भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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४६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं, भाव यह है कि जो यथार्थ कुल-साधक हैं, उन्हें सिद्धि देती हैं। ६० कारणानन्द-जापेष्टा अर्थात् कुल-साधक जपादि द्वारा जिनकी अर्चना करते हैं, ६१ कारणार्चन-हर्षिता अर्थात् कारण द्वारा पूजा करने से जो प्रसन्न होती हैं, ६२ कारणार्णव-संमग्ना अर्थात् त्रिलोकाधार कारण-समुद्र के अन्दर जो विद्यमान हैं, ६३ कारण-व्रत-पालिनी। ६४ कस्तूरी-सौरभामोदा अर्थात् कस्तूरी की सुगन्ध से जो प्रसन्न होती हैं, ६५ कस्तूरी-तिलकोज्ज्वला अर्थात् कस्तूरी का तिलक लगाने से जिनको कान्ति विलक्षण है, ६६ कस्तूरी-पूजन-रता अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजन करने से जो बहुत सन्तुष्ट होती हैं, ६७ कस्तूरी-पूजक-प्रिया अर्थात् कस्तूरी द्वारा पूजा करनेवाला उन्हें प्रिय है। ६८ कस्तूरी-दाह-जननी, ६६ कस्तूरी-मृग-तोषिणी, ७० कस्तूरी-भोजन-प्रीता, ७१ कर्पूरामोद-मोदिता अर्थात् कपूर की सुगन्ध से आनन्दित होती हैं, ७२ कर्पूर-मालाभरणा अर्थात् कपूर से सुगन्धित माला धारण करती हैं, ७३ कपूर-चन्दनोक्षिता अर्थात् जो कपूर-मिश्रित चन्दन लगाए हैं। ७४ कर्पूर-कारणाल्हादा अर्थात् कपूर-मिश्रित सुरा से जिन्हें आनन्द मिलता है। ७५ कर्पूरामृत-पायिनी अर्थात् जो कपूर से सुवासित सुरा का पान करती हैं। ७६ कर्पूर-सागर-स्नाता अर्थात् जो कपूर से सुवासित जल-राशि से स्नान करती हैं, ७७ कर्पूर-सागरालया अर्थात् जो कपूर के सागर मे रहती हैं। ७८ कूर्च-बीज-जप-प्रीता अर्थात् जो 'हूँ' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं। ७६ कूर्च-जप-परायणा, ८० कुलीना, ८१ कौलिकाराध्या अर्थात् कौलिकों द्वारा उपास्या हैं, ८२ कौलिक-प्रिय- कारिणी अर्थात् जो कौलिकों के प्रिय कार्यों को सिद्ध करती हैं। ८३ कुलाचारा, ८४ कौतुकिनी, ८५ कुल-मार्ग- प्रदर्शिनी। ८६ काशीश्वरी, ८७ कष्ट-हर्त्री, ८८ काशीश-वर-दायिनी अर्थात् शिव को वर देनेवाली। ८६ काशी- श्वर-कृतामोदा अर्थात् महादेव जिन्हें आनन्दित करते हैं, ६० काशीश्वर-मनोरमा अर्थात् शिव के मन को मोहित करनेवाली। ६१ कल-मञ्जीर-चरणा अर्थात् जिनके दोनों पैरों में मधुर शब्द करनेवाले नूपुर विराजमान हैं, ६२ क्वणत्-काञ्ची-विभूषणा अर्थात् शब्दायमान करधनी पहने हैं। ६३ कांचनाद्रि-कृतागारा अर्थात् सुमेरु-पर्वत- वासिनी, ६४ कांचनाचल-कौमुदी अर्थात् सुमेरु पर्वत की ज्योत्स्ना के स्वरूपवाली। ६५ काम-बीज-जपानन्दा अर्थात् जो 'क्लीं' - बीज के जप से प्रसन्न होती हैं, ६६ काम-बीज-स्वरूपिणी। ६७ कुमतिघ्नी अर्थात् दुर्बुद्धि- नाशिनी, ६८ कुलीनात्ति-नाशिनी अर्थात् कुलाचारी लोगों के दुःख दूर करती हैं, ६६ कुल-कामिनी। १०० 'क्रीं ह्रीं श्रीं' मन्त्र-वर्णों के प्रभाव से काल-कण्टक-घातिनी अर्थात् यम के भय को नष्ट करनेवाली। हे देवि ! ककार-राशि से घटित काली-रूप के समान आद्या-कालिका देवी का यह शतनाम-स्तोत्र कहा गया है। जो व्यक्ति कालिका को मन अर्पित कर पूजा-काल में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शीघ्र ही मन्त्र- सिद्धि मिलती है और काली उस पर प्रसन्न होती हैं। गुरु के उपदेश मात्र से उसे बुद्धि और विद्या का लाभ होता है अर्थात् उसे परिश्रम नहीं करना पड़ता। वह धनवान, यशस्वी, दाता और दयालु होता है। और वह साधक पृथिवी पर पुत्र-पौत्र-सुख-ऐश्वर्य से आनन्दित रहता है। मंगलवार अमावास्या के निशा-काल में मद्य आदि पञ्च-तत्त्वों के सहित त्रिभुवनेश्वरी आद्या काली की पूजा कर शतनाम-स्तोत्र का पाठ करने से साक्षात् काली-स्वरूप होता है। त्रिभुवन में उसे कुछ भी असाध्य नहीं रहता। विद्या में साक्षात् बृहस्पति, धन में कुबेर, गम्भीरता में समुद्र और बल में पवन के समान होता है। सूर्य के समान दुर्दर्शनीय और चन्द्रमा के समान सौम्य-दर्शन होता है। इस प्रकार मूर्तिमान कामदेव के समान होकर स्त्रियों के हृदय में वह शोभा पाता है। इस स्तव के फल-स्वरूप सर्वत्र विजय पाता है। जो-जो कामना करके इस स्तव का पाठ करेगा, श्री आद्या कालिका की कृपा से वह-वह अभीष्ट फल प्राप्त होगा। युद्ध में, राज-सभा में, द्यूत-क्रीड़ा में, विवाद (मुकदमा) में, प्राण-सङ्कट के समय में, ग्राम में आग लगने पर, दस्यु-पूर्ण स्थान में, सिंह-व्याघ्रादि हिंसक जन्तुओं से भरे स्थान में, दुर्ग में, ग्रह का भय होने पर, राज-भय होने पर,ज्वर-