भारतकोश
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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

डाला, परन्तु फिर भी यह मन वश में नहीं हुआ, पकड़ में नहीं आया। आखिर यह मन है कौन? आगे आओ! देखो, साहिब क्या कह रहे हैं?

निराकार      मन      ही      को      जानो'

आगे कह रहे हैं—

मन हि सरूपी देव निरंजन, तोहिं रहा भरमाई।
हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जा में तोहिं राखा भरमाई॥

पता चल रहा है कि मन निराकार है, निरंजन है। इसी ने निर्मल आत्मा को गन्दे से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किया हुआ है। फिर एक स्थान पर साहिब चेता रहे हैं—

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, ( ज्योति निरंजन ) जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बंध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है; दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह में डालता है; उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है; पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे चन्द्रमा के भ्रम में बार-बार मुँह में डालता है और अंत में परम दुःख को प्राप्त होता है। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अन्तिम सत्य मान बैठे हैं, संसार के अधिष्ठाता निरंजन की तरफ ही जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुःख को प्राप्त हो रहे हैं; क्योंकि वे आवागमन से छूट नहीं पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।

मन के रूप

मन के रूप


हम देखते हैं कि एक मिसाइल है, जो आकाश में घूम रही है। उसका नियन्त्रण पृथ्वी पर से हो रहा है। एक छोटे से रिमोट कण्ट्रोल द्वारा उसे किसी भी दिशा में घुमाया जा सकता है। इस शरीर पर भी रिमोट कण्ट्रोल वाला कार्य हो रहा है। मन जो चाहता है, इससे करवाकर छोड़ता है।

कोई भी आदमी अच्छा है या बुरा है, इसको नापने का पैमाना है। जिसका जितना काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर नियन्त्रण है, वो उतना ही अच्छा होगा। जिसका जितना इंद्रियों पर नियन्त्रण है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने स्वभाव पर अधिकार है, उतना ही ठीक रहेगा। जिसका जितना अपने मन पर काबू है, उतना ही अच्छा होगा। जिसका मन जितना स्थूल होगा, उतना ही बुरा होगा।

मन की दो अवस्थाएँ हैं—स्थूल और सूक्ष्म। इन दोनों को समझना। मन की स्थूल अवस्था है—इंद्रियाँ। जिसकी भी इंद्रियाँ अधिक चलायमान हो रही हैं, समझना मन बहुत बेकाबू है। इंद्रियाँ मन का स्थूल रूप है। कोई बार बार कई चीजें खा रहा है, स्वाद ले रहा है, समझना कि मन चंचल है। मन को नापने के फार्मूले हैं। अपने मन को आप चेक करें। मन के बहाव में मत बहना। अगर ऐसा हो रहा है तो सबसे पहले चक्षु इंद्रि को साधो। ये आँखें सौंदर्य की तलाश में बार बार घूम रही हैं तो समझना मन भटका रहा है। सुंदर रूप चक्षु की पूजा। हमेशा ये आँखें सौंदर्य चाहती हैं। यही इनका भोजन है। कहीं सुंदर मुखड़ा दिखा, वहीं टिकेंगी। समझना ये है मन का स्थूल खेल। अगर स्थूल रूप में मन

नियंत्रण में नहीं है तो सूक्ष्म में कभी भी नहीं हो सकता है। पहले इंद्रियों को चेक कर लेना। इंद्रियों से ही आदमी को जाना जा सकता है कि इसका मन नियंत्रण में है या नहीं है।

अगर कोई यह कहे कि उसका मन अमुक बात सुनकर निर्मल हो गया, अमुक कथा सुनकर उसका मन निर्मल हो गया, कहीं जाकर या तीर्थ में नहा कर मन निर्मल हो गया तो इसमें शंका है। कभी नहीं हो सकता मन ऐसे निर्मल। अगर दो डुबकियाँ लगाने से मन निर्मल हो जाए तो कहना क्या। फिर तीर्थों में रहने वाले ठगी, छल, कपट कैसे कर सकते हैं। इससे सिद्ध हो रहा है कि मन इतनी जल्दी निर्मल होने वाला नहीं है। मन को काबू करना है।

सौ मन साबुन से एक कोयला उजला नहीं हो सकता। लेकिन कोई अगर कहे कि कोयले को धोकर हमने सफेद कर लिया तो हम मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। पर कोई कहे कि मन को निर्मल कर लिया, हम किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं होंगे। मन निर्मल हो ही नहीं सकता है। काबू करना, इस पर सवारी करना, इस पर नियंत्रण करना।

मन पर काबू कैसे? मन नितांत खराब चीज है। मन का स्थूल रूप इंद्रियाँ अगर सक्रिय हो रही हैं, अपने अपने विषयों की तरफ दौड़ रही हैं तो मन मोटा हो जाता है। मन को पोषण इंद्रियों से मिलता है।

मन के चलाए तन चले, ताको सर्वस्व जाए॥

जिसका भी तन मन के चलाए चल रहा है, सर्वस्व नाश हो जाएगा।

जो भी आदमी मन का गुलाम है, वो अच्छा नहीं है। इसलिए इस मन पर नियंत्रण करना। ये कान अपनी बढ़ाई चाहते हैं, इन पर नियंत्रण करना।

ऐसे मन साधारणतया समझ में नहीं आएगा। वातावरण में बहुत से जीवाणु हैं। पानी में अनेक प्रकार के कीड़े हैं। नौ लाख किस्म के जीव

हैं जल में। उनमें एक-दो लाख किस्म के आप देख सकते हैं खुली आँखों से, बाकी दिखाई नहीं देंगे। इसी तरह—मन को कोई देख न पाए। मन का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है। यह बहुत खतरनाक शक्तियों से सम्पन्न है। मन बहुत जल्दी से किसी को समझ में नहीं आता है।

