भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

५४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र श्री सदाशिव ने कहा—हे तत्त्वज्ञ ! तुमने यथार्थ ही कहा है। कलि-युग में सभी वर्णों के लिए एकमात्र तान्त्रिकी क्रिया ही भोग और मोक्ष की निमित्त है और सभी कार्यों में वह सिद्धि देती है (८४)। यह ब्रह्म-सावित्री जिस प्रकार वैदिकी है, उसी प्रकार तान्त्रिकी भी है। अतः दोनों ही कर्म प्रशस्त है (८५) । हे देवि ! इसीलिए मैंने यहाँ कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मणों का गायत्री में ही अधिकार होगा, अन्य किसी वैदिक मन्त्र में नहीं (८६) । कलि-काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की गायत्री क्रमश: 'ॐ', 'श्रीं' और 'ऐं' पूर्विका होगी अर्थात् ब्राह्मण गायत्री के पूर्व 'ॐ', क्षत्रिय गायत्री के पूर्व 'श्रीं' और वैश्य गायत्री के पूर्व 'ऐं' लगावें (८७) । हे परमेश्वरि ! शूद्रों से द्विजों को अलग करने के लिए द्विजों के आह्निक में पूर्व काल में वैदिक सन्ध्या की विधि कही है (८८) । अन्यथा अर्थात् वैदिक सन्ध्या न करने से भी केवल शैव पद्धति द्वारा सिद्धि मिलेगी। यह सत्य, सत्य, विशेष सत्य है, इसमें सन्देह नहीं (८६) । हे देव-वन्दिते ! अनातुर मुमुक्षु व्यक्ति सन्ध्या का यथोक्त समय बीत जाने पर भी 'ॐ तत् सत् ब्रह्म' का उच्चारण कर इस सन्ध्या को करें (६०) । अर्थात् आतुर के लिए विशेष नियम रखने के उद्देश्य से 'अनातुर' विशेषण दिया है। आसन, वस्त्र, पात्र, शय्या, यान, गृह, गृह- सामग्री आदि परिष्कृत होते हुए भी और भी परिष्कृत हों, तो अधिक उत्तम है (६१) । गृहस्थ आह्निक कार्य समाप्त कर स्वाध्याय या गृह-कर्म करे, बिना उद्यम खाली न बैठा रहे (६२) । पुण्य तीर्थ में, पुण्य तिथि में, चन्द्र-ग्रहण और सूर्य-ग्रहण-काल में जप और दान करने से मङ्गल होता है (६३) । कलि-युग में मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, अतः उपवास करना ठीक नहीं है। कलियुग में 'उपवास' के स्थान पर एकमात्र 'दान' ही प्रशस्त है (६४) । हे महेशानि ! कलि-युग में 'दान' सब सिद्धियों का देनेवाला है। सत् क्रिया करनेवाले दरिद्र व्यक्ति हीं 'दान' के पात्र हैं (६५) । हे अम्बिके ! मास, वर्ष और पक्ष के प्रारम्भिक दिन में, चतुर्दशी, अष्टमी, शुक्ल- पक्ष की एकादशी, अमावास्या, अपना जन्म-दिन, पिता-माता की मृत्यु-तिथि और निर्दिष्ट उत्सव के दिन— ये सब पुण्य काल कहे गए हैं (६६-६७) । गङ्गा नदी, महा-नदी, गुरु-गृह और प्रसिद्ध देवता-क्षेत्र पुण्य-तीर्थ कहे हैं (६८) । अध्ययन, माता-पिता की सेवा, पत्नी की रक्षा को छोड़कर तीर्थ करने से पुरुष नरक जाते हैं (६६) । स्त्रियों के लिए पति की सेवा से बढ़कर तीर्थ-सेवा नहीं है, उपवासादि क्रिया नहीं है, व्रत का नियम नहीं है अर्थात् इन सब कर्मों से मिलनेवाला फल मात्र पति-सेवा से ही उन्हें मिल जाता है अतः ये सब कर्म उनके लिए निर्दिष्ट नहीं हैं (१००) । पति ही स्त्रियों के लिए तीर्थ, तपस्या, दान, व्रत और गुरु हैं। अतः स्त्री पूरे अन्त:- करण से पति-सेवा करे (१०१) । वचनों से, सेवा से सदा पति का प्रिय कार्य करे और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलती हुई पति के बान्धवों को सन्तुष्ट करे (१०२) । पतिव्रता स्त्री पति को कठोर दृष्टि से न देखे, दुर्वचन भी न सुनाए, मन से भी स्वामी को अप्रिय लगनेवाला कार्य न करे (१०३) । जो स्त्री शरीर, मन और वचन से सदा प्रिय कार्य-रूपी अनुष्ठान द्वारा पति को सन्तुष्ट करती है, वह ब्रह्म-पद को पाती है (१०४) । पति की आज्ञाकारिणी स्त्री दूसरे पुरुष का मुख न देखे, दूसरे पुरुष के साथ बात न करे (१०५) । स्त्री बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन और बुढ़ापे में पति के बान्धवों के अधीन रहती है। किसी भी अवस्था में वह स्वाधीन नहीं रहती (१०६) । पिता और पति की मर्यादा, पति-सेवा तथा धर्म-शासन को न जाननेवाली बालिका कन्या का विवाह न करे (१०७) । नर-मांस, नराकृति-पशु-मांस, उपकारी गाय और रस-हीन मांस-भोजी जन्तु का मांस न खाए (१०८) । हे शिवे ! भूमि से उत्पन्न ग्राम्य एवं जंगली विविध प्रकार के फल-मूल स्वेच्छापूर्वक खा सकते हैं (१०६) । ब्राह्मण के लिए अध्यापन और याजन—यही दो वृत्तियाँ उत्तम हैं। इनमें अशक्त हो, तो क्षत्रिय-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति से निर्वाह करे (११०) । क्षत्रिय के लिए संग्राम और प्रजा-पालन—यही सद्-