भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि | ३६ पशु (बलि के लिए प्रशस्त) कहे गये हैं (१०५) । साधक की इच्छानुसार अन्यान्य पशुओं की भी बलि दी जा सकती है (१०६) । मन्त्रज्ञ साधक रोगादि-शून्य सुलक्षण पशु को देवी के सम्मुख स्थित कर अर्घ्य जल से उसका प्रोक्षण और धेनु-मुद्रा से अमृतीकरण कर 'छागाय पशवे नमः' मन्त्र से यथा-सम्भव गन्ध, सिन्दूर, पुष्प, नैवेद्य और जल से उसकी पूजा कर पशु के दाएँ कान में पशु-पाश-विमोचनी पशु-गायत्री का जप करे (१०७-१०८) । यथा— पशु-पाशाय विद्महे, विश्व-कर्मणे धीमहि, तन्नो जीवः प्रचोदयात् । तब श्रेष्ठ साधक खड्ग को लेकर कूर्च-बीज 'हूँ' से क्रमशः खड्ग के अग्र, मध्य और मूल प्रदेश में वागी- श्वरी-ब्रह्मा, लक्ष्मी-नारायण और उमा-महेश्वर की पूजा करे (१०६-११२) । फिर निम्न मन्त्र से खड्ग की पूजा करे (११३)— ब्रह्म-विष्णु-शिव-शक्ति-युताय खड्गाय नमः । तदनन्तर महा-वाक्य द्वारा पशु का उत्सर्ग कर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे (११४)— यथोक्तेन विधानेन तुभ्यमस्तु समर्पितम् । इस प्रकार विधि-पूर्वक निवेदन कर पशु को भूमि पर स्थित करे (११५) देवी-भक्ति-परायण होकर तीक्ष्ण प्रहार से पशु का छेदन करे । पशु-छेदन स्वयं, भ्राता, भ्रातु-पुत्र, सुहृद् या सपिण्ड इन सबके द्वारा कर्तव्य है । शत्रु-पक्ष को इस कार्य में कभी न लगाए (११६) । फिर 'एष कवोष्ण-रुधिर-बलिः ॐ बटुकेभ्यो नमः' इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए कुछ उष्ण (तुरन्त निकले हुए) रुधिर की बलि प्रदान करे और 'एष स-प्रदीप शीर्ष-बलिः ॐ ह्रीं देव्यै नमः' से देवी को शीर्ष-बलि प्रदान करे (११७) । कौलिकों के कुलार्चन में इसी प्रकार बलि-विधि कही गई है । इसे किए बिना देवता की प्रीति कदापि नहीं मिलती (११८) । हे प्रिये ! इसके बाद होम करे । उसकी विधि बताता हूँ, सुनो (११९) । श्रेष्ठ साधक अपनी दाईं ओर बालुका-राशि से चार हाथ लम्बा-चौड़ा चतुष्कोण-मण्डल बनाकर मूल-मन्त्र से वीक्षण, अस्त्र (फट्) से ताड़न, उसी से प्रोक्षण और कूर्च-बीज 'हूँ' से अवगुण्ठन कर देवता-नाम का उच्चारण करते हुए 'स्थण्डिलाय नमः' से स्थण्डिल की पूजा करे (१२०-१२१) । फिर स्थण्डिल में प्रादेश-बराबर तीन पूर्वाग्र और तीन उत्तराग्र रेखाएँ बनाए और उन पर निम्न देवताओं की पूजा करे (१२२) । पूर्वाग्र तीन रेखाओं में मुकुन्द, ईश, पुरन्दर और उत्तराग्र तीन रेखाओं में ब्रह्मा, वैवस्वत और इन्दु की क्रमशः पूजा करे (१२३) । फिर साधक स्थण्डिल के मध्य में त्रिकोण-मण्डल बनाए, जिसके मध्य में 'ह्रौं:' लिखे । त्रिकोण-मण्डल के बाहर षट्कोण, उसके बाहर वृत्त और उसके बाहर अष्ट-दल पद्म तथा उसके बाहर भूपुर लिखे । इस प्रकार उत्तम यन्त्र की रचना करे (१२४) । फिर मूल-मन्त्र से पुष्पाञ्जलि देकर यन्त्र की पूजा कर प्रणव से होम-द्रव्य का प्रोक्षण करे । अष्ट-दल पद्म की कर्णिका में माया-बीज 'ह्रीं' से आधार-शक्तियों की एक बार में पूजा करे या अलग-अलग उनकी पूजा करे (१२५) । यन्त्र के अग्नि आदि चार कोणों में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य की और पूर्वाद चार दिशाओं में अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य की क्रमशः पूजा कर साधक मध्य में अनन्त, पद्म, कला-सहित सूर्य और सोम-मण्डलों की पूजा कर प्रागादि केशरों में क्रमशः अग्नि की जिह्वाओं की पूजा करे—पीता, श्वेता, अरुणा, कृष्णा, धूम्रा, तीव्रा, स्फुलिङ्गिनी, रुचिरा, ज्वलिनी (१२६-१२८) । सर्वत्र देवताओं के नाम के आदि में प्रणव और अन्त में 'नमः' लगाकर पूजा करे ।