सूक्ष्म रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मन के रूप हैं। प्रत्येक मानव शरीर में मन चार रूपों में स्थित है—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों अपने-अपने तरीके से आत्मा को भ्रमित कर रहे हैं। जैसे पानी के तीन रूप हैं—तरल, ठोस तथा वाष्प; लेकिन तत्व रूप से तीनों एक ही हैं; बर्फ भी पानी ही है और वाष्प भी; इसी तरह मन के चार रूप हैं, पर मूल रूप से एक ही मन है। जब हमारा मन कोई इच्छा करता है तो यह मन कहलाता है। सारी इच्छाएँ मन से हैं। आत्मा कोई इच्छा नहीं करती है। आत्मा को किसी भी पदार्थ की कोई ज़रूरत नहीं है, वो किसी पर आश्रित ही नहीं है, वो अपने आप में परिपूर्ण और आनन्दमयी है, उसे कुछ नहीं चाहिए, फिर इच्छा क्या करेगी!

देखते हैं कि यह मन कैसी इच्छाएँ करता है। विचार करने पर पता चलता है कि मन मूल रूप से हमारे शरीर के उपयुक्त इच्छाएँ ही करता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए आगे आने वाला नहीं है। कभी-कभी हम बच्चों को अच्छी तालीम दिलवाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। कभी अन्य-अन्य इच्छाएँ करते हैं। सोचो! क्या यह सब इच्छाएँ आत्मा कर रही है? नहीं! आत्मा का कोई रिश्ता-नाता नहीं है। जगत के सब रिश्ते मन बनाता है। सदी-गर्मी से बचने के लिए हम घर बनाते हैं। आत्मा को सदी-गर्मी लगती ही नहीं; सदी-गर्मी तो शरीर को लगती है, फिर आत्मा को क्या ज़रूरत पड़ी है, किसी घर की! कभी-कभी हम कहते हैं, हमारी आत्मा जलेबी खाने को कह रही है, हलवा-पूरी खाने को कह रही है। क्या यह ठीक बात है? नहीं। हमारी आत्मा कुछ भी नहीं खाती। इसमें तो मुँह ही नहीं है; खायेगी क्या! यह तो मन और इन्द्री का समझौता था। इन्द्री को मन ने ही उत्तेजित किया।

इन्द्री के स्वार्थ की पूर्ति के लिए मन ने कार्य किया और इन्द्री मन की आज्ञा के पालन में जुट गयी। आत्मदेव को यहाँ पर धोखा दिया गया। उसने अपने को इन्द्री मान लिया और उसके स्वार्थ की पूर्ति में अपनी ताकत का सहयोग दिया। लोग कहते हैं कि दुनिया में सात अजूबे पर मुझे दुनिया में एक ही अजूबा नज़र आ रहा और वो यह कि आत्मा अपने को शरीर मान रही है। क्या कोई टॉवर कौतुक है! क्या कोई ब्रिज कौतुक है! नहीं है कौतुक। कौतुक है तो बस एक ही। इस आत्मा को भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती; इसका कोई मां-बाप, रिश्ता-नाता नहीं। कितना बड़ा कौतुक है! इसी को साहिब अपने शब्दों में कह रहे हैं—

मन फूला-फूला फिरे जगत में, कैसा नाता रे।
माता कहे है पुत्र यह मेरा, बहिन कहे बीरन मेरा रे।
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा रे।
पेट पकड़कर माता रोवे, बाँह पकड़कर भाई रे।
लपटि झपटि तिरिया रोवे, हंस अकेला जाई रे॥

हम सभी सैद्धान्तिक रूप से तो स्वीकार करते हैं कि 'आत्मा अमर है'। हम ठीक से समझते हैं कि हमारी आत्मा इस भवसागर में जब तक पड़ी रहेगी, यह बंधन में रहेगी। तभी तो हम सब भवसागर से छूटने का प्रयास करते हैं, आत्मा की मुक्ति की बात करते हैं। हम सभी सैद्धान्तिक रूप से शरीर को नाशवान् भी मानते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि जो भी शरीरधारी हुए हैं, सब एक-एक करके जा रहे हैं। हमसे पहले जो शरीरधारी हुए, कोई भी नज़र नहीं आता, चाहे वे बड़े-बड़े महापुरुष ही क्यों न थे, उन्हें भी एक बिन्दु पर पहुँचकर इस शरीर को छोड़ना पड़ा था। इसलिए हम सब सैद्धान्तिक रूप से मानते हैं कि शरीर नाशवान् है। लेकिन विडम्बना यह है कि व्यवहार में हम बिल्कुल विपरीत जा रहे हैं। व्यवहार में तो हम 'आत्मा' नाम की कोई चीज़ मान ही नहीं रहे हैं, क्योंकि हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर रहे, और न ही हम शरीर को

व्यवहार में नाशवान् मान रहे हैं, क्योंकि हम शरीर से बहुत प्यार कर रहे हैं, जितने भी कार्य हैं, सब इसी की सुख-सुविधा के लिए कर रहे हैं। दूसरी ओर आत्मा के कल्याण के लिए, आत्मा को बंधन से छुड़ाने के लिए हम कोई भी कार्य नहीं कर रहे हैं।

