महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५१ ही 'संन्यास-ग्रहण' कहा है (११) । हे देवि ! कलि-युग के प्रबल होने पर ब्राह्मण एवं अन्य सभी वर्णों को इन्हीं दो आश्रमों का अधिकार होगा (१२) । शैव विधि से ही सभी संस्कार और क्रिया-कलाप होंगे, किन्तु ब्राह्मण एवं अन्य वर्णों की कर्म-प्रणाली अलग-अलग होगी (१३)। हे महेश्वरि ! मनुष्य जन्म से ही गृहस्थ होता है। फिर संस्कार के बल से आश्रमी होता है। पहले यथा-विधि गार्हस्थ्य आश्रम करे (१४) । तत्त्व-ज्ञान अर्थात् संसार में निश्चित दुःखादि ज्ञान के समुत्पन्न होने पर जब वैराग्य हो, तब सब कुछ त्यागकर संन्यासाश्रम करे (१५) । बाल्य-काल में विद्योपार्जन, यौवनावस्था में धनोपार्जन और विवाह, प्रौढ़ावस्था में धर्म-जनक कर्म करे। फिर 'सुधी' अर्थात् क्षण-भंगुर संसार के वास्तविक मर्म का ज्ञाता होकर चतुर्थ अवस्था अर्थात् वृद्ध वयस में संन्यासाश्रम करे (१६) । वृद्ध पिता-माता, पतिव्रता भार्या या शिशु सन्तान का त्यागकर अवधूताश्रम प्राप्त नहीं होता (१७) । जो व्यक्ति माता-पिता, शिशु पुत्र, पत्नी, स्वजन ज्ञाती-वर्ग और बन्धु-बान्धव इत्यादि का त्याग कर प्रव्रज्या करता है, वह महा-पातकी होता है (१८) । जो व्यक्ति अपने पित्रादि को तृप्त न करके भिक्षुकाश्रम में जाता है, वह मातृ-हन्ता, पितृ-हन्ता, स्त्री-घाती एवं ब्रह्म-घातक होता है। अर्थात् इन सब कार्यों से जैसा पाप होता है, वह व्यक्ति वैसे ही पाप से कलुषित होता है (१६) । ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर लोग शैव पथ के अनुसार ही अपने विहित संस्कार का अनुष्ठान करें, यही कलि-युग का धर्म है (२०) । श्री देवी ने कहा- हे विभो ! गृहस्थ का धर्म क्या है ? अथवा भिक्षुक का धर्म क्या है ? यह सब और विप्र तथा विप्रेतर अन्य सबके संस्कारादि को मुझे बताइये (२१) । श्री सदाशिव ने कहा- हे कौलिनि ! गार्हस्थ्य धर्म ही सब मनुष्यों का आदि एवं धर्म-जनक है। अतएव पहले यथार्थ रूप से उसे ही कहता हूँ, सुनो (२२) । गृहस्थ ब्रह्म-निष्ठ हो और ब्रह्म-ज्ञान-परायण रहे। जो-जो कर्म करे, उन सबको ब्रह्म को समर्पित करे (२३) । गृहस्थ मिथ्या बात न कहे, शठता न करे और देवता, अतिथि के पूजन में तत्पर रहे (२४) । माता-पिता को गृहस्थ साक्षात् प्रत्यक्ष देवता जानकर सदा सब प्रकार से प्रयत्न कर उनकी सेवा करे (२५) । हे शिवे, हे पार्वति ! माता-पिता के सन्तुष्ट होने से तुम्हारी प्रसन्नता होगी। हे देवि ! तुम्हारी प्रसन्नता होने से परब्रह्म प्रसन्न होंगे (२६) । हे आद्ये ! तुम्हीं जगत् की माता हो और परब्रह्म ही जगत् के पिता हैं। अतएव जिन-जिन कार्यों से गृहस्थ लोग तुम्हारी प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं, उनके सिवा अन्य कौन सी तपस्या है (२७) ? उन-उन अवसरों की विवेचना कर माता-पिता को आसन, शय्या, वस्त्र, पानीय और भोज्य वस्तु प्रदान करे (२८) । कुल-पावन सत्पुत्र उन्हें कोमल वचन सुनावे । सदा उनके प्रिय कार्य करे। माता-पिता का आज्ञाकारी बने । यदि अपने मङ्गल की कामना है, तो कदापि माता-पिता के पास उद्धत परिहास, तर्जन या अप्रिय वचन का प्रयोग न करे (२६-३०) । पिता का शासन माननेवाला पुत्र माता-पिता को देखते ही उन्हें प्रणाम कर उठ खड़ा हो और उनकी आज्ञा के बिना बैठे नहीं (३१) । जो व्यक्ति विद्या और धन के घमण्ड में चूर होकर माता-पिता की अवज्ञा करता है, वह इस लोक में सब धर्मों का अनधिकारी होकर अन्त में घोर नरक में जाता है (३२) । गृहस्थ कण्ठ-गत प्राण होने पर भी माता-पिता, पुत्र, भार्या, अतिथि और सहोदर-इनका त्यागकर भोजन न करे (३३) । जो व्यक्ति सभी गुरुओं (माता-पिता आदि) और सभी बन्धुओं (सहोदर आदि) को वञ्चित कर भोजन करता है, वह अपना ही पेट भरनेवाला इस लोक में निन्दित होता है और पर-लोक में नरक में जाता है (३४) । गृहस्थ पत्नी की रक्षा करे, पुत्रों को विद्या की शिक्षा दे, स्वजन और बन्धुओं का पोषण करे। यही सनातन धर्म है (३५) ।