भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र कर्म-सिद्धि के लिए यह करणीय है (८४) । हे महा-माये ! अब 'गर्भाधान' आदि सब क्रियाएँ बताता हूँ । उनके क्रम के अनुसार पहले 'ऋतु-संस्कार' कहता हूँ, सुनो (८५) । नित्य-कर्म समाप्त कर शुद्ध-शरीर होकर ब्रह्मा, दुर्गा, गणेश, ग्रह-गण और दिक्-पति-गण —इन पञ्च-देवताओं की पूजा करे (८६) । स्थण्डिल की पूर्व दिशा में घट के ऊपर इन सब देवताओं की पूजा कर क्रमशः गौरी आदि सोलह मातृकाओं की पूजा करे (८७ । मातृ-गण ये हैं—१ गौरी, २ पद्मा, ३ शची, ४ मेधा, ५ सावित्री, ६ विजया, ७ जया, ८ देवसेना, ६ स्वधा, १० स्वाहा, ११ शान्ति, १२ पुष्टि, १३ धृति, १४ क्षमा, १५ आत्म-देवता, १६ कुल-देवता (८८) । निम्न मन्त्र पढ़कर इन सबका आवाहन करे— आयान्तु मातरः सर्वास्त्रिदशानन्द-कारिकाः । विवाह-व्रत-यज्ञानां सर्वाभीष्टं प्रकल्प्यताम् ॥ यान-शक्ति-समारूढाः सौम्य-मूर्ति-धराः सदा । आयान्तु मातरः सर्वा यज्ञोत्सव-समृद्धये ॥ अर्थात् हे देव-गण को आनन्द-दायिनी सभी माताओं ! आप सब आयें । विवाह-व्रत और यज्ञों के सभी अभीष्ट फल को प्रदान करें । हे सभी माताओं ! अपने-अपने यान और शक्ति पर आरूढ़ होकर, सदा सौम्य मूर्ति धारण कर, यज्ञोत्सव की समृद्धि के लिए आप सब आएँ (८६-६०) । इस प्रकार मातृका-गण का आवाहन कर और यथा-शक्ति उनकी पूजा कर नाभि तक ऊँची—देहली से प्रादेश तक स्थान मे सिन्दूर और चन्दन द्वारा सात या पाँच बिन्दु प्रदान करे (६१) । ज्ञानी व्यक्ति काम, माया रमा अर्थात् 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इन तीन बीजों का स्मरण करते हुए प्रत्येक बिन्दु को लक्ष्य कर अविच्छिन्न घृत-धारा प्रदान करे और उनमें गन्ध-पुष्पादि से 'वसु' नामक देवता की पूजा करे (६२) । धीर व्यक्ति मेरे द्वारा कही पद्धति से इस प्रकार 'वसु-धारा' की रचना कर, स्थण्डिल-विरचना के बाद, अग्नि-स्थापन-पूर्वक होम-द्रव्यों का संस्कार कर श्रेष्ठ 'चरु-पाक' करे (६३) । इस ऋतु-संस्कार के कार्य में 'प्राजापत्य' नामक 'चरु' और 'वायु' नामक अग्नि है । 'धारा-होम' तक का सब कार्य समाप्त कर 'ऋतु-संस्कार' कर्म आरम्भ करे (६४) । निम्न मन्त्र पढ़ते हुए चरु-द्वारा तीन आहुतियाँ प्रदान करे— ह्रीं प्रजापतये स्वाहा । फिर एक आहुति निम्न मन्त्र से दे— विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥ स्वाहा अर्थात् विष्णु उत्पत्ति-स्थान (योनि) की रचना करें । त्वष्टा रूप को परिष्कृत करें । प्रजापति अभिषेक करें । धाता तुम्हारे गर्भ का पोषण करें (६५-६६) । इसके बाद सूर्य, प्रजापति और विष्णु का ध्यान करते हुए घृत द्वारा, चरु द्वारा या सघृत-चरु द्वारा आहुति प्रदान करे (६७) । यथा—देवी सिनीवाली, सरस्वती और दोनों अश्विनी-कुमारों का ध्यान कर निम्न मन्त्र से उत्तम आहुति प्रदान करे— गर्भं धेहि शिनीवाली, गर्भं धेहि सरस्वती । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्कर-स्रजौ ॥ स्वाहा अर्थात् तुम शिनीवाली-स्वरूपा होकर गर्भं धारण करो । तुम सरस्वती-स्वरूपा होकर गर्भ धारण करो । पद्म-पुष्प-माला-धारी दोनों अश्विनीकुमार देव तुममें गर्भ स्थापित करें (६८-६६) । तब काम, वधू, माया, रमा और कूर्च अर्थात् 'क्लीं स्त्रीं ह्रीं श्रीं हूँ' इन बीजों का उच्चारण कर सूर्य और विष्णु का ध्यान कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (१००)— अमुष्यै पुत्र-कामायै गर्भमाधेहि स्वाहा ।

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 78, कुल 139 में से · BharatKosha