भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

३४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र गुण-शीला अपनी पत्नी से श्रीपात्र का स्थापन करे और उस पत्नी को कारण या सामान्यार्घ्य के जल से अभिषिक्त करे (१७)। अभिषेक का मन्त्र यह है— पहले ‘बाला’ (‘ऐं क्लीं सौः’) कहे, फिर ‘त्रिपुरायै’ का उच्चारण कर ‘नमः’ अन्त में कहे। तब ‘इमां- शक्तिं’ कह कर ‘पवित्री कुरु’—इस शब्द के बाद ‘नमः शक्तिं कुरु स्वाहा’ कहे (१८-१९)। यदि नारी अदीक्षिता हो, तो उसके कान में माया-बीज ‘ह्रीं’ का उच्चारण करे। मैथुन-तत्त्व के सम्पादन के लिए अन्य जो परकीया शक्ति हों, उन सबका पूजन करे (२०)। फिर अपने और यन्त्र के मध्य में एक त्रिकोण- मण्डल लिखकर उसके मध्य में माया-बीज ‘ह्रीं’ लिखे। इस त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक षट्कोण-मण्डल लिख कर उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे (२१)। (चित्र सं० ४) तदनन्तर उत्तम साधक चतुष्कोण-मण्डल के चार कोणों में १. पूं पूर्ण-शैलाय पीठाय नमः, २. उं उड्डीयानाय पीठाय नमः, ३. जां जालन्धराय पीठाय नमः, ४. कां काम-रूपाय पीठाय नमः' से क्रमशः पूर्ण- शैल, उड्डीयान, जालन्धर और कामरूप पीठों का पूजन करे (२२)। फिर षट्कोण के छः कोणों में ‘ह्वां नमः, ह्रीं नमः, ह्रू नमः, ह्रैं नमः, ह्रौं नमः, ह्रः नमः’ इन छः मन्त्रों से षट्-कोण की अधिष्ठात्री देवताओं को पूजा करे। तब त्रिकोण-मण्डल में ‘ह्रीं आधार-शक्तये नमः' से आधार-देवता की पूजा करे (२३)। इसके बाद ‘नमः' से प्रक्षालित आधार को पूर्ववत् उस स्थान पर स्थापित कर उसमें आदि अक्षर के उच्चारण-सहित वह्नि की दश कलाओं की पूजा करे (२४)। दश कलाओं के नाम हैं—१. धूम्रा, २. अर्चिः, ३. ज्वालिनी, ४. सूक्ष्मा, ५. ज्वालिनी, ६. विस्फुलिङ्गिनी, ७. सुश्री, ८. सुरूपा, ६. हव्यवाहा, १०. कव्यवाहा (२५)। इन सब नामों में चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्त में ‘नमः' जोड़कर वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे (२६)। तब ‘मं वह्नि- मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' से वह्नि-मण्डल की पूजा करे (२७)। फिर ‘फट्’ कार से विशोधित अर्घ्य-पात्र लाकर आधार पर स्थापित कर ‘क भ' से 'ठ ङ' तक के वर्ण-बीजों को पहले उच्चारण कर सूर्य की द्वादश कलाओं का पूजन करे (२८)। द्वादश कलाओं के नाम हैं—१. तपनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७ सुषूम्ना, ८. भोगदा, ६. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी, १२. क्षमा (२६)। तब अर्घ्य-पात्र में ‘अं सूर्य-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः’ इस मन्त्र से सूर्य-मण्डल की पूजा करे (३०)। फिर मन्त्रज्ञ व्यक्ति क्षकार से अकार तक विलोम-मातृका वर्ण और उनके अन्त में मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए कलशस्थ सुरा से अर्घ्य-पात्र के तीन भाग को पूर्ण करे (३१)। इसके बाद एकाग्र-चित्त से विशेषार्घ्य के जल से अर्घ्य-पात्र के शेष भाग को पूर्णकर सोलह स्वर-बीजों के अन्त में चतुर्थ्यन्त नाम का उच्चारण कर अन्त में ‘नमः’ शब्द का प्रयोग कर चन्द्रमा की षोडश कलाओं की पूजा करे (३२)। षोडश कलाओं के नाम हैं—१. अमृता, २. मानदा, ३. पूज्ञा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति, ८. शशिनो, ६. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री, १३. प्रीति, १४. अङ्गदा, १५. पूर्णा और १६. पूर्णामृता। ये सोलह कलायें काम-दायिनी अर्थात् अभीष्ट कामना को पूर्ण करनेवाली हैं (३३)। फिर उक्त अर्घ्य-पात्र के जल में ‘उं सोम-मण्डलाय षोडश- कलात्मने नमः' से सोम-मण्डल की पूजा करे (३४)। तब दूर्वा, अक्षत, रक्त-पुष्प, बबंरा-पत्र, अपराजिता-पुष्प— ये सब लेकर ‘ह्रीं’ मन्त्र से पात्र में छोड़कर उसमें तीर्थों का आवाहन करे (३५)। फिर ‘हूँ’ बीज से अवगुण्ठन- द्वारा अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा का अवगुण्ठन कर अस्त्र-मुद्रा द्वारा उसकी रक्षा करे। तब धेनु-मुद्रा से उसे अमृतीकृत कर उसे मत्स्य-मुद्रा से आच्छादित करे (३६)। फिर उस अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा के ऊपर दस बार मूल-मन्त्र का जप कर उसमें इष्ट-देवता का आवाहन कर पुष्पाञ्जलि देकर निम्न पाँच मन्त्रों से सुधा को अभिमन्त्रित करे (३७)—

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 43, कुल 139 में से · BharatKosha