भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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आठवां उल्लास : वर्णाश्रम-आचार-धर्म का कथन । ६१ क्रियाः, सर्वाणीन्द्रिय-कर्माणि प्राण-कर्माणि यानि च । एतानि मे शुद्धचन्तां । ह्रीं ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा। अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश; गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द; वाक्य, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ; श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा, घ्राण; बुद्धि, इन्द्रियाँ; मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार; देह-जन्य सभी कार्य, इन्द्रिय- कार्य, प्राण-कार्य—ये सब मेरे शुद्ध हों, मैं ज्योति-स्वरूप होऊँ, रज और पाप से रहित होऊँ (२४६-५३) । इस प्रकार २४ तत्त्वों और दैहिक कर्मों को अग्नि में होम कर निष्क्रय होकर अपने शरीर को मरा हुआ समझे (२५४) । अपने शरीर को मृत-वत् और सर्व-कर्म-रहित भावना कर परमब्रह्म को स्मरण करता हुआ गले से यज्ञ-सूत्र को उठाकर वक्षःस्थल पर करते हुए स्कन्ध-देश पर रखे (२५५) । फिर तत्त्वज्ञ व्यक्ति 'ऐं क्लीं हूँ' मन्त्र को पढ़ता हुआ यज्ञ-सूत्र को कन्धे से उतारकर अपने हाथों में धारण करे और व्याहृति-त्रय के अन्त में स्वाहा का उच्चारण करते हुए उक्त यज्ञोपवीत को घृत से संयुक्तकर अग्नि में डाल दे (२५६) । इस प्रकार यज्ञोपवीत का होम कर काम-बीज 'क्लीं' का उच्चारण करता हुआ शिखा को काटकर हाथ में लेकर घृत के बीच में स्थापित करे। फिर निम्न मन्त्र को पढ़कर उक्त शिखा को अग्नि में डाल दे (२५७)— ब्रह्म-पुत्रि शिखे ! त्वं हि बाल-रूपा तपस्विनी । दीयते पावके स्थानं गच्छ देवि ! नमोऽस्तु ते । क्लीं ह्रीं हूं फट् स्वाहा। अर्थात् हे ब्रह्म-पुत्रि ! हे शिखे ! तुम केश-रूपा तपस्विनी हो। हे देवि ! तुम्हें अग्नि में स्थान देता हूँ। तुम जाओ । तुम्हें नमस्कार है (२५८-५६) । पितृ, देव और देवर्षि-गण शिखा के ही आश्रय से रहते हैं और सभी आश्रमों के सारे कर्म शिखा पर ही आधारित हैं (२६०) । अतः देव, ऋषि, पितृ, देव-गण—सबको सन्तर्पित कर देही शिखा तथा यज्ञ-सूत्र का त्याग करने से ब्रह्म-मय हो जाता है (२६१) । यज्ञ-सूत्र और शिखा के ही परित्याग से द्विजों का संन्यास होता है (२६२) । शूद्र और सामान्य जातिवालों का संन्यास-संस्कार केवल शिखा-होम से होता है। शिखा-सूत्र का त्याग करने के बाद गुरुदेव को दण्डवत् प्रणाम करे (२६३) । गुरु शिष्य को उठाकर उसके दाहिने कान में निम्न मन्त्र सुनावे— तत्त्वमसि महा-प्राज्ञ ! हंसः सोऽहं विभावय । निर्ममो निरहङ्कारः स्वभावेन सुखं चर ॥ अर्थात् हे महा-प्राज्ञ ! वह ब्रह्म तुम्हीं हो । तुम 'हंसः' और 'सोहं' की भावना करो । तुम अहङ्कार और ममता-रहित होकर अपने शुद्ध भाव में सुख से विचरण करो (२६४) । इसके बाद ब्रह्म-तत्त्वज्ञ गुरुदेव घट और अग्नि का विसर्जन कर शिष्य को आत्म-स्वरूप मानकर उसे मस्तक से निम्न मन्त्र द्वारा प्रणाम करें (२६५) – नमस्तुभ्यं नमो मह्यं तुभ्यं मह्यं नमो नमः । त्वमेव तत् तत्त्वमेव विश्व-रूप ! नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् तुम्हें नमस्कार है, मुझे नमस्कार है। तुम्हें और मुझे बारम्बार नमस्कार है। हे विश्व-रूप ! तुम्हीं वह हो अर्थात् जीव वही है अर्थात् जीव ही तुम हो, तुमको नमस्कार करता हूँ (२६६) । जितेन्द्रिय और तत्त्व-ज्ञान-सम्पन्न ब्रह्म-मन्त्रोपासक लोग अपने मन्त्र का पाठ कर शिखा-छेदन कर संन्यास ग्रहण करते हैं (२६७) । ब्रह्म-ज्ञान द्वारा विशुद्ध व्यक्तियों को यज्ञ, पूजा और श्राद्धादि से क्या प्रयोजन ? वे स्वेच्छाचार-परायण होते हैं, उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता (२६८) ।