महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इस 'चक्र' में देश-काल का नियम नहीं है, पात्र का विचार नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिए द्रव्य को प्रयोग कर सकते हैं (१८१) । वीराचारी या पश्वाचारी द्वारा दूर-देश से लाया पका या बिना पका द्रव्य 'चक्र' में रखने से ही पवित्र हो जाता है (१८२) । हे महेश्वरि ! 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ में वीरों के ब्रह्म-तेज के प्रभाव से सभी विघ्न उद्विग्न और भयभीत होकर भाग जाते हैं (१८३) । पिशाच, गुह्यक, यक्ष, बेताल और अन्य क्रूर प्राणी 'भैरवी-चक्र' का नाम सुनते ही भय से दूर चले जाते हैं (१८४) । उस स्थान में सारे तीर्थ, महा- तीर्थ और देव-राज-सहित सभी देवता आदरपूर्वक आ जाते हैं (१८५) । हे शिवे ! 'चक्र' का स्थान 'महा-तीर्थ' है, अतः सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है, जिसमें देवता भी तुम्हें उत्तम नैवेद्य देने की इच्छा करते हैं (१८६) । म्लेच्छ, श्वपच, किरात या हूण आदि द्वारा लाए कच्चे या पके द्रव्य वीर के हाथ में देने से ही पवित्र हो जाते हैं (१८७) । कलि के पाप से दूषित व्यक्ति 'भैरवो-चक्र' और मेरे स्वरूप साधकों का दर्शन करने से ही पाप के पाश से छूट जाते हैं (१८८) । प्रबल कलि-काल में चक्रानुष्ठान को गोपनीय रखने की आवश्यकता नहीं है। वीराचारी सभी स्थानों में सभी समयों में 'कुल-साधना' करे (१८६) । 'चक्र' में व्यर्थ की बातचीत, चञ्चलता, वाचालता, छींकना-पादना और वर्ण-भेद अर्थात् वर्ण-विचार न करे (१९०) । क्रूर, दुष्ट, पश्वाचारी, पापी, नास्तिक, कुल-दूषक और कुल-शास्त्र के निन्दकों को 'चक्र' से दूर ही छोड़ दे (१९१) । स्नेह, भय या अनुराग के वश पश्वाचारी आदि को 'चक्र' में प्रवेश देने से वीराचारी भी 'कुल-धर्म' से भ्रष्ट होकर नरक में जाता है (१६२) । जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति वाला 'कुल-धर्मावलम्बी' हो, उसे सदा देववत् पूज्य माने (१६३) । जो वर्णाभिमान के वश 'चक्र' में वर्ण-भेद करता है, वह वेदान्त-वेत्ता होने पर भी घोर नरक में जाता है (१६४) । 'चक्र' के अन्दर पवित्र-मनवाले, साधु और साक्षात् शिव-स्वरूप कौलिकों के सम्बन्ध में पाप की शङ्का कैसे हो सकती है (१६५) ? शैव-मार्गावलम्बी विप्रादि लोग जब तक 'चक्र' में रहें, तब तक शिव के आदेशानुसार शाम्भवाचार का पालन करें (१६६) । ये सब 'चक्र' से बाहर होने पर लोक-यात्रा-निर्वाह के लिए अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिए निर्दिष्ट कर्मों का अलग-अलग पालन करें (१६७) । शवासन, मुण्डासन और चितासन पर बैठकर सौ पुरश्चरण करने से जो फल मिलता है, वह ज्ञानी साधक 'चक्र' में एक बार जप करने से ही पा जाता है (१६८) । 'भैरवी-चक्र' का माहात्म्य कहने में कौन व्यक्ति समर्थ है ? इसे एक बार करने से सारे पापों से छुटकारा मिल जाता है (१६६) । छः मास करने से भूपति, और एक वर्ष करने से साधक मृत्युञ्जय होता है। नित्य करने से निर्वाण-मुक्ति प्राप्त होती है (२००) । हे कालिके ! इस विषय में अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? हे सुब्रते ! सत्य जानो कि इस 'कुल-पद्धति' के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय ऐहिक तथा पारलौकिक सुख पाने का नहीं है (२०१) । सर्व-धर्म-शून्य कलि की प्रधानता के समय में 'कुल-धर्म' को छिपाने से कौल भी नरक को जाता है (२०२) । भोग और मोक्ष के एक-मात्र साधन 'भैरवी-चक्र' को मैंने कहा। हे कुलेश्वरि ! अब 'तत्त्व-चक्र' को बताता हूँ, उसे सुनो (२०३) । 'तत्त्व-चक्र' सब चक्रों का राजा है। इसे 'दिव्य-चक्र' कहा गया है। ब्रह्मज्ञ साधक के सिवा अन्य को इसे करने का अधिकार नहीं है (२०४) । जो लोग परब्रह्म के उपासक हैं; ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म-तत्पर, पवित्र अन्तःकरणवाले, सब प्राणियों का हित करने में लगे हुए, शान्त, निर्विकार, तन्त्र और गुरु-वाक्य पर विश्वास रखनेवाले, दया-शील, दृढ़-व्रती, सत्य-सङ्कल्प और ब्राह्म हैं, वही इस 'तत्त्व-चक्र' के करने के अधिकारी हैं (२०५-२०६) । हे तत्त्वज्ञे ! जो इस चराचर को ब्रह्म-भाव से देखते हैं, उन्हीं तत्त्वज्ञ पुरुषों को इस 'तत्त्व-चक्र' के करने का अधिकार है