महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र 'रं वह्नेरासनाय नमः' इस मन्त्र से वह्नि के आसन को पूजा करे (१३०)। फिर साधक ऋतु-स्नाता, नील-नलिनी-लोचना, वागीश्वर-युता वागीश्वरी देवी का ध्यान कर उक्त वह्न्यासन में माया-बीज 'ह्रीं' से उन वागीश्वर और वागीश्वरी की पूजा करे। तब विधि-पूर्वक अग्नि को लाकर मूल-मन्त्र से उसका वीक्षण और 'फट्' से आवाहन करे (१३१-१३२)। 'ॐ वह्नेर्योग-पीठाय नमः' से वह्नि-पीठ की पूजा कर पीठ पर पूर्वादि चार दिशाओं में वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका की क्रमशः पूजा करे (१३३)। तब 'अमुक्या देवतायाः स्थण्डिलाय नमः' से स्थण्डिल की पूजा कर उसके मध्य में मूल-रूपिणी वागीश्वरी देवी का ध्यान कर वह्नि-बीज 'रं' का उच्चारण कर अग्नि को उठाकर 'मूलं हूं फट् क्रव्यादेभ्यो स्वाहा' से राक्षस-गण को देय अंश दक्षिण दिशा में डाल दे। तदनन्तर अस्त्र-बीज 'फट्' से अग्नि का वीक्षण कर, कूर्च-बीज 'हूं' से अवगुण्ठन (तर्जनी घुमाकर वह्नि- वेष्ठन) करे (१३४-१३६)। धेनु-मुद्रा से अमृतीकरण कर दोनों हाथों से अग्नि को उठाकर प्रदक्षिण-क्रम से स्थण्डिल के ऊपर उसे तीन बार घुमाकर अग्नि को शम्भु-वीर्य समझते हुए, घुटनों से भूमि को स्पर्श करते हुए, निजाभिमुख कर योनि-यन्त्र के ऊपर स्थापित करे (१३७-१३८)। इसके बाद साधक 'ह्रीं वह्नि-मूर्तये नमः' से और 'रं वह्नि-चैतन्याय नमः से वह्नि-मूर्ति और वह्नि- चैतन्य की पूजा करे। 'नमः' मन्त्र से वह्नि-मूर्ति और वह्नि-चैतन्य की भावना मन ही मन करते हुए निम्न मन्त्र से अग्नि को प्रज्वलित करे (१३६-४०)— ॐ चित्पिङ्गल हन हन, दह दह, पच पच, सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा । इसी मन्त्र से अग्नि जलाने का निर्देश है। फिर हाथ जोड़कर अग्नि की वन्दना करे (१४१-४२)— अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् । सुवर्ण-वर्णममलं समिद्धं सर्वतोमुखम् ॥ अर्थात् प्रज्वलित, सुवर्ण-तुल्य, निर्मल, प्रदीप्त और सर्वतोमुख, जातवेद, हुताशन की मैं वन्दना करता हूँ (१४३)। इस प्रकार अग्नि की वन्दना कर कुश से स्थण्डिल को आच्छादित करे। फिर अपने इष्ट-देवता का नाम लेकर वह्नि-नाम का उच्चारण कर अभ्यर्थना करे (१४४)। यथा— ॐ वैश्वानर ! जातवेद ! इहावहावह लोहिताक्ष ! सर्व-कर्माणि साधय स्वाहा । तब हिरण्यादि सात जिह्वाओं का पूजन करे (१४५)। फिर बुद्धिमान साधक 'सहस्रार्चिषे हृदयाय नमः' से हृदयादि वह्नि-षडङ्ग की पूजा कर वह्नि-मूर्ति की पूजा करे (१४६-४७)। जातवेद आदि वह्नि की अष्ट-मूर्तियाँ पहले ही बताई हैं (१४८)। फिर ब्राह्मी आदि अष्ट-शक्तियों की पूजा कर पद्मादि अष्ट-निधियों की पूजा कर इन्द्रादि दिक्-पतियों की पूजा करे (१४६)। इसी प्रकार दिक्-पतियों के वज्रादि अस्त्रों की पूजा कर प्रादेश- बराबर दो कुश-पत्र लेकर घृत के मध्य में स्थापित करे (१५०)। घृत के बाईं ओर इडा, दाईं ओर पिंगला ओर मध्य में सुषुम्ना नाड़ी का ध्यान कर एकाग्र-चित्त से दाईं ओर से घी लेकर निम्न मन्त्रों से अग्नि के दाएँ नेत्र में आहुति प्रदान करे (१५१)- ॐ अग्नये स्वाहा । फिर बाईं ओर से घी लेकर अग्नि के बाएं नेत्र में आहुति दे (१५२-१५३)-ॐ सोमाय स्वाहा । तब मध्य भाग से घी लेकर अग्नि के ललाट में आहुति दे-ॐ अग्नी-षोमाभ्यां स्वाहा । इसके बाद 'नमः' से दाएँ भाग से पुनः घी लेकर अग्नि के मुख में होम करे-