महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ४१
ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा। फिर तीन व्याहृतियों से होम करे (१५४-१५६)। यथा- ॐ भूः स्वाहा, ॐ भुवः स्वाहा, ॐ स्वः स्वाहा। तदनन्तर निम्न मन्त्र से तीन आहुतियां प्रदान करे (१५७)- ॐ वैश्वानर ! जातवेद ! इहावहावह लोहिताक्ष ! सर्व-कर्माणि साधय स्वाहा। इसके बाद अग्नि में अपने इष्ट-देवता का आवाहन कर पीठादि-सहित उसकी पूजा कर स्वाहान्त मूल- मन्त्र (मूलं स्वाहा) से अग्नि के मध्य में पचीस आहुतियां प्रदान करे और अपनी बुद्धि द्वारा वह्नि, देवी एवं अपनी आत्मा के ऐक्य-भाव का चिन्तन करता हुआ मूल-मन्त्र से ग्यारह आहुतियां अंग-देवता के उद्देश्य से प्रदान करे। तदनन्तर अपनी कामना-पूर्ति के लिए तिल, घृत और मधु-मिश्रित पुष्प, बिल्व-दल अथवा यथा- विहित वस्तु द्वारा यथा-शक्ति आहुतियों से होम करे। आठ से कम आहुतियां न दे (१५८-१६१)। अन्त में स्वाहान्त मूल-मन्त्र से अग्नि में फल और ताम्बूल से युक्त पूर्णाहुति प्रदान करे। फिर संहार- मुद्रा से देवी को अग्नि से लाकर हृदय-कमल में स्थापित करे (१६२)। तब 'अग्ने क्षमस्व' कहकर अग्नि का विसर्जन करे। फिर दक्षिणा देकर अच्छिद्रावधारण करे (१६३)। इसके बाद हवन से शेष द्रव्य अर्थात् घृत- मिश्रित भस्म को दोनों भौंहों के मध्य में धारण करे (१६४)। सभी आगम-कर्मों में इसी प्रकार होम की विधि कही है। होम-कर्म समाप्त कर साधक जप करे (१६५)। हे देवेशि ! जिस प्रकार विद्या प्रसन्न होती है, मैं उस प्रकार के जपानुष्ठान का विधान बताता हूँ, सुनो। मन-ही-मन देवता, गुरु और मन्त्र के ऐक्य का चिन्तन करे (१६६)। मन्त्र-वर्ण को देवता कहा गया है और देवता गुरु-रूपिणी है। जो व्यक्ति इन तीनों में अभेद जानता हुआ पूजा करता है, उसे उत्तम सिद्धि मिलती है (१६७)। मस्तक में गुरु का ध्यान कर हृदय-कमल में देवता का और जिह्वा में तेजोरूपा मूल-मन्त्रात्मिका विद्या का ध्यान कर गुरु, देवता और मूल-मन्त्र-इन तीनों के तेज द्वारा एकीकृत आत्मा का ध्यान करे (१६८)। मूल-मन्त्र को प्रणव से सम्पुटित कर उसका सात बार जप करे। फिर मातृका से पुटित कर उसे सात बार स्मरण करे (१६६)। चतुर साधक अपने शिरोदेश में माया-बीज 'ह्रीं' का दस बार जप करे। उसी प्रकार अपने मुख में दस बार प्रणव का जप करे। पुनः हृदय-कमल में सात बार माया-बीज का जप कर प्राणायाम करे (१७०)। तदनन्तर प्रवाल (मूंगा) आदि से बनी माला लेकर निम्न मन्त्र से उस माला की पूजा करे- माले ! माले ! महा-माले ! सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥ अर्थात् हे माले ! हे माले ! हे महा-माले ! हे सर्व-शक्ति-स्वरूपिणि ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-ये चारों वर्ग तुममें विन्यस्त हैं। इसलिए तुम मुझे सिद्धि प्रदान करो। इस मन्त्र से माला की पूजा कर मूलमन्त्र का उच्चारण कर श्रीपात्र के अमृत से तीन बार माला का तर्पण कर स्थिर-चित्त से एक सहस्र आठ या एक सौ आठ बार मूल-मन्त्र का जप करे (१७१-१७३)। तब प्राणा- याम कर श्रीपात्र के जल और पुष्प द्वारा देवी के बाएँ कर-कमल में निम्न मन्त्र से तेजोरूप जप-फल समर्पित करे- गुह्याति-गुह्य-गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्-कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि ! त्वत्-प्रसादान्महेश्वरि ॥ अर्थात् हे देवि ! हे महेश्वरि ! तुम गुह्या, अति गुह्या और रक्षा-कर्त्री हो। तुम मेरे किए हुए जप को ग्रहण करो। तुम्हारे प्रसाद से मुझे सिद्धि मिले। फा०-६
४२ । हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र इस प्रकार समर्पण कर पृथिवी पर प्रणाम करे। तब हाथ जोड़कर 'स्तव' और 'कवच' का पाठ करे (१७४-१७६)। फिर प्रदक्षिणा करके विलोम मन्त्र का उच्चारण करते हुए संस्थापित विशेषार्घ्य से विलोमार्घ्य प्रदान कर निम्न मन्त्र से आत्म-समर्पण करे- इतः पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्माधिकारतः, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्त्यवस्थासु, मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यां उदरेण शिश्नया यत् कृतं, यत् स्मृतं, यदुक्तं, तत् सर्वं ब्रह्मार्पणं भवतु । मां मदीयं सकलं आद्या-काली- पदाम्भोजे अर्पयामि ॐ तत् सत् । अर्थात् इसके पूर्वं प्राण-बुद्धि-देह-धर्म के अधिकार में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में मन, वाक्य, कर्म, दोनों हाथों, दोनों पैरों, उदर और उपस्थ द्वारा यथा-सम्भव जो कुछ किया गया, स्मरण हुआ और कहा गया-वह सभी ब्रह्म को अर्पित हो। मैं और वह सभी वस्तु, जो मेरी कहकर अभिमान होता है, आद्या-काली के श्रीचरण-कमलों में अर्पित करता हूँ। यही 'आत्म-समर्पण मन्त्र' है (१७७-१८१)। इसके बाद हाथ जोड़कर इष्ट-देवता से प्रार्थना करे- ह्रीं श्रीआद्ये कालिके ! यथा-शक्त्या पूजितासि, क्षमस्व । इस प्रकार विसर्जन कर संहार-मुद्रा से गृहीत पुष्प को सूंघ कर इष्ट-देवता को अपने हृदय में स्थापित करे (१८२-८३)। तब ईशान-कोण में एक सुन्दर त्रिकोण-मण्डल बनाकर उस पर निर्माल्य पुष्प और जल द्वारा निम्न मन्त्र से निर्माल्य-वासिनी देवी की पूजा करे (१८४)—ह्रीं निर्माल्य-वासिन्यै नमः । इसके बाद साधक ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि सभी देव-गण को नैवेद्य बांट कर फिर स्वयं ग्रहण करे (१८५)। अपने बाईं ओर भिन्न आसन पर अपनी शक्ति को बैठाकर अथवा उसके साथ एक ही आसन पर बैठकर पानादि मनोरम पात्र स्थापित करे (१८६) । पात्र का परिमाण पाँच तोले से अधिक और तीन तोले से कम न हो। स्वर्ण, रजत, काच या नारिकेल का पात्र बनवाए। शुद्धि-पात्र के दाईं ओर आधार के ऊपर उसे स्थापित कर साधक महा-प्रसाद को लाकर स्वयं या भाई या पुत्र द्वारा ज्येष्ठता के क्रम से पात्रों में उसे रखवाए (१८७- १८८) । पान-पात्र में सुधा और शुद्धि-पात्र में शुद्धि (मांस-मत्स्यादि) प्रदान करे। तब देवी-पूजा के समय आए हुए लोगों के साथ पान-भोजन करे (१८९)। पहले आस्तरण के लिए उत्तम शुद्धि ग्रहण करे। फिर सभी कुल-साधक अत्यन्त आनन्द-चित्त से उत्कृष्ट मद्य से पूरित अपने-अपने पात्र लेकर मूलाधार से जिह्वा तक व्याप्त चैतन्य-स्वरूपा 'कुल-कुण्डलिनी' का ध्यान कर उसके मुख-कमल में, मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए, एक-दूसरे की अनुमति लेकर परमामृत को होम करे । (१९१-९३)। कुल-स्त्रियों के लिए मद्य की गन्ध का ग्रहण करना ही अलि-पान है। गृहस्थ साधकों के लिए पञ्च-पात्र तक मद्य-पान करना अलि-पान कहा गया है। कुल-साधकों के लिए अतिरिक्त पान करना सिद्धि-हानि- कारक होता है (१९४-९५)। जब तक दृष्टि में चंचलता न हो, तभी तक पान करना चाहिए। इससे अधिक पान पशु-पान के समान है (१९६) । पान करने से जिसके चित्त में व्याकुलता हो और जो शक्ति-साधक से घृणा करे, वह किस प्रकार यह कह सकता है कि 'मैं आद्या काली का भजन करता हूँ (१९७)?' जिस प्रकार ब्रह्म को समर्पित अन्नादि के छूने में दोष नहीं है (अर्थात् जाति-भेद वर्जित रहता है), उसी प्रकार तुम्हारे प्रसाद के सम्बन्ध में जाति-भेद का विचार न करे (१९८)। इसी प्रकार विधि के अनुसार पान-भोजन करे। तुम्हारे नैवेद्य के सेवन में हाथ धोने की विधि नहीं है। वस्त्र या जल से हस्त-लेप को दूर करे (१९९) । तदनन्तर बुद्धिमान साधक मस्तक पर निर्माल्य-पुष्प को धारण कर लेप-द्रव्य को भ्रू-मध्य में धारण करे और देव-तुल्य होकर भू-तल पर विचरण करे (२००)।
सातवाँ उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन महा-फल-जनक, सौभाग्य और मोक्ष-प्रद, ब्रह्म-ज्ञान के लाभ का अद्वितीय साधन आद्या-काली का मन्त्रो- द्धार, प्रातःकृत्य, स्नान, सन्ध्या, सम्विदा-शोधन, बाह्य और मानस-भेद से न्यास एवं पूजा-विधान, बलिदान, होम, भैरवी और तत्त्व-चक्रानुष्ठान तथा महा-प्रसाद-ग्रहण को सुनकर प्रसन्न-चित्ता पार्वती देवी ने विनय से झुककर शंकर से कहा (१-३)— हे सदाशिव ! हे जगन्नाथ ! हे जगत् के हितकर्त्ता ! हे देव ! तुमने कृपा के वशीभूत होकर मुझसे प्राणियों के लिए हितकर, भोग और मोक्ष के अद्वितीय साधन—विशेषकर कलियुग में जीवों के लिए शीघ्र सिद्धि-दायक परमा प्रकृति का साधन बताया है (४-५) । तुम्हारे वाक्य-रूपी अमृत-सागर में क्रमशः निमग्न-प्राय मेरा मन कुछ-कुछ ऊपर उठने के लिए चेष्टा नहीं करता, अपितु पुनः उसे प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता है (६) । महादेवी की पूजा-विधि में स्तोत्र और कवच-पाठ की सूचना दी है किन्तु उन्हें प्रकाशित नहीं किया है। हे देव ! इस समय उन्हें प्रकट करें (७) । श्री सदाशिव ने कहा—हे जगद्-वन्द्ये ! हे देवि ! यह सर्वोत्तम स्तोत्र कहता हूँ, सुनो, जिसका पाठ या श्रवण करने से व्यक्ति सर्व-सिद्धियों का ईश्वर होता है (८) । इसके द्वारा असौभाग्य का नाश और सुख-सम्पत्ति का वर्द्धन होता है। यह अकाल-मृत्यु को दूर करता है और आपत्तियों का निवारण करता है (९) । हे शिवे ! इस स्तोत्र से आद्या कालिका देवी का सुख-दायक सान्निध्य प्राप्त होता है। मैं इसी स्तोत्र के फल-स्वरूप 'त्रिपुरारि' हुआ हूँ (१०) । हे देवि ! इस स्तोत्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका और विनियोग धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के हेतु बताया गया है (११) । यथा— विनियोग : अस्य स्तोत्रस्य ऋषिः सदाशिवः, छन्दो अनुष्टुप्, देवता आद्या कालिका, धर्मार्थ-काम- मोक्षेषु विनियोगः । स्तोत्र : ह्रीं काली श्रीं कराली च क्रीं कल्याणी कलावती । कमला कलि-दर्पघ्नी कपर्दीश-कृपान्विता ॥१॥ कालिका काल-माता च कालानल-सम-द्युतिः । कपर्दिनी करालास्या करुणामृत-सागरा ॥२॥ कृपा-मयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा । कृशानुः कपिला कृष्णा कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी ॥३॥ काल-रात्रिः काम-रूपा काम-पाश-विमोचनी । कादम्बिनी कलाधारा कलि-कल्मष-नाशिनी ॥४॥ कुमारी-पूजन-प्रीता कुमारी-पूजकालया । कुमारी-भोजनानन्दा कुमारी-रूप-धारिणी ॥५॥ कदम्ब-वन-सञ्चारा कदम्ब-वन-वासिनी । कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा कदम्ब-पुष्प-मालिनी ॥६॥ [ ४३ ]
