महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंछठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि । ३५ अखण्डैक-रसानन्दाकरे पर-सुधात्मनि ! स्वच्छन्द-स्फुरणामुत्र निधेहि कुल-रूपिणि ॥१॥ हे कुल-रूपिणि ! तुम इस परम सुधा-मयी वस्तु से अखण्ड एकमात्र सान्द्र रस और सान्द्रानन्द-प्रदायिनी हो । तुम स्वाधीन स्फूर्ति प्रदान करो (३८) । अनङ्गस्थामृताकारे शुद्ध-ज्ञान-कलेवरे ! अमृतत्त्वं निधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्न-रूपिणि ॥२॥ तुम अनङ्गस्थ अमृत-स्वरूपा हो, विशुद्ध ज्ञान ही तुम्हारा शरीर है । तुम क्लिन्न-रूप इस वस्तु में अमृतत्व स्थापित करो (३६) । तद्-रूपेणैकरस्यं च कृत्वाध्यं तत्-स्वरूपिणि ! भूत्वा कुलामृताकारं मयि विस्फुरणं कुरु ॥३॥ हे सुरा-स्वरूपिणि ! तुम प्रधान माधुर्य-रस-रूप में इस पूजार्घ्य-रूप मद्य को ऐकरस्य अर्थात् प्रधान माधुर्य-विशिष्ट कर कुलामृत-स्वरूप होकर हमारी स्फूर्ति का साधन करो (४०) । ब्रह्माण्ड-रस-सम्भूत मशेष-रस-सम्भवम् । आपूरितं महा-पात्रं पीयूष-रसमावह ॥४॥ सुधा से पूर्ण यह महा-पात्र ब्रह्माण्ड-रस से युक्त, अशेष रस का आकर है, इसे पीयूष-रस-मय करो (४१) । अहन्ता-पात्र-भरितमिदन्ता-परमामृतम् । पराहन्ता-मये वह्नौ होम-स्वीकार-लक्षणम् ॥५॥ आत्म-भाव-रूप पात्र में धारित इदं-भाव-रूप परम अमृत को परात्म-रूप वह्नि में अहन्तादि पात्र को इदन्तादि के सहित स्वीकार करने के लक्षण वाली होमाहुति प्रदान करा (४२) । इस प्रकार सुरा को अभिमन्त्रित कर शिव और शिवानी की समरसता का ध्यान-पूजन कर धूप-दीप दिखाये (४३) । कुल-पूजा-विषय में यह 'श्रीपात्र-संस्कार' तुमसे कहा गया । मन्त्रज्ञ व्यक्ति यदि इस प्रकार संस्कार नहीं करता, तो वह पाप-भागी होता है और उसकी पूजा निष्फल होती है (४४) । ज्ञानी व्यक्ति घट और श्रीपात्र के मध्य स्थान में गुरु-पात्र, भोग-पात्र, शक्ति-पात्र, योगिनी-पात्र, वीर-पात्र, बलि-पात्र, आचमन-पात्र और पाद्य-पात्र-श्रीपात्र को मिलाकर ये नौ पात्र स्थापित करे । सामान्यार्घ्य-स्थापन की विधि के अनुसार पात्र-स्थापन करना चाहिए (४५-४६) । फिर इन सभी पात्रों का तीन भाग कलशस्थ सुधा से भरकर इन सब पात्रों में माष-बराबर शुद्धि-खण्ड छोड़े (४७) । तब बाएँ हाथ के अंगुष्ठ और अनामिका से पात्र-स्थित अमृत शुद्धि-खण्ड के सहित लेकर तत्त्व-मुद्रित दाएँ हाथ से सभी पात्रों से तर्पण करे । इस तर्पण की विधि बाद में कहूँगा (४८) । श्रीपात्र से शुद्धि-सहित परम विन्दु अर्थात् सुधा-बिन्दु लेकर आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी का तर्पण करे (४६) । फिर गुरु-पात्रस्थ अमृत से गुरु-समूह का तर्पण करे । ब्रह्म-रन्ध्र में स्थित सहस्र-दल-कमल में पत्नी के साथ अपने गुरु का तर्पण कर वाग्भव बीज 'ऐं' को आदि में जोड़कर गुरु-चतुष्टय अर्थात् १ गुरु, २ परम गुरु, ३ परापर गुरु और ४ परमेष्ठी गुरु के नामों को उच्चारण करते हुए तर्पण करे (५०) । मन्त्रज्ञ व्यक्ति, इसके बाद, अपने हृदय-कमल में भोग-पात्रस्थ अमृत से पहले 'आत्म-बीज'-'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा' फिर 'आद्यां कालीं तर्पयामि' और अन्त में 'स्वाहा'-इस मन्त्र से तीन बार इष्ट-देवता का तर्पण करे । इसी प्रकार शक्ति-पात्र के अमृत से अङ्ग-देवताओं और आवरण-देवताओं का तर्पण करे (५१-५२) ।