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महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५१ ही 'संन्यास-ग्रहण' कहा है (११) । हे देवि ! कलि-युग के प्रबल होने पर ब्राह्मण एवं अन्य सभी वर्णों को इन्हीं दो आश्रमों का अधिकार होगा (१२) । शैव विधि से ही सभी संस्कार और क्रिया-कलाप होंगे, किन्तु ब्राह्मण एवं अन्य वर्णों की कर्म-प्रणाली अलग-अलग होगी (१३)। हे महेश्वरि ! मनुष्य जन्म से ही गृहस्थ होता है। फिर संस्कार के बल से आश्रमी होता है। पहले यथा-विधि गार्हस्थ्य आश्रम करे (१४) । तत्त्व-ज्ञान अर्थात् संसार में निश्चित दुःखादि ज्ञान के समुत्पन्न होने पर जब वैराग्य हो, तब सब कुछ त्यागकर संन्यासाश्रम करे (१५) । बाल्य-काल में विद्योपार्जन, यौवनावस्था में धनोपार्जन और विवाह, प्रौढ़ावस्था में धर्म-जनक कर्म करे। फिर 'सुधी' अर्थात् क्षण-भंगुर संसार के वास्तविक मर्म का ज्ञाता होकर चतुर्थ अवस्था अर्थात् वृद्ध वयस में संन्यासाश्रम करे (१६) । वृद्ध पिता-माता, पतिव्रता भार्या या शिशु सन्तान का त्यागकर अवधूताश्रम प्राप्त नहीं होता (१७) । जो व्यक्ति माता-पिता, शिशु पुत्र, पत्नी, स्वजन ज्ञाती-वर्ग और बन्धु-बान्धव इत्यादि का त्याग कर प्रव्रज्या करता है, वह महा-पातकी होता है (१८) । जो व्यक्ति अपने पित्रादि को तृप्त न करके भिक्षुकाश्रम में जाता है, वह मातृ-हन्ता, पितृ-हन्ता, स्त्री-घाती एवं ब्रह्म-घातक होता है। अर्थात् इन सब कार्यों से जैसा पाप होता है, वह व्यक्ति वैसे ही पाप से कलुषित होता है (१६) । ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर लोग शैव पथ के अनुसार ही अपने विहित संस्कार का अनुष्ठान करें, यही कलि-युग का धर्म है (२०) । श्री देवी ने कहा- हे विभो ! गृहस्थ का धर्म क्या है ? अथवा भिक्षुक का धर्म क्या है ? यह सब और विप्र तथा विप्रेतर अन्य सबके संस्कारादि को मुझे बताइये (२१) । श्री सदाशिव ने कहा- हे कौलिनि ! गार्हस्थ्य धर्म ही सब मनुष्यों का आदि एवं धर्म-जनक है। अतएव पहले यथार्थ रूप से उसे ही कहता हूँ, सुनो (२२) । गृहस्थ ब्रह्म-निष्ठ हो और ब्रह्म-ज्ञान-परायण रहे। जो-जो कर्म करे, उन सबको ब्रह्म को समर्पित करे (२३) । गृहस्थ मिथ्या बात न कहे, शठता न करे और देवता, अतिथि के पूजन में तत्पर रहे (२४) । माता-पिता को गृहस्थ साक्षात् प्रत्यक्ष देवता जानकर सदा सब प्रकार से प्रयत्न कर उनकी सेवा करे (२५) । हे शिवे, हे पार्वति ! माता-पिता के सन्तुष्ट होने से तुम्हारी प्रसन्नता होगी। हे देवि ! तुम्हारी प्रसन्नता होने से परब्रह्म प्रसन्न होंगे (२६) । हे आद्ये ! तुम्हीं जगत् की माता हो और परब्रह्म ही जगत् के पिता हैं। अतएव जिन-जिन कार्यों से गृहस्थ लोग तुम्हारी प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं, उनके सिवा अन्य कौन सी तपस्या है (२७) ? उन-उन अवसरों की विवेचना कर माता-पिता को आसन, शय्या, वस्त्र, पानीय और भोज्य वस्तु प्रदान करे (२८) । कुल-पावन सत्पुत्र उन्हें कोमल वचन सुनावे । सदा उनके प्रिय कार्य करे। माता-पिता का आज्ञाकारी बने । यदि अपने मङ्गल की कामना है, तो कदापि माता-पिता के पास उद्धत परिहास, तर्जन या अप्रिय वचन का प्रयोग न करे (२६-३०) । पिता का शासन माननेवाला पुत्र माता-पिता को देखते ही उन्हें प्रणाम कर उठ खड़ा हो और उनकी आज्ञा के बिना बैठे नहीं (३१) । जो व्यक्ति विद्या और धन के घमण्ड में चूर होकर माता-पिता की अवज्ञा करता है, वह इस लोक में सब धर्मों का अनधिकारी होकर अन्त में घोर नरक में जाता है (३२) । गृहस्थ कण्ठ-गत प्राण होने पर भी माता-पिता, पुत्र, भार्या, अतिथि और सहोदर-इनका त्यागकर भोजन न करे (३३) । जो व्यक्ति सभी गुरुओं (माता-पिता आदि) और सभी बन्धुओं (सहोदर आदि) को वञ्चित कर भोजन करता है, वह अपना ही पेट भरनेवाला इस लोक में निन्दित होता है और पर-लोक में नरक में जाता है (३४) । गृहस्थ पत्नी की रक्षा करे, पुत्रों को विद्या की शिक्षा दे, स्वजन और बन्धुओं का पोषण करे। यही सनातन धर्म है (३५) ।

५२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जननी से देह की वृद्धि होती है, जनक से देह प्रयोजित होती है और स्वयं व स्वजनों से प्रीति-पूर्वक शिक्षा प्राप्त होती है। जो इन सबका त्याग करता है, वह अधम है (३६)। हे महेशानि ! इन सबके लिए सौ- सौ कष्ट भी उठाकर यथा-सम्भव इन्हें सदा प्रसन्न रखे, यही सनातन धर्म है (३७) । जो मनुष्य पृथिवी पर ब्रह्म-निष्ठ और सत्य-प्रतिज्ञ है, वही महा-पुरुष धन्य है और वही पुरुष परमार्थ का ज्ञाता है (३८) । भार्या की ताड़ना कभी न करे, माता के समान सदा उसका पालन करे। यदि वह साध्वी और पतिव्रता है तो घोर कष्ट में पड़ने पर भी उसका त्याग न करे (३६)। विज्ञ व्यक्ति अपनी पत्नी के विद्यमान रहते दुष्ट भाव से पर-स्त्री को छुए तक नहीं अन्यथा अर्थात् छूने से नरक-गामी होगा (४०)। प्राज्ञ व्यक्ति पर-स्त्री के साथ एकान्त में सोने, रहने और अयुक्त बातचीत करने का त्याग करे और स्त्रियों को वीरता न दिखावे (४१) । धन, वस्त्र, प्रेम, श्रद्धा, मधुर वचनों से भार्या को निरन्तर सन्तुष्ट रखे, कभी उससे अप्रिय आचरण न करे (४२)। सांसारिक तत्त्व का ज्ञाता व्यक्ति उत्सव, लोक-यात्रा, तीर्थ एवं अन्य व्यक्ति के घर में पुत्र अथवा सह- योगी के साथ बिना उसे कभी न भेजे (४३) । हे महेशानि ! पतिव्रता भार्या जिस पुरुष से सन्तुष्ट रहती है, उसके सभी धर्म पूर्ण होते हैं अर्थात् ऐसा व्यक्ति सभी धर्मानुष्ठानों से होनेवाले फलों को प्राप्त करता है और तुम्हारा प्रिय होता है (४४) । पिता पुत्र का पालन चार वर्ष तक करे, उसके बाद सोलह वर्ष तक उसे विद्या और सभी गुणों की शिक्षा दे (४५) । पालन और शिक्षा में बीस वर्ष बीतने पर बीस वर्ष से अधिक आयुवाले पुत्रादि को गृह- कार्य में लगावे । फिर अर्थात् गृह-कार्य के उपयुक्त होने पर उसे आत्म-तुल्य समझकर उस पर स्नेह प्रकट करे (४६) । कन्या का भी इसी प्रकार पालन करे और बड़े यत्न से उसे शिक्षा दे। कन्या को धन-रत्न से समन्वित कर ज्ञानवान् वर को प्रदान करे (४७) । इसी प्रकार गृही भाई, बहन, भांजे, भतोजे, ज्ञाति, मित्र और भृत्यों (सेवकों) का पालन कर उन्हें सन्तुष्ट करे (४८) । तदनन्तर अर्थात् भाई आदि के पालन में समर्थ होने के बाद गृहस्थ स्वधर्म में तत्पर एक-ग्राम-वासियों, अभ्यागतों और उदासीन लोगों का भी पालन करे (४६) । हे देवि ! ऐश्वर्य होने पर गृहस्थ यदि इस प्रकार आचरण नहीं करता, तो वह 'पशु' हो माना जाना चाहिए और वह पापी लोक-समाज में निन्दित होता है। निद्रा, आलस्य, देह के प्रति यत्न, केश-विन्यास, भोजन एवं वस्त्र में आसक्ति—ये आवश्यकता से अधिक न करे (५०-५१) । गृहस्थ परिमित-भोजी, परिमित-निद्रा, निर्मल-प्रकृति, परिमित-भाषी, परिमित-मैथुन, नम्र, शुचि, निपुण, निरालस्य और सब कर्मों में तत्पर रहे। शत्रु के सामने शूर और बान्धव एवं गुरु के पास विनीत रहे । निन्दित व्यक्ति का आदर न करे, सम्मानित लोगों की अवज्ञा न करे (५२-५३) । सहवास और विचार द्वारा व्यक्ति का स्वभाव, सौहार्द, व्यवहार, प्रवृत्ति और प्रकृति जानकर उस पर विश्वास करे (५४) । बुद्धिमान व्यक्ति क्षुद्र शत्रु होने पर भी उससे शङ्कित रहे और अवसर देखकर ही अपना भाव प्रकट करे, किन्तु धर्म का लङ्घन न करे (५५) । धर्मज्ञ व्यक्ति अपना यश, पौरुष और जिसे प्रकट करने से अन्य लोग विरोध करें तथा जो परोपकार के लिए किया गया हो, उसे प्रकाशित न करे (५६) । यशस्वी व्यक्ति जय की निश्चित सम्भावना होने पर भी कभी लोक-निन्दित कार्य में प्रवृत्त न हो और गुरु या लघु व्यक्ति से विवाद न करे (५७) । मान-पूर्वक विद्या, धन, यश और धर्म का उपार्जन करे। असत्य, व्यसन (द्यूत-क्रीड़ा आदि), कुसंग, मिथ्यालाप, पर-द्रोह का त्याग करे (५८) । चेष्टा अवस्था के अनुसार और क्रिया समय के अनुसार होती है, अतः 'अवस्था' और 'समय' का विचार कर कर्म करे (५६) । गृही लोग योग-क्षेम में अर्थात् अलब्ध

आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन | ५३ वस्तु के अर्जन और लब्ध वस्तु के रक्षण में लगा रहे । दक्ष धार्मिक व्यक्ति स्वभाव से ही मित-भाषी और मित- हास्य होता है अर्थात् न अधिक बोलता है और न उच्च स्वर से अधिक हंसता ही है, विशेष कर मान्य व्यक्ति के सामने (६०) । जितेन्द्रिय, निर्मल-स्वभाव, सुचिन्त्य, दृढ़ व्रती, प्रमाद-रहित और दूर-दर्शी होकर विषयोपभोग का कर्तव्याकर्तव्य विचार करे (६१) । धीर व्यक्ति सत्य, कोमल, सन्तोष-जनक, शुभ-कारक वाक्य का प्रयोग करे । आत्म-गौरव का प्रकाश और पर-निन्दा न करे (६२) । जो लोग मार्ग में जलाशय, विश्राम-गृह और सेतु की प्रतिष्ठा करते हैं, वे त्रिभुवन को जय करते हैं अर्थात् सबसे उत्कृष्ट पद को पाते हैं (६३) । माता-पिता जिससे सन्तुष्ट हों, मित्र लोग जिसके प्रेमी हों, लोग जिसका यशोगान करते हों, वही त्रिभुवन को जीतता है (६४) । सत्य ही जिसका व्रत है, जिसमें दोनों के प्रति सदा दया रहती है, काम और क्रोध जिसके वश में हैं, वही त्रिभुवन को जीतता है (६५) । जो व्यक्ति पर-स्त्री से विरक्त है, दूसरे के वस्तु की अभिलाषा से जो रहित है, जो दम्भ और मात्सर्य से हीन है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६६) । जो क्षत्रिय युद्ध में डरता नहीं और पराङ्मुख नहीं होता और जो धर्म-युद्ध में मरता है, वही त्रिभुवन को जीतता है (६७) । जिसके मन में संदेह नहीं है, जो व्यक्ति विश्वास-युक्त है, पाशुपत आचार में तत्पर है और जो मेरी आज्ञा का पालन करता है, वही त्रिभुवन को जीतता है । जो ज्ञानी शत्रु और मित्र के प्रति सम- दृष्टि रखकर केवल संसार-यात्रा के निर्वाह के लिए विहित कर्मों का अनुष्ठान करता है, वही संसार को जीतता है (६८-६६) । हे देवि ! 'शौच' दो प्रकार के हैं— बाह्य और अभ्यन्तर । ब्रह्म में आत्म-समर्पण अर्थात् परमात्मा में मन की एकाग्रता ही आन्तरिक शौच कहा गया है (७०) । जल या भस्म द्वारा मैल को दूर करने से जो देह-शुद्धि होतो है, उसे बाह्य शौच कहते हैं (७१) । हे प्रिये ! क्षुद्र जलाशय, कूप, वापी, ह्रद, नदी, गङ्गा और स्वनंदी— ये सब यथा-क्रम अधिक पवित्रता-दायक हैं अर्थात् इन सब तीर्थ-जलों में स्नान करने से देह शुद्ध होती है (७२) । हे सुव्रते ! बाह्य शौच के सम्बन्ध में याज्ञिक भस्म ही प्रशस्त है । निर्मल मिट्टी द्वारा भी इस प्रकार स्नान से शुद्धि होती है । वस्त्र, मृग-चर्म, तृण आदि भी मिट्टी के समान शुद्धि-दायक हैं (७३) । हे शिवे ! इस शौच और अशौच के विषय में अधिक कहना आवश्यक नहीं है । जिससे मन पवित्र हो, वही आचारण गृहस्थ करे (७४) । निद्रा के बाद, मैथुन के बाद, मल-मूत्र-त्याग के बाद, आहार के बाद और मल के छू जाने पर उक्त प्रकार बहिः शौच की विधि करे (७५) । त्रिकाल में अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और अपराह्न में वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या क्रमशः सम्पन्न करे और उपासना-भेद यथा-शास्त्र पूजा करे (७६) । हे प्रिये ! जो ब्रह्म-मन्त्रोपासक हैं, वे गायत्री के जप-काल में गायत्री के प्रतिपाद्य ब्रह्म हैं, इस प्रकार की भावना करें । ऐसा करने पर वैदिक सन्ध्या होगी (७७) । जो ब्रह्मोपासक नहीं हैं, उनको वैदिक सन्ध्या सूर्यार्घ्य-दान और गायत्री-जप से होगी (७८) । हे भद्रे ! सभी आह्निक कार्यों में १००८ या १०८ या १० बार जप करने का नियम है (७६) । हे देवि ! शूद्र और साधारण जाति को केवल आगमोक्त विधि का ही अधिकार है । उसी से उनको सब प्रकार की सिद्धि होगी (८०) । प्रातः-सन्ध्या सूर्योदय के समय करे । इसी प्रकार मध्याह्न-सन्ध्या और सायं-सन्ध्या क्रमशः मध्याह्न-काल में तथा सूर्यास्त के समय करे । इस सन्ध्या-वन्दन का समय 'त्रिकाल' निर्दिष्ट है। श्री देवी ने कहा—हे नाथ ! तुमने स्वयं कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मण आदि सभी वर्गों के लिए एकमात्र तान्त्रिक क्रिया ही प्रशस्त है (८१-८२) । हे देवदेव ! इस समय किसलिए तुम ब्राह्मणों को वैदिक क्रिया में नियोजित करते हो ? यह सब विशेष रूप से वर्णन करो (८३) ।

५४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र श्री सदाशिव ने कहा—हे तत्त्वज्ञ ! तुमने यथार्थ ही कहा है। कलि-युग में सभी वर्णों के लिए एकमात्र तान्त्रिकी क्रिया ही भोग और मोक्ष की निमित्त है और सभी कार्यों में वह सिद्धि देती है (८४)। यह ब्रह्म-सावित्री जिस प्रकार वैदिकी है, उसी प्रकार तान्त्रिकी भी है। अतः दोनों ही कर्म प्रशस्त है (८५) । हे देवि ! इसीलिए मैंने यहाँ कहा है कि कलि के प्रबल होने पर ब्राह्मणों का गायत्री में ही अधिकार होगा, अन्य किसी वैदिक मन्त्र में नहीं (८६) । कलि-काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की गायत्री क्रमश: 'ॐ', 'श्रीं' और 'ऐं' पूर्विका होगी अर्थात् ब्राह्मण गायत्री के पूर्व 'ॐ', क्षत्रिय गायत्री के पूर्व 'श्रीं' और वैश्य गायत्री के पूर्व 'ऐं' लगावें (८७) । हे परमेश्वरि ! शूद्रों से द्विजों को अलग करने के लिए द्विजों के आह्निक में पूर्व काल में वैदिक सन्ध्या की विधि कही है (८८) । अन्यथा अर्थात् वैदिक सन्ध्या न करने से भी केवल शैव पद्धति द्वारा सिद्धि मिलेगी। यह सत्य, सत्य, विशेष सत्य है, इसमें सन्देह नहीं (८६) । हे देव-वन्दिते ! अनातुर मुमुक्षु व्यक्ति सन्ध्या का यथोक्त समय बीत जाने पर भी 'ॐ तत् सत् ब्रह्म' का उच्चारण कर इस सन्ध्या को करें (६०) । अर्थात् आतुर के लिए विशेष नियम रखने के उद्देश्य से 'अनातुर' विशेषण दिया है। आसन, वस्त्र, पात्र, शय्या, यान, गृह, गृह- सामग्री आदि परिष्कृत होते हुए भी और भी परिष्कृत हों, तो अधिक उत्तम है (६१) । गृहस्थ आह्निक कार्य समाप्त कर स्वाध्याय या गृह-कर्म करे, बिना उद्यम खाली न बैठा रहे (६२) । पुण्य तीर्थ में, पुण्य तिथि में, चन्द्र-ग्रहण और सूर्य-ग्रहण-काल में जप और दान करने से मङ्गल होता है (६३) । कलि-युग में मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, अतः उपवास करना ठीक नहीं है। कलियुग में 'उपवास' के स्थान पर एकमात्र 'दान' ही प्रशस्त है (६४) । हे महेशानि ! कलि-युग में 'दान' सब सिद्धियों का देनेवाला है। सत् क्रिया करनेवाले दरिद्र व्यक्ति हीं 'दान' के पात्र हैं (६५) । हे अम्बिके ! मास, वर्ष और पक्ष के प्रारम्भिक दिन में, चतुर्दशी, अष्टमी, शुक्ल- पक्ष की एकादशी, अमावास्या, अपना जन्म-दिन, पिता-माता की मृत्यु-तिथि और निर्दिष्ट उत्सव के दिन— ये सब पुण्य काल कहे गए हैं (६६-६७) । गङ्गा नदी, महा-नदी, गुरु-गृह और प्रसिद्ध देवता-क्षेत्र पुण्य-तीर्थ कहे हैं (६८) । अध्ययन, माता-पिता की सेवा, पत्नी की रक्षा को छोड़कर तीर्थ करने से पुरुष नरक जाते हैं (६६) । स्त्रियों के लिए पति की सेवा से बढ़कर तीर्थ-सेवा नहीं है, उपवासादि क्रिया नहीं है, व्रत का नियम नहीं है अर्थात् इन सब कर्मों से मिलनेवाला फल मात्र पति-सेवा से ही उन्हें मिल जाता है अतः ये सब कर्म उनके लिए निर्दिष्ट नहीं हैं (१००) । पति ही स्त्रियों के लिए तीर्थ, तपस्या, दान, व्रत और गुरु हैं। अतः स्त्री पूरे अन्त:- करण से पति-सेवा करे (१०१) । वचनों से, सेवा से सदा पति का प्रिय कार्य करे और सदा उनकी आज्ञा के अनुसार चलती हुई पति के बान्धवों को सन्तुष्ट करे (१०२) । पतिव्रता स्त्री पति को कठोर दृष्टि से न देखे, दुर्वचन भी न सुनाए, मन से भी स्वामी को अप्रिय लगनेवाला कार्य न करे (१०३) । जो स्त्री शरीर, मन और वचन से सदा प्रिय कार्य-रूपी अनुष्ठान द्वारा पति को सन्तुष्ट करती है, वह ब्रह्म-पद को पाती है (१०४) । पति की आज्ञाकारिणी स्त्री दूसरे पुरुष का मुख न देखे, दूसरे पुरुष के साथ बात न करे (१०५) । स्त्री बचपन में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन और बुढ़ापे में पति के बान्धवों के अधीन रहती है। किसी भी अवस्था में वह स्वाधीन नहीं रहती (१०६) । पिता और पति की मर्यादा, पति-सेवा तथा धर्म-शासन को न जाननेवाली बालिका कन्या का विवाह न करे (१०७) । नर-मांस, नराकृति-पशु-मांस, उपकारी गाय और रस-हीन मांस-भोजी जन्तु का मांस न खाए (१०८) । हे शिवे ! भूमि से उत्पन्न ग्राम्य एवं जंगली विविध प्रकार के फल-मूल स्वेच्छापूर्वक खा सकते हैं (१०६) । ब्राह्मण के लिए अध्यापन और याजन—यही दो वृत्तियाँ उत्तम हैं। इनमें अशक्त हो, तो क्षत्रिय-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति से निर्वाह करे (११०) । क्षत्रिय के लिए संग्राम और प्रजा-पालन—यही सद्-

आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५५ वृत्तियाँ हैं। यदि इनमें अशक्त हो, तो वैश्य-वृत्ति और उसमें भी अशक्त हो, तो शूद्र-वृत्ति का सहारा ले (१११)। हे परमेशानि ! वाणिज्य में असमर्थ वैश्यों के लिए शूद्र-वृत्ति का सहारा लेना अनुचित नहीं है। शूद्रों के लिए सेवा-वृत्ति विहित है (११२) । हे देवेशि ! सामान्य वर्ण अर्थात् पञ्चम-वर्ण को ब्राह्मण-वृत्ति को छोड़कर अन्य सभी वृत्तियों का अधिकार है (११३) । अपनी वृत्ति में स्थित ब्राह्मण द्वेष-रहित, ममता-शून्य, शान्त, सत्य-वादी, जितेन्द्रिय, मात्सर्य-रहित और निष्कपट होता है (११४)। सत्पथावलम्बी शिष्यों को पुत्र के समान अध्ययन कराता है, सब लोगों का हितैषी और पक्षपात-रहित होता है (११५) । ब्राह्मण मिथ्या कथन, असूया, व्यसन (मृगया, द्यूत आदि), अप्रिय वचन, नीचों का सङ्ग और दम्भ कभी न करे (११६) । हे वरानने ! क्षत्रियों को सन्धि होने पर युद्ध की इच्छा करना निन्दनीय है। सम्मान-पूर्वक सन्धि को स्थिर रखे और युद्ध में जय या मृत्यु दोनों ही उत्तम समझे। राजा प्रजा के धन का लोभ न करे और नियम से ही कर ग्रहण करे। स्वीकृत धर्म की रक्षा करते हुए प्रजा का पुत्र-वत् पालन करे (११७)। न्याय, युद्ध, सन्धि एवं अन्यान्य सभा राजकीय कार्यों में राजा सदा मन्त्रियों के साथ विचार करे (११८-११६) । धर्म-सम्मत युद्ध करे, न्यायतः दण्ड और पुरस्कार दे तथा बलानुसार यथा-शास्त्र सन्धि करे (१२०) । उपाय करके कार्य सम्पन्न करे और शत्रुओं को युद्ध तथा सन्धि उपायों द्वारा नियन्त्रित करे क्योंकि उपाय से ही सभी प्रकार के जय, मङ्गल और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं (१२१)। नीचों का संग न करे, सदा पण्डितों का प्रिय रहे, कार्य-कुशल, सुशील, मित-व्ययी और विपत्ति के समय धैर्य- शाली रहे (१२२) । दुर्ग-संस्कार में निपुण, शस्त्र-शिक्षा में विचक्षण और अपने सैनिकों के भाव का ज्ञाता हो तथा उन्हें रण-कौशल सिखावे (१२३) । हे देवि ! युद्ध में मूर्च्छित, शस्त्र-हीन, भागने को तत्पर या बलपूर्वक लाए गए शत्रु को और शत्रु के स्त्री-शिशु-सन्तानादि को मारे नहीं (१२४) । जो सारी वस्तुएँ विजय में या सन्धि द्वारा प्राप्त हों, उन्हें यथा-योग्य सैनिकों में बाँट दे (१२५)। योद्धाओं की वीरता और चरित्र को राजा को अलग- अलग जानना चाहिए। अपना हितेच्छु राजा एक व्यक्ति को बहुत सेना का अधिपति न बनावे (१२६) । राजा एक व्यक्ति पर पूरा विश्वास न करे, एक ही व्यक्ति को विचार करने में नियुक्त न करे। नीच लोगों के प्रति न समता-भाव दिखावे, न उनके साथ क्रीड़ा या परिहास करे (१२७) । अनेक शास्त्रों का ज्ञानी, मित-भाषी, जिज्ञासु, स्वाभिमानी और दम्भ-शून्य रहे। दण्ड देते समय या प्रसन्नता के समय धीर रहे अर्थात् दोनों ही समय आकार और मुद्रा से सम-भाव रहे (१२८)। राजा स्वयं या गुप्तचरों द्वारा प्रजा के भाव को जानता रहे और अपने स्वजनों तथा सेवकों के भाव को समझता रहे (१२६) । तत्त्व-दर्शी शासक क्रोध, दम्भ या प्रमाद के वश में होकर सहसा किसी का सम्मान या अपमान न करे (१३०)। सेनाओं के सेनापति और मन्त्रियों की स्त्री-कन्या-पुत्र- भृत्य का पालन राजा करे ! यदि दोषी हों, तो यथा-विधि उन्हें दण्डित करे (१३१) । उन्मत्त, असमर्थ, बालक, पीड़ित और वृद्ध—ऐसे लोग यदि बान्धव-रहित हों, तो राजा पिता के समान उनकी रक्षा करे (१३२) । कृषि-वाणिज्य को ही वैश्यों को सनातन वृत्ति माना है और उसके द्वारा सभी लोगों की शरीर-रक्षा होती है (१३३)। हे देवि ! इसीलिए वाणिज्य और कृषि-कर्म में असावधानी, व्यसन, आलस्य, मिथ्या-व्यवहार, शठता-कभी किसी प्रकार न करे (१३४) । हे शिवे ! क्रेता और विक्रेता-दोनों की सम्मति से वस्तु और उसका मूल्य निश्चित कर परस्पर-स्वीकृति से 'क्रय' सिद्ध होता है (१३५) । हे प्रिये ! मत्त, विक्षिप्त, शोकार्त, विशेष उत्कण्ठित, बालक, शत्रु-गृहीत और रोग से भ्रान्त-बुद्धि—ऐसे लोगों को किया गया दान और विक्रय असिद्ध होता है (१३६) । अदृष्ट-वस्तु का गुण सुनकर ही क्रय सिद्ध होता है किन्तु उस गुण में विपर्यय होने से विक्रय असिद्ध हो जाता है। हाथी, ऊँट, घोड़ा आदि के गुण सुनकर क्रय-सिद्धि होती है किन्तु यदि वर्णित गुण उनमें न हुआ, तो वह क्रय असिद्ध होता है। हाथी, ऊंट, घोड़े आदि का गुप्त दोष प्रकट होने पर एक वर्ष बाद भी वह

५६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र क्रय अन्यथा किया जा सकता है (१३७-३८)। हे कुलेश्वरि! मानव-देह धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को भाजन-स्वरूप है। इसलिए हमारे शासन के कारण इस शरीर का क्रय सिद्ध नहीं है (१३६) । हे प्रिये ! जो, गेहूँ और धान्य में वर्ष के अन्त में (ऋण देने पर) मूल का चतुर्थांश मात्र लाभ होता है। धातु-द्रव्य में एक वर्ष में अष्टमांश लाभ लेना निर्दिष्ट है (१४०)। ऋण, कृषि-कार्य, वाणिज्य और अन्य सभी कार्यों में शास्त्र के द्वारा स्वीकृत नियमानुसार ही मनुष्य कार्य करें (१४१) । सेवा-वृत्ति में लगे व्यक्ति कार्य-कुशल, पवित्र, सत्यवादी, जित-निद्र, जितेन्द्रिय, सावधान और निरालस्य रहें (१४२) । इस लोक और पर-लोक में सुख चाहनेवाले सेवक स्वामी को विष्णु के समान, उनकी पत्नी को माता के समान और उनके बान्धवों को देवता के समान आदर दें (१४३) । स्वामी के मित्रों को अपना मित्र, उनके शत्रुओं को अपना शत्रु समझें । सभी समय स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा करते हुए भय-पूर्वक उपस्थित रहें (१४४) । अपमान, घर के छिद्र, गोपनीय अन्य बातों और जिससे स्वामी को ग्लानि होती हो, ऐसी बातों को अति यत्न-पूर्वक छिपा कर रखें (१४५) । स्वामी के धन में लोभ न करें, सदा स्वामी के हित में लगे रहें। उनके निकट असद् वाक्य, क्रीडा और हँसी का त्याग करें (१४६) । स्वामी की दासियों आदि को पाप-मन से न देखें, उनके साथ एकान्त में न सोयें और न हँसी-खेल करें ( ४७)। स्वामी की शय्या, आसन, यान, वसन, पानादि-पात्र, पादुका, भूषण, शस्त्र अपने उपयोग में न लायें (१४८) । यदि सेवक से अपराध हो, तो उसके लिए स्वामी से क्षमा मांगे । स्वामी के सामने धृष्टता, लम्बी-चौड़ी बात, आदि छोड़ दे (१४६) । हे शिवे ! भैरवी-चक्र और तत्त्व-चक्र के बाहर सभी वर्ण अपने-अपने वर्ण में ही ब्राह्म-विवाह और भोजन करें किन्तु हे महेशानि ! उक्त दो स्थानों अर्थात् तत्त्व-चक्र और भैरवी चक्र में शैव-विवाह कहा है। इनमें भोजन और पान करते समय वर्ण का भेद-भाव नहीं किया जाता । तात्पर्य यह है कि शैव-विवाह में वर्ण-विचार नहीं है और शैव-विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री दोनों चक्रों में तथा अन्य सभी कार्यों में ब्राह्म विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री प्रशस्त है। इसी प्रकार चक्रों में भोजन करते समय जाति-भेद का विचार नहीं है किन्तु अन्य समयों में, विचार करना चाहिए (१५०-१५१) । श्री देवी ने कहा - यह 'भैरवी-चक्र' क्या है ? अथवा 'तत्त्व-चक्र' किस प्रकार का है ? मैं वह सब सुनना चाहती हूँ, कृपा करके बताइए (१५२) । श्री सदाशिव ने कहा - हे देवि ! कुल-पूजा की विधि से 'चक्र' का अनुष्ठान होता है। उत्तम साधकों को विशेष पूजा-समयों में उसे करना चाहिए (१५३) । हे प्रिये ! 'भैरवी-चक्र' के सम्बन्ध में समयादि का कोई नियम नहीं है। किसी भी समय यह शुभ 'भैरवी-चक्र' किया जा सकता है (१५४) । साधकों के लिए मंगल- कारी 'भैरवी-चक्र' का विधान बताता हूँ, जिसके द्वारा भगवती की आराधना करने से प्राणी को अभीष्ट फल मिलता है (१५५) । कुलाचार्य सुन्दर स्थल पर उत्तम आसन बिछा कर 'कामाद्य-अस्त्र' अर्थात् 'क्लीं फट्' मन्त्र से उक्त आसन का शुद्ध कर उस पर बैठे (१५६) । सिन्दूर, रक्त-चन्दन या केवल जल से त्रिकोण-चतुष्कोण मण्डल बनाए (१५७) । एक सुन्दर घट लेकर उसे क्रमशः दही, अक्षत, फल, पल्लव, सिन्दूर तिलक से युक्त कर जल से भरे और प्रणव का उच्चारण करते हुए उसे उक्त मण्डल पर स्थापित कर उसे धूप-दीप दिखाए (१५८-१५६)। गन्ध- पुष्प से पूजन कर इष्ट-देवता का ध्यान करे और संक्षिप्त पूजा-विधि से उसमें पूजा करे (१६०) । हे सुर-वन्दिते ! इसमें जो विशेष है, उसे कहता हूँ, सुनो-

आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५७ इस चक्र में गुरु आदि नौ पात्र स्थापन करने की आवश्यकता नहीं है (१६१)। यथेच्छ तत्त्व अपने सामने रखकर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' मन्त्र से उन्हें प्रोक्षित कर 'दिव्य-दृष्टि' अर्थात् एकटक दृष्टि से उन्हें देखे (१६२) । फिर 'अलि-यन्त्र' अर्थात् मद्य-पात्र में गन्ध-पुष्प देकर उसमें आनन्द-भैरवी देवी और आनन्द-भैरव का ध्यान करे (१६३)। यथा— नव-यौवन-सम्पन्नां तरुणारुण-विग्रहाम्, चारु-हासामृताभाषोल्लसद्-वदन-पङ्कजाम् । नृत्य-गीत-कृतामोदां नानाभरण-भूषिताम्, विचित्र-वसनां ध्यायेत् वराभय-कराम्बुजाम् ॥ अर्थात् बाल-सूर्य के समान दीप्तिवाला शरीर है, मनोरम हास्य-सुधा की कमनीय कान्ति से मुख-कमल शोभायमान है, नृत्य-गीत से आनन्दिता हैं, नाना अलङ्कारों से सज्जिता हैं, विलक्षण वस्त्र पहने हैं और हाथों में वर-अभय मुद्राएँ हैं। इस प्रकार आनन्द-भैरवी का ध्यान कर आनन्द-भैरव का स्मरण करे (१६४)। यथा— कर्पूर-पूर-धवलं कमलायताक्षम्, दिव्याम्बराभरण-भूषित-देह-कान्तिम् । वामेन पाणि-कमलेन सुधाढ्य-पात्रं, दक्षेण शुद्धि-गुटिकां दधतं स्मरामि ॥ अर्थात् कर्पूर-राशि के समान शुक्ल वर्ण है, कमल के समान बड़े नेत्र हैं, दिव्य वस्त्र और अलंकारों से शरीर की कान्ति शोभायमान है, बाएँ हाथ में सुधा-पूर्ण पात्र और दाएँ हाथ में शुद्धि की गुटिका लिए हैं (१६५-६७)। इस प्रकार दोनों का ध्यान कर साधक उक्त सुरा-पात्र में इन दोनों की सम-रसता का चिन्तन करते हुए आदि में प्रणव (ॐ) और अन्त में 'नमः' जोड़कर नाम-मन्त्र का पाठ कर गन्ध-पुष्प से पूजा करने के बाद सुरा का शोधन करे (१६८) । यथा-- कुल-पूजक 'स्वाहान्त-पाशबीज-त्रय' अर्थात् 'आं ह्रीं क्रों स्वाहा' का १०८ बार जप कर सुरा का शोधन करे (१६६) । प्रबल कलि-काल में गृहस्थ केवल गृह-कार्य की कामना से एकाग्र-चित्त हो पूजन करे । गृहस्थ के लिए आद्य-तत्त्व (सुरा) के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में 'मधुर-त्रय' का निर्देश है (१७०) । दूध, चीनी और शहद- ये 'मधुर-त्रय' कहे हैं। इन्हें अलि-रूप अर्थात् 'मद्य'-स्वरूप मानकर देवता को निवेदन करे (१७१)। कलि-युग के सभी मनुष्य स्वभावतः काम-द्वारा भ्रान्त चित्तवाले अतः सामान्य बुद्धिवाले होते हैं, जिससे वे 'शक्ति' अर्थात् नारी को शक्ति-रूपा नहीं समझ पाते (१७२)। हे पार्वती ! इसी से उनके लिए 'शेष-तत्त्व' अर्थात् 'मैथुन'-तत्त्व के प्रतिनिधि (अनुकल्प) रूप में देवी के चरण-कमलों का ध्यान और इष्ट-मन्त्र का जप निर्दिष्ट है (१७३) । मांस आदि जो प्राप्त हों अर्थात् कलि-काल में अदूषित प्रत्येक 'तत्त्व' को उक्त मन्त्र (आं ह्रीं क्रों स्वाहा) से १०० बार अभिमन्त्रित करे (१७४) । फिर लाई हुई समस्त वस्तुओं को ब्रह्म-मय समझते हुए दोनों आँखें बन्द कर उन्हें भगवती काली को निवेदित करे, तब स्वयं पान और भोजन करे (१७५) । हे भद्रे ! यह 'भैरवी-चक्र' सार का सार-श्रेष्ठ है। सभी तन्त्रों में गुप्त है, इसे तुमसे कहा है (१७६)। हे पार्वती ! 'भैरवी-चक्र' और 'तत्त्व-चक्र' में शैव-पद्धति से विवाह करना श्रेष्ठ साधकों का कर्तव्य है (१७७) । बिना विवाह किए शक्ति-सेवी वीर साधक पर-स्त्री-गमन के पाप को प्राप्त करते हैं, इसमें संदेह नहीं (१७८) । 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ होने पर सभी जातियों के व्यक्ति श्रेष्ठ द्विज हो जाते हैं। 'भैरवी-चक्र' के समाप्त होने पर सभी अलग-अलग वर्ण के हो जाते हैं (१७६)। इस 'भैरवी-चक्र' में जाति-विचार नहीं है, उच्छिष्ट (जूठे) का भी विचार नहीं है। 'चक्र' में विद्यमान वीर मेरे ही स्वरूप होते हैं, अन्य नहीं (१८०) । फा०-८