‘आत्मा अमर है’ जानकर भी हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर पाते हैं और शरीर को भी व्यवहार में नाशवान् नहीं समझते हैं। आखिर क्यों ? संत कहा करते हैं कि वेद-शास्त्रों या अन्य-अन्य धार्मिक पुस्तकों का हम कितना ही अध्ययन क्यों न कर लें; लेकिन जब तक हम यथार्थ में अपनी आत्मा से परिचित न हो जाएँ, उसे देख न लें; हम अपने को शरीर से परे एक आत्मा मानकर व्यवहार नहीं कर सकते। वर्तमान में हम अपने को आत्मा न समझकर एक शरीर ही मान रहे हैं। आत्मा को ज्ञान है कि वो अमर है, इसलिए आत्मा अपनी अमरता की प्रवृत्ति के कारण ही शरीर में बैठकर उसे भी अमर मान रही है, सत्य मान रही है, नित्य मान रही है, जो कि वास्तव में नाशवान् है, अनित्य है, झूठ है।

मन का दूसरा रूप है—बुद्धि। जब भी मन कोई फैसला करता है तो इसी मन को बुद्धि कहा जाता है। वह बैरी है, वो मित्र है, यह काम करना है, वो काम नहीं करना है आदि कार्य बुद्धि करती है। बुद्धि के भी सारे फैसले, सारे निर्णय शरीर के विषय में होते हैं। आत्मा के विषय में तो इसे सोचने का समय ही नहीं। महापुरुषों के सत्संग से प्रभावित होकर ही हम थोड़ी देर आत्मा के विषय में सोच पाते हैं। ऐसा तभी सम्भव हो पाता है, जब महापुरुषों की अलौकिक वाणी हमारी आत्मा को छू जाती है और फिर हम विचारों में खो जाते हैं। विचार आत्मा का गुण है। पर थोड़ी देर बाद पुनः मन की दुनिया में रम जाते हैं।

मन का तीसरा रूप है—चित्त। चित्त का काम है—याद करना। यह चित्त भी आत्मा के कल्याण के लिए कभी आगे नहीं आने वाला, प्रभु को याद नहीं करने वाला। कभी-कभी हम पुरानी बातों को याद करते हैं कि उसने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया था। फिर कभी-कभी

हम बीते हुए दिनों को याद करते हैं। पचास साल, सौ साल पुरानी बातें भी याद आ जाती हैं, पर कभी भी यह चित्त प्रभु की याद नहीं आने देता। यह गम्भीर विषय है। हम कहीं उलझे हुए हैं। हमें इस पर गहराई से विचार करना है।

चौथा रूप है—अहंकार। इसका काम है—क्रिया करना। उदाहरण के लिए मन ने इच्छा की कि आम खाना है। इस पर बुद्धि फैसला करती है। पहले देखती है कि आम खरीदने के लिए पैसे भी हैं या नहीं। यदि पैसे ही नहीं हैं तो बुद्धि मन से कह देती है—ओ मन! पैसे नहीं हैं, आम नहीं खा सकते। मन शांत हो जाता है। मान लो कि आम खरीदने के लिए पैसे हैं। बुद्धि फौरन फैसला करती है—हाँ, आम खायेंगे। अब आम कहाँ मिले। यह बताता है चित्त। हमने चलते-फिरते कहीं आम की दुकान देखी थी। चित्त में यह बात बैठ गयी थी; उसे याद आ गया। अब फिर हम चलकर आम खरीदने के लिए जाते हैं। यही अहंकार कहलाता है।

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“वेद चारों नहीं जानत सत्य पुरुष कहानियां ॥”

क्या कहते वेद ?

  1. ऋग्वेद—परमात्मा निराकार है।
  2. यजुर्वेद—परमात्मा साकार है।
  3. अथर्ववेद—कर्म ही परमात्मा है।
  4. साम वेद—आत्मा ही परमात्मा है।

मन का परिवार

मन का परिवार


आओ, मन के परिवार की तरफ चलते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। इन पाँचों का अपना-अपना परिवार है। इस तरह मन का एक बहुत बड़ा परिवार है। इन सबने मिलकर आत्मा को कसकर पकड़ा हुआ है। इस पर साहिब कह रहे हैं—

बहु बन्धन ने बांधिया, एक विचार जीव।
जीव विचार क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

साहिब कह रहे हैं कि यह जीवात्मा अनेक बंधनों से बँधी हुई है। यह तो तभी छूटकर अपने देश जा सकती है, जब मालिक स्वयं आकर इसे छुड़ा ले जाए।

सबसे पहले काम की तरफ चलते हैं। यह काम, सभी को अपने वश में किया हुआ है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को भी यह काम नचाता आया है। काम का भी परिवार है। काम की स्त्री है—रति। यह रति क्या है? संभोग क्रिया ही रति है। काम की यही पत्नी है। दोनों मिलकर वार करते हैं। ये दुश्मन ऐसे हैं कि दिखाई भी नहीं देते, वार पूरा करते हैं। फिर लालच इसका पुत्र है। जहाँ ये सब नहीं, वहाँ संभोग नहीं। फिर लोलुपता यानी उसी में रहना। तू-ही-तू बस। यह लोलुपता है। यह भी काम की बहू है। किसी से कोई लड़ाई करे तो उसके घर के सारे सदस्य भिड़ जायेंगे, एक हो जायेंगे। इस तरह ये सब भिड़ते हैं।

प्रबल अविद्या का परिवारा॥

गोस्वामी जी रामायण में बोल रहे हैं—

इन सब मिल जीवहि घेरा ॥

ये दिख नहीं रहे हैं। इन्होंने आत्मा को घेरा है। आत्मा यहाँ बँधी है। वो पीड़ित है। ये समझ नहीं आ रहे हैं। बड़े बारीक दुश्मन से पाला पड़ा है।

एक मनोवैज्ञानिक मिला; वो एक ही सवाल में ढेर हो गया। मैंने कहा कि मन क्या है? कहाँ रहता है? जब पूरी बात हुई तो कहने लगा कि महाराज, जो बात आप कर रहे हैं, वो आजतक किसी स्लेबस में नहीं है।