४४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र किशोरी कल-कण्ठा च कल-नाद-निनादिनी । कादम्बरी-पान-रता तथा कादम्बरी-प्रिया ॥७॥ कपाल-पात्र-निरता कङ्काल-माल्य-धारिणी । कमलासन-सन्तुष्टा कमलासन-वासिनी ॥८॥ कमलालय-मध्यस्था कमलामोद-मोदिनी । कल-हंस-गतिः क्लैव्य-नाशिनी काम-रूपिणी ॥६॥ काम-रूप-कृतावासा काम-पीठ-विलासिनी । कमनीया कल्पलता कमनीय-विभूषणा ॥१०॥ कमनीय-गुणाराध्या कोमलाङ्गी कृशोदरी । कारणामृत-सन्तोषा कारणानन्द-सिद्धिदा ॥११॥ कारणानन्द-जापेष्टा कारणार्चन-हर्षिता । कारणार्णव-सम्मग्ना कारण-व्रत-पालिनी ॥१२॥ कस्तूरी-सौरभामोदा कस्तूरी-तिलकोज्ज्वला । कस्तूरी-पूजन-रता कस्तूरी-पूजक-प्रिया ॥१३ कस्तूरी-दाह-जननी कस्तूरी-मृग-तोषिणी । कस्तूरी-भोजन-प्रीता कर्पूरामोद-मोदिता ॥१४ कर्पूर-मालाभरणा कर्पूर-चन्दनोक्षिता । कर्पूर-कारणाल्हादा कर्पूरामृत-पायिनी ॥१५ कर्पूर-सागर-स्नाता कर्पूर-सागरालया । कूर्च-बीज-जप-प्रीता कूर्च-जाप-परायणा ॥१६ कुलीना कौलिकाराध्या कौलिक-प्रिय-कारिणी । कुलाचारा कौतुकिनी कुल-मार्ग-प्रदर्शिनी ॥१७ काशीश्वरी कष्ट-हर्त्री काशीश-वर-दायिनी । काशीश्वर-कृतामोदा काशीश्वर-मनोरमा ॥१८ कल-मञ्जीर-चरणा क्वणत्-काञ्ची-विभूषणा । काञ्चनाद्रि-कृतागारा काञ्चनाचल-कौमुदी ॥१६ काम-बीज-जपानन्दा काम-बीज-स्वरूपिणी । कुमतिघ्नी कुलीनाति-नाशिनी कुल-कामिनी ॥२० क्रीं ह्रीं श्रो-मन्त्र-वर्णेन काल-कण्टक-घातिनी । इत्याद्या-कालिका-देव्याः शतनाम प्रकीर्त्तितम् ॥२१ ककार-कूट-घटितं काली-रूप-स्वरूपकम् ॥२२॥ फल-श्रुति पूजा-काले पठेद्यस्तु कालिका-कृत-मानसः । मन्त्र-सिद्धिर्भवेदाशु तस्य कालो प्रसीदति ॥ बुद्धिं विद्यां च लभते गुरोरादेश-मात्रतः । धन-वान् कीर्त्ति-मान् भूयाद् दान-शीलो दयान्वितः ॥ पुत्र-पौत्र-सुखैश्वर्यैर्मोदते साधको भुवि । भौमावस्या निशा-भागे म-पञ्चक-समन्वितः ॥ पूजयित्वा महाकालीमाद्यां त्रि-भुवनेश्वरीम् । पठित्वा शत-नामानि साक्षात् काली-मयो भवेत् ॥ नासाध्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किञ्चन । विद्यायां वाक्-पतिः साक्षात् धने धनपतिर्भवेत् ॥ समुद्र इव गाम्भीर्ये बले च पवनोपमः । तिग्मांशुरिव दुष्प्रेक्ष्यः शशि-वत् शुभ-दर्शनः ॥ रूपे मूर्त्ति-धरः कामो योषितां हृदयङ्गमः । सर्वत्र जयमाप्नोति स्तवस्यास्य प्रसादतः ॥ यं यं कामं पुरस्कृत्य स्तोत्रमेतदुदीरयेत् । तं तं काममवाप्नोति श्रीमदाद्या-प्रसादतः ॥ रणे राज-कुले द्यूते विवादे प्राण-सङ्कटे । दस्यु-ग्रस्ते ग्राम-दाहे सिंह-व्याघ्रावृते तथा ॥ अरण्ये प्रान्तरे दुर्गे ग्रह-राज-भयेऽपि वा। ज्वर-दाहे चिर-व्याधौ महा-रोगादि-संकुले ॥
सातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्त्व के लक्षणों का कथन । ४५ बाल-ग्रहादि-रोगे च तथा दुःस्वप्न-दर्शने । दुस्तरे सलिले वापि पोते वात-विपद्-गते ॥ विचिन्त्य परमां मायामाद्यां कालीं परात्पराम् । यः पठेच्छत-नामानि दृढ-भक्ति-समन्वितः ॥ सर्वापद्भ्यो विमुच्येत देवि सत्यं न संशयः । न पापेभ्यो भयं तस्य न रोगेभ्यो भयं क्वचित् ॥ सर्वत्र विजयस्तस्य न कुत्रापि पराभवः । तस्य दर्शन-मात्रेण पलायन्ते विपद्-गणाः ॥ स वक्ता सर्व-शास्त्राणां स भोक्ता सर्व-सम्पदाम् । स कर्त्ता जाति-धर्माणां ज्ञातीनां प्रभुरेव सः ॥ वाणी तस्य वसेद् वक्त्रे कमला निश्चला गृहे । तन्नाम्ना मानवाः सर्वे प्रणमन्ति ससम्भ्रमाः ॥ दृष्ट्वा तस्य तृणायन्ते ह्यणिमाद्यष्ट-सिद्धयः । आद्या-काली-स्वरूपाख्यं शत-नाम प्रकीर्त्तितम् ॥ अष्टोत्तर-शतावृत्त्या पुरश्चर्याऽस्य गीयते । पुरस्क्रियान्वितं स्तोत्रं सर्वाभीष्ट-फल-प्रदम् ॥ शतनाम-स्तुतिमिमामाद्या-काली-स्वरूपिणीम् । पठेद् वा पाठयेद् वापि शृणुयाच्छावयेदपि ॥ सर्व-पाप-विनिर्मुक्तो ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ॥ अर्थात् १ ह्रीं-रूपा काली, २ श्रीं-रूपा कराली और ३ क्रीं-रूपा कल्याणी । ४ कलावती, ५ कमला, ६ कलि-दर्प-नाशिनी, ७ महादेव के प्रति कृपा-वती । ८ कालिका, ६ काल-माता अर्थात् काल की भी आदि-भूता, १० कालानल-सम-द्युति अर्थात् जिनका तेज प्रलय-कालीन अग्नि के समान है, ११ कपर्दिनी, १२ कराल-वदना, १३ करुणा-रूप अमृत के समुद्र के तुल्य अर्थात् जिनकी करुणा अपार, अपरिमेय और अक्षय है । १४ कृपा-मयी, १५ कृपाधारा, १६ कृपापारा, १७ कृपागमा अर्थात् जिनकी अपनी कृपा से ही जिन्हें जान सकते हैं । १८ कृशानु अर्थात् अग्नि-रूपा, १६ कपिला, २० कृष्णा, २१ कृष्णानन्द-विवर्द्धिनी । २२ काल-रात्रि, २३ काम-रूपा, २४ काम-पाश-विमोचनी अर्थात् काम के बन्धन को काटनेवाली, २५ कादम्बिनी (मेघ-माला-रूपी), २६ कलाधारा, २७ कलि-पाप-हारिणी । २८ कुमारी-पूजन-प्रीता अर्थात् जो कुमारी-पूजन से प्रसन्न होती हैं, २६ कुमारी-पूज- कालया अर्थात् कुमारी-पूजन करनेवाले के निकट ही रहती हैं । ३० कुमारी-भोजनानन्दा अर्थात् कुमारियों को भोजन कराने से आनन्दित होती हैं, ३१ कुमारी-रूप-धारिणी । ३२ कदम्ब-वन-सञ्चारा अर्थात् कदम्ब-वन में विचरण करती हैं, ३३ कदम्ब-वन-वासिनी, ३४ कदम्ब-पुष्प-सन्तोषा अर्थात् कदम्ब के पुष्प से सन्तुष्ट होती हैं, ३५ कदम्ब-पुष्प-मालिनी अर्थात् जो कदम्ब के फूलों की माला पहिने हैं । ३६ किशोरी, ३७ कल-कण्ठा अर्थात् जिनका कण्ठ-स्वर बड़ा मधुर है, ३८ कल-नाद-निनादिनी अर्थात् कोयल के समान सुन्दर स्वरवाली, ३६ काद- म्बरी-पान-रता अर्थात् मद्य-पान करती हैं, ४० कादम्बरी-प्रिया । ४१ कपाल-पात्र-निरता अर्थात् जिनका पान- पात्र नर-कपाल है, ४२ कङ्काल-माल्य-धारिणी अर्थात् जो अस्थि-माला पहिने हैं । ४३ कमलासन-सन्तुष्टा अर्थात् ब्रह्मा से सन्तुष्ट, ४४ कमलासन-वासिनी अर्थात् पद्मासीना । ४५ कमलालया-मध्यस्था, ४६ कमलामोद-मोदिनी अर्थात् कमल की सुगन्ध से जो आनन्दित होती हैं । ४७ कल-हंस-गति अर्थात् राज-हंस के समान सुन्दर चालवाली, ४८ क्लैव्य-नाशिनी अर्थात् भक्तों के दुःख को दूर करनेवाली, ४६ काम-रूपिणी, ५० काम-रूप-कृतावासा अर्थात् कामरूप-प्रदेश में जिनका निवास है, ५१ काम-पीठ-विलासिनी, ५२ कमनीया, ५३ कल्प-लता अर्थात् जो कल्प- लता के समान साधकों के अभीष्ट को पूर्ण करती है, ५४ कमनीय-विभूषणा । ५५ कमनीय-गुणाराध्या अर्थात् सुन्दर गुणों से जिनकी आराधना हो सकती है। ५६ कोमलाङ्गी, ५७ कृशोदरी, ५८ कारणामृत-सन्तोषा अर्थात् मद्य-रूप अमृत से जो सन्तुष्ट होती हैं । ५६ कारणानन्द-सिद्धिदा अर्थात् कारण के पान से जो आनन्दित होती
४६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं, भाव यह है कि जो यथार्थ कुल-साधक हैं, उन्हें सिद्धि देती हैं। ६० कारणानन्द-जापेष्टा अर्थात् कुल-साधक जपादि द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, ६१ कारणार्चन-हर्षिता अर्थात् कारण द्वारा पूजा करने से जो प्रसन्न होती हैं, ६२ कारणार्णव-संमग्ना अर्थात् त्रिलोकाधार कारण-समुद्र के अन्दर जो विद्यमान हैं, ६३ कारण-व्रत-पालिनी। ६४ कस्तूरी-सौरभामोदा अर्थात् कस्तूरी की सुगन्ध से जो प्रसन्न होती हैं, ६५ कस्तूरी-तिलकोज्ज्वला अर्थात् कस्तूरी का तिलक लगाने से जिनको कान्ति विलक्षण है, ६६ कस्तूरी-पूजन-रता अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजन करने से जो बहुत सन्तुष्ट होती हैं, ६७ कस्तूरी-पूजक-प्रिया अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजा करनेवाला उन्हें प्रिय है। ६८ कस्तूरी-दाह-जननी, ६६ कस्तूरी-मृग-तोषिणी, ७० कस्तूरी-भोजन-प्रीता, ७१ कर्पूरामोद-मोदिता अर्थात् कपूर की सुगन्ध से आनन्दित होती हैं, ७२ कर्पूर-मालाभरणा अर्थात् कपूर से सुगन्धित माला धारण करती हैं, ७३ कपूर-चन्दनोक्षिता अर्थात् जो कपूर-मिश्रित चन्दन लगाए हैं। ७४ कर्पूर-कारणाल्हादा अर्थात् कपूर-मिश्रित सुरा से जिन्हें आनन्द मिलता है। ७५ कर्पूरामृत-पायिनी अर्थात् जो कपूर से सुवासित सुरा का पान करती हैं। ७६ कर्पूर-सागर-स्नाता अर्थात् जो कपूर से सुवासित जल-राशि से स्नान करती हैं, ७७ कर्पूर-सागरालया अर्थात् जो कपूर के सागर मे रहती हैं। ७८ कूर्च-बीज-जप-प्रीता अर्थात् जो 'हूँ' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं। ७६ कूर्च-जप-परायणा, ८० कुलीना, ८१ कौलिकाराध्या अर्थात् कौलिकों द्वारा उपास्या हैं, ८२ कौलिक-प्रिय- कारिणी अर्थात् जो कौलिकों के प्रिय कार्यों को सिद्ध करती हैं। ८३ कुलाचारा, ८४ कौतुकिनी, ८५ कुल-मार्ग- प्रदर्शिनी। ८६ काशीश्वरी, ८७ कष्ट-हर्त्री, ८८ काशीश-वर-दायिनी अर्थात् शिव को वर देनेवाली। ८६ काशी- श्वर-कृतामोदा अर्थात् महादेव जिन्हें आनन्दित करते हैं, ६० काशीश्वर-मनोरमा अर्थात् शिव के मन को मोहित करनेवाली। ६१ कल-मञ्जीर-चरणा अर्थात् जिनके दोनों पैरों में मधुर शब्द करनेवाले नूपुर विराजमान हैं, ६२ क्वणत्-काञ्ची-विभूषणा