भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५७ इस चक्र में गुरु आदि नौ पात्र स्थापन करने की आवश्यकता नहीं है (१६१)। यथेच्छ तत्त्व अपने सामने रखकर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' मन्त्र से उन्हें प्रोक्षित कर 'दिव्य-दृष्टि' अर्थात् एकटक दृष्टि से उन्हें देखे (१६२) । फिर 'अलि-यन्त्र' अर्थात् मद्य-पात्र में गन्ध-पुष्प देकर उसमें आनन्द-भैरवी देवी और आनन्द-भैरव का ध्यान करे (१६३)। यथा— नव-यौवन-सम्पन्नां तरुणारुण-विग्रहाम्, चारु-हासामृताभाषोल्लसद्-वदन-पङ्कजाम् । नृत्य-गीत-कृतामोदां नानाभरण-भूषिताम्, विचित्र-वसनां ध्यायेत् वराभय-कराम्बुजाम् ॥ अर्थात् बाल-सूर्य के समान दीप्तिवाला शरीर है, मनोरम हास्य-सुधा की कमनीय कान्ति से मुख-कमल शोभायमान है, नृत्य-गीत से आनन्दिता हैं, नाना अलङ्कारों से सज्जिता हैं, विलक्षण वस्त्र पहने हैं और हाथों में वर-अभय मुद्राएँ हैं। इस प्रकार आनन्द-भैरवी का ध्यान कर आनन्द-भैरव का स्मरण करे (१६४)। यथा— कर्पूर-पूर-धवलं कमलायताक्षम्, दिव्याम्बराभरण-भूषित-देह-कान्तिम् । वामेन पाणि-कमलेन सुधाढ्य-पात्रं, दक्षेण शुद्धि-गुटिकां दधतं स्मरामि ॥ अर्थात् कर्पूर-राशि के समान शुक्ल वर्ण है, कमल के समान बड़े नेत्र हैं, दिव्य वस्त्र और अलंकारों से शरीर की कान्ति शोभायमान है, बाएँ हाथ में सुधा-पूर्ण पात्र और दाएँ हाथ में शुद्धि की गुटिका लिए हैं (१६५-६७)। इस प्रकार दोनों का ध्यान कर साधक उक्त सुरा-पात्र में इन दोनों की सम-रसता का चिन्तन करते हुए आदि में प्रणव (ॐ) और अन्त में 'नमः' जोड़कर नाम-मन्त्र का पाठ कर गन्ध-पुष्प से पूजा करने के बाद सुरा का शोधन करे (१६८) । यथा-- कुल-पूजक 'स्वाहान्त-पाशबीज-त्रय' अर्थात् 'आं ह्रीं क्रों स्वाहा' का १०८ बार जप कर सुरा का शोधन करे (१६६) । प्रबल कलि-काल में गृहस्थ केवल गृह-कार्य की कामना से एकाग्र-चित्त हो पूजन करे । गृहस्थ के लिए आद्य-तत्त्व (सुरा) के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में 'मधुर-त्रय' का निर्देश है (१७०) । दूध, चीनी और शहद- ये 'मधुर-त्रय' कहे हैं। इन्हें अलि-रूप अर्थात् 'मद्य'-स्वरूप मानकर देवता को निवेदन करे (१७१)। कलि-युग के सभी मनुष्य स्वभावतः काम-द्वारा भ्रान्त चित्तवाले अतः सामान्य बुद्धिवाले होते हैं, जिससे वे 'शक्ति' अर्थात् नारी को शक्ति-रूपा नहीं समझ पाते (१७२)। हे पार्वती ! इसी से उनके लिए 'शेष-तत्त्व' अर्थात् 'मैथुन'-तत्त्व के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में देवी के चरण-कमलों का ध्यान और इष्ट-मन्त्र का जप निर्दिष्ट है (१७३) । मांस आदि जो प्राप्त हों अर्थात् कलि-काल में अदूषित प्रत्येक 'तत्त्व' को उक्त मन्त्र (आं ह्रीं क्रों स्वाहा) से १०० बार अभिमन्त्रित करे (१७४) । फिर लाई हुई समस्त वस्तुओं को ब्रह्म-मय समझते हुए दोनों आँखें बन्द कर उन्हें भगवती काली को निवेदित करे, तब स्वयं पान और भोजन करे (१७५) । हे भद्रे ! यह 'भैरवी-चक्र' सार का सार-श्रेष्ठ है। सभी तन्त्रों में गुप्त है, इसे तुमसे कहा है (१७६)। हे पार्वती ! 'भैरवी-चक्र' और 'तत्त्व-चक्र' में शैव-पद्धति से विवाह करना श्रेष्ठ साधकों का कर्तव्य है (१७७) । बिना विवाह किए शक्ति-सेवी वीर साधक पर-स्त्री-गमन के पाप को प्राप्त करते हैं, इसमें संदेह नहीं (१७८) । 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ होने पर सभी जातियों के व्यक्ति श्रेष्ठ द्विज हो जाते हैं। 'भैरवी-चक्र' के समाप्त होने पर सभी अलग-अलग वर्ण के हो जाते हैं (१७६)। इस 'भैरवी-चक्र' में जाति-विचार नहीं है, उच्छिष्ट (जूठे) का भी विचार नहीं है। 'चक्र' में विद्यमान वीर मेरे ही स्वरूप होते हैं, अन्य नहीं (१८०) । फा०-८