम- मोक्षेषु विनियोगः । स्तोत्र : ह्रीं काली श्रीं कराली च क्रीं कल्याणी कलावती । कमला कलि-दर्पघ्नी कपर्दीश-कृपान्विता ॥१॥ कालिका काल-माता च कालानल-सम-द्युतिः । कपर्दिनी करालास्या करुणामृत-सागरा ॥२॥ कृपा-मयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा । कृशानुः कपिला कृष्णा कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी ॥३॥ काल-रात्रिः काम-रूपा काम-पाश-विमोचनी । कादम्बिनी कलाधारा कलि-कल्मष-नाशिनी ॥४॥ कुमारी-पूजन-प्रीता कुमारी-पूजकालया । कुमारी-भोजनानन्दा कुमारी-रूप-धारिणी ॥५॥ कदम्ब-वन-सञ्चारा कदम्ब-वन-वासिनी । कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा कदम्ब-पुष्प-मालिनी ॥६॥ [ ४३ ]