भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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नवां उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६७ शक्ति, प्रज्ञा अर्थात् सारासार-विवेक की निपुणता, श्रद्धा, यश, श्री, आरोग्य, तेज, आयु—यह सब प्रदान करो। (६२-६३) । हे शिवे ! इस प्रकार अग्निदेव की प्रार्थना कर निम्न मन्त्र द्वारा उनका विसर्जन करे — यज्ञ यज्ञ-पतिं गच्छ यज्ञं गच्छ हुताशन । स्वां योनिं गच्छ यज्ञेश ! पूरयास्मन्मनोरथम् ॥ अग्ने ! क्षमस्व स्वाहा । अर्थात् हे यज्ञ ! तुम यज्ञ-पुरुष विष्णु के पास जाओ। हे हुताशन ! तुम यज्ञ में प्रविष्ट हो जाओ। हे यज्ञे- श्वर ! तुम अपने स्थान को जाओ और मेरे मनोरथ को पूरा करो। हे अग्ने ! क्षमा करो (६४)। इस मन्त्र को पढ़ते हुए अग्नि की उत्तर दिशा में दही की आहुति देकर अग्नि को दक्षिण दिशा में खिसका दे (६५)। तब ब्रह्मा को दक्षिणा देकर भक्ति से नमस्कार कर उन्हें विदा करे। फिर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए यज्ञ-कर्ता 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में लगी भस्म से अपने ललाट पर तिलक लगाए (६६-६७)— ह्रीं क्लीं सर्व-शान्ति-करो भव । तब निम्न मन्त्र पढ़ता हुआ मस्तक के ऊपर आयु बढ़ानेवाला पुष्प धारण करे— शान्तिरस्तु शिवं चास्तु वासवाग्नि-प्रसादतः । मरुतां ब्रह्मणश्चैव वसु-रुद्र-प्रजापतेः ॥ अर्थात् इन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, प्रजापति, वसु-गण, रुद्र-गण और मरुद्-गण के प्रसाद से शान्ति हो और मंगल हों (६८) । तब होम और प्रकृत कर्म की यथा-शक्ति दक्षिणा प्रदान करे (६६) । हे देवि ! मैंने तुमसे सभी सत्कर्मों में की जानेवाले यह 'कुशण्डिका' कही। कुल-साधक लोग शुभ कर्म के पूर्व यत्न-पूर्वक इसका अनुष्ठान करें (७०)। हे शिवे ! वंश-परम्परा के अनुसार जिन्हें प्रकृत कर्म में 'चरु' करने का नियम है, उनको कर्म-सिद्धि के लिए 'चरु'-कर्म बताता हूँ (७१) । पहले ताम्र-मयो या मृण्मयी 'चरु'-स्थाली प्रस्तुत करे (७२) । फिर कुशण्डिका में कही विधि से द्रव्य-संस्कार तक के सब कर्म करके अपने सामने 'चरु'-स्थाली को लाए (७३) । इस 'चरु'-स्थालो को अक्षत और अछिद्र देखकर प्रादेश-बराबर एक पवित्र कुश स्थाली के मध्य में रखे (७४) । हे सुर-वन्दिते ! फिर यज्ञ-स्थल में तण्डुल लाकर स्थण्डिल के पास रखे। जिस कर्म में जिस देवता की पूजा करने की रीति हो, उसके नाम में चतुर्थी विभक्ति लगाकर उसका उल्लेख कर 'त्वा जुष्टम्' कहे और क्रमशः 'गृह्णामि' (लेता हूँ), 'निर्वपामि' (स्थाली में रखता हूँ), 'प्रोक्षामि' (जल छिड़कता हूँ) कह कर प्रत्येक देवता के लिए चार-चार मुट्ठी तण्डुल ले, स्थाली पर रखे और उस पर जल छिड़के (७५-७७) । हे सुव्रते ! तब उन पर दूध और चीनी देकर एकाग्र हृदय से सुसंस्कृत अग्नि में पाक-विधि से उस सबको उत्तम रूप से पकाये (७८) । जब समझे कि अन्न पक गया है और कोमल हो गया है, तब उसमें स्रुव से घृत छोड़े (७६) । तब अग्नि की उत्तर दिशा में कुश के ऊपर 'चरु'-पात्र स्थापित कर उसमें पुनः तीन बार घृत देकर कुश द्वारा 'चरु'- स्थाली को आच्छादित करे (८०)। फिर 'चरु'-स्थाली से 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में कुछ 'चरु' लेकर उसमें घी देकर 'जानु'-होम करे (८१) । तदनन्तर 'धारा'-होम करके प्रधान कर्म में यहाँ जो देवता पूज्य हों, उन्हीं देवताओं को मन्त्र द्वारा आहुति प्रदान करे (८२) । इस प्रकार प्रकृत होम को समाप्त कर प्रायश्चित्त-होम करके कर्म समाप्त करे (८३) । दश-विध संस्कार के समय और प्रतिष्ठा के समय इसी प्रकार की विधि कही है। शुभ कर्म के आदि में