जब यह काम मनुष्य पर सवार होता है तो उसे कुछ भी होश बाकी नहीं रहने देता। कामातुर मनुष्य बड़े-बड़े अनर्थक कार्य कर डालता है। काम ने सभी को अपने अधीन किया है।

एक पौराणिक कथा है कि 'नेमि' नाम का एक ऋषि काम के प्रताप से बचने के लिए जंगल में जाकर छिप गया। वहाँ ज़मीन के भीतर एक खड्ड में बैठ कर तप करने लगा। उसने सोचा कि शरीर में किसी भी तरह विषय-विकार उत्पन्न न हों, इसलिए रोटी खाना भी छोड़ दिया। वो दो-तीन दिन में एक बार ही उस खड्ड से बाहर आता था और वहाँ एक नीम के पेड़ को थोड़ा चाटकर ही अपना काम चलाता था। तभी किसी राजा के यहाँ यज्ञ का आयोजन हुआ। सब पंडितों को बुलाया गया। पंडितों ने राजा से कहा, हे राजन्! यदि नेमि ऋषि (शृंगी ऋषि) इस इतने बड़े यज्ञ का भोग लगा लेगा तो निश्चय ही यह यज्ञ सफल हो जाएगा। अब समस्या यह थी कि उसे बुलाकर लाए कौन! नेमि ऋषि तो किसी के यहाँ आता जाता ही नहीं था। राजा के महल में एक वेश्या रहती थी। उसने ऋषि को बुला लाने का दायित्व अपने ऊपर लिया। इसके लिए उसने कुछ समय माँगा। राजा की आज्ञा पाकर वेश्या वहाँ जंगल में आयी। वहाँ पहुँचकर वह एक स्थान पर छिपकर ऋषि के खड्ड से बाहर आने का इंतजार करने लगी। तीसरे दिन ऋषि ने बाहर आकर वहाँ नीम के पेड़ को दो-तीन बार चाटा और वापिस अपने खड्ड में चला गया। वेश्या

सब कुछ चुपचाप देख रही थी; सहसा उसे कुछ सूझ गया और उसने पेड़ के उस स्थान पर थोड़ी शक्कर लगा दी। अगली बार जब ऋषि बाहर आकर उस पेड़ को चाट रहा था तो वेश्या ने देखा कि ऋषि ने पिछली बार से अधिक बार पेड़ को चाटा है। जब वो चाट कर चला गया तो वेश्या ने तीसरे दिन वहाँ पर शहद लगा दिया और खुद छिपकर देखने लगी। ऋषि ने इस बार पिछली बार से भी ज्यादा चाटा। फिर वेश्या ने उस जगह अनाज लगाना शुरू किया। अब ऋषि रोज खड़ड से बाहर आकर उस पेड़ को चाटने लगा। वेश्या को लगा, अब मामला ठीक है। उसने अब रोटी बनाकर वहाँ रखना शुरू किया। उधर ऋषि ने भी दिन में दो बार बाहर आकर भोजन करना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे ऋषि का शरीर पुष्ट होने लगा; उसमें विषय-विकार उत्पन्न होने लगे। उसे मालूम पड़ गया कि यहाँ पर कोई स्त्री है, जो उसके लिए यह सब कर रही है। बस फिर क्या था! ऋषि की निगाहें चारों ओर उसे खोजने लगीं। वेश्या जान गयी कि उसका काम पूरा हो चुका है। वो खुद उसके सामने आ गयी। ऋषि ने उससे शादी कर ली और कुछ ही समय में वो तीन बच्चों का पिता भी बन गया।

अब ऋषि पूरी तरह से वेश्या के अधीन हो चुका था। वेश्या ने उसे राजा के यहाँ चलने को कहा। कुछ देर हाँ-ना करने के बाद जब ऋषि जाने को राजी हो गया तो वेश्या ने महल में राजा को सूचना भिजवा दी कि नेमि ऋषि आ रहा है। चलते समय वेश्या ने दो बच्चों को ऋषि के दोनों कन्धों पर बिठा दिया, एक को उसकी गोद में दे दिया और स्वयं उसके आगे-आगे बड़े ठाट से चलने लगी।

उधर राज्य में नेमि ऋषि के स्वागत की तैयारियाँ होने लगी। लोग अपने-अपने घरों की छतों पर ऋषि के दर्शन पाने के लिए खड़े हो गये। कुछ समय बाद ऋषि ने राज्य में प्रवेश किया। लोगों ने देखा कि एक जटाधारी दो बच्चों को अपने कन्धों पर बिठाए हुए तथा एक को गोद में उठाए हुए अपनी स्त्री सहित चला आ रहा है। किसी ने बताया

कि नेमि ऋषि आ रहे हैं। लोगों ने हंसी-मजाक करते हुए एक-दूसरे से पूछा-क्या यही नेमि ऋषि हैं? इन्हीं के लिए इतनी तैयारियाँ हो रही हैं! ऋषि ने जब ये शब्द सुने, तब उन्हें होश आया और उसी समय सब कुछ छोड़ पुनः जंगल में चले गए।

प्रथम काम धनुष कर लीन्हें। पाँच बान सो तासंग चीन्हें ॥
मोहन वशीकरण उचाटा। बान लगत घर भूले बाटा ॥
दुष्ट काम उर प्रकटे आयी। ज्ञान विचार बिसरि सब जायी ॥
ऋतु बसंत त्रिय सैन सिंगारा। कहि न काम की सेन अपारा ॥
सोलह शृंगार देखी मन मानी। निरखत अंग अंग की वाणी ॥
ऐसी निरखि काल की सेना। सुर नर मुनि उर धरत न चैना ॥