५८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इस 'चक्र' में देश-काल का नियम नहीं है, पात्र का विचार नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिए द्रव्य को प्रयोग कर सकते हैं (१८१) । वीराचारी या पश्वाचारी द्वारा दूर-देश से लाया पका या बिना पका द्रव्य 'चक्र' में रखने से ही पवित्र हो जाता है (१८२) । हे महेश्वरि ! 'भैरवी-चक्र' के आरम्भ में वीरों के ब्रह्म-तेज के प्रभाव से सभी विघ्न उद्विग्न और भयभीत होकर भाग जाते हैं (१८३) । पिशाच, गुह्यक, यक्ष, बेताल और अन्य क्रूर प्राणी 'भैरवी-चक्र' का नाम सुनते ही भय से दूर चले जाते हैं (१८४) । उस स्थान में सारे तीर्थ, महा- तीर्थ और देव-राज-सहित सभी देवता आदरपूर्वक आ जाते हैं (१८५) । हे शिवे ! 'चक्र' का स्थान 'महा-तीर्थ' है, अतः सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है, जिसमें देवता भी तुम्हें उत्तम नैवेद्य देने की इच्छा करते हैं (१८६) । म्लेच्छ, श्वपच, किरात या हूण आदि द्वारा लाए कच्चे या पके द्रव्य वीर के हाथ में देने से ही पवित्र हो जाते हैं (१८७) । कलि के पाप से दूषित व्यक्ति 'भैरवो-चक्र' और मेरे स्वरूप साधकों का दर्शन करने से ही पाप के पाश से छूट जाते हैं (१८८) । प्रबल कलि-काल में चक्रानुष्ठान को गोपनीय रखने की आवश्यकता नहीं है। वीराचारी सभी स्थानों में सभी समयों में 'कुल-साधना' करे (१८६) । 'चक्र' में व्यर्थ की बातचीत, चञ्चलता, वाचालता, छींकना-पादना और वर्ण-भेद अर्थात् वर्ण-विचार न करे (१९०) । क्रूर, दुष्ट, पश्वाचारी, पापी, नास्तिक, कुल-दूषक और कुल-शास्त्र के निन्दकों को 'चक्र' से दूर ही छोड़ दे (१९१) । स्नेह, भय या अनुराग के वश पश्वाचारी आदि को 'चक्र' में प्रवेश देने से वीराचारी भी 'कुल-धर्म' से भ्रष्ट होकर नरक में जाता है (१६२) । जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या सामान्य जाति वाला 'कुल-धर्मावलम्बी' हो, उसे सदा देववत् पूज्य माने (१६३) । जो वर्णाभिमान के वश 'चक्र' में वर्ण-भेद करता है, वह वेदान्त-वेत्ता होने पर भी घोर नरक में जाता है (१६४) । 'चक्र' के अन्दर पवित्र-मनवाले, साधु और साक्षात् शिव-स्वरूप कौलिकों के सम्बन्ध में पाप की शङ्का कैसे हो सकती है (१६५) ? शैव-मार्गावलम्बी विप्रादि लोग जब तक 'चक्र' में रहें, तब तक शिव के आदेशानुसार शाम्भवाचार का पालन करें (१६६) । ये सब 'चक्र' से बाहर होने पर लोक-यात्रा-निर्वाह के लिए अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिए निर्दिष्ट कर्मों का अलग-अलग पालन करें (१६७) । शवासन, मुण्डासन और चितासन पर बैठकर सौ पुरश्चरण करने से जो फल मिलता है, वह ज्ञानी साधक 'चक्र' में एक बार जप करने से ही पा जाता है (१६८) । 'भैरवी-चक्र' का माहात्म्य कहने में कौन व्यक्ति समर्थ है ? इसे एक बार करने से सारे पापों से छुटकारा मिल जाता है (१६६) । छः मास करने से भूपति, और एक वर्ष करने से साधक मृत्युञ्जय होता है। नित्य करने से निर्वाण-मुक्ति प्राप्त होती है (२००) । हे कालिके ! इस विषय में अधिक कहने से क्या प्रयोजन ? हे सुब्रते ! सत्य जानो कि इस 'कुल-पद्धति' के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय ऐहिक तथा पारलौकिक सुख पाने का नहीं है (२०१) । सर्व-धर्म-शून्य कलि की प्रधानता के समय में 'कुल-धर्म' को छिपाने से कौल भी नरक को जाता है (२०२) । भोग और मोक्ष के एक-मात्र साधन 'भैरवी-चक्र' को मैंने कहा। हे कुलेश्वरि ! अब 'तत्त्व-चक्र' को बताता हूँ, उसे सुनो (२०३) । 'तत्त्व-चक्र' सब चक्रों का राजा है। इसे 'दिव्य-चक्र' कहा गया है। ब्रह्मज्ञ साधक के सिवा अन्य को इसे करने का अधिकार नहीं है (२०४) । जो लोग परब्रह्म के उपासक हैं; ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म-तत्पर, पवित्र अन्तःकरणवाले, सब प्राणियों का हित करने में लगे हुए, शान्त, निर्विकार, तन्त्र और गुरु-वाक्य पर विश्वास रखनेवाले, दया-शील, दृढ़-व्रती, सत्य-सङ्कल्प और ब्राह्म हैं, वही इस 'तत्त्व-चक्र' के करने के अधिकारी हैं (२०५-२०६) । हे तत्त्वज्ञे ! जो इस चराचर को ब्रह्म-भाव से देखते हैं, उन्हीं तत्त्वज्ञ पुरुषों को इस 'तत्त्व-चक्र' के करने का अधिकार है

आठवाँ उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ५६ (२०७) । हे देवि ! जिन्हें इस प्रकार का भाव है कि 'सब कुछ ब्रह्म ही है, वही 'तत्त्व-चक्री' हैं अर्थात् उन्हें ही 'तत्त्व-चक्र' करने का अधिकार है (२०८) । इसमें घट की स्थापना नहीं होती, विस्तृत रूप में पूजा नहीं होती । सभी स्थानों में ब्रह्म-भाव से तत्त्व-साधन करे (२०६) । हे प्रिये ! ब्रह्म-मन्त्रोपासक और ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति चक्रे- श्वर बने । ब्रह्मज्ञ साधकों के साथ 'तत्त्व-चक्र' का आरम्भ करे (२१०) । रमणीय, अत्यन्त निर्मल और साधकों को सुखदायक प्रदेश में विचित्र आसन लाकर विमल आसन की कल्पना करे (२११) । हे शिवे ! चक्रेश्वर ऐसे स्थान में ब्रह्म-साधकों के साथ बैठकर तत्त्व-समुदाय को एकत्र करे और तब उन्हें सामने स्थापित करे (२१२) । चक्रेश्वर सभी तत्त्वों पर तार-प्रणव अर्थात् 'ॐ हंसः' मन्त्र का सौ बार जप कर निम्न मन्त्र का पाठ करे (२१३)— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म-हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ॥ अर्थात् जिसके द्वारा यज्ञ में घृतादि अर्पित किया जाता है, उसे 'अर्पण' कहते हैं अर्थात् स्रुवा आदि— वह ब्रह्म है । जो वस्तु अर्पित की जाती है अर्थात् घृत आदि—वह भी ब्रह्म है । ब्रह्म-अग्नि में स्वयं ब्रह्म द्वारा आहुति दी जाती है अर्थात् अग्नि और होम-कर्त्ता भी ब्रह्म हैं। इस प्रकार ब्रह्म-कर्म में जिसका चित्त एकाग्र होता है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है (२१४) । उक्त मन्त्र 'ब्रह्मार्पणं......समाधिना' को सात या तीन बार जप कर सभी तत्त्वों का शोधन करे (२१५) । तब ब्राह्म मन्त्र से उन सबको परमात्मा को समर्पित कर ब्रह्मज्ञ साधकों के सहित एक साथ पान और भोजन करे (२१६) । हे महेश्वरि ! इस 'तत्त्व-चक्र' में जाति-गत पृथकता को छोड़ दे। इसमें देश-काल या पात्र का नियम नहीं है (२१७) । जो मूढ़ लोग इस 'दिव्य-चक्र' में असावधानी से वंश-गत या जाति-गत भेद-भाव करते हैं, उन्हें अति निकृष्ट गति प्राप्त होती है (२१८) । अतः ब्रह्मज्ञ साधक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के लिए सब यत्न करके 'तत्त्व-चक्र' का अनुष्ठान करे (२१६) । श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! आपने गृहस्थों के धर्म को विस्तार से कहा है। अब कृपया संन्यास में विहित धर्मों को कहिए (२२०) । श्री सदाशिव ने कहा—हे देवि ! कलि-युग में अवधूताश्रम ही संन्यास कहा गया है। जिस विधि से संन्यास आश्रम कर्त्तव्य है, उसे अब सुनो (२२१) । ब्रह्म-ज्ञान के उत्पन्न होने पर, सभी काम्य कर्मों से रहित होने पर, अध्यात्म-विद्या में विशारद व्यक्ति संन्यासाश्रम का अवलम्बन करे (२२२) । वृद्ध पिता-माता, शिशु पुत्र, पतिव्रता भार्या, असमर्थ बन्धु-वर्ग—इन सबको छोड़कर जो प्रव्रज्या करते हैं, वे नरक को जाते हैं (२२३) । कुलावधूत-संस्कार में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और सामान्य जाति—इन पाँचों वर्णों को अधिकार है (२२४) । साधक गृहस्थोचित कर्म सम्पन्न कर, अपने सभी स्वजनों को सन्तुष्ट कर, ममता और कामना-शून्य होकर तथा जितेन्द्रिय हो गृह से बाहर निकले (२२५) । गृहस्थाश्रम त्याग कर जाने की अभिलाषा रखनेवाला व्यक्ति अपने स्वजन बन्धुओं और आश्रित लोगों तथा गांव के निवासियों को बुलाकर प्रेम-पूर्ण मन से अनुमति देने की प्रार्थना करे (२२६) । फिर सबकी अनुमति लेकर अभीष्ट देवता को प्रणाम कर गाँव की प्रदक्षिणा कर निरपेक्ष- हृदय से घर से बाहर निकले (२२७) । संसार-बन्धन से मुक्त होकर परमानन्द से सुखी होकर कुलावधूत ब्रह्मज्ञ के पास जाकर यह प्रार्थना करे (२२८)— गृहाश्रमे पर-ब्रह्मन् ! ममैतद् विगतं वयः । प्रसादं कुरु मे नाथ ! संन्यास-ग्रहणं प्रति ॥

