भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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मन के रूप


हम देखते हैं कि एक मिसाइल है, जो आकाश में घूम रही है। उसका नियन्त्रण पृथ्वी पर से हो रहा है। एक छोटे से रिमोट कण्ट्रोल द्वारा उसे किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है। इस शरीर पर भी रिमोट कण्ट्रोल वाला कार्य हो रहा है। मन जो चाहता है, इससे करवाकर छोड़ता है।

कोई भी आदमी अच्छा है या बुरा है, इसको नापने का पैमाना है। जिसका जितना काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियन्त्रण है, वो उतना ही अच्छा होगा। जिसका जितना इंद्रियों पर नियन्त्रण है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने स्वभाव पर अधिकार है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने मन पर काबू है, उतना ही अच्छा होगा। जिसका मन जितना स्थूल होगा, उतना ही बुरा होगा।

मन की दो अवस्थाएँ हैं—स्थूल और सूक्ष्म। इन दोनों को समझना। मन की स्थूल अवस्था है—इंद्रियाँ। जिसकी भी इंद्रियाँ अधिक चलायमान हो रही हैं, समझना मन बहुत बेकाबू है। इंद्रियाँ मन का स्थूल रूप है। कोई बार बार कई चीजें खा रहा है, स्वाद ले रहा है, समझना कि मन चंचल है। मन को नापने के फार्मूले हैं। अपने मन को आप चेक करें। मन के बहाव में मत बहना। अगर ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले चक्षु इंद्रि को साधो। ये आँखें सौंदर्य की तलाश में बार बार घूम रही हैं तो समझना मन भटका रहा है। सुंदर रूप चक्षु की पूजा। हमेशा ये आँखें सौंदर्य चाहती हैं। यही इनका भोजन है। कहीं सुंदर मुखड़ा दिखा, वहीं टिकेंगी। समझना ये है मन का स्थूल खेल। अगर स्थूल रूप में मन