भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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४८ : हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र मन्त्र-सिद्धिर्भवेदाशु किङ्कराः क्षुद्र-सिद्धयः । अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी प्राप्नुयाद् धनम् ॥१० विद्यार्थी लभते विद्यां कामी कामानवाप्नुयात् । सहस्रावृत्ति-पाठेन वर्मणोऽस्य पुरस्क्रिया ॥११ पुरश्चरण-सम्पन्नं यथोक्त-फलदं भवेत् । चन्दनागरु-कस्तूरी-कुंकुमै रक्त-चन्दनैः ॥१२ भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा साधकः कटौ ॥१३ तस्याद्या कालिका वश्या वांच्छितार्थं प्रयच्छति । न कुत्रापि भयं तस्य सर्वत्र विजयी कविः ॥१४ अरोगी चिर-जीवो स्यात् बलवान् धारण-क्षमः । सर्व-विद्यासु निपुणः सर्व-शास्त्रार्थ-तत्त्व-वित् । १५ वशे तस्य मही-पाला भोग-मोक्षौ कर-स्थितौ । कलि-कल्मष-युक्तानां निःश्रेयस-करं परम् ॥१६ अर्थात् 'ह्रीं'-रूपा आद्या मेरे मस्तक को और 'श्रीं'-रूपा काली मेरे मुख की रक्षा करे । 'क्रीं'-रूपा परा-शक्ति हृदय की और परात्परा कण्ठ की रक्षा करे । जगद्धात्री दोनों नेत्रों की रक्षा करे, शङ्करी दोनों कानों की रक्षा करे । महामाया नासिका को और सर्व-मङ्गला जिह्वा को रक्षा करे । कौमारी दन्त-श्रेणी की और कमलालया दोनों कपोलों की रक्षा करे । क्षमा ओष्ठाधर की और चारु-हासिनी चिबुक (ठोडी) की रक्षा करे । कुलेशानी गर्दन की और कृपा-मयी ककूत् (कन्धे) की रक्षा करे । बाहुदा दोनों बाहों की और कैवल्य-दायिनी दोनों हाथों की रक्षा करे । कर्पादिनी दोनों कंधों की और त्रैलोक्य-तारिणी पीठ की रक्षा करे । अपर्णा मेरे दोनों पार्श्वों की और कमठासना मेरे कटि-देश की रक्षा करे । विशालाक्षी मेरे नाभि-देश की और प्रभावती प्रजा- स्थान को रक्षा करे । कल्याणी दोनों ऊरुओं की और पार्वती मेरे दोनों पैरों की रक्षा करे । जयदुर्गा पञ्च-प्राणों की और सर्व-सिद्धिदा मेरे सर्वाङ्ग की रक्षा करे । जो स्थान कवच में वर्जित और रक्षाहीन हैं अर्थात् उल्लिखित अङ्ग-प्रत्यङ्ग के सिवा अन्य स्थानों की रक्षा सनातनी आद्या काली सदा करें । हे देवि ! तुमसे आद्या देवी कालिका का 'त्रैलोक्य-विजय' नामक दिव्य कवच कहा । जो व्यक्ति पूजा-काल में आद्या-मय चित्त से इस परमाद्भुत कवच का पाठ करता है, उसे सभी अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं और आद्या काली उस पर बहुत प्रसन्न होती हैं। उसे शीघ्र मन्त्र की सिद्धि होती है । क्षुद्र अणिमादि सिद्धियां उसकी सेविका होती हैं। पुत्र-हीन व्यक्ति पुत्र पाता है, धनार्थी धन पाता है और विद्यार्थी विद्या पाता है, कामी व्यक्ति काम्य फलों को पाता है। एक सहस्र बार पाठ करने से इस कवच का पुरश्चरण होता है । पुरश्चरण से सम्पन्न इस कवच से यथोक्त फल होता है । यदि साधक अगरु, चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम या रक्त-चन्दन से भूर्ज-पत्र पर इस कवच को लिखकर, भूर्ज-पत्र-रूपा गुटिका को स्वर्णस्थ करके अपनी शिखा, दाईं भुजा, कण्ठ या कटि-देश में धारण करे, तो आद्या काली उसके वशीभूत होकर उसे वांछित फल देती हैं। कहीं भी उसे भय नहीं होता । वह सभी स्थानों में विजयी, कवि, अरोगी, बलवान, धारण-क्षम, चिर-जीवी, सर्व विद्याओं में निपुण और सर्व-शास्त्रार्थ- तत्त्व का मर्मज्ञ होता है । राजा उसके वशीभूत होते हैं और भोग-मोक्ष उसके हाथ में रहते हैं। यह कवच कलि-काल में पाप-युक्त मनुष्यों के लिए मोक्ष-दायक है, अतः अत्यन्त श्रेष्ठ है । (५८-७४) श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने कृपा करके स्तोत्र और कवच बताए । हे विभो ! अब पुरश्चरण की विधि सुनने की इच्छा करती हूँ (७५) । श्री सदाशिव ने कहा—ब्रह्म-मन्त्र के पुरश्चरण की जो विधि है, वही आद्या कालिका के मन्त्र की भी कही है (७६) । हे देवि ! साधक जप, पूजा, होमादि करने में यदि असमर्थ हों, तो संक्षेप से पूजा और पुरश्चरण