भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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निरंजन पूरे-पूरे काम करवा रहा है। जो भी काम कर रहे हैं, आपका कोई काम नहीं है। जो घर बनाया, यह निरंजन का काम है, आत्मा का नहीं। फकीरचंद के पास बैल हैं। वो बैल से जो भी काम करवाता होगा, वो अपने वाला ही करवाता होगा। उस काम से बैल को कोई मतलब नहीं होगा। बैल का कोई काम नहीं है। इस तरह—

जीव पड़ा बहु लूट में, नहीं कछु लेन न देन ॥

निरंजन जो भी करवा रहा है, आत्मा का उससे कोई वास्ता नहीं है। आत्मा को घर की जरूरत ही नहीं है, पर निरंजन उससे घर बनवा रहा है। शादी करवा रहा है। शादी से आत्मा को क्या लेना! आत्मा तो स्त्री-पुरुष कुछ भी नहीं है। खेतीबाड़ी करवाई जा रही है। खेतीबाड़ी से आत्मा का क्या वास्ता! आत्मा को भूख-प्यास नहीं लगती है। तभी तो साहिब बार-बार समझा रहे हैं—

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई।

हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

तो फकीरचंद ने बैल को नहीं छोड़ा है। उसे रोटी भी खिलाता होगा ताकि जिंदा रहे और उसका (फकीरचंद का) काम करता रहे। उसे जो रोटी खिला रहा होगा, वो भी अपने मतलब के लिए। निरंजन ने भी शादी में, इंद्रियों आदि का मजा इसलिए डाल दिया ताकि जिंदा रहे और उसका काम करता रहे।

<!-- image: Three decorative floral or geometric symbols arranged horizontally. -->

सुर नर मुनि सबको ठगे, मनहिं लिया औतार।
जो कोई या ते बचे, तीन लोक से न्यार ॥