६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे पर-ब्रह्मन् ! गृहस्थाश्रम में मेरी इतनी आयु बीत चुकी है। हे नाथ ! मैं अब संन्यास लेने के लिए आया हूँ, मुझ पर प्रसन्न हों (२२६)। गुरुदेव विचार करके गृह-कर्म से निवृत्त उस व्यक्ति को शास्त्र और विवेक से युक्त देखकर द्वितीय आश्रम का आदेश प्रदान करें (२३०) । तब शिष्य स्नान कर संयतात्मा होकर आह्निक कर्म सम्पन्न कर तीन ऋणों से मुक्त होने के लिए देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करे (२३१) । ब्रह्मा, विष्णु, अनुचरों सहित रुद्र— ये देव-गण, ब्रह्मर्षि-गण और सभी पितृ-गण संन्यास लेते समय पूज्य हैं। उन सबको बताता हूँ, सुनो (२३२-३३) । हे देवि ! पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्ध-प्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्ध-प्रमातामही की पूजा करे (२३४) । संन्यास लेते समय पूर्व दिशा में देव-गण एवं ऋषिगण और पश्चिम दिशा में मातामह-पक्ष की पूजा करे (२३५) । पूर्व-दिशा से आरम्भ कर दो-दो आसन स्थापित करे। इन आसनों पर क्रमशः देवादि का आवाहन कर पूजा आरम्भ करे (२३६) । फिर सबका अर्चन कर अलग-अलग पिण्ड-दान करे। इस प्रकार पिण्ड-दान की विधि के अनुसार यथा-क्रम पिण्ड देकर पितृ-गण एवं देव-गण से हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (२३७)— तृप्यध्वं पितरो देवा देवर्षि-मातृका-गणाः । गुणातीत-पदे यूयममृणी-कुरुताऽचिरात् ॥ अर्थात् हे पितृ-गण ! हे मातृ-गण ! हे देवर्षि-गण ! मैं गुणातीत पद को जा रहा हूँ। आप लोग मुझे शीघ्र ऋण से मुक्त कर दें (२३८) । इस प्रकार देव, ऋषि, पितृ और मातृ-गण को बारम्बार प्रणाम कर और उनसे अपनी ऋण-मुक्ति की प्रार्थना कर ऋण-त्रय से छूटकर साधक आत्म-श्राद्ध करे (२३६)। आत्मा ही सबकी पिता, पितामह और प्रपितामह है। अतः ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा को आत्म-समर्पण करने के लिए अपना श्राद्ध करे (२४०) । हे देवि ! पूर्ववत् परिकल्पित आसन पर उत्तर की ओर मुख करके बैठे और अपने पितृ-गण का आवाहन कर अर्चन कर पिण्ड-दान करे। देव-गण, ऋषि-गण और पितृ-गण के लिए पिण्ड-दान हेतु यथा-क्रम पूर्वाग्र, दक्षिणाग्र, पश्चिमाग्र और अपने पिण्ड-दान हेतु उत्तराभिमुख कुश रखे (२४१- ४२) । मुमुक्षु व्यक्ति गुरु द्वारा प्रदर्शित पद्धति के अनुसार श्राद्ध-कर्म समाप्त कर चित्त-शुद्धि के लिए सौ बार निम्न मन्त्र का जप करे (२४३)— ह्रीं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥ इस मन्त्र का अर्थ कृपया पृष्ठ ३२ पर देखें (२४४) । इसके बाद गुरुदेव पूजा-पद्धति के अनुसार वेदी पर मण्डल प्रस्तुत कर उस पर कलश-स्थापन-पूर्वक पूजा प्रारम्भ करें (२४५) । फिर ब्रह्मज्ञ व्यक्ति परम ब्रह्म का ध्यान कर शैव पद्धति के अनुसार पूजा कर वह्नि-स्थापन करे (२४६) । तब गुरुदेव पूर्वोक्त संस्कृत वह्नि में स्व-कल्पोक्त आहुतियां देकर शिष्य को बुलाकर साकल्य-होम करावें (२४७) । पहले महा-व्याहृति-होम कर प्राण-होम अर्थात् प्राणादि पञ्च-वायु का होम करे। प्राण, अपान समान, उदान, व्यान—ये ही पञ्च प्राण-वायु हैं (२४८) । तब देह में आत्मा का अध्यास अर्थात् देह को आत्मा समझने का जो भ्रम है, उसे हटाने के लिए तत्त्व-होम करे। यथा— पृथिवी सलिलं वह्निर्वायुराकाशं, गन्धो रसश्च रूपञ्च स्पर्शः शब्दो, वाक्-पाणि-पादाश्च पायूपस्थौ श्रोत्रं त्वङ्-नयनं जिह्वा घ्राणं बुद्धीन्द्रियाणि च; मनो बुद्धिश्च चित्तं चाहङ्कारो देहजाः

आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ६१ क्रियाः, सर्वाणीन्द्रिय-कर्माणि प्राण-कर्माणि यानि च । एतानि मे शुद्धचन्तां । ह्रीं ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा। अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश; गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; वाक्य, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ; श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, घ्राण; बुद्धि, इन्द्रियाँ; मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार; देह-जन्य सभी कार्य, इन्द्रिय- कार्य, प्राण-कार्य—ये सब मेरे शुद्ध हों, मैं ज्योति-स्वरूप होऊँ, रज और पाप से रहित होऊँ (२४६-५३) । इस प्रकार २४ तत्त्वों और दैहिक कर्मों को अग्नि में होम कर निष्क्रय होकर अपने शरीर को मरा हुआ समझे (२५४) । अपने शरीर को मृत-वत् और सर्व-कर्म-रहित भावना कर परमब्रह्म को स्मरण करता हुआ गले से यज्ञ-सूत्र को उठाकर वक्षःस्थल पर करते हुए स्कन्ध-देश पर रखे (२५५) । फिर तत्त्वज्ञ व्यक्ति 'ऐं क्लीं हूँ' मन्त्र को पढ़ता हुआ यज्ञ-सूत्र को कन्धे से उतारकर अपने हाथों में धारण करे और व्याहृति-त्रय के अन्त में स्वाहा का उच्चारण करते हुए उक्त यज्ञोपवीत को घृत से संयुक्तकर अग्नि में डाल दे (२५६) । इस प्रकार यज्ञोपवीत का होम कर काम-बीज 'क्लीं' का उच्चारण करता हुआ शिखा को काटकर हाथ में लेकर घृत के बीच में स्थापित करे। फिर निम्न मन्त्र को पढ़कर उक्त शिखा को अग्नि में डाल दे (२५७)— ब्रह्म-पुत्रि शिखे ! त्वं हि बाल-रूपा तपस्विनी । दीयते पावके स्थानं गच्छ देवि ! नमोऽस्तु ते । क्लीं ह्रीं हूं फट् स्वाहा। अर्थात् हे ब्रह्म-पुत्रि ! हे शिखे ! तुम केश-रूपा तपस्विनी हो। हे देवि ! तुम्हें अग्नि में स्थान देता हूँ। तुम जाओ । तुम्हें नमस्कार है (२५८-५६) । पितृ, देव और देवर्षि-गण शिखा के ही आश्रय से रहते हैं और सभी आश्रमों के सारे कर्म शिखा पर ही आधारित हैं (२६०) । अतः देव, ऋषि, पितृ, देव-गण—सबको सन्तर्पित कर देही शिखा तथा यज्ञ-सूत्र का त्याग करने से ब्रह्म-मय हो जाता है (२६१) । यज्ञ-सूत्र और शिखा के ही परित्याग से द्विजों का संन्यास होता है (२६२) । शूद्र और सामान्य जातिवालों का संन्यास-संस्कार केवल शिखा-होम से होता है। शिखा-सूत्र का त्याग करने के बाद गुरुदेव को दण्डवत् प्रणाम करे (२६३) । गुरु शिष्य को उठाकर उसके दाहिने कान में निम्न मन्त्र सुनावे— तत्त्वमसि महा-प्राज्ञ ! हंसः सोऽहं विभावय । निर्ममो निरहङ्कारः स्वभावेन सुखं चर ॥ अर्थात् हे महा-प्राज्ञ ! वह ब्रह्म तुम्हीं हो । तुम 'हंसः' और 'सोहं' की भावना करो । तुम अहङ्कार और ममता-रहित होकर अपने शुद्ध भाव में सुख से विचरण करो (२६४) । इसके बाद ब्रह्म-तत्त्वज्ञ गुरुदेव घट और अग्नि का विसर्जन कर शिष्य को आत्म-स्वरूप मानकर उसे मस्तक से निम्न मन्त्र द्वारा प्रणाम करें (२६५) – नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमो नमः । त्वमेव तत् तत्त्वमेव विश्व-रूप ! नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् तुम्हें नमस्कार है, मुझे नमस्कार है। तुम्हें और मुझे बारम्बार नमस्कार है। हे विश्व-रूप ! तुम्हीं वह हो अर्थात् जीव वही है अर्थात् जीव ही तुम हो, तुमको नमस्कार करता हूँ (२६६) । जितेन्द्रिय और तत्त्व-ज्ञान-सम्पन्न ब्रह्म-मन्त्रोपासक लोग अपने मन्त्र का पाठ कर शिखा-छेदन कर संन्यास ग्रहण करते हैं (२६७) । ब्रह्म-ज्ञान द्वारा विशुद्ध व्यक्तियों को यज्ञ, पूजा और श्राद्धादि से क्या प्रयोजन ? वे स्वेच्छाचार-परायण होते हैं, उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता (२६८) ।

६२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इसके बाद शिष्य सुख-दुःखादि-रूप द्वन्द्वों से रहित; कामनाओं से रहित, स्थिर-चित्त और साक्षात् ब्रह्म- मय होकर भू-तल पर स्वेच्छानुसार विचरण करे (२६६)। वह ब्रह्म से स्तम्ब अर्थात् तृण-गुच्छ पर्यन्त सारे विश्व को सत्-स्वरूप समझे, नाम-रूप को भूलकर आत्मा से आत्मा का ध्यान करता हुआ, आवास-शून्य, क्षमा- शील, निःशङ्क-हृदय, संसर्ग-शून्य, ममता-शून्य, अहङ्कार-शून्य और संन्यासी होकर भू-मण्डल में विचरण करे (२७०-७१)। वह शास्त्र के विधि-निषेध से मुक्त हो जाता है। वह प्राप्त विषय की रक्षा और अप्राप्य विषय के पाने की चेष्टा न करे। वह सुख-दुःख में समान, धीर, जितेन्द्रिय और इच्छा-शून्य रहे (२७२)। दुःख होने पर भी उसका अन्तःकरण स्थिर रहता है और सुख होने पर वह उसकी स्पृहा नहीं करता। वह सदा आनन्द-युक्त, पवित्र, शान्त, निरपेक्ष और व्याकुलता से शून्य रहता है (२७३)। वह किसी व्यक्ति को उद्विग्न न करे; सदा सब प्राणियों का हित करने में लगा रहे; क्रोध, भय, सङ्कल्प और उद्यम से वह शून्य रहे (२७४)। शोक, द्वेष से शून्य और शत्रु-मित्र में समदर्शी रहे। वह शीत, वात, धूपादि प्रकृति के कष्टों के सहन करने में समर्थ बने और मान-अपमान को समान समझे (२७५)। शुभ-अशुभ को समान रूप में देखे। अपने आप प्राप्त होनेवाली वस्तुओं से ही वह सन्तुष्ट रहे। वह त्रिगुणातीत, निर्विकल्प, लोभ-शून्य होकर सञ्चय से दूर रहे (२७६)। जगत् मिथ्या-स्वरूप होने पर भी जिस प्रकार एकमात्र सत्य-स्वरूप परमात्मा का आश्रय लेकर सत्य प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा का आश्रय लेकर मिथ्या-भूत यह देह आत्म-वत् प्रतीत होती है, इसे अनुभव कर संन्यासी सुखी हो (२७७)। इन्द्रियाँ अलग-अलग अपने-अपने कर्म करती हैं। आत्मा साक्षी और निर्लिप्त है, इसे जानकर संन्यासी मोक्ष को प्राप्त करता है (२७८)। संन्यासी धातु-द्रव्य का लेना, पर-निन्दा, मिथ्या व्यवहार स्त्रियों के साथ क्रीड़ा, शुक्र-त्याग और असूया-इन सबका परित्याग करे (२७६)। परिव्राजक संन्यासी देवता, मनुष्य या कीट सबके प्रति समदर्शी हो। सभी कर्मों के समूह-रूप जगत् को 'ब्रह्म' ही जाने (२८०)। ब्राह्मण का अन्न हो या चाण्डाल का, जिस किसी व्यक्ति का अन्न हो और किसी भी देश से आया हो, यह सब देश-काल का विचार न कर भोजन करे (२८१)। अवधूत व्यक्ति स्वेच्छाचारी होकर भी वेदान्त आदि अध्यात्म-शास्त्र के अध्ययन और सदा आत्म-तत्त्व के विचार करने में अपना समय बिताए (२८२)। संन्यासियों की मृत देह को कभी जलाए नहीं। इस देह को गन्ध-पुष्पादि से अर्चित कर भूमि में समाधिस्थ करे या जल में डुबो दे (२८३)। हे देवि ! सदा कामाभिलाषी मनुष्य, जिन्हें योग नहीं प्राप्त होता, ऐसे सभी लोगों की स्वभावतः कर्मकाण्ड में प्रवृत्ति होती है (२८४)। ये लोग कर्मकाण्ड में आसक्त होकर ध्यान, पूजा, जप आदि साधनों में दृढ़ होकर उन्हीं को कल्याणकारी मानते हैं (२८५)। इसी कारण मैंने चित्त-शुद्धि के लिए कर्मकाण्ड का विधान बताया है और इसीलिए मैंने बहुत प्रकार के नाम-रूपों की कल्पना की है (२८६)। हे देवि ! ब्रह्म- ज्ञान और कर्म-संन्यास के बिना सौ कल्पों तक भी कर्म करने से कोई व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता (२८७)। ब्रह्म-ज्ञान-सम्पन्न कुलावधूत मनुष्याकृति होकर भी जीवन्मुक्त है। गृहस्थ उन्हें साक्षात् नारायण जान- कर उनकी पूजा करते हैं (२८८)। यति का दर्शन करने मात्र से मनुष्य के सभी पाप दूर होकर उन्हें तीर्थ, तपस्या, दान और सभी यज्ञानुष्ठानों का फल प्राप्त होता है (२८६)।