अर्थात् शब्दायमान करधनी पहने हैं। ६३ कांचनाद्रि-कृतागारा अर्थात् सुमेरु-पर्वत- वासिनी, ६४ कांचनाचल-कौमुदी अर्थात् सुमेरु पर्वत की ज्योत्स्ना के स्वरूपवाली। ६५ काम-बीज-जपानन्दा अर्थात् जो 'क्लीं' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं, ६६ काम-बीज-स्वरूपिणी। ६७ कुमतिघ्नी अर्थात् दुर्बुद्धि- नाशिनी, ६८ कुलीनात्ति-नाशिनी अर्थात् कुलाचारी लोगों के दुःख दूर करती हैं, ६६ कुल-कामिनी। १०० 'क्रीं ह्रीं श्रीं' मन्त्र-वर्णों के प्रभाव से काल-कण्टक-घातिनी अर्थात् यम के भय को नष्ट करनेवाली। हे देवि ! ककार-राशि से घटित काली-रूप के समान आद्या-कालिका देवी का यह शतनाम-स्तोत्र कहा गया है। जो व्यक्ति कालिका को मन अर्पित कर पूजा-काल में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शीघ्र ही मन्त्र- सिद्धि मिलती है और काली उस पर प्रसन्न होती हैं। गुरु के उपदेश मात्र से उसे बुद्धि और विद्या का लाभ होता है अर्थात् उसे परिश्रम नहीं करना पड़ता। वह धनवान, यशस्वी, दाता और दयालु होता है। और वह साधक पृथिवी पर पुत्र-पौत्र-सुख-ऐश्वर्य से आनन्दित रहता है। मंगलवार अमावास्या के निशा-काल में मद्य आदि पञ्च-तत्त्वों के सहित त्रिभुवनेश्वरी आद्या काली की पूजा कर शतनाम-स्तोत्र का पाठ करने से साक्षात् काली-स्वरूप होता है। त्रिभुवन में उसे कुछ भी असाध्य नहीं रहता। विद्या में साक्षात् बृहस्पति, धन में कुबेर, गम्भीरता में समुद्र और बल में पवन के समान होता है। सूर्य के समान दुर्दर्शनीय और चन्द्रमा के समान सौम्य-दर्शन होता है। इस प्रकार मूर्तिमान कामदेव के समान होकर स्त्रियों के हृदय में वह शोभा पाता है। इस स्तव के फल-स्वरूप सर्वत्र विजय पाता है। जो-जो कामना करके इस स्तव का पाठ करेगा, श्री आद्या कालिका की कृपा से वह-वह अभीष्ट फल प्राप्त होगा। युद्ध में, राज-सभा में, द्यूत-क्रीड़ा में, विवाद (मुकदमा) में, प्राण-सङ्कट के समय में, ग्राम में आग लगने पर, दस्यु-पूर्ण स्थान में, सिंह-व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं से भरे स्थान में, दुर्ग में, ग्रह का भय होने पर, राज-भय होने पर,ज्वर-
सातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्व के लक्षणों का कथन | ४७ दाह में, पुरानी व्याधि में, महा-रोग का आक्रमण होने पर, बाल-ग्रहादि के योग में, दुःस्वप्न देखने पर, दुस्तर समुद्र में अथवा तूफान से आई विपत्ति से ग्रस्त जहाज में, विपत्ति में जो व्यक्ति परात्परा, परमा माया, आद्या काली का ध्यान कर दृढ़ भक्ति के साथ इस शतनाम स्तोत्र का पाठ करेगा, वह सचमुच ही सभी विपत्तियों से मुक्ति पाएगा। हे देवि, इसमें संदेह नहीं। उसे किसी भी स्थान में पाप का भय, रोग का भय नहीं होगा। उसकी सर्वत्र जय होगी, कहीं भी उसकी पराजय नहीं होगी और उसके दर्शन मात्र से विपत्तियाँ दूर हो जायेंगी। वह व्यक्ति सब शास्त्रों का वक्ता होगा, वह सभी सम्पत्तियों का भोग करेगा। वह जाति और धर्म का कर्त्ता होगा और जातियों का स्वामी होगा। सरस्वती उसके मुख में और लक्ष्मी स्थिर होकर उसके घर में वास करेंगी। सभी मनुष्य उसके नाम को सुनकर ही सादर उसे प्रणाम करेंगे। अणिमादि सिद्धियाँ उसके दर्शन-मात्र से ही तृण-वत् प्रतीत होंगी अर्थात् ऐसे पुरुष के दर्शन मात्र से अणिमादि अष्ट सिद्धियां या उनसे भी अधिक कोई भी विषय सुलभ होगा। यह 'आद्या काली स्वरूप' नामक शतनाम स्तोत्र कहा गया। इस स्तोत्र का पुरश्चरण १०८ बार पाठ करने से होता है। पुरश्चरण करने से यह स्तोत्र सभी अभीष्ट फलों को देता है। जो व्यक्ति इस आद्या-काली-स्वरूपिणी शतनाम-स्तुति का पाठ करता है, या इसका पाठ कराता है; इसे सुनता है या सुनवाता है, वह सब पापों से छूटकर ब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त करता है। श्री सदाशिव ने कहा कि हे देवि ! तुमसे परंब्रह्म-स्वरूप प्रकृति का महत् स्तोत्र मैंने कहा। (१२-५४) अब आद्या श्री कालिका के 'कवच' को सुनो। इस 'त्रैलोक्य-विजय कवच' के ऋषि शिव, छन्द अनु- ष्टुप्, देवता आद्या काली, बीज माया (ह्रीँ), शक्ति रमाँ-बीज (श्रीँ), कीलक 'क्रीँ' और विनियोग काम्य-सिद्धि के लिए है (५५-५७)— आद्यायाः श्रीकालिकायाः कवचं श्रृणु साम्प्रतम् । विनियोग-त्रैलोक्य-विजयस्य कवचस्य शिवः ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या काली देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रीं कीलकं, काम्य-सिद्धौ विनियोगः । ह्रीमाद्या मे शिरः पातु श्रीं काली वदनं मम । हृदयं क्रीं परा-शक्तिः पायात् कण्ठं परात्परा ॥१ नेत्रे पातु जगद्धात्री कर्णौ रक्षतु शङ्करो । घ्राणं पातु महा-माया रसनां सर्व-मङ्गला ॥२ दन्तान् रक्षतु कौमारी कपोलौ कमलालया । ओष्ठाधरी क्षमा रक्षेत् चिबुकं चारु-हासिनी ॥३ ग्रीवां पायात् कुलेशानी ककुत् पातु कृपा-मयी । द्वौ बाहूबाहुदा रक्षेत् करौ कैवल्य-दायिनी ॥४ स्कन्धौ कर्पादिनी पातु पृष्ठं त्रैलोक्य-तारिणी । पार्श्वे पायादपर्णा मे कटिं मे कमठासना ॥५ नाभौ पातु विशालाक्षी प्रजा-स्थानं प्रभावती । ऊरू रक्षतु कल्याणी पादौ मे पातु पार्वती ॥६ जयदुर्गाऽवतु प्राणान् सर्वाङ्गं सर्व-सिद्धिदा । रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च ॥७ तत् सर्वं मे सदा रक्षेदाद्या काली सनातनी । इति ते कथितं दिव्यं त्रैलोक्य-विजयाभिधम् ॥८ कवचं कालिका-देव्या आद्यायाः परमाद्भुतम् ॥ फल-श्रुति पूजा-काले पठेद् यस्तु आद्याधिकृत-मानसः । सर्वान् कामानवाप्नोति तस्याद्या सुप्रसीदति ॥६
४८ : हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र मन्त्र-सिद्धिर्भवेदाशु किङ्कराः क्षुद्र-सिद्धयः । अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी प्राप्नुयाद् धनम् ॥१० विद्यार्थी लभते विद्यां कामी कामानवाप्नुयात् । सहस्रावृत्ति-पाठेन वर्मणोऽस्य पुरस्क्रिया ॥११ पुरश्चरण-सम्पन्नं यथोक्त-फलदं भवेत् । चन्दनागरु-कस्तूरी-कुंकुमै रक्त-चन्दनैः ॥१२ भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा साधकः कटौ ॥१३ तस्याद्या कालिका वश्या वांच्छितार्थं प्रयच्छति । न कुत्रापि भयं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ॥१४ अरोगी चिर-जीवो स्यात् बलवान् धारण-क्षमः । सर्व-विद्यासु निपुणः सर्व-शास्त्रार्थ-तत्त्व-वित् । १५ वशे तस्य मही-पाला भोग-मोक्षौ कर-स्थितौ । कलि-कल्मष-युक्तानां निःश्रेयस-करं परम् ॥१६ अर्थात् 'ह्रीं'-रूपा आद्या मेरे मस्तक को और 'श्रीं'-रूपा काली मेरे मुख की रक्षा करे । 'क्रीं'-रूपा परा-शक्ति हृदय की और परात्परा कण्ठ की रक्षा करे । जगद्धात्री दोनों नेत्रों की रक्षा करे, शङ्करी दोनों कानों की रक्षा करे । महामाया नासिका को और सर्व-मङ्गला जिह्वा को रक्षा करे । कौमारी दन्त-श्रेणी की और कमलालया दोनों कपोलों की रक्षा करे । क्षमा ओष्ठाधर की और चारु-हासिनी चिबुक (ठोडी) की रक्षा करे । कुलेशानी गर्दन की और कृपा-मयी ककूत् (कन्धे) की रक्षा करे । बाहुदा दोनों बाहों की और कैवल्य-दायिनी दोनों हाथों की रक्षा करे । कर्पादिनी दोनों कंधों की और त्रैलोक्य-तारिणी पीठ की रक्षा करे । अपर्णा मेरे दोनों पार्श्वों की और कमठासना मेरे कटि-देश की रक्षा करे । विशालाक्षी मेरे नाभि-देश की और प्रभावती प्रजा- स्थान को रक्षा करे । कल्याणी दोनों ऊरुओं की और पार्वती मेरे दोनों पैरों की रक्षा करे । जयदुर्गा पञ्च-प्राणों की और सर्व-सिद्धिदा मेरे सर्वाङ्ग की रक्षा करे । जो स्थान कवच में वर्जित और रक्षाहीन हैं अर्थात् उल्लिखित अङ्ग-प्रत्यङ्ग के सिवा अन्य स्थानों की रक्षा सनातनी आद्या काली सदा करें । हे देवि ! तुमसे आद्या देवी कालिका का 'त्रैलोक्य-विजय' नामक दिव्य कवच कहा । जो व्यक्ति पूजा-काल में आद्या-मय चित्त से इस परमाद्भुत कवच का पाठ करता है, उसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और आद्या काली उस पर बहुत प्रसन्न होती हैं। उसे शीघ्र मन्त्र की सिद्धि होती है । क्षुद्र अणिमादि सिद्धियां उसकी सेविका होती हैं। पुत्र-हीन व्यक्ति पुत्र पाता है, धनार्थी धन पाता है और विद्यार्थी विद्या पाता है, कामी व्यक्ति काम्य फलों को पाता है। एक सहस्र बार पाठ करने से इस कवच का पुरश्चरण होता है । पुरश्चरण से सम्पन्न इस कवच से यथोक्त फल होता है । यदि साधक अगरु, चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम या रक्त-चन्दन से भूर्ज-पत्र पर इस कवच को लिखकर, भूर्ज-पत्र-रूपा गुटिका को स्वर्णस्थ करके अपनी शिखा, दाईं भुजा, कण्ठ या कटि-देश में धारण करे, तो आद्या काली उसके वशीभूत होकर उसे वांछित फल देती हैं। कहीं भी उसे भय नहीं होता । वह सभी स्थानों में विजयी, कवि, अरोगी, बलवान, धारण-क्षम, चिर-जीवी, सर्व विद्याओं में निपुण और सर्व-शास्त्रार्थ- तत्त्व का मर्मज्ञ होता है । राजा उसके वशीभूत होते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं। यह कवच कलि-काल में पाप-युक्त मनुष्यों के लिए मोक्ष-दायक है, अतः अत्यन्त श्रेष्ठ है । (५८-७४) श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने कृपा करके स्तोत्र और कवच बताए । हे विभो ! अब पुरश्चरण की विधि सुनने की इच्छा करती हूँ (७५) । श्री सदाशिव ने कहा—ब्रह्म-मन्त्र के पुरश्चरण की जो विधि है, वही आद्या कालिका के मन्त्र की भी कही है (७६) । हे देवि ! साधक जप, पूजा, होमादि करने में यदि असमर्थ हों, तो संक्षेप से पूजा और पुरश्चरण