काम के पाँच बाण हैं—मारण, मरण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन। इन पाँच बाणों से काम ने सबकी मति मार दी है। क्या देवता, क्या मनुष्य, क्या ऋषि-मुनि, सबका चैन काम ने छीन लिया है। इसके बाणों से आहत होकर सभी बेहाल घूम रहे हैं।

यह काम अति प्रचण्ड है, होय उत्पन्न तिय अंग।
सैन चैन अतिही बढ़े, चढ़े काम रति रंग ॥
तन मन अस्थिर न रहे, काम बान उर साल।
एक बाण से सब किये, सुर नर मुनि विहाल ॥

यह काम बड़ा प्रबल है, जो तपस्वियों का तप नहीं रहने देता है। यह काम स्त्री के संग से उत्पन्न होता है। देवता लोगों को भी यह अपने वश में रखता है। शास्त्रों में प्रमाण मिलते हैं—

चलै काम यह सबै पलाने। महारुद्र की करत न काने ॥
महारुद्र पहुँ पहुँचे जानी। मारयो पुहुप बान शर तानी ॥
देखि कामिनी मोहे देवा। पुहुप बान को कुछ लह्यो न भेवा ॥
छांडि ध्यान धाये त्रिपुरारी। समुझे जबहिं परे जुहारी ॥

बड़े-बड़ों की खबर ली है इसने। महारुद्र को भी नहीं छोड़ा। मोहिनी रूप ने मोहित कर लिया। इसे मामूली नहीं समझना।

तब रति देख दीन है गयऊ। विनती करत विषय तन भयऊ॥
जब रति देखि दीन है आई। विनती करी तब लिखि पाई॥
सृष्टि न होय न चलै संसारा। महा रुद्र तुम करहु विचारा॥
जब शिव देख दया मन लावा। ता दुख मेटन मन में आवा॥
तब तिय जानि बहुरि निर्मयऊ। अंगहीन सो अति बलि भयऊ॥

शिव महापुराण में भी कथा आती है। तो—

बहुरि काम चले समुहाई। तेतिस क्रोड किये वशि जाई॥
काम बान शर धरि लीन्हा। जीतन चले सो आपु वशि कीन्हा॥
इंद्रसेन जब गयी सब हारी। इंद्रहु की गई बुद्धि मति मारी॥
जबहिं इंद्र काम वश भयऊ। गौतम नारि छलन तब गयऊ॥
जबते चित में चितये पापू। सहे उग्र गौतम का शापू॥
सहस्त्र भग ताकहैं भयऊ। काम बान कर फल यह ठयऊ॥
काम चंद्र पर चितवे जबहीं। जाइ हरे गुरुपत्नी तबहीं॥

इस काम ने तैर्तीस करोड़ देवताओं को भी अपने वश में किया हुआ है। उनके राजा को ही लेते हैं। राक्षसों से युद्ध में हार जाने पर इंद्र का दिमाग खराब हो गया और वो गौतम की पत्नी अहिल्या के पास पहुँच गया। देखा न, देवताओं के राजा का यह हाल हो गया! फिर आम आदमी की क्या बात करें! आदमी क्या, अन्य देवताओं की बात भी क्या की जाए! देवताओं के राजा का यह हाल हो गया। कोई अच्छा हो तो कहते हैं कि देवता समान है। अब देवताओं के राजा का यह हाल है कि पराई स्त्री के पास पहुँच गया तो क्या कहा जाए! गौतम ऋषि ने शाप दे दिया, कहा कि जाओ, सहस्त्र भग हो जाएँ शरीर में। उसके शरीर में हजार भग द्वार हो गये, मुँह में, टाँगों में..... सब जगह। जब चंद्रमा पर काम की नज़र पड़ गयी तो वो गुरु-पत्नी के पास पहुँच गया। साहिब कह रहे हैं—

ऐसो असुर घट मों बसे, सुनहु हो धर्मदास॥
घट परिचय जाने बिना, सबका भया विनाश॥

तन मन लज्जा ना रहै, काम बाण उर साल ॥

एक काम सब बसि किये, सुर नर मुनि विहाल ॥

इस तरह यह काम बड़ा प्रबल है, जो तपस्वियों का तप नहीं रहने देता। देवता लोगों को भी यह अपने वश में रखता है। आम आदमी की तो बात ही क्या करनी। यह नहीं सोचना कि इस काम ने बड़े-बड़े तपस्वियों को ही नचाया है। याद रहे, मन भी इस काम के वश में है।

मन पाँचों के वश पड़ा, मन के वश नहीं पाँच।

जित देखूँ तित धौ लगी, जित भागूँ तित आँच ॥

इसके बाद आता है—क्रोध। साहिब कहते हैं—‘काम से अधिक क्रोध प्रचण्डा, जा के डर त्रासे नौ खण्डा’। क्रोध का बेटा है—अविचार। यानी विचार नहीं करना है। जब भी क्रोध आता है तो विचार नहीं करने देता है। अन्दर में दैवी गुणों को दबा कर रखता है। इसकी बहू है—भूल। कहते हैं कि भूल गया। यह बहू है। लोभ का परिवार भी है। तृष्णा इसकी स्त्री है। लोभ से इंसान पूरे पाप करता है। झूठ इसकी बहू है। पाप पुत्र है।

अस असुर घट में बसे, कै से रहे कुशल ॥

ये सब भी बहुत बुरे हैं। जब भी मनुष्य में क्रोध उठता है तो उसके मस्तिष्क पर एक पर्दा-सा छा जाता है। फिर उसे अपना पराया कुछ भी नहीं सूझता है और बड़े-बड़े मूर्खों वाले काम हो जाते हैं..... मनुष्य गाली बकता है, मारपीट करता है, आपे से बाहर हो जाता है; पर बाद में पछताना पड़ता है। क्रोध ने समय-समय पर इस संसार का बड़ा विनाश किया है। साहिब कह रहे हैं—