नवाँ उल्लास--दस प्रकार के संस्कार श्री सदाशिव ने कहा—हे सुव्रते ! सभी वर्णों और आश्रमों के आचार और धर्म को मैंने तुमसे कहा । अब सभी वर्णों के 'संस्कार' कहता हूँ, सुनो (१) । हे देवि ! 'संस्कार' के बिना देह की शुद्धि नहीं होती । असंस्कृत व्यक्ति देव और पैत्र कर्मों के करने का अधिकारी नहीं हो पाता । इसलिए इस लोक और परलोक में अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मण, विप्रादि वर्णों को प्रयत्न करके अपने-अपने वर्ण के लिए निर्दिष्ट 'संस्कार' को अवश्य करना चाहिए (२-३) । १ जीव-सेक अर्थात् गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूड़ाकरण (मुण्डन), ६ उपनयन (यज्ञोपवीत) और १० विवाह—ये 'दस संस्कार' कहे हैं। शूद्र और सामान्य जाति में उपनयन नहीं होता, अतः उनके लिए नौ ही संस्कार हैं । द्विजों के लिए दस सस्कार कहे हैं (४) । हे वरारोहे ! नित्य, नैमित्तिक और काम्य सभी कर्म शम्भु द्वारा बताए मार्ग से करे (५-६) । हे प्रिये ! जिस-जिस कर्म में जो-जो विधान निर्दिष्ट हैं, वह सब ब्रह्मा-रूप से मैंने पहले ही प्रकट कर दिये हैं (७) । सभी संस्कार और ब्राह्मणादि वर्ण-भेद के अनुसार अन्यान्य मन्त्र मैंने प्रकाशित किए हैं (८) । हे कालिके ! सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में उन-उन सब कर्मों के अनुष्ठान-काल में पहले प्रणव लगाकर मन्त्रों का प्रयोग करे (६) । हे परमेशानि ! शङ्कर के आदेशानुसार कलि-युग में पहले ॐकार के स्थान पर माया-बीज 'ह्रीं' लगावे और उन उन मन्त्रों द्वारा सारे कर्म करे (१०) । निगम, आगम, तन्त्र, वेद और संहिता में समस्त मन्त्र मेरे ही द्वारा कहे गए हैं । युग-भेद से प्रयोग-भेद में कहे हैं (११) । हे कल्याणि ! कलि-काल के मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, जिससे वे तेज-हीन होते हैं । उन्हीं के हित के लिए 'कुल-धर्म' का निरूपण किया गया है (१२) । कलियुग के दुर्बल जीव परिश्रम सहने में असमर्थ हैं, उनके लिए संस्कारादि की क्रिया संक्षेप में तुमसे कहता हूँ । हे सुर-वन्दिते ! 'कुशण्डिका' सभी शुभ कर्मों के आदि में की जाती है । अतः पहले उसे बताता हूँ, सुनो— बुद्धिमान् व्यक्ति फूस, अङ्गार आदि से रहित, रमणीय, परिष्कृत स्थान में एक हाथ का स्थण्डिल बनाए (१३-१५) । उस मण्डल के पूर्वाग्र में तीन रेखाएँ खींचे । उन्हें कूर्च—'हूँ' मन्त्र से अभ्युक्षित कर वह्नि-बीज 'रं' से अग्नि लाये (१६) । वाग्भव अर्थात् 'ऐं' मन्त्र का स्मरण करते हुए मण्डल के बगल में अग्नि को स्थापित करे (१७) । तब दाएँ हाथ से उसमें जलती हुई लकड़ी लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए दक्षिण दिशा में राक्षस का अंश छोड़ दे (१८)— ह्रीं क्रव्यादेभ्यो नमः स्वाहा । इसी प्रकार प्रतिष्ठित अग्नि को दोनों हाथों से उठाकर 'मायाद्या' अर्थात् आदि में माया-बीज 'ह्रीं' लगा कर व्याहृति को स्मरण करते हुए अपने आगे अंकित तीन रेखाओं पर स्थापित तृण-काष्ठ द्वारा उक्त अग्नि को [ ६३ ]

६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रज्वलित करे और इसी अग्नि में दो घृताक्त समिधाओं को आहुति देकर क्रमानुसार अग्नि का विहित नामकरण करके अग्नि का ध्यान करे (१६-२०)। यथा-- बालार्कारुण-सङ्काशं सप्त-जिह्वं द्वि-मस्तकम् । अजारूढं शक्ति-धरं जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥ अर्थात् बाल-सूर्य के समान अरुण वर्ण, सात जिह्वाओं वाले, दो मस्तकों से युक्त, छाग पर सवार, शक्ति लिए हुए, जटा और मुकुट से शोभायमान अग्नि-देव हैं (२१) । इस प्रकार ध्यान कर हाथ जोड़कर अग्नि का आवाहन करे (२२) । आवाहन का मन्त्र यह है— ह्रीं एह्येहि सर्व्वामर-हव्य-वाह ! मुनिभिः स्व-गणैः सह अध्वरं रक्ष रक्ष नमः स्वाहा । इस प्रकार अग्नि का आवाहन कर कहे कि— अयं ते योनिः । फिर जो उपचार सुलभ हों, उनसे अग्निदेव की पूजाकर उनकी सप्त जिह्वाओं का पूजन करे (२३-२४) । सात जिह्वायें ये हैं—१ काली, २ कराली, ३ मनोजवा, ४ सुलोहिता, ५ सुधूम्र-वर्णा, ६ स्फुलिङ्गिनी, ७ विश्व- निरूपिणी । ये सभी लोलायमाना अर्थात् लपलपाती हुई उज्ज्वल हैं (२५) । हे महेश्वरि ! अग्नि को पूर्व-दिशा से आरम्भ कर उत्तर दिशा तक तीन बार प्रोक्षण करे । फिर यज्ञीय वस्तुओं पर भी तीन बार प्रोक्षण करे (२६- २७)। तब मण्डल को पूर्व-दिशा से आरम्भ कर उत्तर दिशा तक कुश द्वारा आच्छादन करे । उत्तर दिशा में स्थित कुशों को उत्तर-मुख और अन्य दिशाओं के कुशों को पूर्व-मुख रखे (२८)। अग्नि को दाएँ रखते हुए अर्थात् अग्नि को बाईं ओर ब्रह्मासन के पास जाकर बाएँ हाथ की अंगुष्ठ-कनिष्ठा अंगुलियों से ब्रह्मा के कल्पित आसन से एक कुश-पत्र लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए अग्नि को दक्षिण दिशा में फेंक दे (२६)— ह्रीं निरस्तः परावसुः । सीद यज्ञ-पते ब्रह्मन् ! इदं ते कल्पितासनम् । अर्थात् हे यज्ञ-पते, हे ब्रह्मन् ! यह आसन तुम्हारे लिए प्रस्तुत है, इस पर बैठिए । ब्रह्मा कहे (ब्रह्मा के प्रतिनिधि-रूप कोई न हो, तो स्वयं कहे)— सीदामि । अर्थात् 'मैं बैठता हूँ।' यह कहकर ब्रह्मा उत्तर-मुख होकर उक्त आसन पर बैठे (३०-३१) । गन्ध-पुष्पादि से ब्रह्मा की पूजा कर उनसे प्रार्थना करे (३२) । यथा— गोपाय यज्ञं यज्ञेश ! यज्ञं पाहि बृहस्पते ! मां च यज्ञ-पतिं पाहि कर्म-साक्षिन् नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् हे यज्ञेश्वर ! यज्ञ को रक्षा करो । हे बृहस्पते ! यज्ञ की रक्षा करो । मैं यज्ञ-पति हूँ, मेरी भी रक्षा करो । हे कर्म-साक्षिन् ! तुम्हें नमस्कार है (३३) । उत्तर में ब्रह्मा कहें— गोपयामि । अर्थात् 'मैं रक्षा करता हूँ।' ब्रह्मा के न होने पर स्वयं यह वचन कहे । यज्ञ की सिद्धि हेतु वहां दर्भ-मय विप्र की कल्पना कर ले । फिर कहे— ब्रह्मन् ! इहागच्छागच्छ । अर्थात् 'इस स्थान पर आइए, इस स्थान पर आइए।' इस प्रकारँ आवाहन कर पाद्यादि द्वारा उनकी पूजा कर उनसे प्रार्थना करे—