सातवाँ उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ४६ करे (७७)। क्योंकि न करने से कुछ करना उत्तम है। हे भद्रे ! ऐसे लोगों के लिए पहले संक्षिप्त पूजा-विधि कहता हूँ, सुनो (७८)। मूल-मन्त्र से आचमन कर ऋषि-न्यास करे। फिर कर-शुद्धि, कर-न्यास और अङ्ग-न्यास करे। तब सर्वाङ्ग-व्यापक न्यास कर प्राणायाम, ध्यान, पूजा और जप करे। संक्षिप्त पूजा की यही विधि है (७६-८०)। मन्त्र के पुरश्चरण में जिस मन्त्र की जितनी संख्या निर्दिष्ट है, होमादि न करने पर, उसका चौगुना जप करने से ही पुरश्चरण सम्पन्न होता है (८१)। अथवा अन्य प्रकार से पुरश्चरण-विधि कही है— मङ्गल या शनिवार को कृष्णा चतुर्दशी होने पर, उसी दिन रजनी-योग में पञ्च-तत्त्व लाकर जगन्मयी की पूजा कर, महा-निशा में एकाग्र मन से दस हजार बार मन्त्र का जप करे। फिर ब्रह्म-निष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर पुरश्चरण पूर्ण करे (८२-८३)। अथवा एक मङ्गलवार से आरम्भ कर लगातार अगले मङ्गलवार तक प्रतिदिन एक हजार मन्त्र जप कर आठ हजार मन्त्र-जप से ही पुरश्चरण हो जाता है (८४-८५)। हे देवि ! आद्या कालिका के सभी मन्त्र 'सिद्ध मन्त्र' हैं; सभी समयों में, सब युगों में सुसिद्धि प्रदान करते हैं, विशेषकर कलि-काल में (८६)। हे पार्वति ! कलि-काल में बहुत प्रकार के काली-रूप जाग्रत् हैं। विशेषकर प्रबल कलि-काल में यही रूप जगत् के लिए हित-कारी है (८७)। इस मन्त्र में सिद्धादि चक्र-गणना की अपेक्षा नहीं है। अरि-मित्रादि दोष नहीं हैं। इस मन्त्र में विशेष नियमानियम नहीं हैं। इस मन्त्र का जप कर आद्या काली को प्रसन्न करे (८८)। इस मन्त्र का जप करने से श्रीमदाद्या काली के प्रसाद से ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है। ब्रह्म- ज्ञान से युक्त मनुष्य जीवन्मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं (८६)। हे प्रिये ! इस मन्त्र की साधना में विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, शरीर को कष्ट नहीं होता। आद्या काली के साधकों की साधना सुख-साध्य है (६०)। इस विषय में 'चित्त-शुद्धि' ही साधकों के लिए फल-दायिनी होती है (६१)। साधक जब तक चित्त की मलिनता दूर करने में समर्थ नहीं होता, तब तक 'कुल-भक्ति' से समन्वित होकर कर्म करे (६२), क्योंकि यथा- विधि कर्मानुष्ठान ही चित्त-शुद्धि का उपाय है। ब्रह्म-मन्त्र के समान इस मन्त्र को पहले गुरु-मुख से ग्रहण करे (६३)। प्रातःकृत्यादि नियमानुष्ठान के साथ पुरश्चरण करे। हे महेशानि ! चित्त के शुद्ध होने पर ही ब्रह्म-ज्ञान उत्पन्न होता है और ब्रह्म-ज्ञान के उत्पन्न होने पर अन्य कृत्याकृत्य रहते नहीं (६४)। श्रीपार्वती ने कहा—हे परमेशान ! हे विभो ! 'कुल' क्या है ? 'कुलाचार' क्या है ? यह सब और 'पञ्च- तत्त्व' के लक्षण यथार्थ रूप में सुनने की इच्छा करती हूँ (६५)। श्रीसदाशिव ने कहा—हे कुलेशानि ! तुम साधकों की हितैषिणी हो। तुमने उत्तम प्रश्न किया है। तुम्हारो प्रसन्नता के लिए मैं यह सब यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो (६६)। जीव, प्रकृति-तत्त्व, दिक्, आकाश, पृथिवी, जल, तेज और वायु 'कुल'-नाम से कहे गए हैं (६७)। हे आद्ये ! इन सब वस्तुओं में ब्रह्म-बुद्धि द्वारा जो विकल्प-शून्य आचरण होता है, वही 'कुलाचार' है और यही 'कुलाचार' धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग का दाता है। तपस्या, दान और कठोर ब्रह्मचर्यादि द्वारा बहुजन्मा- र्जित पुण्य के फल-स्वरूप निष्पाप हुए साधकों की ही 'कुलाचार' में प्रवृत्ति होती है (६८-६६)। 'कुलाचार' में लगी बुद्धि शीघ्र ही निर्मल हो जाती है। तब उनकी मति आद्या काली के चरण-कमलों में लग जाती है (१००)। सद्गुरु की सेवा से परात्परा इस मन्त्र-रूपा विद्या को प्राप्त कर 'कुलाचार' में तत्पर हो 'पञ्च-तत्त्व' द्वारा कुलेश्वरी आद्या कालिका की पूजा में परायण व्यक्ति 'कुलज्ञ' और साधकोत्तम हैं। ये लोग इस लोक में समस्त सुभोग्य वस्तुओं का भोग कर अन्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं (१०१-१०२)। सभी जीवों के लिए जो महौषध महत् दुःखों को भुलानेवाली और आनन्द-दायक है, वही 'आद्य-तत्त्व' फा०-७
५० | हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र का लक्षण है (१०३) । यह तत्त्व शोधित न होने पर केवल मोह-दायक, भ्रमोत्पादक और विषाद तथा रोग का कारण होता है । हे प्रिये ! कौलिक-गण उसका सर्वथा परित्याग करें (१०४) । ग्राम्य (छागादि), वायव्य (हारोतादि पक्षी), वन्य (मृगादि)—जिनके शरीर से उत्पन्न तत्व पुष्टि-वर्द्धक और बुद्धि, तेज एवं बल-दायक है, वही 'द्वितीय तत्त्व' का लक्षण है (१०५) । हे कल्याणि ! जो जल से उत्पन्न अति-लोभनोय, सुख-दायक और प्रजा-वृद्धि-कारक तत्त्व है, वही 'तृतीय तत्त्व' का लक्षण है (१०६) । जो तत्त्व सुलभ, भूमि से उत्पन्न, जोवों का जीवन-स्वरूप और त्रिभुवन के परमायु का निदान है, वही 'चतुर्थ तत्त्व' का लक्षण है (१०७) । हे देवि ! महानन्द-जनक, प्राणियों की सृष्टि का कारण ओर आद्यन्त-रहित जगत् का जो मूल है, वही शेष—'पञ्चम तत्त्व' का लक्षण है (१०८) । हे प्रिये ! आद्य तत्त्व को 'तेज', द्वितीय तत्त्व को 'पवन', तृतीय तत्त्व को 'जल', चतुर्थ तत्त्व को 'पृथिवी' और पंचम तत्त्व को जगदाधार 'नभो' मण्डल समझो (१०६-१०) । हे कुलेशानि ! मनुष्य इसी प्रकार 'कुल', 'पञ्च-तत्त्व' और 'कुल-धर्म के आचार' को जानकर तदनुसार कर्म कर जीवन्मुक्त होते हैं (१११) । •—• आठवाँ उल्लास-वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन संसार-मोचिनी भवानी माता ने जगत् के हित के लिए शङ्कर से पुनः कहा (१)—इस लोक और परलोक में भी सुख-दायक, धर्म-अर्थ-काम-प्रद तथा मोक्ष-जनक, विघ्न-नाशक धर्म की कथा सुनना चाहती हूँ (२) । हे विभो ! अब 'वर्ण' ओर 'आश्रम' तथा उन-उन वर्णों और आश्रमों में जो 'आचार' विहित हैं, उन्हें सुनने की इच्छा है। कृपया वह सब कहिए (३) । श्री सदाशिव ने कहा—हे सुव्रते ! सत्य आदि चार युगों में चार 'वर्ण', चार 'आश्रम' और उन-उ. वर्णों तथा आश्रमों के 'आचार' भिन्न-भिन्न रूप में कहे हैं, किन्तु कलि-काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं सामान्य—ये पाँच प्रकार के 'वर्ण' कहे हैं (४-५) । इन सभी वर्णों के लिए आश्रम दो प्रकार के हैं। हे आद्ये, हे महेश्वरि ! तुमसे उन सभी वर्णों और आश्रमों के आचार तथा धर्म कहता हूँ, सुनो (६) । कलि-काल में उत्पन्न मनुष्यों की कथा पहले ही कह चुका हूँ। तपस्या और वेद-पाठ-विहीन, अल्पायु, क्लेश और प्रयास में अशक्त मनुष्यों के लिए शारीरिक परिश्रम असम्भव है (७) । हे प्रिये ! कलियुग में ब्रह्म- चर्याश्रम नहीं है, वानप्रस्थ आश्रम भी नहीं है। गार्हस्थ्य और भैक्षुक—यही दो आश्रम हैं (८) । हे शिवे ! कलि-काल में गृहस्थों के सभी कार्य आगमोक्त अर्थात् तन्त्र-मत के अनुसार कर्तव्य हैं। गृहस्थों को अन्य किसी पथ से कदापि क्रिया-सिद्धि न होगी (६)। हे देवि, हे तत्त्वज्ञे ! कलियुग में भैक्षुकाश्रम में भी वेदोक्त दण्ड-धारण नहीं है क्योंकि वह वैदिक-संस्कार है (१०) । हे भद्रे ! कलि-काल में शैव-संस्कार-विधि से अवधूताश्रम-धारण
आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५१ ही 'संन्यास-ग्रहण' कहा है (११) । हे देवि ! कलि-युग के प्रबल होने पर ब्राह्मण एवं अन्य सभी वर्णों को इन्हीं दो आश्रमों का अधिकार होगा (१२) । शैव विधि से ही सभी संस्कार और क्रिया-कलाप होंगे, किन्तु ब्राह्मण एवं अन्य वर्णों की कर्म-प्रणाली अलग-अलग होगी (१३)। हे महेश्वरि ! मनुष्य जन्म से ही गृहस्थ होता है। फिर संस्कार के बल से आश्रमी होता है। पहले यथा-विधि गार्हस्थ्य आश्रम करे (१४) । तत्त्व-ज्ञान अर्थात् संसार में निश्चित दुःखादि ज्ञान के समुत्पन्न होने पर जब वैराग्य हो, तब सब कुछ त्यागकर संन्यासाश्रम करे (१५) । बाल्य-काल में विद्योपार्जन, यौवनावस्था में धनोपार्जन और विवाह, प्रौढ़ावस्था में धर्म-जनक कर्म करे। फिर 'सुधी' अर्थात् क्षण-भंगुर संसार के वास्तविक मर्म का ज्ञाता होकर चतुर्थ अवस्था अर्थात् वृद्ध वयस में संन्यासाश्रम करे (१६) । वृद्ध पिता-माता, पतिव्रता भार्या या शिशु सन्तान का त्यागकर अवधूताश्रम प्राप्त नहीं होता (१७) । जो व्यक्ति माता-पिता, शिशु पुत्र, पत्नी, स्वजन ज्ञाती-वर्ग और बन्धु-बान्धव इत्यादि का त्याग कर प्रव्रज्या करता है, वह महा-पातकी होता है (१८) । जो व्यक्ति अपने पित्रादि को तृप्त न करके भिक्षुकाश्रम में जाता है, वह मातृ-हन्ता, पितृ-हन्ता, स्त्री-घाती एवं ब्रह्म-घातक होता है। अर्थात् इन सब कार्यों से जैसा पाप होता है, वह व्यक्ति वैसे ही पाप से कलुषित होता है (१६) । ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर लोग शैव पथ के अनुसार ही अपने विहित संस्कार का अनुष्ठान करें, यही कलि-युग का धर्म है (२०) । श्री देवी ने कहा- हे विभो ! गृहस्थ का धर्म क्या है ? अथवा भिक्षुक का धर्म क्या है ? यह सब और विप्र तथा विप्रेतर अन्य सबके संस्कारादि को मुझे बताइये (२१) । श्री सदाशिव ने कहा- हे कौलिनि ! गार्हस्थ्य धर्म ही सब मनुष्यों का आदि एवं धर्म-जनक है। अतएव पहले यथार्थ रूप से उसे ही कहता हूँ, सुनो (२२) । गृहस्थ ब्रह्म-निष्ठ हो और ब्रह्म-ज्ञान-परायण रहे। जो-जो कर्म करे, उन सबको ब्रह्म को समर्पित करे (२३) । गृहस्थ मिथ्या बात न कहे, शठता न करे और देवता, अतिथि के पूजन में तत्पर रहे (२४) । माता-पिता को गृहस्थ साक्षात् प्रत्यक्ष देवता जानकर सदा सब प्रकार से प्रयत्न कर उनकी सेवा करे (२५) । हे शिवे, हे पार्वति ! माता-पिता के सन्तुष्ट होने से तुम्हारी प्रसन्नता होगी। हे देवि ! तुम्हारी प्रसन्नता होने से परब्रह्म प्रसन्न होंगे (२६) । हे आद्ये ! तुम्हीं जगत् की माता हो और परब्रह्म ही जगत् के पिता हैं। अतएव जिन-जिन कार्यों से गृहस्थ लोग तुम्हारी प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं, उनके सिवा अन्य कौन सी तपस्या है (२७) ? उन-उन अवसरों की विवेचना कर माता-पिता को आसन, शय्या, वस्त्र, पानीय और भोज्य वस्तु प्रदान करे (२८) । कुल-पावन सत्पुत्र उन्हें कोमल वचन सुनावे । सदा उनके प्रिय कार्य करे। माता-पिता का आज्ञाकारी बने । यदि अपने मङ्गल की कामना है, तो कदापि माता-पिता के पास उद्धत परिहास, तर्जन या अप्रिय वचन का प्रयोग न करे (२६-३०) । पिता का शासन माननेवाला पुत्र माता-पिता को देखते ही उन्हें प्रणाम कर उठ खड़ा हो और उनकी आज्ञा के बिना बैठे नहीं (३१) । जो व्यक्ति विद्या और धन के घमण्ड में चूर होकर माता-पिता की अवज्ञा करता है, वह इस लोक में सब धर्मों का अनधिकारी होकर अन्त में घोर नरक में जाता है (३२) । गृहस्थ कण्ठ-गत प्राण होने पर भी माता-पिता, पुत्र, भार्या, अतिथि और सहोदर-इनका त्यागकर भोजन न करे (३३) । जो व्यक्ति सभी गुरुओं (माता-पिता आदि) और सभी बन्धुओं (सहोदर आदि) को वञ्चित कर भोजन करता है, वह अपना ही पेट भरनेवाला इस लोक में निन्दित होता है और पर-लोक में नरक में जाता है (३४) । गृहस्थ पत्नी की रक्षा करे, पुत्रों को विद्या की शिक्षा दे, स्वजन और बन्धुओं का पोषण करे। यही सनातन धर्म है (३५) ।
५२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जननी से देह की वृद्धि होती है, जनक से देह प्रयोजित होती है और स्वयं व स्वजनों से प्रीति-पूर्वक शिक्षा प्राप्त होती है। जो इन सबका त्याग करता है, वह अधम है (३६)। हे महेशानि ! इन सबके लिए सौ- सौ कष्ट भी उठाकर यथा-सम्भव इन्हें सदा प्रसन्न रखे, यही सनातन धर्म है (३७) । जो मनुष्य पृथिवी पर ब्रह्म-निष्ठ और सत्य-प्रतिज्ञ है, वही महा-पुरुष धन्य है और वही पुरुष परमार्थ का ज्ञाता है (३८) । भार्या की ताड़ना कभी न करे, माता के समान सदा उसका पालन करे। यदि वह साध्वी और पतिव्रता है तो घोर कष्ट में पड़ने पर भी उसका त्याग न करे (३६)। विज्ञ व्यक्ति अपनी पत्नी के विद्यमान रहते दुष्ट भाव से पर-स्त्री को छुए तक नहीं अन्यथा अर्थात् छूने से नरक-गामी होगा (४०)। प्राज्ञ व्यक्ति पर-स्त्री के साथ एकान्त में सोने, रहने और अयुक्त बातचीत करने का त्याग करे और स्त्रियों को वीरता न दिखावे (४१) । धन, वस्त्र, प्रेम, श्रद्धा, मधुर वचनों से भार्या को निरन्तर सन्तुष्ट रखे, कभी उससे अप्रिय आचरण न करे (४२)। सांसारिक तत्त्व का ज्ञाता व्यक्ति उत्सव, लोक-यात्रा, तीर्थ एवं अन्य व्यक्ति के घर में पुत्र अथवा सह- योगी के साथ बिना उसे कभी न भेजे (४३) । हे महेशानि ! पतिव्रता भार्या जिस पुरुष से सन्तुष्ट रहती है, उसके सभी धर्म पूर्ण होते हैं अर्थात् ऐसा व्यक्ति सभी धर्मानुष्ठानों से होनेवाले फलों को प्राप्त करता है और तुम्हारा प्रिय होता है (४४) । पिता पुत्र का पालन चार वर्ष तक करे, उसके बाद सोलह वर्ष तक उसे विद्या और सभी गुणों की शिक्षा दे (४५) । पालन और शिक्षा में बीस वर्ष बीतने पर बीस वर्ष से अधिक आयुवाले पुत्रादि को गृह- कार्य में लगावे । फिर अर्थात् गृह-कार्य के उपयुक्त होने पर उसे आत्म-तुल्य समझकर उस पर स्नेह प्रकट करे (४६) । कन्या का भी इसी प्रकार पालन करे और बड़े यत्न से उसे शिक्षा दे। कन्या को धन-रत्न से समन्वित कर ज्ञानवान् वर को प्रदान करे (४७) । इसी प्रकार गृही भाई, बहन, भांजे, भतोजे, ज्ञाति, मित्र और भृत्यों (सेवकों) का पालन कर उन्हें सन्तुष्ट करे (४८) । तदनन्तर अर्थात् भाई आदि के पालन में समर्थ होने के बाद गृहस्थ स्वधर्म में तत्पर एक-ग्राम-वासियों, अभ्यागतों और उदासीन लोगों का भी पालन करे (४६) । हे देवि ! ऐश्वर्य होने पर गृहस्थ यदि इस प्रकार आचरण नहीं करता, तो वह 'पशु' हो माना जाना चाहिए और वह पापी लोक-समाज में निन्दित होता है। निद्रा, आलस्य, देह के प्रति यत्न, केश-विन्यास, भोजन एवं वस्त्र में आसक्ति—ये आवश्यकता से अधिक न करे (५०-५१) । गृहस्थ परिमित-भोजी, परिमित-निद्रा, निर्मल-प्रकृति, परिमित-भाषी, परिमित-मैथुन, नम्र, शुचि, निपुण, निरालस्य और सब कर्मों में तत्पर रहे। शत्रु के सामने शूर और बान्धव एवं गुरु के पास विनीत रहे । निन्दित व्यक्ति का आदर न करे, सम्मानित लोगों की अवज्ञा न करे (५२-५३) । सहवास और विचार द्वारा व्यक्ति का स्वभाव, सौहार्द, व्यवहार, प्रवृत्ति और प्रकृति जानकर उस पर विश्वास करे (५४) । बुद्धिमान व्यक्ति क्षुद्र शत्रु होने पर भी उससे शङ्कित रहे और अवसर देखकर ही अपना भाव प्रकट करे, किन्तु धर्म का लङ्घन न करे (५५) । धर्मज्ञ व्यक्ति अपना यश, पौरुष और जिसे प्रकट करने से अन्य लोग विरोध करें तथा जो परोपकार के लिए किया गया हो, उसे प्रकाशित न करे (५६) । यशस्वी व्यक्ति जय की निश्चित सम्भावना होने पर भी कभी लोक-निन्दित कार्य में प्रवृत्त न हो और गुरु या लघु व्यक्ति से विवाद न करे (५७) । मान-पूर्वक विद्या, धन, यश और धर्म का उपार्जन करे। असत्य, व्यसन (द्यूत-क्रीड़ा आदि), कुसंग, मिथ्यालाप, पर-द्रोह का त्याग करे (५८) । चेष्टा अवस्था के अनुसार और क्रिया समय के अनुसार होती है, अतः 'अवस्था' और 'समय' का विचार कर कर्म करे (५६) । गृही लोग योग-क्षेम में अर्थात् अलब्ध
आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५३ वस्तु के अर्जन और लब्ध वस्तु के रक्षण में लगा रहे । दक्ष धार्मिक व्यक्ति स्वभाव से ही मित-भाषी और मित- हास्य होता है अर्थात् न अधिक बोलता है और न उच्च स्वर से अधिक हंसता ही है, विशेष कर मान्य व्यक्ति के सामने (६०) । जितेन्द्रिय, निर्मल-स्वभाव, सुचिन्त्य, दृढ़ व्रती, प्रमाद-रहित और दूर-दर्शी होकर विषयोपभोग का कर्तव्याकर्तव्य विचार करे (६१) । धीर व्यक्ति सत्य, कोमल, सन्तोष-जनक, शुभ-कारक वाक्य का प्रयोग करे । आत्म-गौरव का प्रकाश और पर-निन्दा न करे (६२) । जो लोग मार्ग में जलाशय, विश्राम-गृह और सेतु की प्रतिष्ठा करते हैं, वे त्रिभुवन को जय करते हैं अर्थात् सबसे उत्कृष्ट पद को पाते हैं (६३) । माता-पिता जिससे सन्तुष्ट हों, मित्र लोग जिसके प्रेमी हों, लोग जिसका यशोगान करते हों, वही त्रिभुवन को जीतता है (६४) । सत्य ही जिसका व्रत है, जिसमें दोनों के प्रति सदा दया रहती है, काम और क्रोध जिसके वश में हैं, वही त्रिभुवन को जीतता है (६५) । जो व्यक्ति पर-स्त्री से विरक्त है, दूसरे के वस्तु की अभिलाषा से जो रहित है, जो दम्भ और मात्सर्य से हीन है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६६) । जो क्षत्रिय युद्ध में डरता नहीं और पराङ्मुख नहीं होता और जो धर्म-युद्ध में मरता है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६७) । जिसके मन में संदेह नहीं है, जो व्यक्ति विश्वास-युक्त है, पाशुपत आचार में तत्पर है और जो मेरी आज्ञा का पालन करता है, वही त्रिभुवन को जीतता है । जो ज्ञानी शत्रु और मित्र के प्रति सम- दृष्टि रखकर केवल संसार-यात्रा के निर्वाह के लिए विहित कर्मों का अनुष्ठान करता है, वही संसार को जीतता है (६८-६६) । हे देवि ! 'शौच' दो प्रकार के हैं— बाह्य और अभ्यन्तर । ब्रह्म में आत्म-समर्पण अर्थात् परमात्मा में मन की एकाग्रता ही आन्तरिक शौच कहा गया है (७०) । जल या भस्म द्वारा मैल को दूर करने से जो देह-शुद्धि होतो है, उसे बाह्य शौच कहते हैं (७१) । हे प्रिये ! क्षुद्र जलाशय, कूप, वापी, ह्रद, नदी, गङ्गा और स्वनंदी— ये सब यथा-क्रम अधिक पवित्रता-दायक हैं अर्थात् इन सब तीर्थ-जलों में स्नान करने से देह शुद्ध होती है (७२) । हे सुव्रते ! बाह्य शौच के सम्बन्ध में याज्ञिक भस्म ही प्रशस्त है । निर्मल मिट्टी द्वारा भी इस प्रकार स्नान से शुद्धि होती है । वस्त्र, मृग-चर्म, तृण आदि भी मिट्टी के समान शुद्धि-दायक हैं (७३) । हे शिवे ! इस शौच और अशौच के विषय में अधिक कहना आवश्यक नहीं है । जिससे मन पवित्र हो, वही आचारण गृहस्थ करे (७४) । निद्रा के बाद, मैथुन के बाद, मल-मूत्र-त्याग के बाद, आहार के बाद और मल के छू जाने पर उक्त प्रकार बहिः शौच की विधि करे (७५) । त्रिकाल में अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और अपराह्न में वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या क्रमशः सम्पन्न करे और उपासना-भेद यथा-शास्त्र पूजा करे (७६) । हे प्रिये ! जो ब्रह्म-मन्त्रोपासक हैं, वे गायत्री के जप-काल में गायत्री के प्रतिपाद्य ब्रह्म हैं, इस प्रकार की भावना करें । ऐसा करने पर वैदिक सन्ध्या होगी (७७) । जो ब्रह्मोपासक नहीं हैं, उनको वैदिक सन्ध्या सूर्यार्घ्य-दान और गायत्री-जप से होगी (७८) । हे भद्रे ! सभी आह्निक कार्यों में १००८ या १०८ या १० बार जप करने का नियम है (७६) । हे देवि ! शूद्र और साधारण जाति को केवल आगमोक्त विधि का ही अधिकार है । उसी से उनको सब प्रकार की सिद्धि होगी (८०) । प्रातः-सन्ध्या सूर्योदय के समय करे । इसी प्रकार मध्याह्न-सन्ध्या और सायं-सन्ध्या क्रमशः मध्याह्न-काल में तथा सूर्यास्त के समय करे । इस सन्ध्या-वन्दन का समय 'त्रिकाल' निर्दिष्ट है। श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने स्वयं कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मण आदि सभी वर्गों के लिए एकमात्र तान्त्रिक क्रिया ही प्रशस्त है (८१-८२) । हे देवदेव ! इस समय किसलिए तुम ब्राह्मणों को वैदिक क्रिया में नियोजित करते हो ? यह सब विशेष रूप से वर्णन करो (८३) ।