प्रथमें क्रोध ब्रह्मा को भयऊ। षट पुत्रन कहँ शाप जो दयऊ ॥
सनकादिक वैकुंठे गयऊ। रोकत पौरी क्रोध मन भयऊ ॥
जब जब शिव क्रोध करै संसारा। परलय होत न लागे बारा ॥
दुरवासा क्रोध न सहेऊ। उलटी हानी तप में भयेऊ ॥
छप्पन कोटि यादव संधारा। आपुहिं आप क्रोध परजारा ॥

कौरव पाण्डव क्रोधहि जारे । आपहि आप गये सब मारे ॥

ब्रह्मा जी सृष्टि के कर्ता हैं। भाइयो, यह मामूली बात नहीं है, विचार करना होगा। छह पुत्रों को शाप देकर भस्म कर डाला। सनकादिक ऋषि वैकुण्ठ में जा रहे थे तो जय-विजय नामक द्वारपालों ने अन्दर नहीं जाने दिया। ओह, इतना बड़ा ऋषि, मुझे रोका। क्रोध आ गया सनकादिक को और बस, दे डाला शाप, कहा—जाओ, तीन जन्म के लिए राक्षस हो जाओ। शिवजी क्रोध करते हैं तो तीन-लोक में प्रलय कर देते हैं। यह तो सब जानते हैं। दुर्वासा ऋषि क्रोध को न जीत सके और 56 कोटि यादवों को शाप देकर भस्म कर डाला।

देखा न, कितने बड़े बड़ों को वश में कर रखा है इसने! सारा संसार इसकी चपेट में है।

क्रोध अग्नि घट घट बरी, जरत सकल संसार ।

दीन लीन निज भक्ति सो, ताकर निकट उबार ॥

दसो दिशा ते उठी परबल क्रोध की आग ।

संगति शीतल साधु की, शरण उबरिये भाग ॥

संतों की शरण में जाकर ही इससे बचा जा सकता है, अन्यथा पूरा संसार इस क्रोध की आग में जल रहा है।

कहैं कबीर क्रोध परहरै । सोई प्राणी भवसागर तरै ॥

क्षण क्षण क्रोध हृदय में आवै । जप तप ज्ञान रहन नहिं पावै ॥

पंडित गुणी योगी वैरागी । ये सब जरें क्रोध की आगी ॥

पंच अग्नि ग्रीष्म ऋतु धरई । ऐसी विधि त्रिकाल तप करई ॥

पाँचो इंद्री करै निरासा । साथे निद्रा भूख पियासा ॥

जतन जतन बहुत तप करहीं । क्रोध छुड़ाय छन एकमहँ हरहीं ॥

सिद्ध काज विनासै क्रोधा । सब फल जाइ न पावै सोधा ॥

इस क्रोध को जो त्याग देता है, वो भवसागर से पार हो जाता है। जब यह क्रोध हृदय में आ जाता है तो जप, तप, ज्ञान कुछ भी रहने नहीं देता है। चाहे कोई पाँचों इंद्रियों को साथ ले, भूख, नींद आदि को भी वश

में कर ले, पर जब क्रोध आता है तो एक पल में सब कुछ हर लेता है। यह क्रोध बने बनाए काम बिगाड़ देता है और सारे फल का नाश कर देता है।

बहुत जतन तप कीनेऊ, सब फल क्रोध नसाय।

कहैं कबीर धन संचै, चोर मूसि लै जाय॥

तपस्वी बड़े यत्न से तप करते हैं, पर क्रोध आता है तो सारे तप को नष्ट कर देता है। जैसे कोई धन का संचय करता है, पर आखिर चोर चुरा ले जाता है, ऐसे ही क्रोध सारे तप का नाश कर देता है।

फिर इसके बाद—लोभ। 'बुरा लोभ ते और न कोई, सकल अधर्म लोभ ते होई'। लोभ की स्त्री—तृष्णा, बेटा है—पाप। यह लोभ पाप का बाप है; क्योंकि सारे पाप मनुष्य लोभ में फँसकर ही करता है। इस पर तो साहिब कह रहे हैं—

कामी नर बहुते तरे, क्रोधी तरे अनन्त।

लोभी बन्दा न तरे, कहैं कबीर सिधन्त॥

साहिब कह रहे हैं कि कामी मनुष्य भी तर जाएगा, क्रोधी भी तर सकता है, पर लोभी बन्दे के लिए मेरा सिद्धान्त भी रुक गया है; वो भी कह रहा है कि लोभी बन्दा नहीं तर सकता। लोभी बन्दे के लिए साहिब ने बड़ा सुन्दर कहा है—

कबीरा कौड़ी-कौड़ी जोरि कै, जोरे लाख करोरि।

चलती बार न कछु मिल्यो, लई लंगोटी तोरि॥

इस लोभ की कहानी भी बड़ी ही निराली है।

पहिले पैसा में मन लावै। पैसा मिले टका को धावै॥
टका देखि मन में सुख भयऊ। दो टका का उद्यम कियऊ॥
दुई जोरे जोरे फिर चारी। लोभ पाति दीन्हों परचारी॥
चारि जोरि मन उपज्यो रंगू। अब दश कै जोर होय जनि भंगू॥
दश जुरै मन रहे न ठोरा। जोरि बीस मन आगे दौरा॥
बीस जोरि मन बाढ़ी आशा। अब जो कैसेहु के जुरे पचासा॥