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५ यावद् यज्ञ-समापनं तावद् भवद्भिः स्थातव्यम् । अर्थात् 'जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप यहाँ स्थित रहें।' इस प्रकार प्रार्थना कर उन्हें नमस्कार करे (३४-३५) । अग्नि के ईशान कोण से आरम्भ कर ब्रह्मा के निकट तक तीन बार स-जल हस्त से पर्युक्षण करे। फिर तीन बार अग्नि को प्रोक्षित कर उसो अर्थात् पहले जिस पथ से आए थे, उसी पथ से लौटकर अपने आसन पर बैठ जाय । तब मण्डल की उत्तर-दिशा में कुछ कुशों को उत्तराभिमुख करके बिछाये (३६-३७) । उसो पर स-जल प्रोक्षणो-पात्र, आज्य-स्थालो, समिद् और कुश आदि सभी यज्ञीय वस्तुओं को रखे (३८) । फिर स्रुकू, स्रुवा आदि रखकर 'ह्लां हौं ह्रूं' मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य दृष्टि अर्थात् एकटक दृष्टि से उन सबको देखे और प्रोक्षण द्वारा उन्हें संस्कृत कर साधक भूमि पर दाएँ घुटने के बल बैठकर 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में रखे घृत को 'स्रुक' से लेकर अपने कल्याण को कामना करते हुए निम्न मन्त्र से तीन आहु- तियाँ दे (३६-४०)— ह्रीं विष्णवे स्वाहा । इसी प्रकार अर्थात् 'स्रुक' के द्वारा 'स्रुव' में रखा घृत लेकर प्रजापति देव का ध्यान करते हुए वायु- कोण से आरम्भ कर अग्नि-कोण तक होम करे (४१)— ह्रौं प्रजापतये स्वाहा । पुनः घृत लेकर पुरन्दर देव का ध्यान करते हुए नैर्ऋत-कोण से ईशान-कोण तक घृत-धारा प्रदान करे (४२)— ह्रौं पुरन्दराय स्वाहा । हे परमेश्वरि ! फिर अग्नि के उत्तर, दक्षिण और मध्य में क्रमशः अग्नि, सोम और अग्निषोम को तीन आहुतियाँ प्रदान करे— ह्रीं अग्नये नमः । ह्रीं सोमाय नमः । ह्रीं अग्नी-षोमाभ्यां नमः । अब विधेय कर्म में कहे होम को करे (४३-४४) । तीन आहुति देने तक के उक्त कर्म को 'धारा-होम' कहते हैं (४५) । जिस देवता के लिए आहुति दे, उसो देवता के उद्देश्य से देय वस्तु का उल्लेख करे । यथा— ह्रौं विष्णवे स्वाहा, हविरिदं विष्णवे । इस प्रकार प्रकृत कर्म को समाप्त कर 'स्विष्ट-कृत होम' करे (४६) । हे वरानने ! कलि-काल में 'प्राय- श्चित्त होम' नहीं होता, 'स्विष्टकृत' और 'व्याहृति होम' द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है (४७) । पूर्ववत् हवि लेकर अर्थात् स्रुव में रखे घृत को स्रुक द्वारा ग्रहण कर मन-ही-मन ब्रह्मा का स्मरण कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (४८)— ह्रौं अस्मिन् कर्मणि देवेश ! प्रमादाद् भ्रमतोऽपि वा । न्यूनाधिकं कृतं यच्च सर्वं स्विष्ट-कृतं कुरु ।। स्वाहा । अर्थात् हे देवेश ! प्रमाद या भ्रम-वश इस कार्य में जो कुछ कम या अधिक हुआ हो, उस सबको मेरे लिए उत्तम फल-दायक करो (४६) । फा—६

नवां उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५ यावद् यज्ञ-समापनं तावद् भवद्भिः स्थातव्यम् । अर्थात् 'जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप यहाँ स्थित रहें।' इस प्रकार प्रार्थना कर उन्हें नमस्कार करे (३४-३५) । अग्नि के ईशान कोण से आरम्भ कर ब्रह्मा के निकट तक तीन बार स-जल हस्त से पर्युक्षण करे। फिर तीन बार अग्नि को प्रोक्षित कर उसी अर्थात् पहले जिस पथ से आए थे, उसी पथ से लौटकर अपने आसन पर बैठ जाय । तब मण्डल की उत्तर-दिशा में कुछ कुशों को उत्तराभिमुख करके बिछाये (३६-३७) । उसी पर स-जल प्रोक्षणी-पात्र, आज्य-स्थाली, समिद् और कुश आदि सभी यज्ञीय वस्तुओं को रखे (३८) । फिर स्रुक्, स्रुवा आदि रखकर 'ह्मां ह्रीं हूं' मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य दृष्टि अर्थात् एकटक दृष्टि से उन सबको देखे और प्रोक्षण द्वारा उन्हें संस्कृत कर साधक भूमि पर दाएँ घुटने के बल बैठकर 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में रखे घृत को 'स्रुक्' से लेकर अपने कल्याण की कामना करते हुए निम्न मन्त्र से तीन आहु- तियाँ दे (३६-४०) - ह्रीं विष्णवे स्वाहा । इसी प्रकार अर्थात् 'स्रुक्' के द्वारा 'स्रुव' में रखा घृत लेकर प्रजापति देव का ध्यान करते हुए वायु- कोण से आरम्भ कर अग्नि-कोण तक होम करे (४१) - ह्रीं प्रजापतये स्वाहा । पुनः घृत लेकर पुरन्दर देव का ध्यान करते हुए नैर्ऋत-कोण से ईशान-कोण तक घृत-धारा प्रदान करे (४२)- ह्रीं पुरन्दराय स्वाहा । हे परमेश्वरि ! फिर अग्नि के उत्तर, दक्षिण और मध्य में क्रमशः अग्नि, सोम और अग्निषोम को तीन आहुतियाँ प्रदान करे- ह्रीं अग्नये नमः । ह्रीं सोमाय नमः । ह्रीं अग्नी-षोमाभ्यां नमः । अब विधेय कर्म में कहे होम को करे (४३-४४) । तीन आहुति देने तक के उक्त कर्म को 'धारा-होम' कहते हैं (४५) । जिस देवता के लिए आहुति दे, उसी देवता के उद्देश्य से देय वस्तु का उल्लेख करे। यथा- ह्रीं विष्णवे स्वाहा, हविरिदं विष्णवे । इस प्रकार प्रकृत कर्म को समाप्त कर 'स्विष्ट-कृत होम' करे (४६) । हे वरानने ! कलि-काल में 'प्राय- श्चित्त होम' नहीं होता, 'स्विष्टकृत' और 'व्याहृति होम' द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है (४७) । पूर्ववत् हवि लेकर अर्थात् स्रुव में रखे घृत को स्रुक् द्वारा ग्रहण कर मन-ही-मन ब्रह्मा का स्मरण कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (४८) - ह्रीं अस्मिन् कर्मणि देवेश ! प्रमादाद् भ्रमतोऽपि वा । न्यूनाधिकं कृतं यच्च सर्वं स्विष्ट-कृतं कुरु ।। स्वाहा । अर्थात् हे देवेश ! प्रमाद या भ्रम-वश इस कार्य में जो कुछ कम या अधिक हुआ हो, उस सबको मेरे लिए उत्तम फल-दायक करो (४६) । फा-६

६६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र फिर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे— ह्रीं त्वमग्ने ! सर्व-लोकानां पावनः स्विष्ट-कृत् प्रभुः । यज्ञ-साक्षो क्षेम-कर्त्ता सर्वान् कामान् प्रपूरय ॥ स्वाहा । अर्थात् हे अग्ने ! तुम सब लोकों को पवित्र करनेवाले, अभीष्ट देनेवाले, प्रभु, यज्ञ के साक्षी और मंगल- कारी हो । तुम मेरी सभी कामनाओं को पूर्ण करो (५०) । इस प्रकार ‘स्विष्ट-कृत होम' को सम्पन्न कर यह प्रार्थना करे— कर्मणोऽस्य परब्रह्मन्नयुक्तं विहितं च यत् । तच्छान्त्यै यज्ञ-सम्पत्त्यै व्याहृत्या हूयते विभो ॥ अर्थात् हे परब्रह्मन् ! इस कर्म में जो कुछ अयुक्त हुआ है, उसको शान्ति के लिए और यज्ञ-सम्पत्ति के लिए मैं व्याहृति द्वारा होम करता हूँ (५१) । यह प्रार्थना कर व्याहृति-होम करे । यथा— ह्रीं भूः स्वाहा । ह्रीं भुवः स्वाहा । ह्रीं स्वः स्वाहा । ह्रीं भूर्भुवः स्वः स्वाहा । इस प्रकार चार आहुतियाँ देकर ज्ञानी यज्ञ-कर्ता यजमान के साथ पूर्णाहुति प्रदान करे (५२-५३) । यदि कर्म करनेवाला स्वयं ही यजमान हो, तो स्वयं आहुति दे । अभिषेक आदि विधानों में इसी प्रकार की विधि कही है (५४) । पूर्णाहुति का मन्त्र यह है— ह्रीं यज्ञ-पते पूर्णो भवतु यज्ञो मे हृष्यन्तु यज्ञ-देवताः । फलानि सम्यग् यच्छन्तु स्वाहा ॥ अर्थात् हे यज्ञ-पते ! मेरा यह यज्ञ पूर्ण हो, यज्ञ के देवता प्रसन्न हों, इस यज्ञ का पूरा फल प्रदान करें (५५) । ज्ञानी व्यक्ति दण्डायमान होकर एकाग्र-चित्त से उक्त मन्त्र द्वारा फल और ताम्बूल-सहित अग्नि में पूर्णा- हुति प्रदान करे (५६) । पूर्णाहुति देकर शान्ति-कर्म करे । पहले प्रोक्षणो-पात्र से कुश द्वारा गृहीत जल द्वारा निम्न दो मन्त्रों को पढ़ते हुए अपने मस्तक का अच्छी तरह मार्जन करे (५७)— १—आपः सुमित्रियाः सन्तु भवन्त्वोषधयो मम । आपो रक्षन्तु मां नित्यमापो नारायणः स्वयम् ॥ २—आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातनः । अर्थात् जल मेरे उत्तम बन्धु स्वरूप हों, मेरे लिए ओषधि-स्वरूप हों, जल मेरी नित्य रक्षा करें, जल स्वयं नारायण है । हे जल ! तुम सुख दो, तुम मुझे ऐहिक विषय दो । उक्त दोनों मन्त्रों से क्रमशः मस्तक को सिक्त कर कुश द्वारा ईशान-कोण में निम्न मन्त्र पढ़ते हुए भूमि पर जल-विन्दु छोड़े (५८-५६)— ये द्विषन्ति च मां नित्यं यांश्च द्विष्मो नरान्वयं । आपो दुर्मित्रियास्तेषां सन्तु भक्षन्तु तानपि ॥ अर्थात् जो नित्य मुझसे द्वेष करते हैं, हम जिन लोगों से द्वेष करते हैं, उनके लिए जल शत्रु-स्वरूप हों और उन्हें भक्षण करें (६०) । तदनन्तर कुशों का त्याग कर हाथ जोड़कर अग्नि से प्रार्थना करे (६१)— बुद्धिं विद्यां बलं मेधां प्रज्ञां श्रद्धां यशः श्रियम् । आरोग्यं तेज आयुष्यं देहि मे हव्य-वाहन ॥ अर्थात् हे हव्य-वाहन ! मुझे बुद्धि अर्थात् शास्त्रादि तत्त्व-ज्ञान, बल अर्थात् शक्ति, मेधा अर्थात् धारणा-

