महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५३ वस्तु के अर्जन और लब्ध वस्तु के रक्षण में लगा रहे । दक्ष धार्मिक व्यक्ति स्वभाव से ही मित-भाषी और मित- हास्य होता है अर्थात् न अधिक बोलता है और न उच्च स्वर से अधिक हंसता ही है, विशेष कर मान्य व्यक्ति के सामने (६०) । जितेन्द्रिय, निर्मल-स्वभाव, सुचिन्त्य, दृढ़ व्रती, प्रमाद-रहित और दूर-दर्शी होकर विषयोपभोग का कर्तव्याकर्तव्य विचार करे (६१) । धीर व्यक्ति सत्य, कोमल, सन्तोष-जनक, शुभ-कारक वाक्य का प्रयोग करे । आत्म-गौरव का प्रकाश और पर-निन्दा न करे (६२) । जो लोग मार्ग में जलाशय, विश्राम-गृह और सेतु की प्रतिष्ठा करते हैं, वे त्रिभुवन को जय करते हैं अर्थात् सबसे उत्कृष्ट पद को पाते हैं (६३) । माता-पिता जिससे सन्तुष्ट हों, मित्र लोग जिसके प्रेमी हों, लोग जिसका यशोगान करते हों, वही त्रिभुवन को जीतता है (६४) । सत्य ही जिसका व्रत है, जिसमें दोनों के प्रति सदा दया रहती है, काम और क्रोध जिसके वश में हैं, वही त्रिभुवन को जीतता है (६५) । जो व्यक्ति पर-स्त्री से विरक्त है, दूसरे के वस्तु की अभिलाषा से जो रहित है, जो दम्भ और मात्सर्य से हीन है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६६) । जो क्षत्रिय युद्ध में डरता नहीं और पराङ्मुख नहीं होता और जो धर्म-युद्ध में मरता है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६७) । जिसके मन में संदेह नहीं है, जो व्यक्ति विश्वास-युक्त है, पाशुपत आचार में तत्पर है और जो मेरी आज्ञा का पालन करता है, वही त्रिभुवन को जीतता है । जो ज्ञानी शत्रु और मित्र के प्रति सम- दृष्टि रखकर केवल संसार-यात्रा के निर्वाह के लिए विहित कर्मों का अनुष्ठान करता है, वही संसार को जीतता है (६८-६६) । हे देवि ! 'शौच' दो प्रकार के हैं— बाह्य और अभ्यन्तर । ब्रह्म में आत्म-समर्पण अर्थात् परमात्मा में मन की एकाग्रता ही आन्तरिक शौच कहा गया है (७०) । जल या भस्म द्वारा मैल को दूर करने से जो देह-शुद्धि होतो है, उसे बाह्य शौच कहते हैं (७१) । हे प्रिये ! क्षुद्र जलाशय, कूप, वापी, ह्रद, नदी, गङ्गा और स्वनंदी— ये सब यथा-क्रम अधिक पवित्रता-दायक हैं अर्थात् इन सब तीर्थ-जलों में स्नान करने से देह शुद्ध होती है (७२) । हे सुव्रते ! बाह्य शौच के सम्बन्ध में याज्ञिक भस्म ही प्रशस्त है । निर्मल मिट्टी द्वारा भी इस प्रकार स्नान से शुद्धि होती है । वस्त्र, मृग-चर्म, तृण आदि भी मिट्टी के समान शुद्धि-दायक हैं (७३) । हे शिवे ! इस शौच और अशौच के विषय में अधिक कहना आवश्यक नहीं है । जिससे मन पवित्र हो, वही आचारण गृहस्थ करे (७४) । निद्रा के बाद, मैथुन के बाद, मल-मूत्र-त्याग के बाद, आहार के बाद और मल के छू जाने पर उक्त प्रकार बहिः शौच की विधि करे (७५) । त्रिकाल में अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और अपराह्न में वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या क्रमशः सम्पन्न करे और उपासना-भेद यथा-शास्त्र पूजा करे (७६) । हे प्रिये ! जो ब्रह्म-मन्त्रोपासक हैं, वे गायत्री के जप-काल में गायत्री के प्रतिपाद्य ब्रह्म हैं, इस प्रकार की भावना करें । ऐसा करने पर वैदिक सन्ध्या होगी (७७) । जो ब्रह्मोपासक नहीं हैं, उनको वैदिक सन्ध्या सूर्यार्घ्य-दान और गायत्री-जप से होगी (७८) । हे भद्रे ! सभी आह्निक कार्यों में १००८ या १०८ या १० बार जप करने का नियम है (७६) । हे देवि ! शूद्र और साधारण जाति को केवल आगमोक्त विधि का ही अधिकार है । उसी से उनको सब प्रकार की सिद्धि होगी (८०) । प्रातः-सन्ध्या सूर्योदय के समय करे । इसी प्रकार मध्याह्न-सन्ध्या और सायं-सन्ध्या क्रमशः मध्याह्न-काल में तथा सूर्यास्त के समय करे । इस सन्ध्या-वन्दन का समय 'त्रिकाल' निर्दिष्ट है। श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने स्वयं कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मण आदि सभी वर्गों के लिए एकमात्र तान्त्रिक क्रिया ही प्रशस्त है (८१-८२) । हे देवदेव ! इस समय किसलिए तुम ब्राह्मणों को वैदिक क्रिया में नियोजित करते हो ? यह सब विशेष रूप से वर्णन करो (८३) ।