जोर पसाच गाँठ सो दीन्हा । तब सहस्त्र को उद्यम कीन्हा ॥
जोरि सहस्त्र तृष्णा नहिं साखू । अब लागै जोरन लाखू ॥
लाख जोरि विनवै कर जोरी । अब परमेश्वर मोहि देहि करोरी ॥
जोरि करोर क्षण कल नहिं पऐ । लोभ अग्नि छिन छिन तनु जैरे ॥
ज्यों ज्यों लोभ मिलै नौखंडा । त्यों त्यों लोभ भयो परचंडा ॥

दस मिलें तो बीस चाहिए, बीस मिलें तो पचास, पचास मिलें तो एक सौ, एक सौ के बाद एक हजार, फिर लाख, करोड़ । नहीं, कभी ख़त्म नहीं होता यह लोभ । साहिब धर्मदास से कह रहे हैं—

कलियुग वैराग अस होवे भाई । सुनु धर्मदास मैं कहैं बुझाई ॥
कलियुग पाप कर्म बहु बढ़िहैं । करि करि पाप दुख में परिहैं ॥
ताते दरिद्र होय बहु लोगा । सहिहैं बहुते दुख अरू सोगा ॥
पाइ दुख बहु भेष सों धरिहैं । लागे लोभ पाप बहु करिहैं ॥
मांगि मांगि कछु द्रव्य कमायी । ऋण ब्याज दर दिहैं उठायी ॥
नाम साधु जग माहिं कहायी । खैहैं ब्याज करि कर्म कसायी ॥
मठ मंदिर कारण धन लैहैं । सेवक साख बहुत बढ़ैहैं ॥
पाइ द्रव्य विषय सो भोगहैं । बहु विधि इंद्रिन सुख लगिहैं ॥
विषय भोग को द्रव्य सो चाही । तब पड़िहैं वह तृष्णा माहीं ॥
तृष्णा अति परबल जग भंगी । सदा रहै वह लोभ की संगी ॥

साहिब कह रहे हैं कि कलियुग में मनुष्य लोभ के कारण बड़ा पाप करता है, इसलिए दरिद्र होता है और बड़ा दुख सहता है । कलियुग में पाखण्डी साधु धर्म के नाम पर भीख माँगते हैं और बहुत धन जोड़ लेते हैं । उनके दिल में विषय-भोगों की तृष्णा रहती है । यह तृष्णा लोभ की पत्नी है, जो सदा उसके संग रहती है ।

यह लोभ तो काम और क्रोध से भी बढ़कर है, इसलिए साहिब कह रहे हैं—

कामी नर बहुते तरे, क्रोधी तरे अनन्त ।
लोभी बंदा न तरे, कहैं कबीर सिद्धंत ॥

इस लोभ के चंगुल में एक-दो नहीं हैं।

भगत मुड़िया जटाधारी, ज्ञानी गुनी अपार।
षट दर्शन भटकत फिरे, एक लोभ की लार॥

इसके बाद आता है—मोह। 'मोह सकल व्याधिन को मूला। ता ते उपजत बहु विधि सूला।' मोह सभी बीमारियों की जड़ है। यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। जैसे मछली पानी में रहती है, इसी तरह मोह अज्ञान में रहता है। इस मोह की स्त्री है—तृष्णा; बेटी है—इच्छा; बेटा है—लालच; मंत्री है—पारखण्ड; वजीर है—कपट; मित्र हैं—रोग और शोक। इस प्रकार इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है। जीव को सत्य-पथ से हटाने के लिए यह अकेला ही काफी है। इसी के कारण पक्षपात होता है। इसकी उत्पत्ति ही माया से है।

मोह नृपति माया ते भयऊ। प्रबल घटा तिहूँ पुर सी छयऊ॥
वरनो तासु नाम गुण बैना। महा मोह राजा को सैना॥

इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार भी है।

निज अज्ञान देश राजधानी। आलस महल आशा पटरानी॥
इच्छा बेटी खरी कठोरी। बाँधे अनेक जीव उठि भोरी॥
कुमति सखी ताके संग रहई। निति उठि हृदय सबन की दहई॥
लौंडी छूत टहल घर करई। जाके परसत सब जग डरई॥
लौंडा लालच नाहिं अधावे। वरजत निलज सबके घर जावे॥
रोग शोक संशय बहु भांति। पर द्रोही और द्रुन्द संधाती॥
ये राजा के पुत्र प्रचंडा। जाके डर त्रासे नौखंडा॥
पाप सबन को औगुन जानी। दुख दरिद्र मोह अभिमानी॥
अधर्म ध्वजा जाके अगवानी। बाजा प्रकट कलह निशानी॥
दम्भ क्षत्र चौतरा शूला। जहाँ सिंहासन बैठे फूला॥
कपट वजीर असत्य खवासा। पारखंड मंत्री संग प्रकाशा॥

यह मोह अज्ञान के देश में रहता है। इसकी स्त्री है—तृष्णा, बेटी है—इच्छा, बेटा है—लालच, मंत्री है—पारखंड, वजीर है—कपट, मित्र हैं—

रोग और शोक। इस तरह इस मोह राजा का बहुत बड़ा परिवार है, बहुत बड़ी सेना है। मोह की इस सेना से बचना आसान काम नहीं है, इसलिए साहिब कह रहे हैं—

