महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र क्रय अन्यथा किया जा सकता है (१३७-३८)। हे कुलेश्वरि! मानव-देह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को भाजन-स्वरूप है। इसलिए हमारे शासन के कारण इस शरीर का क्रय सिद्ध नहीं है (१३६) । हे प्रिये ! जो, गेहूँ और धान्य में वर्ष के अन्त में (ऋण देने पर) मूल का चतुर्थांश मात्र लाभ होता है। धातु-द्रव्य में एक वर्ष में अष्टमांश लाभ लेना निर्दिष्ट है (१४०)। ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में शास्त्र के द्वारा स्वीकृत नियमानुसार ही मनुष्य कार्य करें (१४१) । सेवा-वृत्ति में लगे व्यक्ति कार्य-कुशल, पवित्र, सत्यवादी, जित-निद्र, जितेन्द्रिय, सावधान और निरालस्य रहें (१४२) । इस लोक और पर-लोक में सुख चाहनेवाले सेवक स्वामी को विष्णु के समान, उनकी पत्नी को माता के समान और उनके बान्धवों को देवता के समान आदर दें (१४३) । स्वामी के मित्रों को अपना मित्र, उनके शत्रुओं को अपना शत्रु समझें । सभी समय स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए भय-पूर्वक उपस्थित रहें (१४४) । अपमान, घर के छिद्र, गोपनीय अन्य बातों और जिससे स्वामी को ग्लानि होती हो, ऐसी बातों को अति यत्न-पूर्वक छिपा कर रखें (१४५) । स्वामी के धन में लोभ न करें, सदा स्वामी के हित में लगे रहें। उनके निकट असद् वाक्य, क्रीडा और हँसी का त्याग करें (१४६) । स्वामी की दासियों आदि को पाप-मन से न देखें, उनके साथ एकान्त में न सोयें और न हँसी-खेल करें ( ४७)। स्वामी की शय्या, आसन, यान, वसन, पानादि-पात्र, पादुका, भूषण, शस्त्र अपने उपयोग में न लायें (१४८) । यदि सेवक से अपराध हो, तो उसके लिए स्वामी से क्षमा मांगे । स्वामी के सामने धृष्टता, लम्बी-चौड़ी बात, आदि छोड़ दे (१४६) । हे शिवे ! भैरवी-चक्र और तत्त्व-चक्र के बाहर सभी वर्ण अपने-अपने वर्ण में ही ब्राह्म-विवाह और भोजन करें किन्तु हे महेशानि ! उक्त दो स्थानों अर्थात् तत्त्व-चक्र और भैरवी चक्र में शैव-विवाह कहा है। इनमें भोजन और पान करते समय वर्ण का भेद-भाव नहीं किया जाता । तात्पर्य यह है कि शैव-विवाह में वर्ण-विचार नहीं है और शैव-विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री दोनों चक्रों में तथा अन्य सभी कार्यों में ब्राह्म विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री प्रशस्त है। इसी प्रकार चक्रों में भोजन करते समय जाति-भेद का विचार नहीं है किन्तु अन्य समयों में, विचार करना चाहिए (१५०-१५१) । श्री देवी ने कहा - यह 'भैरवी-चक्र' क्या है ? अथवा 'तत्त्व-चक्र' किस प्रकार का है ? मैं वह सब सुनना चाहती हूँ, कृपा करके बताइए (१५२) । श्री सदाशिव ने कहा - हे देवि ! कुल-पूजा की विधि से 'चक्र' का अनुष्ठान होता है। उत्तम साधकों को विशेष पूजा-समयों में उसे करना चाहिए (१५३) । हे प्रिये ! 'भैरवी-चक्र' के सम्बन्ध में समयादि का कोई नियम नहीं है। किसी भी समय यह शुभ 'भैरवी-चक्र' किया जा सकता है (१५४) । साधकों के लिए मंगल- कारी 'भैरवी-चक्र' का विधान बताता हूँ, जिसके द्वारा भगवती की आराधना करने से प्राणी को अभीष्ट फल मिलता है (१५५) । कुलाचार्य सुन्दर स्थल पर उत्तम आसन बिछा कर 'कामाद्य-अस्त्र' अर्थात् 'क्लीं फट्' मन्त्र से उक्त आसन का शुद्ध कर उस पर बैठे (१५६) । सिन्दूर, रक्त-चन्दन या केवल जल से त्रिकोण-चतुष्कोण मण्डल बनाए (१५७) । एक सुन्दर घट लेकर उसे क्रमशः दही, अक्षत, फल, पल्लव, सिन्दूर तिलक से युक्त कर जल से भरे और प्रणव का उच्चारण करते हुए उसे उक्त मण्डल पर स्थापित कर उसे धूप-दीप दिखाए (१५८-१५६)। गन्ध- पुष्प से पूजन कर इष्ट-देवता का ध्यान करे और संक्षिप्त पूजा-विधि से उसमें पूजा करे (१६०) । हे सुर-वन्दिते ! इसमें जो विशेष है, उसे कहता हूँ, सुनो-