भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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५० | हिन्दो महा-निर्वाण तन्त्र का लक्षण है (१०३) । यह तत्त्व शोधित न होने पर केवल मोह-दायक, भ्रमोत्पादक और विषाद तथा रोग का कारण होता है । हे प्रिये ! कौलिक-गण उसका सर्वथा परित्याग करें (१०४) । ग्राम्य (छागादि), वायव्य (हारोतादि पक्षी), वन्य (मृगादि)—जिनके शरीर से उत्पन्न तत्व पुष्टि-वर्द्धक और बुद्धि, तेज एवं बल-दायक है, वही 'द्वितीय तत्त्व' का लक्षण है (१०५) । हे कल्याणि ! जो जल से उत्पन्न अति-लोभनोय, सुख-दायक और प्रजा-वृद्धि-कारक तत्त्व है, वही 'तृतीय तत्त्व' का लक्षण है (१०६) । जो तत्त्व सुलभ, भूमि से उत्पन्न, जोवों का जीवन-स्वरूप और त्रिभुवन के परमायु का निदान है, वही 'चतुर्थ तत्त्व' का लक्षण है (१०७) । हे देवि ! महानन्द-जनक, प्राणियों की सृष्टि का कारण ओर आद्यन्त-रहित जगत् का जो मूल है, वही शेष—'पञ्चम तत्त्व' का लक्षण है (१०८) । हे प्रिये ! आद्य तत्त्व को 'तेज', द्वितीय तत्त्व को 'पवन', तृतीय तत्त्व को 'जल', चतुर्थ तत्त्व को 'पृथिवी' और पंचम तत्त्व को जगदाधार 'नभो' मण्डल समझो (१०६-१०) । हे कुलेशानि ! मनुष्य इसी प्रकार 'कुल', 'पञ्च-तत्त्व' और 'कुल-धर्म के आचार' को जानकर तदनुसार कर्म कर जीवन्मुक्त होते हैं (१११) । •—• आठवाँ उल्लास-वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन संसार-मोचिनी भवानी माता ने जगत् के हित के लिए शङ्कर से पुनः कहा (१)—इस लोक और परलोक में भी सुख-दायक, धर्म-अर्थ-काम-प्रद तथा मोक्ष-जनक, विघ्न-नाशक धर्म की कथा सुनना चाहती हूँ (२) । हे विभो ! अब 'वर्ण' ओर 'आश्रम' तथा उन-उन वर्णों और आश्रमों में जो 'आचार' विहित हैं, उन्हें सुनने की इच्छा है। कृपया वह सब कहिए (३) । श्री सदाशिव ने कहा—हे सुव्रते ! सत्य आदि चार युगों में चार 'वर्ण', चार 'आश्रम' और उन-उ. वर्णों तथा आश्रमों के 'आचार' भिन्न-भिन्न रूप में कहे हैं, किन्तु कलि-काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं सामान्य—ये पाँच प्रकार के 'वर्ण' कहे हैं (४-५) । इन सभी वर्णों के लिए आश्रम दो प्रकार के हैं। हे आद्ये, हे महेश्वरि ! तुमसे उन सभी वर्णों और आश्रमों के आचार तथा धर्म कहता हूँ, सुनो (६) । कलि-काल में उत्पन्न मनुष्यों की कथा पहले ही कह चुका हूँ। तपस्या और वेद-पाठ-विहीन, अल्पायु, क्लेश और प्रयास में अशक्त मनुष्यों के लिए शारीरिक परिश्रम असम्भव है (७) । हे प्रिये ! कलियुग में ब्रह्म- चर्याश्रम नहीं है, वानप्रस्थ आश्रम भी नहीं है। गार्हस्थ्य और भैक्षुक—यही दो आश्रम हैं (८) । हे शिवे ! कलि-काल में गृहस्थों के सभी कार्य आगमोक्त अर्थात् तन्त्र-मत के अनुसार कर्तव्य हैं। गृहस्थों को अन्य किसी पथ से कदापि क्रिया-सिद्धि न होगी (६)। हे देवि, हे तत्त्वज्ञे ! कलियुग में भैक्षुकाश्रम में भी वेदोक्त दण्ड-धारण नहीं है क्योंकि वह वैदिक-संस्कार है (१०) । हे भद्रे ! कलि-काल में शैव-संस्कार-विधि से अवधूताश्रम-धारण