यह सेना सब मोह की, कहैं कबीर समझाया।

इनते जो कोई बाचई, भवसागर तरि जाय ॥

फिर अंत में आता है—अहंकार। यह इन सबसे ही खतरनाक है। इसकी स्त्री है—निन्दा। जिसमें अहंकार होगा, दूसरे की निंदा करेगा। अहंकार के अनेक रूप हैं। किसी को धन का, किसी को जवानी का, किसी को बुद्धि का तो किसी को बल का अहंकार घेरे रहता है। जब व्यक्ति में अहंकार आता है तो अपने समान किसी को नहीं मानता है। छिन छिन गर्व हिया में आवे। आगे कुटिल सबही दिखलावे ॥
ऐंठत चलै निहारत पागा। गर्व खबीस तबहिं उठि लाग ॥
ऐंठ अकड़ अभिमानी माहीं। अभिमानी नीचा हों नाहीं ॥
मूँछे ताव निहारत छांही। काँधे धरे अवर की बाँहीं ॥
टेढ़ी पाग गर्व मन धरई। मन महाँ ऊमतवालो फिरई ॥
अनीति वचन औरन सों बकै, हमरी बरोबरी को करि सकै ॥

अहंकारी में अकड़ होती है। वो दूसरे को कुछ नहीं गिनता है। दूसरों को अपशब्द भी बोल देता है। वो सोचता है कि मेरे बराबर कोई नहीं है। साहिब समझा रहे हैं—

अति के गर्व न होय भाई। गर्वहि ते पुनि सर्व नशायी ॥
अभिमानी नहिं छूटे कबहूँ। बहु विलक्षण ज्ञानी होय तबहूँ ॥
भगली दंभ नितही मन माहीं। निकट साँच कछु आवे नाहीं ॥
हम हम हम करत सो डोलै। काहू से सीधा नहिं बोलै ॥
रूपवन्त रूप गरवावै। कोई मोसम दृष्टि न आवै ॥
धन कुल विद्या गर्बाना। अनी ऊँच ज्ञानी विखराना ॥
अहै भूप राजा अभिमानी। आपेही को सरवस जानी ॥
है योगी योग गर्व धारै। बड़े बड़े सिद्धि काल गहि मारै ॥

साहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है। अहंकारी सदा 'मैं' 'मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है। धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है। राजा को अपने बद्धपन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है।

अहंकार के साहिब ने तीन प्रकार बताया हैं—

अहंकार कह तीन प्रकारा। द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥
जीवन मुक्त केर गुन दोई। त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥
प्रथम दृश्य जेती जग माहीं। मोते इतर और कछु नाहीं ॥
मैं अद्वैत परमात्म सारा। जीवनमुक्त परम हंकारा ॥

अहंकार तीन प्रकार का है और उनमें से दो प्रकार का ग्रहण करने योग्य है, जबकि तीसरा त्यागने योग्य है। पहला तो यह कि जितना कुछ भी संसार में आभासित हो रहा है, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, यह मान लेना; यह समझ लेना कि मैं परमात्मा से अभिन्न हूँ। यह जीवनमुक्त करने वाला प्रथम अहंकार है, जो ग्रहण करने योग्य है।

पुनि दुतिया हंकार बखानो। आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥
सवां भाव कच तेहौं कीन्हा। दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥
जीवनमुक्त को दोऊ हंकारा। पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥
देह को जो आपा करि माना। ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥
जाने सत्य जो अपनी देहा। बन्धन को कारण है येहा ॥

दूसरा अहंकार है कि अपने को बहुत ही सूक्ष्म समझे। यह भी जीवनमुक्त करने वाला अहंकार है। पर पहले दो अहंकार को छोड़कर तीसरा बड़ा खराब है। जो अपने को शरीर करके मानता है, यह बड़ा ही छोटा बनाने वाला अहंकार है। जो अपने शरीर को सत्य मानता है, यही अहंकार बंधन का कारण है।

इसी अहंकार के लिए साहिब आगे कह रहे हैं—

अहं ब्रह्मास्मि कह ब्रह्मा। ताते रचना को आरंभा ॥
अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी। कथा कहानी जग में बाढ़ी ॥
यहि अहं अज्ञान को मूला। ताते जीव सहे सो शूला ॥
अहं बोलि यह जीव सिधरै। बहुरि नवीन कलेवर धरै ॥
आवा गौन अहं ते होई। यक तन तजि दूसर गह सोई ॥
ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई। त्यों त्यों अधिक अहं से लहई ॥
ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदन को पावै। त्यों त्यों ताही दीनता आवै।

अहंकार के कारण ही साधक अपने को अहं ब्रह्मास्मि कहता है। अहंकार के कारण ही यह सृष्टि है। यही अज्ञान का मूल भी है और इसी कारण से जीव दुख पाता है। इसी कारण जीव का आवागमन लगा रहता है, एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को धारण करता है। जैसे-जैसे जीव में मानसिक तुच्छता आती जाती है, ऐसे ऐसे जीव में अहंकार बढ़ता जाता है; जैसे-जैसे जीव श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता जाता है, उसमें दीनता आती जाती है।

भृगु मुनि विष्णु को मार्ग्यो लाता। सो करि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥
देखो दारिद्री कं गाला। धन पाये तेहि गर्व विशाला ॥
गये न हंकार हरि प्यारे। जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥
अहंकार के है षट अंगा। ताते जीव केरि मति भंगा ॥
जब मति भंग जीव की होई। नाना विधि को तन गह सोई ॥
देह सदा वासना ते पूरी। सुखी होय करि ताको दूरी ॥
जबलों रहै वासना मन में। तबलों विचार विषय के बन में ॥
जीव कहाव देह अभिमानी। ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥
निर्बासनिक होय निस्प्रेही। जत्त पूज्य है साधू येही ॥
जिनके हृदय में अभिमाना। तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥

भृगु मुनि ने विष्णु जी को लात मारी तो उन्होंने उसे क्षमा कर दिया और फिर मीठी वाणी में पूछा कि कहीं लगी तो नहीं। देखो, जब कोई द्रिद्री धन पा लेता है तो अहंकारी हो जाता है। यह अहंकार जीव