महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५५ वृत्तियाँ हैं। यदि इनमें अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो शूद्र-वृत्ति का सहारा ले (१११)। हे परमेशानि ! वाणिज्य में असमर्थ वैश्यों के लिए शूद्र-वृत्ति का सहारा लेना अनुचित नहीं है। शूद्रों के लिए सेवा-वृत्ति विहित है (११२) । हे देवेशि ! सामान्य वर्ण अर्थात् पञ्चम-वर्ण को ब्राह्मण-वृत्ति को छोड़कर अन्य सभी वृत्तियों का अधिकार है (११३) । अपनी वृत्ति में स्थित ब्राह्मण द्वेष-रहित, ममता-शून्य, शान्त, सत्य-वादी, जितेन्द्रिय, मात्सर्य-रहित और निष्कपट होता है (११४)। सत्पथावलम्बी शिष्यों को पुत्र के समान अध्ययन कराता है, सब लोगों का हितैषी और पक्षपात-रहित होता है (११५) । ब्राह्मण मिथ्या कथन, असूया, व्यसन (मृगया, द्यूत आदि), अप्रिय वचन, नीचों का सङ्ग और दम्भ कभी न करे (११६) । हे वरानने ! क्षत्रियों को सन्धि होने पर युद्ध की इच्छा करना निन्दनीय है। सम्मान-पूर्वक सन्धि को स्थिर रखे और युद्ध में जय या मृत्यु दोनों ही उत्तम समझे। राजा प्रजा के धन का लोभ न करे और नियम से ही कर ग्रहण करे। स्वीकृत धर्म की रक्षा करते हुए प्रजा का पुत्र-वत् पालन करे (११७)। न्याय, युद्ध, सन्धि एवं अन्यान्य सभा राजकीय कार्यों में राजा सदा मन्त्रियों के साथ विचार करे (११८-११६) । धर्म-सम्मत युद्ध करे, न्यायतः दण्ड और पुरस्कार दे तथा बलानुसार यथा-शास्त्र सन्धि करे (१२०) । उपाय करके कार्य सम्पन्न करे और शत्रुओं को युद्ध तथा सन्धि उपायों द्वारा नियन्त्रित करे क्योंकि उपाय से ही सभी प्रकार के जय, मङ्गल और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं (१२१)। नीचों का संग न करे, सदा पण्डितों का प्रिय रहे, कार्य-कुशल, सुशील, मित-व्ययी और विपत्ति के समय धैर्य- शाली रहे (१२२) । दुर्ग-संस्कार में निपुण, शस्त्र-शिक्षा में विचक्षण और अपने सैनिकों के भाव का ज्ञाता हो तथा उन्हें रण-कौशल सिखावे (१२३) । हे देवि ! युद्ध में मूर्च्छित, शस्त्र-हीन, भागने को तत्पर या बलपूर्वक लाए गए शत्रु को और शत्रु के स्त्री-शिशु-सन्तानादि को मारे नहीं (१२४) । जो सारी वस्तुएँ विजय में या सन्धि द्वारा प्राप्त हों, उन्हें यथा-योग्य सैनिकों में बाँट दे (१२५)। योद्धाओं की वीरता और चरित्र को राजा को अलग- अलग जानना चाहिए। अपना हितेच्छु राजा एक व्यक्ति को बहुत सेना का अधिपति न बनावे (१२६) । राजा एक व्यक्ति पर पूरा विश्वास न करे, एक ही व्यक्ति को विचार करने में नियुक्त न करे। नीच लोगों के प्रति न समता-भाव दिखावे, न उनके साथ क्रीड़ा या परिहास करे (१२७) । अनेक शास्त्रों का ज्ञानी, मित-भाषी, जिज्ञासु, स्वाभिमानी और दम्भ-शून्य रहे। दण्ड देते समय या प्रसन्नता के समय धीर रहे अर्थात् दोनों ही समय आकार और मुद्रा से सम-भाव रहे (१२८)। राजा स्वयं या गुप्तचरों द्वारा प्रजा के भाव को जानता रहे और अपने स्वजनों तथा सेवकों के भाव को समझता रहे (१२६) । तत्त्व-दर्शी शासक क्रोध, दम्भ या प्रमाद के वश में होकर सहसा किसी का सम्मान या अपमान न करे (१३०)। सेनाओं के सेनापति और मन्त्रियों की स्त्री-कन्या-पुत्र- भृत्य का पालन राजा करे ! यदि दोषी हों, तो यथा-विधि उन्हें दण्डित करे (१३१) । उन्मत्त, असमर्थ, बालक, पीड़ित और वृद्ध—ऐसे लोग यदि बान्धव-रहित हों, तो राजा पिता के समान उनकी रक्षा करे (१३२) । कृषि-वाणिज्य को ही वैश्यों को सनातन वृत्ति माना है और उसके द्वारा सभी लोगों की शरीर-रक्षा होती है (१३३)। हे देवि ! इसीलिए वाणिज्य और कृषि-कर्म में असावधानी, व्यसन, आलस्य, मिथ्या-व्यवहार, शठता-कभी किसी प्रकार न करे (१३४) । हे शिवे ! क्रेता और विक्रेता-दोनों की सम्मति से वस्तु और उसका मूल्य निश्चित कर परस्पर-स्वीकृति से 'क्रय' सिद्ध होता है (१३५) । हे प्रिये ! मत्त, विक्षिप्त, शोकार्त, विशेष उत्कण्ठित, बालक, शत्रु-गृहीत और रोग से भ्रान्त-बुद्धि—ऐसे लोगों को किया गया दान और विक्रय असिद्ध होता है (१३६) । अदृष्ट-वस्तु का गुण सुनकर ही क्रय सिद्ध होता है किन्तु उस गुण में विपर्यय होने से विक्रय असिद्ध हो जाता है। हाथी, ऊँट, घोड़ा आदि के गुण सुनकर क्रय-सिद्धि होती है किन्तु यदि वर्णित गुण उनमें न हुआ, तो वह क्रय असिद्ध होता है। हाथी, ऊंट, घोड़े आदि का गुप्त दोष प्रकट होने पर एक वर्ष बाद भी वह