महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां उल्लास : स्तोत्र, कवच और कुल-तत्व के लक्षणों का कथन | ४७ दाह में, पुरानी व्याधि में, महा-रोग का आक्रमण होने पर, बाल-ग्रहादि के योग में, दुःस्वप्न देखने पर, दुस्तर समुद्र में अथवा तूफान से आई विपत्ति से ग्रस्त जहाज में, विपत्ति में जो व्यक्ति परात्परा, परमा माया, आद्या काली का ध्यान कर दृढ़ भक्ति के साथ इस शतनाम स्तोत्र का पाठ करेगा, वह सचमुच ही सभी विपत्तियों से मुक्ति पाएगा। हे देवि, इसमें संदेह नहीं। उसे किसी भी स्थान में पाप का भय, रोग का भय नहीं होगा। उसकी सर्वत्र जय होगी, कहीं भी उसकी पराजय नहीं होगी और उसके दर्शन मात्र से विपत्तियाँ दूर हो जायेंगी। वह व्यक्ति सब शास्त्रों का वक्ता होगा, वह सभी सम्पत्तियों का भोग करेगा। वह जाति और धर्म का कर्त्ता होगा और जातियों का स्वामी होगा। सरस्वती उसके मुख में और लक्ष्मी स्थिर होकर उसके घर में वास करेंगी। सभी मनुष्य उसके नाम को सुनकर ही सादर उसे प्रणाम करेंगे। अणिमादि सिद्धियाँ उसके दर्शन-मात्र से ही तृण-वत् प्रतीत होंगी अर्थात् ऐसे पुरुष के दर्शन मात्र से अणिमादि अष्ट सिद्धियां या उनसे भी अधिक कोई भी विषय सुलभ होगा। यह 'आद्या काली स्वरूप' नामक शतनाम स्तोत्र कहा गया। इस स्तोत्र का पुरश्चरण १०८ बार पाठ करने से होता है। पुरश्चरण करने से यह स्तोत्र सभी अभीष्ट फलों को देता है। जो व्यक्ति इस आद्या-काली-स्वरूपिणी शतनाम-स्तुति का पाठ करता है, या इसका पाठ कराता है; इसे सुनता है या सुनवाता है, वह सब पापों से छूटकर ब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त करता है। श्री सदाशिव ने कहा कि हे देवि ! तुमसे परंब्रह्म-स्वरूप प्रकृति का महत् स्तोत्र मैंने कहा। (१२-५४) अब आद्या श्री कालिका के 'कवच' को सुनो। इस 'त्रैलोक्य-विजय कवच' के ऋषि शिव, छन्द अनु- ष्टुप्, देवता आद्या काली, बीज माया (ह्रीँ), शक्ति रमाँ-बीज (श्रीँ), कीलक 'क्रीँ' और विनियोग काम्य-सिद्धि के लिए है (५५-५७)— आद्यायाः श्रीकालिकायाः कवचं श्रृणु साम्प्रतम् । विनियोग-त्रैलोक्य-विजयस्य कवचस्य शिवः ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आद्या काली देवता, ह्रीं बीजं, श्रीं शक्ति, क्रीं कीलकं, काम्य-सिद्धौ विनियोगः । ह्रीमाद्या मे शिरः पातु श्रीं काली वदनं मम । हृदयं क्रीं परा-शक्तिः पायात् कण्ठं परात्परा ॥१ नेत्रे पातु जगद्धात्री कर्णौ रक्षतु शङ्करो । घ्राणं पातु महा-माया रसनां सर्व-मङ्गला ॥२ दन्तान् रक्षतु कौमारी कपोलौ कमलालया । ओष्ठाधरी क्षमा रक्षेत् चिबुकं चारु-हासिनी ॥३ ग्रीवां पायात् कुलेशानी ककुत् पातु कृपा-मयी । द्वौ बाहूबाहुदा रक्षेत् करौ कैवल्य-दायिनी ॥४ स्कन्धौ कर्पादिनी पातु पृष्ठं त्रैलोक्य-तारिणी । पार्श्वे पायादपर्णा मे कटिं मे कमठासना ॥५ नाभौ पातु विशालाक्षी प्रजा-स्थानं प्रभावती । ऊरू रक्षतु कल्याणी पादौ मे पातु पार्वती ॥६ जयदुर्गाऽवतु प्राणान् सर्वाङ्गं सर्व-सिद्धिदा । रक्षा-हीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन च ॥७ तत् सर्वं मे सदा रक्षेदाद्या काली सनातनी । इति ते कथितं दिव्यं त्रैलोक्य-विजयाभिधम् ॥८ कवचं कालिका-देव्या आद्यायाः परमाद्भुतम् ॥ फल-श्रुति पूजा-काले पठेद् यस्तु आद्याधिकृत-मानसः । सर्वान् कामानवाप्नोति तस्याद्या सुप्रसीदति ॥६