मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है। अहंकारी सदा 'मैं' 'मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है। धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है। राजा को अपने बद्धपन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है।
अहंकार के साहिब ने तीन प्रकार बताया हैं—
अहंकार कह तीन प्रकारा। द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥
जीवन मुक्त केर गुन दोई। त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥
प्रथम दृश्य जेती जग माहीं। मोते इतर और कछु नाहीं ॥
मैं अद्वैत परमात्म सारा। जीवनमुक्त परम हंकारा ॥
अहंकार तीन प्रकार का है और उनमें से दो प्रकार का ग्रहण करने योग्य है, जबकि तीसरा त्यागने योग्य है। पहला तो यह कि जितना कुछ भी संसार में आभासित हो रहा है, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, यह मान लेना; यह समझ लेना कि मैं परमात्मा से अभिन्न हूँ। यह जीवनमुक्त करने वाला प्रथम अहंकार है, जो ग्रहण करने योग्य है।
पुनि दुतिया हंकार बखानो। आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥
सवां भाव कच तेहौं कीन्हा। दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥
जीवनमुक्त को दोऊ हंकारा। पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥
देह को जो आपा करि माना। ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥
जाने सत्य जो अपनी देहा। बन्धन को कारण है येहा ॥
दूसरा अहंकार है कि अपने को बहुत ही सूक्ष्म समझे। यह भी जीवनमुक्त करने वाला अहंकार है। पर पहले दो अहंकार को छोड़कर तीसरा बड़ा खराब है। जो अपने को शरीर करके मानता है, यह बड़ा ही छोटा बनाने वाला अहंकार है। जो अपने शरीर को सत्य मानता है, यही अहंकार बंधन का कारण है।
इसी अहंकार के लिए साहिब आगे कह रहे हैं—