भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ४१

ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। फिर तीन व्याहृतियों से होम करे (१५४-१५६)। यथा- ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा। तदनन्तर निम्न मन्त्र से तीन आहुतियां प्रदान करे (१५७)- ॐ वैश्वानर ! जातवेद ! इहावहावह लोहिताक्ष ! सर्व-कर्माणि साधय स्वाहा। इसके बाद अग्नि में अपने इष्ट-देवता का आवाहन कर पीठादि-सहित उसकी पूजा कर स्वाहान्त मूल- मन्त्र (मूलं स्वाहा) से अग्नि के मध्य में पचीस आहुतियां प्रदान करे और अपनी बुद्धि द्वारा वह्नि, देवी एवं अपनी आत्मा के ऐक्य-भाव का चिन्तन करता हुआ मूल-मन्त्र से ग्यारह आहुतियां अंग-देवता के उद्देश्य से प्रदान करे। तदनन्तर अपनी कामना-पूर्ति के लिए तिल, घृत और मधु-मिश्रित पुष्प, बिल्व-दल अथवा यथा- विहित वस्तु द्वारा यथा-शक्ति आहुतियों से होम करे। आठ से कम आहुतियां न दे (१५८-१६१)। अन्त में स्वाहान्त मूल-मन्त्र से अग्नि में फल और ताम्बूल से युक्त पूर्णाहुति प्रदान करे। फिर संहार- मुद्रा से देवी को अग्नि से लाकर हृदय-कमल में स्थापित करे (१६२)। तब 'अग्ने क्षमस्व' कहकर अग्नि का विसर्जन करे। फिर दक्षिणा देकर अच्छिद्रावधारण करे (१६३)। इसके बाद हवन से शेष द्रव्य अर्थात् घृत- मिश्रित भस्म को दोनों भौंहों के मध्य में धारण करे (१६४)। सभी आगम-कर्मों में इसी प्रकार होम की विधि कही है। होम-कर्म समाप्त कर साधक जप करे (१६५)। हे देवेशि ! जिस प्रकार विद्या प्रसन्न होती है, मैं उस प्रकार के जपानुष्ठान का विधान बताता हूँ, सुनो। मन-ही-मन देवता, गुरु और मन्त्र के ऐक्य का चिन्तन करे (१६६)। मन्त्र-वर्ण को देवता कहा गया है और देवता गुरु-रूपिणी है। जो व्यक्ति इन तीनों में अभेद जानता हुआ पूजा करता है, उसे उत्तम सिद्धि मिलती है (१६७)। मस्तक में गुरु का ध्यान कर हृदय-कमल में देवता का और जिह्वा में तेजोरूपा मूल-मन्त्रात्मिका विद्या का ध्यान कर गुरु, देवता और मूल-मन्त्र-इन तीनों के तेज द्वारा एकीकृत आत्मा का ध्यान करे (१६८)। मूल-मन्त्र को प्रणव से सम्पुटित कर उसका सात बार जप करे। फिर मातृका से पुटित कर उसे सात बार स्मरण करे (१६६)। चतुर साधक अपने शिरोदेश में माया-बीज 'ह्रीं' का दस बार जप करे। उसी प्रकार अपने मुख में दस बार प्रणव का जप करे। पुनः हृदय-कमल में सात बार माया-बीज का जप कर प्राणायाम करे (१७०)। तदनन्तर प्रवाल (मूंगा) आदि से बनी माला लेकर निम्न मन्त्र से उस माला की पूजा करे- माले ! माले ! महा-माले ! सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥ अर्थात् हे माले ! हे माले ! हे महा-माले ! हे सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों वर्ग तुममें विन्यस्त हैं। इसलिए तुम मुझे सिद्धि प्रदान करो। इस मन्त्र से माला की पूजा कर मूलमन्त्र का उच्चारण कर श्रीपात्र के अमृत से तीन बार माला का तर्पण कर स्थिर-चित्त से एक सहस्र आठ या एक सौ आठ बार मूल-मन्त्र का जप करे (१७१-१७३)। तब प्राणा- याम कर श्रीपात्र के जल और पुष्प द्वारा देवी के बाएँ कर-कमल में निम्न मन्त्र से तेजोरूप जप-फल समर्पित करे- गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि ! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि ॥ अर्थात् हे देवि ! हे महेश्वरि ! तुम गुह्या, अति गुह्या और रक्षा-कर्त्री हो। तुम मेरे किए हुए जप को ग्रहण करो। तुम्हारे प्रसाद से मुझे सिद्धि मिले। फा०-६

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