नवां उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६७ शक्ति, प्रज्ञा अर्थात् सारासार-विवेक की निपुणता, श्रद्धा, यश, श्री, आरोग्य, तेज, आयु—यह सब प्रदान करो। (६२-६३) । हे शिवे ! इस प्रकार अग्निदेव की प्रार्थना कर निम्न मन्त्र द्वारा उनका विसर्जन करे — यज्ञ यज्ञ-पतिं गच्छ यज्ञं गच्छ हुताशन । स्वां योनिं गच्छ यज्ञेश ! पूरयास्मन्मनोरथम् ॥ अग्ने ! क्षमस्व स्वाहा । अर्थात् हे यज्ञ ! तुम यज्ञ-पुरुष विष्णु के पास जाओ। हे हुताशन ! तुम यज्ञ में प्रविष्ट हो जाओ। हे यज्ञे- श्वर ! तुम अपने स्थान को जाओ और मेरे मनोरथ को पूरा करो। हे अग्ने ! क्षमा करो (६४)। इस मन्त्र को पढ़ते हुए अग्नि की उत्तर दिशा में दही की आहुति देकर अग्नि को दक्षिण दिशा में खिसका दे (६५)। तब ब्रह्मा को दक्षिणा देकर भक्ति से नमस्कार कर उन्हें विदा करे। फिर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ-कर्ता 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में लगी भस्म से अपने ललाट पर तिलक लगाए (६६-६७)— ह्रीं क्लीं सर्व-शान्ति-करो भव । तब निम्न मन्त्र पढ़ता हुआ मस्तक के ऊपर आयु बढ़ानेवाला पुष्प धारण करे— शान्तिरस्तु शिवं चास्तु वासवाग्नि-प्रसादतः । मरुतां ब्रह्मणश्चैव वसु-रुद्र-प्रजापतेः ॥ अर्थात् इन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, प्रजापति, वसु-गण, रुद्र-गण और मरुद्-गण के प्रसाद से शान्ति हो और मंगल हों (६८) । तब होम और प्रकृत कर्म की यथा-शक्ति दक्षिणा प्रदान करे (६६) । हे देवि ! मैंने तुमसे सभी सत्कर्मों में की जानेवाले यह 'कुशण्डिका' कही। कुल-साधक लोग शुभ कर्म के पूर्व यत्न-पूर्वक इसका अनुष्ठान करें (७०)। हे शिवे ! वंश-परम्परा के अनुसार जिन्हें प्रकृत कर्म में 'चरु' करने का नियम है, उनको कर्म-सिद्धि के लिए 'चरु'-कर्म बताता हूँ (७१) । पहले ताम्र-मयो या मृण्मयी 'चरु'-स्थाली प्रस्तुत करे (७२) । फिर कुशण्डिका में कही विधि से द्रव्य-संस्कार तक के सब कर्म करके अपने सामने 'चरु'-स्थाली को लाए (७३) । इस 'चरु'-स्थालो को अक्षत और अछिद्र देखकर प्रादेश-बराबर एक पवित्र कुश स्थाली के मध्य में रखे (७४) । हे सुर-वन्दिते ! फिर यज्ञ-स्थल में तण्डुल लाकर स्थण्डिल के पास रखे। जिस कर्म में जिस देवता की पूजा करने की रीति हो, उसके नाम में चतुर्थी विभक्ति लगाकर उसका उल्लेख कर 'त्वा जुष्टम्' कहे और क्रमशः 'गृह्णामि' (लेता हूँ), 'निर्वपामि' (स्थाली में रखता हूँ), 'प्रोक्षामि' (जल छिड़कता हूँ) कह कर प्रत्येक देवता के लिए चार-चार मुट्ठी तण्डुल ले, स्थाली पर रखे और उस पर जल छिड़के (७५-७७) । हे सुव्रते ! तब उन पर दूध और चीनी देकर एकाग्र हृदय से सुसंस्कृत अग्नि में पाक-विधि से उस सबको उत्तम रूप से पकाये (७८) । जब समझे कि अन्न पक गया है और कोमल हो गया है, तब उसमें स्रुव से घृत छोड़े (७६) । तब अग्नि की उत्तर दिशा में कुश के ऊपर 'चरु'-पात्र स्थापित कर उसमें पुनः तीन बार घृत देकर कुश द्वारा 'चरु'- स्थाली को आच्छादित करे (८०)। फिर 'चरु'-स्थाली से 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में कुछ 'चरु' लेकर उसमें घी देकर 'जानु'-होम करे (८१) । तदनन्तर 'धारा'-होम करके प्रधान कर्म में यहाँ जो देवता पूज्य हों, उन्हीं देवताओं को मन्त्र द्वारा आहुति प्रदान करे (८२) । इस प्रकार प्रकृत होम को समाप्त कर प्रायश्चित्त-होम करके कर्म समाप्त करे (८३) । दश-विध संस्कार के समय और प्रतिष्ठा के समय इसी प्रकार की विधि कही है। शुभ कर्म के आदि में

६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कर्म-सिद्धि के लिए यह करणीय है (८४) । हे महा-माये ! अब 'गर्भाधान' आदि सब क्रियाएँ बताता हूँ । उनके क्रम के अनुसार पहले 'ऋतु-संस्कार' कहता हूँ, सुनो (८५) । नित्य-कर्म समाप्त कर शुद्ध-शरीर होकर ब्रह्मा, दुर्गा, गणेश, ग्रह-गण और दिक्-पति-गण —इन पञ्च-देवताओं की पूजा करे (८६) । स्थण्डिल की पूर्व दिशा में घट के ऊपर इन सब देवताओं की पूजा कर क्रमशः गौरी आदि सोलह मातृकाओं की पूजा करे (८७ । मातृ-गण ये हैं—१ गौरी, २ पद्मा, ३ शची, ४ मेधा, ५ सावित्री, ६ विजया, ७ जया, ८ देवसेना, ६ स्वधा, १० स्वाहा, ११ शान्ति, १२ पुष्टि, १३ धृति, १४ क्षमा, १५ आत्म-देवता, १६ कुल-देवता (८८) । निम्न मन्त्र पढ़कर इन सबका आवाहन करे— आयान्तु मातरः सर्वास्त्रिदशानन्द-कारिकाः । विवाह-व्रत-यज्ञानां सर्वाभीष्टं प्रकल्प्यताम् ॥ यान-शक्ति-समारूढाः सौम्य-मूर्ति-धराः सदा । आयान्तु मातरः सर्वा यज्ञोत्सव-समृद्धये ॥ अर्थात् हे देव-गण को आनन्द-दायिनी सभी माताओं ! आप सब आयें । विवाह-व्रत और यज्ञों के सभी अभीष्ट फल को प्रदान करें । हे सभी माताओं ! अपने-अपने यान और शक्ति पर आरूढ़ होकर, सदा सौम्य मूर्ति धारण कर, यज्ञोत्सव की समृद्धि के लिए आप सब आएँ (८६-६०) । इस प्रकार मातृका-गण का आवाहन कर और यथा-शक्ति उनकी पूजा कर नाभि तक ऊँची—देहली से प्रादेश तक स्थान मे सिन्दूर और चन्दन द्वारा सात या पाँच बिन्दु प्रदान करे (६१) । ज्ञानी व्यक्ति काम, माया रमा अर्थात् 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इन तीन बीजों का स्मरण करते हुए प्रत्येक बिन्दु को लक्ष्य कर अविच्छिन्न घृत-धारा प्रदान करे और उनमें गन्ध-पुष्पादि से 'वसु' नामक देवता की पूजा करे (६२) । धीर व्यक्ति मेरे द्वारा कही पद्धति से इस प्रकार 'वसु-धारा' की रचना कर, स्थण्डिल-विरचना के बाद, अग्नि-स्थापन-पूर्वक होम-द्रव्यों का संस्कार कर श्रेष्ठ 'चरु-पाक' करे (६३) । इस ऋतु-संस्कार के कार्य में 'प्राजापत्य' नामक 'चरु' और 'वायु' नामक अग्नि है । 'धारा-होम' तक का सब कार्य समाप्त कर 'ऋतु-संस्कार' कर्म आरम्भ करे (६४) । निम्न मन्त्र पढ़ते हुए चरु-द्वारा तीन आहुतियाँ प्रदान करे— ह्रीं प्रजापतये स्वाहा । फिर एक आहुति निम्न मन्त्र से दे— विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥ स्वाहा अर्थात् विष्णु उत्पत्ति-स्थान (योनि) की रचना करें । त्वष्टा रूप को परिष्कृत करें । प्रजापति अभिषेक करें । धाता तुम्हारे गर्भ का पोषण करें (६५-६६) । इसके बाद सूर्य, प्रजापति और विष्णु का ध्यान करते हुए घृत द्वारा, चरु द्वारा या सघृत-चरु द्वारा आहुति प्रदान करे (६७) । यथा—देवी सिनीवाली, सरस्वती और दोनों अश्विनी-कुमारों का ध्यान कर निम्न मन्त्र से उत्तम आहुति प्रदान करे— गर्भं धेहि शिनीवाली, गर्भं धेहि सरस्वती । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्कर-स्रजौ ॥ स्वाहा अर्थात् तुम शिनीवाली-स्वरूपा होकर गर्भं धारण करो । तुम सरस्वती-स्वरूपा होकर गर्भ धारण करो । पद्म-पुष्प-माला-धारी दोनों अश्विनीकुमार देव तुममें गर्भ स्थापित करें (६८-६६) । तब काम, वधू, माया, रमा और कूर्च अर्थात् 'क्लीं स्त्रीं ह्रीं श्रीं हूँ' इन बीजों का उच्चारण कर सूर्य और विष्णु का ध्यान कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (१००)— अमुष्यै पुत्र-कामायै गर्भमाधेहि स्वाहा ।

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५ फिर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति दे (१०१)— यथेयं पृथिवी देवी ह्युत्ताना गर्भमादधे । तथा त्वं गर्भमाधेहि दशमे मासि सूतये ।। स्वाहा अर्थात् यह उत्ताना पृथ्वी देवी जिस प्रकार गर्भ धारण करे, उसी प्रकार दसवें मास में प्रसव होने के लिए तुम गर्भ धारण करो। पुनः आज्य (घृत) लेकर परात्पर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति छोड़े (१०२)— विष्णो ! ज्येष्ठेन रूपेण नार्यामस्यां वरीयसम् । सुतमाधेहि स्वाहा ॥ अर्थात् हे विष्णो ! तुम श्रेष्ठ रूप द्वारा इस नारी में श्रेष्ठ सन्तान का आधान करो। इसके बाद काम-बीज-पुटित माया अर्थात् 'क्लीं ह्रीं क्लीं' और माया-पुटित वधू अर्थात् 'ह्रीं स्त्रीं ह्रीं' तथा पुनः काम 'क्लीं', माया-बीज 'ह्रीं' का पाठ कर भार्या के मस्तक को छुये (१०३)। इसके बाद पति-पुत्र- वती स्त्रियों से घिरकर पति अपने दोनों हाथों से पत्नी के मस्तक को छूते हुए विष्णु, दुर्गा, ब्रह्मा और सूर्य का ध्यान कर उसके क्रोडाञ्चल में तीन फल देकर स्विष्टकृत्-होम कर प्रायश्चित्त-होम द्वारा कर्म को समाप्त करे (१०४-१०५)। अथवा सायंकाल में गौरी-शङ्कर की पूजा कर सूर्यार्घ्य देकर दम्पति का शोधन करे (१०६)। यह तुमसे 'ऋतु-शोधन' का कर्म कहा, अब 'गर्भाधान' बताता हूँ, सुनो (१०७)। उसी ऋतु-संस्कार की रात्रि में अथवा किसी अन्य युग्म रात्रि में घर के भीतर जाकर प्रजापति देव का ध्यान कर पत्नी को छूते हुए पति माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर निम्न मन्त्र पढ़े (१०८-१०६)— ह्रीं आवयोः सुप्रजाये त्वं शय्ये शुभकरी भव । अर्थात् हे शय्ये ! हम दोनों की उत्तम सन्तान के लिए तुम शुभ करनेवाली बनो। तब पत्नी के साथ शय्या पर चढ़कर पूर्व-मुख या उत्तर-मुख होकर बैठे और पत्नी को देखते हुए उसके मस्तक पर हाथ रखकर बाएँ हाथ से आलिङ्गन करने के बाद स्थान-स्थान पर मन्त्र का जप करे (११०)— मस्तक पर काम-बीज 'क्लीं' का १०० बार, चिबुक पर वाग्भव 'ऐं' का १०० बार, कण्ठ पर रमा 'श्रीं' का २० बार, दोनों स्तनों पर भी 'श्रीं' बीज का सौ-सौ बार, हृदय पर माया-बीज 'ह्रीं' का १० बार, नाभि पर भी 'ह्रीं' बीज का २५ बार जप कर योनि पर हाथ रखकर काम-बीज-सहित वाग्भव अर्थात् 'क्लीं ऐं' का १०८ बार जप कर लिङ्ग पर भी इसी 'क्लीं ऐं' मन्त्र का जप करे। तब 'ह्रीं' मन्त्र जप कर योनि को विकसित कर सन्तान की कामना से पत्नी-गमन करे (१११-१३)। वीर्य-पात के समय प्रजापति का ध्यान कर पति नाभि के नीचे चित्त-कुण्ड में रक्तिका नाड़ी में बीज का निक्षेप करे (११४)। वीर्य-त्याग के समय निम्न मन्त्र पढ़े— यथाऽग्निना सगर्भा भूद्यौर्यथा वज्र-धारिणा । वायुना दिग् गर्भवती तथा गर्भवती भव ॥ अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी अग्नि द्वारा गर्भवती होती है, अमरावती इन्द्र द्वारा गर्भवती होती है, दिशा जिस प्रकार वायु द्वारा गर्भवती होती है, उसी प्रकार तुम गर्भवती हो (११५-१६)। हेममहेश्वरि ! उसी ऋतु में अथवा अन्य ऋतु में गर्भ रहने पर—गर्भाधान के तीसरे महीने में 'पुंसवन' संस्कार करे (११७)। पति नित्यकर्म समाप्त कर पञ्च-देवताओं की पूजा करे। फिर गौरी आदि सोलह मातृकाओं की पूजा कर वसु-धारा प्रदान करे (११८)। तब वृद्धि श्राद्ध कर पूर्वोक्त विधि से धारा-होम तक कर्म सम्पन्न कर 'पुंसवन'-क्रिया करे (११६)। उसमें 'प्राजापत्य' नामक चरु और 'चन्द्र' नामक अग्नि होते हैं (१२०)। पति गव्य दही में एक यव (जौ) और दो माष (उड़द) छोड़कर पत्नी से तीन बार पूछे—