मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंडाला, परन्तु फिर भी यह मन वश में नहीं हुआ, पकड़ में नहीं आया। आखिर यह मन है कौन? आगे आओ! देखो, साहिब क्या कह रहे हैं?
निराकार मन ही को जानो'
आगे कह रहे हैं—
मन हि सरूपी देव निरंजन, तोहिं रहा भरमाई।
हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जा में तोहिं राखा भरमाई॥
पता चल रहा है कि मन निराकार है, निरंजन है। इसी ने निर्मल आत्मा को गन्दे से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किया हुआ है। फिर एक स्थान पर साहिब चेता रहे हैं—
अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना॥
साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, ( ज्योति निरंजन ) जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बंध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है; दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह में डालता है; उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है; पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे चन्द्रमा के भ्रम में बार-बार मुँह में डालता है और अंत में परम दुःख को प्राप्त होता है। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अन्तिम सत्य मान बैठे हैं, संसार के अधिष्ठाता निरंजन की तरफ ही जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुःख को प्राप्त हो रहे हैं; क्योंकि वे आवागमन से छूट नहीं पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।