महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रकार के पथ का अवलम्बन करना होगा या साधन करना होगा, उसका मन्त्र क्या है, अथवा ध्यान-पूजा आदि क्या है (६) ? हे देव-देव ! आप यह सब विशेष रूप से और सम्पूर्ण रूप में आद्योपान्त बताइए । इससे मेरो प्रसन्नता होगी और लोगों का हित होगा । हे शम्भो ! आपको छोड़कर कौन व्यक्ति संसार-रूपी व्याधि का निवा- रण करने में समर्थ होगा ? आप ही सद्-वैद्य और उपदेष्टा हैं (७) । पार्वती-पति देव-देव महा-देव ने पार्वती के ये वचन सुनकर प्रीति-पूर्वक कहा (८) । श्री सदाशिव ने कहा कि—हे महा-भागे ! हे देवि ! मनुष्य लोग तुम्हारी साधना द्वारा ब्रह्म-सायुज्य पा सकें, इसके लिए मैं तुम्हारी आराधना का विषय कहता हूँ, सुनो (६) । तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो। यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है। हे शिवे ! तुम सारे जगत् की जननी हो (१०) । हे भद्रे ! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल सूक्ष्म सारा स्थावर- जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है । यह सारा जगत् तुम्हारे ही अधीन है (११) । तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो । सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो । तुम्हें कोई नहीं जान सकता (१२) । तुम काली हो, तुम तारिणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम षोडशी हो, तुम भुवनेश्वरी हो, तुम धूमावती हो, तुम बगला हो, तुम भैरवी हो, तुम छिन्न-मस्ता हो (१३) । तुम अन्नपूर्णा हो, तुम वाग्-देवी हो, तुम कमलालया लक्ष्मी हो, तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो, तुम सर्व-देव-मयी हो (१४) । तुम सूक्ष्मा हो, तुम स्थूला हो, तुम व्यक्त-स्वरूपा हो, तुम अव्यक्त-स्वरूपा हो, तुम निराकारा होकर भी साकारा हो । तुम्हें कोई भी नहीं जान सकता (१५) । तुम उपासकों के कार्य के लिए, जगत् के कल्याण के लिए और दानवादि के संहार के लिए समय-समय पर विविध प्रकार की देह धारण करती हो (१६) । तुम विश्व-रक्षा के लिए कभी चतुर्भुजा, कभी द्विभुजा, कभी षड्-भुजा, कभी अष्ट-भुजा होकर विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो (१७) । सभी तन्त्रों में उन्हीं विविध रूप-भेदों के विविध प्रकार के मन्त्र और विविध प्रकार के यन्त्रादि और विविध साधन बताए गए हैं। पशु, दिव्य और वीर—ये तीन प्रकार के भाव कहे गए हैं (१८) । कलियुग में पशु-भाव नहीं है, दिव्य भाव भी दुर्लभ है । कलियुग में वीर-साधन ही प्रत्यक्ष फल-दायक है (१६) । हे देवि ! कलियुग में कुलाचार के बिना सिद्धि नहीं हो सकती । अतएव सब प्रयत्न करके कुल-साधन करे (२०) । हे देवि ! कुलाचार द्वारा ब्रह्म- ज्ञान का जन्म होता है । जिस मनुष्य को ब्रह्म-ज्ञान होता है, वही जीवन्मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं (२१) । शास्त्रों के ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ पवित्र ज्ञात होती हैं और उसी ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ अपवित्र प्रतीत होती हैं किन्तु जब ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है, तब कोई वस्तु पवित्र या अपवित्र नहीं रहती (२२) । जो यह जानता है कि परब्रह्म सर्व-व्यापी है, उसके लिए कौन वस्तु अपवित्र है ? कारण वह सारे जगत् को 'ब्रह्म' नाम से ही जानता है (२३) । हे देवेशि ! तुम सर्व-स्वरूपिणी हो और संसार-चक्र द्वारा क्रीड़ा करनेवाली हो तथा सबकी परम जननी हो । तुम्हारे परितुष्ट होने पर सभी का परितोष होता है (२४) । सृष्टि के आदि में तुम्हीं 'तमो' अर्थात् प्रकृति-रूप से विद्यमान रहती हो । तुम्हारा वही रूप वाणी और मन से अगोचर है । परब्रह्म को सिसृक्षा- सृष्टि करने की इच्छा से तुम्हारे द्वारा सारा जगत् उत्पन्न होता है (२५) । महत् तत्त्व से महा-भूत पृथिवी तक सारा जगत् तुम्हीं से सृष्ट होता है । सब कारणों का कारण हो, वह ब्रह्म निमित्त मात्र है (२६) । वह सत्-स्वरूप और सर्व-व्यापी है। सारे जगत् को वेष्टन कर अवस्थित रहता है, सभी वस्तुओं में वह सदा एक-रूप, परिणाम- रहित, चिन्मात्र और निर्लिप्त है (२७) । वह कोई कार्य नहीं करता, वह भक्षण करता नहीं, गमन करता नहीं ।