५४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र श्री सदाशिव ने कहा—हे तत्त्वज्ञ ! तुमने यथार्थ ही कहा है। कलि-युग में सभी वर्णों के लिए एकमात्र तान्त्रिकी क्रिया ही भोग और मोक्ष की निमित्त है और सभी कार्यों में वह सिद्धि देती है (८४)। यह ब्रह्म-सावित्री जिस प्रकार वैदिकी है, उसी प्रकार तान्त्रिकी भी है। अतः दोनों ही कर्म प्रशस्त है (८५) । हे देवि ! इसीलिए मैंने यहाँ कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मणों का गायत्री में ही अधिकार होगा, अन्य किसी वैदिक मन्त्र में नहीं (८६) । कलि-काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की गायत्री क्रमश: 'ॐ', 'श्रीं' और 'ऐं' पूर्विका होगी अर्थात् ब्राह्मण गायत्री के पूर्व 'ॐ', क्षत्रिय गायत्री के पूर्व 'श्रीं' और वैश्य गायत्री के पूर्व 'ऐं' लगावें (८७) । हे परमेश्वरि ! शूद्रों से द्विजों को अलग करने के लिए द्विजों के आह्निक में पूर्व काल में वैदिक सन्ध्या की विधि कही है (८८) । अन्यथा अर्थात् वैदिक सन्ध्या न करने से भी केवल शैव पद्धति द्वारा सिद्धि मिलेगी। यह सत्य, सत्य, विशेष सत्य है, इसमें सन्देह नहीं (८६) । हे देव-वन्दिते ! अनातुर मुमुक्षु व्यक्ति सन्ध्या का यथोक्त समय बीत जाने पर भी 'ॐ तत् सत् ब्रह्म' का उच्चारण कर इस सन्ध्या को करें (६०) । अर्थात् आतुर के लिए विशेष नियम रखने के उद्देश्य से 'अनातुर' विशेषण दिया है। आसन, वस्त्र, पात्र, शय्या, यान, गृह, गृह- सामग्री आदि परिष्कृत होते हुए भी और भी परिष्कृत हों, तो अधिक उत्तम है (६१) । गृहस्थ आह्निक कार्य समाप्त कर स्वाध्याय या गृह-कर्म करे, बिना उद्यम खाली न बैठा रहे (६२) । पुण्य तीर्थ में, पुण्य तिथि में, चन्द्र-ग्रहण और सूर्य-ग्रहण-काल में जप और दान करने से मङ्गल होता है (६३) । कलि-युग में मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, अतः उपवास करना ठीक नहीं है। कलियुग में 'उपवास' के स्थान पर एकमात्र 'दान' ही प्रशस्त है (६४) । हे महेशानि ! कलि-युग में 'दान' सब सिद्धियों का देनेवाला है। सत् क्रिया करनेवाले दरिद्र व्यक्ति हीं 'दान' के पात्र हैं (६५) । हे अम्बिके ! मास, वर्ष और पक्ष के प्रारम्भिक दिन में, चतुर्दशी, अष्टमी, शुक्ल- पक्ष की एकादशी, अमावास्या, अपना जन्म-दिन, पिता-माता की मृत्यु-तिथि और निर्दिष्ट उत्सव के दिन— ये सब पुण्य काल कहे गए हैं (६६-६७) । गङ्गा नदी, महा-नदी, गुरु-गृह और प्रसिद्ध देवता-क्षेत्र पुण्य-तीर्थ कहे हैं (६८) । अध्ययन, माता-पिता की सेवा, पत्नी की रक्षा को छोड़कर तीर्थ करने से पुरुष नरक जाते हैं (६६) । स्त्रियों के लिए पति की सेवा से बढ़कर तीर्थ-सेवा नहीं है, उपवासादि क्रिया नहीं है, व्रत का नियम नहीं है अर्थात् इन सब कर्मों से मिलनेवाला फल मात्र पति-सेवा से ही उन्हें मिल जाता है अतः ये सब कर्म उनके लिए निर्दिष्ट नहीं हैं (१००) । पति ही स्त्रियों के लिए तीर्थ, तपस्या, दान, व्रत और गुरु हैं। अतः स्त्री पूरे अन्त:- करण से पति-सेवा करे (१०१) । वचनों से, सेवा से सदा पति का प्रिय कार्य करे और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलती हुई पति के बान्धवों को सन्तुष्ट करे (१०२) । पतिव्रता स्त्री पति को कठोर दृष्टि से न देखे, दुर्वचन भी न सुनाए, मन से भी स्वामी को अप्रिय लगनेवाला कार्य न करे (१०३) । जो स्त्री शरीर, मन और वचन से सदा प्रिय कार्य-रूपी अनुष्ठान द्वारा पति को सन्तुष्ट करती है, वह ब्रह्म-पद को पाती है (१०४) । पति की आज्ञाकारिणी स्त्री दूसरे पुरुष का मुख न देखे, दूसरे पुरुष के साथ बात न करे (१०५) । स्त्री बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन और बुढ़ापे में पति के बान्धवों के अधीन रहती है। किसी भी अवस्था में वह स्वाधीन नहीं रहती (१०६) । पिता और पति की मर्यादा, पति-सेवा तथा धर्म-शासन को न जाननेवाली बालिका कन्या का विवाह न करे (१०७) । नर-मांस, नराकृति-पशु-मांस, उपकारी गाय और रस-हीन मांस-भोजी जन्तु का मांस न खाए (१०८) । हे शिवे ! भूमि से उत्पन्न ग्राम्य एवं जंगली विविध प्रकार के फल-मूल स्वेच्छापूर्वक खा सकते हैं (१०६) । ब्राह्मण के लिए अध्यापन और याजन—यही दो वृत्तियाँ उत्तम हैं। इनमें अशक्त हो, तो क्षत्रिय-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति से निर्वाह करे (११०) । क्षत्रिय के लिए संग्राम और प्रजा-पालन—यही सद्-
आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५५ वृत्तियाँ हैं। यदि इनमें अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो शूद्र-वृत्ति का सहारा ले (१११)। हे परमेशानि ! वाणिज्य में असमर्थ वैश्यों के लिए शूद्र-वृत्ति का सहारा लेना अनुचित नहीं है। शूद्रों के लिए सेवा-वृत्ति विहित है (११२) । हे देवेशि ! सामान्य वर्ण अर्थात् पञ्चम-वर्ण को ब्राह्मण-वृत्ति को छोड़कर अन्य सभी वृत्तियों का अधिकार है (११३) । अपनी वृत्ति में स्थित ब्राह्मण द्वेष-रहित, ममता-शून्य, शान्त, सत्य-वादी, जितेन्द्रिय, मात्सर्य-रहित और निष्कपट होता है (११४)। सत्पथावलम्बी शिष्यों को पुत्र के समान अध्ययन कराता है, सब लोगों का हितैषी और पक्षपात-रहित होता है (११५) । ब्राह्मण मिथ्या कथन, असूया, व्यसन (मृगया, द्यूत आदि), अप्रिय वचन, नीचों का सङ्ग और दम्भ कभी न करे (११६) । हे वरानने ! क्षत्रियों को सन्धि होने पर युद्ध की इच्छा करना निन्दनीय है। सम्मान-पूर्वक सन्धि को स्थिर रखे और युद्ध में जय या मृत्यु दोनों ही उत्तम समझे। राजा प्रजा के धन का लोभ न करे और नियम से ही कर ग्रहण करे। स्वीकृत धर्म की रक्षा करते हुए प्रजा का पुत्र-वत् पालन करे (११७)। न्याय, युद्ध, सन्धि एवं अन्यान्य सभा राजकीय कार्यों में राजा सदा मन्त्रियों के साथ विचार करे (११८-११६) । धर्म-सम्मत युद्ध करे, न्यायतः दण्ड और पुरस्कार दे तथा बलानुसार यथा-शास्त्र सन्धि करे (१२०) । उपाय करके कार्य सम्पन्न करे और शत्रुओं को युद्ध तथा सन्धि उपायों द्वारा नियन्त्रित करे क्योंकि उपाय से ही सभी प्रकार के जय, मङ्गल और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं (१२१)। नीचों का संग न करे, सदा पण्डितों का प्रिय रहे, कार्य-कुशल, सुशील, मित-व्ययी और विपत्ति के समय धैर्य- शाली रहे (१२२) । दुर्ग-संस्कार में निपुण, शस्त्र-शिक्षा में विचक्षण और अपने सैनिकों के भाव का ज्ञाता हो तथा उन्हें रण-कौशल सिखावे (१२३) । हे देवि ! युद्ध में मूर्च्छित, शस्त्र-हीन, भागने को तत्पर या बलपूर्वक लाए गए शत्रु को और शत्रु के स्त्री-शिशु-सन्तानादि को मारे नहीं (१२४) । जो सारी वस्तुएँ विजय में या सन्धि द्वारा प्राप्त हों, उन्हें यथा-योग्य सैनिकों में बाँट दे (१२५)। योद्धाओं की वीरता और चरित्र को राजा को अलग- अलग जानना चाहिए। अपना हितेच्छु राजा एक व्यक्ति को बहुत सेना का अधिपति न बनावे (१२६) । राजा एक व्यक्ति पर पूरा विश्वास न करे, एक ही व्यक्ति को विचार करने में नियुक्त न करे। नीच लोगों के प्रति न समता-भाव दिखावे, न उनके साथ क्रीड़ा या परिहास करे (१२७) । अनेक शास्त्रों का ज्ञानी, मित-भाषी, जिज्ञासु, स्वाभिमानी और दम्भ-शून्य रहे। दण्ड देते समय या प्रसन्नता के समय धीर रहे अर्थात् दोनों ही समय आकार और मुद्रा से सम-भाव रहे (१२८)। राजा स्वयं या गुप्तचरों द्वारा प्रजा के भाव को जानता रहे और अपने स्वजनों तथा सेवकों के भाव को समझता रहे (१२६) । तत्त्व-दर्शी शासक क्रोध, दम्भ या प्रमाद के वश में होकर सहसा किसी का सम्मान या अपमान न करे (१३०)। सेनाओं के सेनापति और मन्त्रियों की स्त्री-कन्या-पुत्र- भृत्य का पालन राजा करे ! यदि दोषी हों, तो यथा-विधि उन्हें दण्डित करे (१३१) । उन्मत्त, असमर्थ, बालक, पीड़ित और वृद्ध—ऐसे लोग यदि बान्धव-रहित हों, तो राजा पिता के समान उनकी रक्षा करे (१३२) । कृषि-वाणिज्य को ही वैश्यों को सनातन वृत्ति माना है और उसके द्वारा सभी लोगों की शरीर-रक्षा होती है (१३३)। हे देवि ! इसीलिए वाणिज्य और कृषि-कर्म में असावधानी, व्यसन, आलस्य, मिथ्या-व्यवहार, शठता-कभी किसी प्रकार न करे (१३४) । हे शिवे ! क्रेता और विक्रेता-दोनों की सम्मति से वस्तु और उसका मूल्य निश्चित कर परस्पर-स्वीकृति से 'क्रय' सिद्ध होता है (१३५) । हे प्रिये ! मत्त, विक्षिप्त, शोकार्त, विशेष उत्कण्ठित, बालक, शत्रु-गृहीत और रोग से भ्रान्त-बुद्धि—ऐसे लोगों को किया गया दान और विक्रय असिद्ध होता है (१३६) । अदृष्ट-वस्तु का गुण सुनकर ही क्रय सिद्ध होता है किन्तु उस गुण में विपर्यय होने से विक्रय असिद्ध हो जाता है। हाथी, ऊँट, घोड़ा आदि के गुण सुनकर क्रय-सिद्धि होती है किन्तु यदि वर्णित गुण उनमें न हुआ, तो वह क्रय असिद्ध होता है। हाथी, ऊंट, घोड़े आदि का गुप्त दोष प्रकट होने पर एक वर्ष बाद भी वह
