महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ४६ करे (७७)। क्योंकि न करने से कुछ करना उत्तम है। हे भद्रे ! ऐसे लोगों के लिए पहले संक्षिप्त पूजा-विधि कहता हूँ, सुनो (७८)। मूल-मन्त्र से आचमन कर ऋषि-न्यास करे। फिर कर-शुद्धि, कर-न्यास और अङ्ग-न्यास करे। तब सर्वाङ्ग-व्यापक न्यास कर प्राणायाम, ध्यान, पूजा और जप करे। संक्षिप्त पूजा की यही विधि है (७६-८०)। मन्त्र के पुरश्चरण में जिस मन्त्र की जितनी संख्या निर्दिष्ट है, होमादि न करने पर, उसका चौगुना जप करने से ही पुरश्चरण सम्पन्न होता है (८१)। अथवा अन्य प्रकार से पुरश्चरण-विधि कही है— मङ्गल या शनिवार को कृष्णा चतुर्दशी होने पर, उसी दिन रजनी-योग में पञ्च-तत्त्व लाकर जगन्मयी की पूजा कर, महा-निशा में एकाग्र मन से दस हजार बार मन्त्र का जप करे। फिर ब्रह्म-निष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराकर पुरश्चरण पूर्ण करे (८२-८३)। अथवा एक मङ्गलवार से आरम्भ कर लगातार अगले मङ्गलवार तक प्रतिदिन एक हजार मन्त्र जप कर आठ हजार मन्त्र-जप से ही पुरश्चरण हो जाता है (८४-८५)। हे देवि ! आद्या कालिका के सभी मन्त्र 'सिद्ध मन्त्र' हैं; सभी समयों में, सब युगों में सुसिद्धि प्रदान करते हैं, विशेषकर कलि-काल में (८६)। हे पार्वति ! कलि-काल में बहुत प्रकार के काली-रूप जाग्रत् हैं। विशेषकर प्रबल कलि-काल में यही रूप जगत् के लिए हित-कारी है (८७)। इस मन्त्र में सिद्धादि चक्र-गणना की अपेक्षा नहीं है। अरि-मित्रादि दोष नहीं हैं। इस मन्त्र में विशेष नियमानियम नहीं हैं। इस मन्त्र का जप कर आद्या काली को प्रसन्न करे (८८)। इस मन्त्र का जप करने से श्रीमदाद्या काली के प्रसाद से ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है। ब्रह्म- ज्ञान से युक्त मनुष्य जीवन्मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं (८६)। हे प्रिये ! इस मन्त्र की साधना में विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, शरीर को कष्ट नहीं होता। आद्या काली के साधकों की साधना सुख-साध्य है (६०)। इस विषय में 'चित्त-शुद्धि' ही साधकों के लिए फल-दायिनी होती है (६१)। साधक जब तक चित्त की मलिनता दूर करने में समर्थ नहीं होता, तब तक 'कुल-भक्ति' से समन्वित होकर कर्म करे (६२), क्योंकि यथा- विधि कर्मानुष्ठान ही चित्त-शुद्धि का उपाय है। ब्रह्म-मन्त्र के समान इस मन्त्र को पहले गुरु-मुख से ग्रहण करे (६३)। प्रातःकृत्यादि नियमानुष्ठान के साथ पुरश्चरण करे। हे महेशानि ! चित्त के शुद्ध होने पर ही ब्रह्म-ज्ञान उत्पन्न होता है और ब्रह्म-ज्ञान के उत्पन्न होने पर अन्य कृत्याकृत्य रहते नहीं (६४)। श्रीपार्वती ने कहा—हे परमेशान ! हे विभो ! 'कुल' क्या है ? 'कुलाचार' क्या है ? यह सब और 'पञ्च- तत्त्व' के लक्षण यथार्थ रूप में सुनने की इच्छा करती हूँ (६५)। श्रीसदाशिव ने कहा—हे कुलेशानि ! तुम साधकों की हितैषिणी हो। तुमने उत्तम प्रश्न किया है। तुम्हारो प्रसन्नता के लिए मैं यह सब यथार्थ रूप में बताता हूँ, सुनो (६६)। जीव, प्रकृति-तत्त्व, दिक्, आकाश, पृथिवी, जल, तेज और वायु 'कुल'-नाम से कहे गए हैं (६७)। हे आद्ये ! इन सब वस्तुओं में ब्रह्म-बुद्धि द्वारा जो विकल्प-शून्य आचरण होता है, वही 'कुलाचार' है और यही 'कुलाचार' धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग का दाता है। तपस्या, दान और कठोर ब्रह्मचर्यादि द्वारा बहुजन्मा- र्जित पुण्य के फल-स्वरूप निष्पाप हुए साधकों की ही 'कुलाचार' में प्रवृत्ति होती है (६८-६६)। 'कुलाचार' में लगी बुद्धि शीघ्र ही निर्मल हो जाती है। तब उनकी मति आद्या काली के चरण-कमलों में लग जाती है (१००)। सद्गुरु की सेवा से परात्परा इस मन्त्र-रूपा विद्या को प्राप्त कर 'कुलाचार' में तत्पर हो 'पञ्च-तत्त्व' द्वारा कुलेश्वरी आद्या कालिका की पूजा में परायण व्यक्ति 'कुलज्ञ' और साधकोत्तम हैं। ये लोग इस लोक में समस्त सुभोग्य वस्तुओं का भोग कर अन्त में मोक्ष प्राप्त करते हैं (१०१-१०२)। सभी जीवों के लिए जो महौषध महत् दुःखों को भुलानेवाली और आनन्द-दायक है, वही 'आद्य-तत्त्व' फा०-७