भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि श्री देवी ने जिज्ञासा की—हे नाथ ! आपने पूजादि कर्म के समय मुझे ‘पञ्च-तत्त्व’ बताए हैं। इस समय यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो उन्हें विशेष रूप से बताइए (१)। श्री सदाशिव ने कहा—उत्तम सुरा तीन प्रकार की है : १. गौड़ो, २. पेष्टी और ३. माध्वी। यह सुरा ताल और खर्जूर से बनने से विविध रूप की कही गई है। देश-भेद से और विभिन्न द्रव्य-भेद से सुरा अनेक प्रकार को है। यह सभी सुरा देवी की अर्चना के लिए प्रशस्त हैं (२)। यह सुरा जिस किसी रूप से समुत्पन्न हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा लाई गई हो, शोधित होने पर सब सिद्धियाँ प्रदान करती है। सुरा के सम्बन्ध में जाति का विचार नहीं है (३)। मांस तीन प्रकार का है—१. जलचर, २. भूचर और ३. खेचर। यह मांस जिस किसी स्थान से आया हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया हो, वह सभी देवता को प्रसन्न करता है, इसमें सन्देह नहीं (४)। देवता को देय वस्तु के सम्बन्ध में साधक की इच्छा ही बलवती है। जो वस्तु अपने को प्रिय है, वही इष्ट-देवता को प्रदान करे (५)। हे देवि ! बलि-दान में पुरुष पशु ही विहित है। महादेव के शासन के कारण स्त्री-पशु का हनन न करे (६)। शाल, बोयाल और रोहू—यही तीन प्रकार की मत्स्य उत्तम हैं (७)। अन्य कण्टक-हीन मत्स्य मध्यम और बहुत कण्टकवाली मत्स्य अधम हैं। बहुत कण्टकवाली मत्स्य को भी अच्छी तरह भूनकर देवी को दे सकते हैं (८)। मुद्रा भी उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार की है। जो चन्द्र-बिम्ब के समान शुभ्र है, जो शालि- तण्डुल से प्रस्तुत की गई है अथवा जो यव या गेहूँ द्वारा बनी है और जो घी में पकी तथा मनोहर है, वही मुद्रा उत्तम है। जो भ्रष्ट धान्य से बनी है, वह मध्यम मुद्रा है। जो अन्य प्रकार की वनस्पति--शाक द्वारा प्रस्तुत है, वह अधम मुद्रा कही गई है (६-१०)। देवी को सुधा देते समय जो मांस, मत्स्य, मुद्रा, फल-मूल आदि दिया जाता है, उस सबको ‘शुद्धि’ कहते हैं (११)। शुद्धि के बिना देवी को सुरा देकर पूजा या तर्पण करने से सारा कर्म निष्फल होता है और देवता प्रसन्न नहीं होती (१२)। शुद्धि के बिना मद्य-पान करने से वह केवल विष-पान होता है और ऐसा व्यक्ति चिर- रोगी तथा स्वल्पायु होकर शीघ्र ही मर जाता है (१३)। हे महेशानि ! कलि के प्रबल होने पर शेष-तत्त्व का शोधन एकमात्र सर्व-दोष-विवर्जिता स्वकीया पत्नी से ही सम्पन्न होगा (१४)। हे प्राण-वल्लभे ! मैंने जो स्वयम्भू-कुसुमादि की बात कही है, उनके प्रतिनिधि के स्थान पर ‘रक्त-चन्दन’ को बताया है (१५)। उक्त पञ्च-तत्त्व एवं फल-मूल, पत्र बिना शोधन किए देवी को न दे, अन्यथा करनेवाला नरक-गामी होगा (१६)। [ ३३ ] फा०-५