५६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र क्रय अन्यथा किया जा सकता है (१३७-३८)। हे कुलेश्वरि! मानव-देह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को भाजन-स्वरूप है। इसलिए हमारे शासन के कारण इस शरीर का क्रय सिद्ध नहीं है (१३६) । हे प्रिये ! जो, गेहूँ और धान्य में वर्ष के अन्त में (ऋण देने पर) मूल का चतुर्थांश मात्र लाभ होता है। धातु-द्रव्य में एक वर्ष में अष्टमांश लाभ लेना निर्दिष्ट है (१४०)। ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में शास्त्र के द्वारा स्वीकृत नियमानुसार ही मनुष्य कार्य करें (१४१) । सेवा-वृत्ति में लगे व्यक्ति कार्य-कुशल, पवित्र, सत्यवादी, जित-निद्र, जितेन्द्रिय, सावधान और निरालस्य रहें (१४२) । इस लोक और पर-लोक में सुख चाहनेवाले सेवक स्वामी को विष्णु के समान, उनकी पत्नी को माता के समान और उनके बान्धवों को देवता के समान आदर दें (१४३) । स्वामी के मित्रों को अपना मित्र, उनके शत्रुओं को अपना शत्रु समझें । सभी समय स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए भय-पूर्वक उपस्थित रहें (१४४) । अपमान, घर के छिद्र, गोपनीय अन्य बातों और जिससे स्वामी को ग्लानि होती हो, ऐसी बातों को अति यत्न-पूर्वक छिपा कर रखें (१४५) । स्वामी के धन में लोभ न करें, सदा स्वामी के हित में लगे रहें। उनके निकट असद् वाक्य, क्रीडा और हँसी का त्याग करें (१४६) । स्वामी की दासियों आदि को पाप-मन से न देखें, उनके साथ एकान्त में न सोयें और न हँसी-खेल करें ( ४७)। स्वामी की शय्या, आसन, यान, वसन, पानादि-पात्र, पादुका, भूषण, शस्त्र अपने उपयोग में न लायें (१४८) । यदि सेवक से अपराध हो, तो उसके लिए स्वामी से क्षमा मांगे । स्वामी के सामने धृष्टता, लम्बी-चौड़ी बात, आदि छोड़ दे (१४६) । हे शिवे ! भैरवी-चक्र और तत्त्व-चक्र के बाहर सभी वर्ण अपने-अपने वर्ण में ही ब्राह्म-विवाह और भोजन करें किन्तु हे महेशानि ! उक्त दो स्थानों अर्थात् तत्त्व-चक्र और भैरवी चक्र में शैव-विवाह कहा है। इनमें भोजन और पान करते समय वर्ण का भेद-भाव नहीं किया जाता । तात्पर्य यह है कि शैव-विवाह में वर्ण-विचार नहीं है और शैव-विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री दोनों चक्रों में तथा अन्य सभी कार्यों में ब्राह्म विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री प्रशस्त है। इसी प्रकार चक्रों में भोजन करते समय जाति-भेद का विचार नहीं है किन्तु अन्य समयों में, विचार करना चाहिए (१५०-१५१) । श्री देवी ने कहा - यह 'भैरवी-चक्र' क्या है ? अथवा 'तत्त्व-चक्र' किस प्रकार का है ? मैं वह सब सुनना चाहती हूँ, कृपा करके बताइए (१५२) । श्री सदाशिव ने कहा - हे देवि ! कुल-पूजा की विधि से 'चक्र' का अनुष्ठान होता है। उत्तम साधकों को विशेष पूजा-समयों में उसे करना चाहिए (१५३) । हे प्रिये ! 'भैरवी-चक्र' के सम्बन्ध में समयादि का कोई नियम नहीं है। किसी भी समय यह शुभ 'भैरवी-चक्र' किया जा सकता है (१५४) । साधकों के लिए मंगल- कारी 'भैरवी-चक्र' का विधान बताता हूँ, जिसके द्वारा भगवती की आराधना करने से प्राणी को अभीष्ट फल मिलता है (१५५) । कुलाचार्य सुन्दर स्थल पर उत्तम आसन बिछा कर 'कामाद्य-अस्त्र' अर्थात् 'क्लीं फट्' मन्त्र से उक्त आसन का शुद्ध कर उस पर बैठे (१५६) । सिन्दूर, रक्त-चन्दन या केवल जल से त्रिकोण-चतुष्कोण मण्डल बनाए (१५७) । एक सुन्दर घट लेकर उसे क्रमशः दही, अक्षत, फल, पल्लव, सिन्दूर तिलक से युक्त कर जल से भरे और प्रणव का उच्चारण करते हुए उसे उक्त मण्डल पर स्थापित कर उसे धूप-दीप दिखाए (१५८-१५६)। गन्ध- पुष्प से पूजन कर इष्ट-देवता का ध्यान करे और संक्षिप्त पूजा-विधि से उसमें पूजा करे (१६०) । हे सुर-वन्दिते ! इसमें जो विशेष है, उसे कहता हूँ, सुनो-
आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५७ इस चक्र में गुरु आदि नौ पात्र स्थापन करने की आवश्यकता नहीं है (१६१)। यथेच्छ तत्त्व अपने सामने रखकर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' मन्त्र से उन्हें प्रोक्षित कर 'दिव्य-दृष्टि' अर्थात् एकटक दृष्टि से उन्हें देखे (१६२) । फिर 'अलि-यन्त्र' अर्थात् मद्य-पात्र में गन्ध-पुष्प देकर उसमें आनन्द-भैरवी देवी और आनन्द-भैरव का ध्यान करे (१६३)। यथा— नव-यौवन-सम्पन्नां तरुणारुण-विग्रहाम्, चारु-हासामृताभाषोल्लसद्-वदन-पङ्कजाम् । नृत्य-गीत-कृतामोदां नानाभरण-भूषिताम्, विचित्र-वसनां ध्यायेत् वराभय-कराम्बुजाम् ॥ अर्थात् बाल-सूर्य के समान दीप्तिवाला शरीर है, मनोरम हास्य-सुधा की कमनीय कान्ति से मुख-कमल शोभायमान है, नृत्य-गीत से आनन्दिता हैं, नाना अलङ्कारों से सज्जिता हैं, विलक्षण वस्त्र पहने हैं और हाथों में वर-अभय मुद्राएँ हैं। इस प्रकार आनन्द-भैरवी का ध्यान कर आनन्द-भैरव का स्मरण करे (१६४)। यथा— कर्पूर-पूर-धवलं कमलायताक्षम्, दिव्याम्बराभरण-भूषित-देह-कान्तिम् । वामेन पाणि-कमलेन सुधाढ्य-पात्रं, दक्षेण शुद्धि-गुटिकां दधतं स्मरामि ॥ अर्थात् कर्पूर-राशि के समान शुक्ल वर्ण है, कमल के समान बड़े नेत्र हैं, दिव्य वस्त्र और अलंकारों से शरीर की कान्ति शोभायमान है, बाएँ हाथ में सुधा-पूर्ण पात्र और दाएँ हाथ में शुद्धि की गुटिका लिए हैं (१६५-६७)। इस प्रकार दोनों का ध्यान कर साधक उक्त सुरा-पात्र में इन दोनों की सम-रसता का चिन्तन करते हुए आदि में प्रणव (ॐ) और अन्त में 'नमः' जोड़कर नाम-मन्त्र का पाठ कर गन्ध-पुष्प से पूजा करने के बाद सुरा का शोधन करे (१६८) । यथा-- कुल-पूजक 'स्वाहान्त-पाशबीज-त्रय' अर्थात् 'आं ह्रीं क्रों स्वाहा' का १०८ बार जप कर सुरा का शोधन करे (१६६) । प्रबल कलि-काल में गृहस्थ केवल गृह-कार्य की कामना से एकाग्र-चित्त हो पूजन करे । गृहस्थ के लिए आद्य-तत्त्व (सुरा) के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में 'मधुर-त्रय' का निर्देश है (१७०) । दूध, चीनी और शहद- ये 'मधुर-त्रय' कहे हैं। इन्हें अलि-रूप अर्थात् 'मद्य'-स्वरूप मानकर देवता को निवेदन करे (१७१)। कलि-युग के सभी मनुष्य स्वभावतः काम-द्वारा भ्रान्त चित्तवाले अतः सामान्य बुद्धिवाले होते हैं, जिससे वे 'शक्ति' अर्थात् नारी को शक्ति-रूपा नहीं समझ पाते (१७२)। हे पार्वती ! इसी से उनके लिए 'शेष-तत्त्व' अर्थात् 'मैथुन'-तत्त्व के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में देवी के चरण-कमलों का ध्यान और इष्ट-मन्त्र का जप निर्दिष्ट है (१७३) । मांस आदि जो प्राप्त हों अर्थात् कलि-काल में अदूषित प्रत्येक 'तत्त्व' को उक्त मन्त्र (आं ह्रीं क्रों स्वाहा) से १०० बार अभिमन्त्रित करे (१७४) । फिर लाई हुई समस्त वस्तुओं को ब्रह्म-मय समझते हुए दोनों आँखें बन्द कर उन्हें भगवती काली को निवेदित करे, तब स्वयं पान और भोजन करे (१७५) । हे भद्रे ! यह 'भैरवी-चक्र' सार का सार-श्रेष्ठ है। सभी तन्त्रों में गुप्त है, इसे तुमसे कहा है (१७६)। हे पार्वती ! 'भैरवी-चक्र' और 'तत्त्व-चक्र' में शैव-पद्धति से विवाह करना श्रेष्ठ साधकों का कर्तव्य है (१७७) । बिना विवाह किए शक्ति-सेवी वीर साधक पर-स्त्री-गमन के पाप को प्राप्त करते हैं, इसमें संदेह नहीं (१७८) । 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ होने पर सभी जातियों के व्यक्ति श्रेष्ठ द्विज हो जाते हैं। 'भैरवी-चक्र' के समाप्त होने पर सभी अलग-अलग वर्ण के हो जाते हैं (१७६)। इस 'भैरवी-चक्र' में जाति-विचार नहीं है, उच्छिष्ट (जूठे) का भी विचार नहीं है। 'चक्र' में विद्यमान वीर मेरे ही स्वरूप होते हैं, अन्य नहीं (१८०) । फा०-८
५८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इस 'चक्र' में देश-काल का नियम नहीं है, पात्र का विचार नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिए द्रव्य को प्रयोग कर सकते हैं (१८१) । वीराचारी या पश्वाचारी द्वारा दूर-देश से लाया पका या बिना पका द्रव्य 'चक्र' में रखने से ही पवित्र हो जाता है (१८२) । हे महेश्वरि ! 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ में वीरों के ब्रह्म-तेज के प्रभाव से सभी विघ्न उद्विग्न और भयभीत होकर भाग जाते हैं (१८३) । पिशाच, गुह्यक, यक्ष, बेताल और अन्य क्रूर प्राणी 'भैरवी-चक्र' का नाम सुनते ही भय से दूर चले जाते हैं (१८४) । उस स्थान में सारे तीर्थ, महा- तीर्थ और देव-राज-सहित सभी देवता आदरपूर्वक आ जाते हैं (१८५) । हे शिवे ! 'चक्र' का स्थान 'महा-तीर्थ' है, अतः सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है, जिसमें देवता भी तुम्हें उत्तम नैवेद्य देने की इच्छा करते हैं (१८६) । म्लेच्छ, श्वपच, किरात या हूण आदि द्वारा लाए कच्चे या पके द्रव्य वीर के हाथ में देने से ही पवित्र हो जाते हैं (१८७) । कलि के पाप से दूषित व्यक्ति 'भैरवो-चक्र' और मेरे स्वरूप साधकों का दर्शन करने से ही पाप के पाश से छूट जाते हैं (१८८) । प्रबल कलि-काल में चक्रानुष्ठान को गोपनीय रखने की आवश्यकता नहीं है। वीराचारी सभी स्थानों में सभी समयों में 'कुल-साधना' करे (१८६) । 'चक्र' में व्यर्थ की बातचीत, चञ्चलता, वाचालता, छींकना-पादना और वर्ण-भेद अर्थात् वर्ण-विचार न करे (१९०) । क्रूर, दुष्ट, पश्वाचारी, पापी, नास्तिक, कुल-दूषक और कुल-शास्त्र के निन्दकों को 'चक्र' से दूर ही छोड़ दे (१९१) । स्नेह, भय या अनुराग के वश पश्वाचारी आदि को 'चक्र' में प्रवेश देने से वीराचारी भी 'कुल-धर्म' से भ्रष्ट होकर नरक में जाता है (१६२) । जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति वाला 'कुल-धर्मावलम्बी' हो, उसे सदा देववत् पूज्य माने (१६३) । जो वर्णाभिमान के वश 'चक्र' में वर्ण-भेद करता है, वह वेदान्त-वेत्ता होने पर भी घोर नरक में जाता है (१६४) । 