भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 45

३६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र योगिनी-पात्रस्थ अमृत से अस्त्र एवं परिकर के सहित वर्तमान आद्या कालिका का तर्पण कर बटुकादि को पंच-बलियां प्रदान करे (५३) । १- सुधी व्यक्ति अपने बाईं ओर एक सामान्य चतुष्कोण-मण्डल बनाए । फिर उसकी पूजा कर उस पर मद्य-युक्त सामिष अन्न स्थापित करे (५४) । वाक्—'ऐं', माया—'ह्रीं', कमला—'श्रीं' और 'वं' के बाद 'बटुकाय नमः'—इस मन्त्र से मण्डल के पूर्व-भाग में बटुक को बलि दे (५५) । २—तदनन्तर 'यां योगिनीभ्यः स्वाहा' इस मन्त्र से मण्डल के दक्षिण में योगिनियों को बलि दे (५६) । ३—फिर छः दीर्घ-स्वर-युक्त सम्वर्त्त (क्ष) अर्थात् 'क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षः' के बाद 'क्षेत्र-पालाय नमः' इस मन्त्र से मण्डल के पश्चिम में क्षेत्रपाल को बलि दे (५७) । ४—छः दीर्घ स्वर-युक्त 'ख' वर्ण के अन्त के बीज (ग) अर्थात् 'गां गीं गूं गैं गौं गः' का उद्धार कर चतुर्थी के एक-वचनान्त 'गणपति' शब्द—'गणपतये' का उच्चारण कर वह्निजाया—'स्वाहा' कह कर इस मन्त्र से मण्डल की उत्तर दिशा में गणेश को बलि दे । ५—इसी प्रकार मण्डल के मध्य भाग में यथा-विधि सर्व-भूत को बलि दे (५८) । 'ह्रौं श्रीं सर्व' इस पद का उच्चारण कर 'विघ्न-कृद्भ्यः' पद का उच्चारण करे । फिर 'सर्व-भूतेभ्यः' यह पद कहकर 'हूँ फट् स्वाहा' इस प्रकार उच्चारण करे ! यही सर्व-भूत का बलि-मन्त्र कहा गया है (५६-६०) । इसके बाद निम्न मन्त्र पढ़कर यथा-विधि शिवा को एक बलि प्रदान करे— गृह्ण देवि ! महा-भागे ! शिवे ! कालाग्नि-रूपिणि ! शुभाशुभं फलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव 'मूलं' (ह्रीं श्रीं इत्यादि) एष बलिः शिवायै नमः । अर्थात् हे देवि ! हे महा-भागे ! हे शिवे ! हे कालाग्नि-रूपिणि ! ग्रहण करो ! मेरे शुभ-अशुभ को स्पष्ट रूप से बताओ । अपनी बलि ग्रहण करो । यह बलि शिवा को देता हूँ । हे शिवे ! यह मैंने चक्रानुष्ठान तुमसे बताया है (६१-६२) । तदनन्तर चन्दन, अगरु, कस्तूरी द्वारा अति सुगन्धित पुष्प को कच्छप-मुद्रा-युक्त दोनों हाथों में लेकर अपने हृदय-पद्म में परात्परा काली को लाकर ध्यान करे (६३-६४) । फिर सुषुम्ना-रूप ब्रह्म-पथ से भगवती को सहस्रार के महा-पद्म में ले जाकर निर्मल सुधा से उसे आनन्दित कर गहरे निःश्वास-रूप पथ के द्वारा जैसे एक दीप से दूसरा दीप प्रज्वलित होता है, उसी प्रकार भगवती को अपने हाथों में स्थित उक्त पुष्प में संक्रमित करते हुए उसे यन्त्र में स्थापित कर मन्त्रज्ञ व्यक्ति गहरी भक्ति के साथ हाथ जोड़कर इष्ट-देवता से प्रार्थना करे (६५-६६)— देवेशि ! भक्ति-सुलभे ! परिवार-समन्विते ! यावत् त्वां पूजयिष्यामि तावत् त्वं सुस्थिरा भव ॥ अर्थात् हे देवेशि ! हे भक्ति-सुलभे ! हे बहु-परिवार-वृते ! मैं जब तक तुम्हारी पूजा करूँ, तब तक तुम सुस्थिर होकर रहो (६७) । 'क्रीं आद्ये कालिके देवि ! परिवारादिभिः सह इहागच्छ इहागच्छ ।' यह कहकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करे— इह तिष्ठ इह तिष्ठ, इह सन्निधेहि, इह सन्निरुद्धस्व, मम पूजां गृहाण ।