भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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६६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र फिर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे— ह्रीं त्वमग्ने ! सर्व-लोकानां पावनः स्विष्ट-कृत् प्रभुः । यज्ञ-साक्षो क्षेम-कर्त्ता सर्वान् कामान् प्रपूरय ॥ स्वाहा । अर्थात् हे अग्ने ! तुम सब लोकों को पवित्र करनेवाले, अभीष्ट देनेवाले, प्रभु, यज्ञ के साक्षी और मंगल- कारी हो । तुम मेरी सभी कामनाओं को पूर्ण करो (५०) । इस प्रकार ‘स्विष्ट-कृत होम' को सम्पन्न कर यह प्रार्थना करे— कर्मणोऽस्य परब्रह्मन्नयुक्तं विहितं च यत् । तच्छान्त्यै यज्ञ-सम्पत्त्यै व्याहृत्या हूयते विभो ॥ अर्थात् हे परब्रह्मन् ! इस कर्म में जो कुछ अयुक्त हुआ है, उसको शान्ति के लिए और यज्ञ-सम्पत्ति के लिए मैं व्याहृति द्वारा होम करता हूँ (५१) । यह प्रार्थना कर व्याहृति-होम करे । यथा— ह्रीं भूः स्वाहा । ह्रीं भुवः स्वाहा । ह्रीं स्वः स्वाहा । ह्रीं भूर्भुवः स्वः स्वाहा । इस प्रकार चार आहुतियाँ देकर ज्ञानी यज्ञ-कर्ता यजमान के साथ पूर्णाहुति प्रदान करे (५२-५३) । यदि कर्म करनेवाला स्वयं ही यजमान हो, तो स्वयं आहुति दे । अभिषेक आदि विधानों में इसी प्रकार की विधि कही है (५४) । पूर्णाहुति का मन्त्र यह है— ह्रीं यज्ञ-पते पूर्णो भवतु यज्ञो मे हृष्यन्तु यज्ञ-देवताः । फलानि सम्यग् यच्छन्तु स्वाहा ॥ अर्थात् हे यज्ञ-पते ! मेरा यह यज्ञ पूर्ण हो, यज्ञ के देवता प्रसन्न हों, इस यज्ञ का पूरा फल प्रदान करें (५५) । ज्ञानी व्यक्ति दण्डायमान होकर एकाग्र-चित्त से उक्त मन्त्र द्वारा फल और ताम्बूल-सहित अग्नि में पूर्णा- हुति प्रदान करे (५६) । पूर्णाहुति देकर शान्ति-कर्म करे । पहले प्रोक्षणो-पात्र से कुश द्वारा गृहीत जल द्वारा निम्न दो मन्त्रों को पढ़ते हुए अपने मस्तक का अच्छी तरह मार्जन करे (५७)— १—आपः सुमित्रियाः सन्तु भवन्त्वोषधयो मम । आपो रक्षन्तु मां नित्यमापो नारायणः स्वयम् ॥ २—आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातनः । अर्थात् जल मेरे उत्तम बन्धु स्वरूप हों, मेरे लिए ओषधि-स्वरूप हों, जल मेरी नित्य रक्षा करें, जल स्वयं नारायण है । हे जल ! तुम सुख दो, तुम मुझे ऐहिक विषय दो । उक्त दोनों मन्त्रों से क्रमशः मस्तक को सिक्त कर कुश द्वारा ईशान-कोण में निम्न मन्त्र पढ़ते हुए भूमि पर जल-विन्दु छोड़े (५८-५६)— ये द्विषन्ति च मां नित्यं यांश्च द्विष्मो नरान्वयं । आपो दुर्मित्रियास्तेषां सन्तु भक्षन्तु तानपि ॥ अर्थात् जो नित्य मुझसे द्वेष करते हैं, हम जिन लोगों से द्वेष करते हैं, उनके लिए जल शत्रु-स्वरूप हों और उन्हें भक्षण करें (६०) । तदनन्तर कुशों का त्याग कर हाथ जोड़कर अग्नि से प्रार्थना करे (६१)— बुद्धिं विद्यां बलं मेधां प्रज्ञां श्रद्धां यशः श्रियम् । आरोग्यं तेज आयुष्यं देहि मे हव्य-वाहन ॥ अर्थात् हे हव्य-वाहन ! मुझे बुद्धि अर्थात् शास्त्रादि तत्त्व-ज्ञान, बल अर्थात् शक्ति, मेधा अर्थात् धारणा-