महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तब पान-पात्र एवं शुद्धि (मांसादि) दोनों हाथों में ले मूल मन्त्र का उच्चारण करते हुए यन्त्र के मध्य में निवेदित कर, निम्न मन्त्र से प्रार्थना करे (८७)। यथा- परमं वारुणी-कल्पं कोटि-कल्पान्त-कारिणि ! गृहाण शुद्धि-सहितं देहि मे मोक्षमव्ययम् । अर्थात् हे कोटि-कल्पान्त करनेवाली ! इस श्रेष्ठ वारुणो-कल्प को शुद्धि के साथ ग्रहण करो और मुझे अक्षय मुक्ति प्रदान करो (८८)। इसके बाद सामान्य विधि से अपने सामने मण्डल लिखकर उस पर नैवेद्य-पूर्ण पात्र को स्थापित करे (८६) फिर 'फट्' से नैवेद्य का प्रोक्षण, 'हुं' से अवगुण्ठन, 'फट्' से रक्षाकरण, 'वं' से अमृतीकरण कर मूलमन्त्र से सात बार उसे अभिमन्त्रित कर अर्घ्य-जल द्वारा उसे निवेदित करे (६०) । यथा- मूलं एतत्तु सिद्धान्नं सर्वोपकरणान्वितम् । निवेदयामीष्ट-देव्यै जुषाणेदं हविः शिवे ! अर्थात् सभी सामग्रियों से युक्त पके हुए अन्न को इष्ट-देवता के लिए निवेदन करता हूँ । हे शिवे ! इस 'हवि' (भोज्य-पदार्थ) को ग्रहण करो (६१) । इसके बाद प्राणादि पञ्च-मुद्राएँ दिखाकर देवी को हवि (भोज्य पदार्थ) को खिलावे (६२)। फिर बाएँ हाथ से प्रस्फुटित पद्माकृति वाली नैवेद्य-मुद्रा दिखाये । तब मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए पीने के लिए तीर्थ (सुरा) से पूर्ण कलश एवं पुनराचमनीय निवेदन कर श्रोपात्र के अमृत से तीन बार तर्पण करे (६३-६४) । साधक मूल-मन्त्र से देवी के शिर, हृदय, मूलाधार, दोनों चरणों और सर्वाङ्ग में पांच पुष्पाञ्जलियाँ अर्पित कर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे। यथा- तव आवरण-देवान् पूजयामि नमः । अर्थात् तुम्हारे आवरण देवताओं की पूजा करता हूँ (६५-६६) । यन्त्र के अग्नि, नैऋत्य, वायु, ईशान कोणों में, सामने और पीछे के भाग में क्रमशः षडङ्ग-पूजा कर गुरु-पंक्ति की अर्चना करे (६७)। गुरु, परम-गुरु, परापर-गुरु और परमेष्ठि-गुरु-इन सब कुल-गुरुओं की पूजा करे (६८) । गुरु-पात्र के अमृत से तीन-तीन बार इनका तर्पण करे। तर्पण मन्त्र - ॐ गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परमं-गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परापर-गुरुं तर्पयामि नमः, ॐ परमेष्ठि-गुरुं तर्पयामि नमः । इसके बाद अष्ट-दलों के मध्य में अष्ट-नायिकाओं की पूजा करे (६६) । १. मङ्गला, २. विजया, ३. भद्रा, ४. जयन्ती, ५. अपराजिता, ६. नन्दिनी, ७. नारसिंही और ८. कौमारी-ये ही अष्ट-मातायें हैं (१००)। पूजन-मन्त्र - 'ॐ मङ्गलायै नमः' इत्यादि । साधक-श्रेष्ठ दलों के अग्र-भाग में १. असिताङ्ग, २. रुरु, ३. चण्ड, ४. क्रोधोन्मत्त, ५. भयङ्कर, ६. कपाली, ७. भीषण और ८. संहार-इन अष्ट-भैरवों की पूजा करे (१०१-१०२) । भूपुर के मध्य में इन्द्रादि दश दिक्पालों की पूजा करे और उसके बहिर्भाग में दिक्पालों के अस्त्रों की पूजा करे। फिर दिक्पालों का तर्पण करे (१०३) । इसी प्रकार एकाग्र-चित्त से पाद्यादि सभी उपचारों से देवी की पूजा कर बलि प्रदान करे (१०४) । १. मृग, २. छाग, ३. मेष, ४. महिष, ५. शूकर, ६. शल्लकी, ७. शशक, ८. गोधा, ६. कूर्म, १०. गण्डार ये दस