भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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६० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् हे पर-ब्रह्मन् ! गृहस्थाश्रम में मेरी इतनी आयु बीत चुकी है। हे नाथ ! मैं अब संन्यास लेने के लिए आया हूँ, मुझ पर प्रसन्न हों (२२६)। गुरुदेव विचार करके गृह-कर्म से निवृत्त उस व्यक्ति को शास्त्र और विवेक से युक्त देखकर द्वितीय आश्रम का आदेश प्रदान करें (२३०) । तब शिष्य स्नान कर संयतात्मा होकर आह्निक कर्म सम्पन्न कर तीन ऋणों से मुक्त होने के लिए देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण करे (२३१) । ब्रह्मा, विष्णु, अनुचरों सहित रुद्र— ये देव-गण, ब्रह्मर्षि-गण और सभी पितृ-गण संन्यास लेते समय पूज्य हैं। उन सबको बताता हूँ, सुनो (२३२-३३) । हे देवि ! पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह, वृद्ध-प्रमातामह, मातामही, प्रमातामही, वृद्ध-प्रमातामही की पूजा करे (२३४) । संन्यास लेते समय पूर्व दिशा में देव-गण एवं ऋषिगण और पश्चिम दिशा में मातामह-पक्ष की पूजा करे (२३५) । पूर्व-दिशा से आरम्भ कर दो-दो आसन स्थापित करे। इन आसनों पर क्रमशः देवादि का आवाहन कर पूजा आरम्भ करे (२३६) । फिर सबका अर्चन कर अलग-अलग पिण्ड-दान करे। इस प्रकार पिण्ड-दान की विधि के अनुसार यथा-क्रम पिण्ड देकर पितृ-गण एवं देव-गण से हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (२३७)— तृप्यध्वं पितरो देवा देवर्षि-मातृका-गणाः । गुणातीत-पदे यूयममृणी-कुरुताऽचिरात् ॥ अर्थात् हे पितृ-गण ! हे मातृ-गण ! हे देवर्षि-गण ! मैं गुणातीत पद को जा रहा हूँ। आप लोग मुझे शीघ्र ऋण से मुक्त कर दें (२३८) । इस प्रकार देव, ऋषि, पितृ और मातृ-गण को बारम्बार प्रणाम कर और उनसे अपनी ऋण-मुक्ति की प्रार्थना कर ऋण-त्रय से छूटकर साधक आत्म-श्राद्ध करे (२३६)। आत्मा ही सबकी पिता, पितामह और प्रपितामह है। अतः ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा को आत्म-समर्पण करने के लिए अपना श्राद्ध करे (२४०) । हे देवि ! पूर्ववत् परिकल्पित आसन पर उत्तर की ओर मुख करके बैठे और अपने पितृ-गण का आवाहन कर अर्चन कर पिण्ड-दान करे। देव-गण, ऋषि-गण और पितृ-गण के लिए पिण्ड-दान हेतु यथा-क्रम पूर्वाग्र, दक्षिणाग्र, पश्चिमाग्र और अपने पिण्ड-दान हेतु उत्तराभिमुख कुश रखे (२४१- ४२) । मुमुक्षु व्यक्ति गुरु द्वारा प्रदर्शित पद्धति के अनुसार श्राद्ध-कर्म समाप्त कर चित्त-शुद्धि के लिए सौ बार निम्न मन्त्र का जप करे (२४३)— ह्रीं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥ इस मन्त्र का अर्थ कृपया पृष्ठ ३२ पर देखें (२४४) । इसके बाद गुरुदेव पूजा-पद्धति के अनुसार वेदी पर मण्डल प्रस्तुत कर उस पर कलश-स्थापन-पूर्वक पूजा प्रारम्भ करें (२४५) । फिर ब्रह्मज्ञ व्यक्ति परम ब्रह्म का ध्यान कर शैव पद्धति के अनुसार पूजा कर वह्नि-स्थापन करे (२४६) । तब गुरुदेव पूर्वोक्त संस्कृत वह्नि में स्व-कल्पोक्त आहुतियां देकर शिष्य को बुलाकर साकल्य-होम करावें (२४७) । पहले महा-व्याहृति-होम कर प्राण-होम अर्थात् प्राणादि पञ्च-वायु का होम करे। प्राण, अपान समान, उदान, व्यान—ये ही पञ्च प्राण-वायु हैं (२४८) । तब देह में आत्मा का अध्यास अर्थात् देह को आत्मा समझने का जो भ्रम है, उसे हटाने के लिए तत्त्व-होम करे। यथा— पृथिवी सलिलं वह्निर्वायुराकाशं, गन्धो रसश्च रूपञ्च स्पर्शः शब्दो, वाक्-पाणि-पादाश्च पायूपस्थौ श्रोत्रं त्वङ्-नयनं जिह्वा घ्राणं बुद्धीन्द्रियाणि च; मनो बुद्धिश्च चित्तं चाहङ्कारो देहजाः