'चक्र' के अन्दर पवित्र-मनवाले, साधु और साक्षात् शिव-स्वरूप कौलिकों के सम्बन्ध में पाप की शङ्का कैसे हो सकती है (१६५) ? शैव-मार्गावलम्बी विप्रादि लोग जब तक 'चक्र' में रहें, तब तक शिव के आदेशानुसार शाम्भवाचार का पालन करें (१६६) । ये सब 'चक्र' से बाहर होने पर लोक-यात्रा-निर्वाह के लिए अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिए निर्दिष्ट कर्मों का अलग-अलग पालन करें (१६७) । शवासन, मुण्डासन और चितासन पर बैठकर सौ पुरश्चरण करने से जो फल मिलता है, वह ज्ञानी साधक 'चक्र' में एक बार जप करने से ही पा जाता है (१६८) । 'भैरवी-चक्र' का माहात्म्य कहने में कौन व्यक्ति समर्थ है ? इसे एक बार करने से सारे पापों से छुटकारा मिल जाता है (१६६) । छः मास करने से भूपति, और एक वर्ष करने से साधक मृत्युञ्जय होता है। नित्य करने से निर्वाण-मुक्ति प्राप्त होती है (२००) । हे कालिके ! इस विषय में अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? हे सुब्रते ! सत्य जानो कि इस 'कुल-पद्धति' के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय ऐहिक तथा पारलौकिक सुख पाने का नहीं है (२०१) । सर्व-धर्म-शून्य कलि की प्रधानता के समय में 'कुल-धर्म' को छिपाने से कौल भी नरक को जाता है (२०२) । भोग और मोक्ष के एक-मात्र साधन 'भैरवी-चक्र' को मैंने कहा। हे कुलेश्वरि ! अब 'तत्त्व-चक्र' को बताता हूँ, उसे सुनो (२०३) । 'तत्त्व-चक्र' सब चक्रों का राजा है। इसे 'दिव्य-चक्र' कहा गया है। ब्रह्मज्ञ साधक के सिवा अन्य को इसे करने का अधिकार नहीं है (२०४) । जो लोग परब्रह्म के उपासक हैं; ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म-तत्पर, पवित्र अन्तःकरणवाले, सब प्राणियों का हित करने में लगे हुए, शान्त, निर्विकार, तन्त्र और गुरु-वाक्य पर विश्वास रखनेवाले, दया-शील, दृढ़-व्रती, सत्य-सङ्कल्प और ब्राह्म हैं, वही इस 'तत्त्व-चक्र' के करने के अधिकारी हैं (२०५-२०६) । हे तत्त्वज्ञे ! जो इस चराचर को ब्रह्म-भाव से देखते हैं, उन्हीं तत्त्वज्ञ पुरुषों को इस 'तत्त्व-चक्र' के करने का अधिकार है
आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५६ (२०७) । हे देवि ! जिन्हें इस प्रकार का भाव है कि 'सब कुछ ब्रह्म ही है, वही 'तत्त्व-चक्री' हैं अर्थात् उन्हें ही 'तत्त्व-चक्र' करने का अधिकार है (२०८) । इसमें घट की स्थापना नहीं होती, विस्तृत रूप में पूजा नहीं होती । सभी स्थानों में ब्रह्म-भाव से तत्त्व-साधन करे (२०६) । हे प्रिये ! ब्रह्म-मन्त्रोपासक और ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति चक्रे- श्वर बने । ब्रह्मज्ञ साधकों के साथ 'तत्त्व-चक्र' का आरम्भ करे (२१०) । रमणीय, अत्यन्त निर्मल और साधकों को सुखदायक प्रदेश में विचित्र आसन लाकर विमल आसन की कल्पना करे (२११) । हे शिवे ! चक्रेश्वर ऐसे स्थान में ब्रह्म-साधकों के साथ बैठकर तत्त्व-समुदाय को एकत्र करे और तब उन्हें सामने स्थापित करे (२१२) । चक्रेश्वर सभी तत्त्वों पर तार-प्रणव अर्थात् 'ॐ हंसः' मन्त्र का सौ बार जप कर निम्न मन्त्र का पाठ करे (२१३)— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म-हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ॥ अर्थात् जिसके द्वारा यज्ञ में घृतादि अर्पित किया जाता है, उसे 'अर्पण' कहते हैं अर्थात् स्रुवा आदि— वह ब्रह्म है । जो वस्तु अर्पित की जाती है अर्थात् घृत आदि—वह भी ब्रह्म है । ब्रह्म-अग्नि में स्वयं ब्रह्म द्वारा आहुति दी जाती है अर्थात् अग्नि और होम-कर्त्ता भी ब्रह्म हैं। इस प्रकार ब्रह्म-कर्म में जिसका चित्त एकाग्र होता है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है (२१४) । उक्त मन्त्र 'ब्रह्मार्पणं......समाधिना' को सात या तीन बार जप कर सभी तत्त्वों का शोधन करे (२१५) । तब ब्राह्म मन्त्र से उन सबको परमात्मा को समर्पित कर ब्रह्मज्ञ साधकों के सहित एक साथ पान और भोजन करे (२१६) । हे महेश्वरि ! इस 'तत्त्व-चक्र' में जाति-गत पृथकता को छोड़ दे। इसमें देश-काल या पात्र का नियम नहीं है (२१७) । जो मूढ़ लोग इस 'दिव्य-चक्र' में असावधानी से वंश-गत या जाति-गत भेद-भाव करते हैं, उन्हें अति निकृष्ट गति प्राप्त होती है (२१८) । अतः ब्रह्मज्ञ साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के लिए सब यत्न करके 'तत्त्व-चक्र' का अनुष्ठान करे (२१६) । श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! आपने गृहस्थों के धर्म को विस्तार से कहा है। अब कृपया संन्यास में विहित धर्मों को कहिए (२२०) । श्री सदाशिव ने कहा—हे देवि ! कलि-युग में अवधूताश्रम ही संन्यास कहा गया है। जिस विधि से संन्यास आश्रम कर्त्तव्य है, उसे अब सुनो (२२१) । ब्रह्म-ज्ञान के उत्पन्न होने पर, सभी काम्य कर्मों से रहित होने पर, अध्यात्म-विद्या में विशारद व्यक्ति संन्यासाश्रम का अवलम्बन करे (२२२) । वृद्ध पिता-माता, शिशु पुत्र, पतिव्रता भार्या, असमर्थ बन्धु-वर्ग—इन सबको छोड़कर जो प्रव्रज्या करते हैं, वे नरक को जाते हैं (२२३) । कुलावधूत-संस्कार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सामान्य जाति—इन पाँचों वर्णों को अधिकार है (२२४) । साधक गृहस्थोचित कर्म सम्पन्न कर, अपने सभी स्वजनों को सन्तुष्ट कर, ममता और कामना-शून्य होकर तथा जितेन्द्रिय हो गृह से बाहर निकले (२२५) । गृहस्थाश्रम त्याग कर जाने की अभिलाषा रखनेवाला व्यक्ति अपने स्वजन बन्धुओं और आश्रित लोगों तथा गांव के निवासियों को बुलाकर प्रेम-पूर्ण मन से अनुमति देने की प्रार्थना करे (२२६) । फिर सबकी अनुमति लेकर अभीष्ट देवता को प्रणाम कर गाँव की प्रदक्षिणा कर निरपेक्ष- हृदय से घर से बाहर निकले (२२७) । संसार-बन्धन से मुक्त होकर परमानन्द से सुखी होकर कुलावधूत ब्रह्मज्ञ के पास जाकर यह प्रार्थना करे (२२८)— गृहाश्रमे पर-ब्रह्मन् ! ममैतद् विगतं वयः । प्रसादं कुरु मे नाथ ! संन्यास-ग्रहणं प्रति ॥
६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे पर-ब्रह्मन् ! गृहस्थाश्रम में मेरी इतनी आयु बीत चुकी है। हे नाथ ! मैं अब संन्यास लेने के लिए आया हूँ, मुझ पर प्रसन्न हों (२२६)। गुरुदेव विचार करके गृह-कर्म से निवृत्त उस व्यक्ति को शास्त्र और विवेक से युक्त देखकर द्वितीय आश्रम का आदेश प्रदान करें (२३०) । तब शिष्य स्नान कर संयतात्मा होकर आह्निक कर्म सम्पन्न कर तीन ऋणों से मुक्त होने के लिए देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करे (२३१) । ब्रह्मा, विष्णु, अनुचरों सहित रुद्र— ये देव-गण, ब्रह्मर्षि-गण और सभी पितृ-गण संन्यास लेते समय पूज्य हैं। उन सबको बताता हूँ, सुनो (२३२-३३) । हे देवि ! पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्ध-प्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्ध-प्रमातामही की पूजा करे (२३४) । संन्यास लेते समय पूर्व दिशा में देव-गण एवं ऋषिगण और पश्चिम दिशा में मातामह-पक्ष की पूजा करे (२३५) । पूर्व-दिशा से आरम्भ कर दो-दो आसन स्थापित करे। इन आसनों पर क्रमशः देवादि का आवाहन कर पूजा आरम्भ करे (२३६) । फिर सबका अर्चन कर अलग-अलग पिण्ड-दान करे। इस प्रकार पिण्ड-दान की विधि के अनुसार यथा-क्रम पिण्ड देकर पितृ-गण एवं देव-गण से हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (२३७)— तृप्यध्वं पितरो देवा देवर्षि-मातृका-गणाः । गुणातीत-पदे यूयममृणी-कुरुताऽचिरात् ॥ अर्थात् हे पितृ-गण ! हे मातृ-गण ! हे देवर्षि-गण ! मैं गुणातीत पद को जा रहा हूँ। आप लोग मुझे शीघ्र ऋण से मुक्त कर दें (२३८) । इस प्रकार देव, ऋषि, पितृ और मातृ-गण को बारम्बार प्रणाम कर और उनसे अपनी ऋण-मुक्ति की प्रार्थना कर ऋण-त्रय से छूटकर साधक आत्म-श्राद्ध करे (२३६)। आत्मा ही सबकी पिता, पितामह और प्रपितामह है। अतः ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा को आत्म-समर्पण करने के लिए अपना श्राद्ध करे (२४०) । हे देवि ! पूर्ववत् परिकल्पित आसन पर उत्तर की ओर मुख करके बैठे और अपने पितृ-गण का आवाहन कर अर्चन कर पिण्ड-दान करे। देव-गण, ऋषि-गण और पितृ-गण के लिए पिण्ड-दान हेतु यथा-क्रम पूर्वाग्र, दक्षिणाग्र, पश्चिमाग्र और अपने पिण्ड-दान हेतु उत्तराभिमुख कुश रखे (२४१- ४२) । मुमुक्षु व्यक्ति गुरु द्वारा प्रदर्शित पद्धति के अनुसार श्राद्ध-कर्म समाप्त कर चित्त-शुद्धि के लिए सौ बार निम्न मन्त्र का जप करे (२४३)— ह्रीं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥ इस मन्त्र का अर्थ कृपया पृष्ठ ३२ पर देखें (२४४) । इसके बाद गुरुदेव पूजा-पद्धति के अनुसार वेदी पर मण्डल प्रस्तुत कर उस पर कलश-स्थापन-पूर्वक पूजा प्रारम्भ करें (२४५) । फिर ब्रह्मज्ञ व्यक्ति परम ब्रह्म का ध्यान कर शैव पद्धति के अनुसार पूजा कर वह्नि-स्थापन करे (२४६) । तब गुरुदेव पूर्वोक्त संस्कृत वह्नि में स्व-कल्पोक्त आहुतियां देकर शिष्य को बुलाकर साकल्य-होम करावें (२४७) । पहले महा-व्याहृति-होम कर प्राण-होम अर्थात् प्राणादि पञ्च-वायु का होम करे। प्राण, अपान समान, उदान, व्यान—ये ही पञ्च प्राण-वायु हैं (२४८) । तब देह में आत्मा का अध्यास अर्थात् देह को आत्मा समझने का जो भ्रम है, उसे हटाने के लिए तत्त्व-होम करे। यथा— पृथिवी सलिलं वह्निर्वायुराकाशं, गन्धो रसश्च रूपञ्च स्पर्शः शब्दो, वाक्-पाणि-पादाश्च पायूपस्थौ श्रोत्रं त्वङ्-नयनं जिह्वा घ्राणं बुद्धीन्द्रियाणि च; मनो बुद्धिश्च चित्तं चाहङ्कारो देहजाः