मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
साहिब कह रहे हैं कि यह अहंकार नहीं होना चाहिए। इस अहंकार से सब नाश हो जाता है। अभिमानी कभी पार नहीं हो सकता है। अहंकारी सदा 'मैं' 'मैं' ही लगाए रखता है और किसी से सीधी बात नहीं करता है। धन, कुल, विद्या आदि का अभिमान सबको घेरे रखता है। राजा को अपने बद्धपन का अभिमान होता है। योगी को अपने योग का अभिमान रहता है।
अहंकार के साहिब ने तीन प्रकार बताया हैं—
अहंकार कह तीन प्रकारा। द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥
जीवन मुक्त केर गुन दोई। त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥
प्रथम दृश्य जेती जग माहीं। मोते इतर और कछु नाहीं ॥
मैं अद्वैत परमात्म सारा। जीवनमुक्त परम हंकारा ॥
अहंकार तीन प्रकार का है और उनमें से दो प्रकार का ग्रहण करने योग्य है, जबकि तीसरा त्यागने योग्य है। पहला तो यह कि जितना कुछ भी संसार में आभासित हो रहा है, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, यह मान लेना; यह समझ लेना कि मैं परमात्मा से अभिन्न हूँ। यह जीवनमुक्त करने वाला प्रथम अहंकार है, जो ग्रहण करने योग्य है।
पुनि दुतिया हंकार बखानो। आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥
सवां भाव कच तेहौं कीन्हा। दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥
जीवनमुक्त को दोऊ हंकारा। पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥
देह को जो आपा करि माना। ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥
जाने सत्य जो अपनी देहा। बन्धन को कारण है येहा ॥
दूसरा अहंकार है कि अपने को बहुत ही सूक्ष्म समझे। यह भी जीवनमुक्त करने वाला अहंकार है। पर पहले दो अहंकार को छोड़कर तीसरा बड़ा खराब है। जो अपने को शरीर करके मानता है, यह बड़ा ही छोटा बनाने वाला अहंकार है। जो अपने शरीर को सत्य मानता है, यही अहंकार बंधन का कारण है।
इसी अहंकार के लिए साहिब आगे कह रहे हैं—
अहं ब्रह्मास्मि कह ब्रह्मा। ताते रचना को आरंभा ॥
अहंते सकल सृष्टि यह ठाढ़ी। कथा कहानी जग में बाढ़ी ॥
यहि अहं अज्ञान को मूला। ताते जीव सहे सो शूला ॥
अहं बोलि यह जीव सिधरै। बहुरि नवीन कलेवर धरै ॥
आवा गौन अहं ते होई। यक तन तजि दूसर गह सोई ॥
ज्यों ज्यों जीव तुच्छता गहई। त्यों त्यों अधिक अहं से लहई ॥
ज्यों ज्यों श्रेष्ठ पदन को पावै। त्यों त्यों ताही दीनता आवै।
अहंकार के कारण ही साधक अपने को अहं ब्रह्मास्मि कहता है। अहंकार के कारण ही यह सृष्टि है। यही अज्ञान का मूल भी है और इसी कारण से जीव दुख पाता है। इसी कारण जीव का आवागमन लगा रहता है, एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को धारण करता है। जैसे-जैसे जीव में मानसिक तुच्छता आती जाती है, ऐसे ऐसे जीव में अहंकार बढ़ता जाता है; जैसे-जैसे जीव श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता जाता है, उसमें दीनता आती जाती है।
भृगु मुनि विष्णु को मार्ग्यो लाता। सो करि क्षमा कहौ मृदुबाता ॥
देखो दारिद्री कं गाला। धन पाये तेहि गर्व विशाला ॥
गये न हंकार हरि प्यारे। जीवहि अहं तुच्छ करि डारे ॥
अहंकार के है षट अंगा। ताते जीव केरि मति भंगा ॥
जब मति भंग जीव की होई। नाना विधि को तन गह सोई ॥
देह सदा वासना ते पूरी। सुखी होय करि ताको दूरी ॥
जबलों रहै वासना मन में। तबलों विचार विषय के बन में ॥
जीव कहाव देह अभिमानी। ताको मुक्तिपात्र नहिं जानी ॥
निर्बासनिक होय निस्प्रेही। जत्त पूज्य है साधू येही ॥
जिनके हृदय में अभिमाना। तिनको कबहु उगै न ज्ञाना ॥
भृगु मुनि ने विष्णु जी को लात मारी तो उन्होंने उसे क्षमा कर दिया और फिर मीठी वाणी में पूछा कि कहीं लगी तो नहीं। देखो, जब कोई द्रिद्री धन पा लेता है तो अहंकारी हो जाता है। यह अहंकार जीव
को छोटा बना देता है। इस अहंकार के छः अंग हैं। जब जीव की बुद्धि का नाश हो जाता है तो देही को पकड़ लेती है अर्थात तब जीव देही के विषय में ही सोचने लगता है, उसी के सुख के लिए काम करने लगता है। देह तो वासना से भरी हुई है। इसे दूर करके ही जीव सुखी हो सकता है। जब तक मन में वासना रहती है, तब तक विषयों के जंगल में ही घूमता रहता है। जो जीव शरीर का अभिमान करता है, वो मुक्ति का पात्र नहीं हो सकता है और जब वही निर्व्यासिक हो जाता है तो साधु होकर जग में पूजा जाता है। लेकिन जिनके दिल में अभिमान रहता है, उनको कभी भी ज्ञान नहीं हो सकता है।
प्रथम कहौं विद्या अभिमानी। दुतिये तपसी तक जिन ठानी ॥
विद्या के अभिमानी जोईं। तिनके मत विचार अस होईं ॥
हमही मनुष और सब पशु गन। जिनके हृदय न विद्या को धन ॥
विद्या धन सर्वापर गाईं। ताते हम ईश्वर लखि पाईं ॥
जग में हम सबके शिर ताजा। हमरे हाथ है काज अकाजा ॥
दुतिये तपसिन केर समाजा। बिना मान नहिं कोई ऋषि राजा ॥
सो ऐसो निजु महि विचारी। दरश हमार जक्त हितकारी ॥
आपको मुक्त युक्त लख औरा। और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥
ये दोनों पद को मद भारी। रूप गर्व धारत है नारी ॥
धन अभिमानी पुनि अस बोला। मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥
बलमद कुलमद कुटुंब अरु चाकर। शिखशाखा बहु मन धरे नर ॥
कह रहे हैं कि पहले विद्या के अभिमानी होते हैं। दूसरे तपस्या के अभिमानी होते हैं। जो विद्या के अभिमानी होते हैं, उन्हें यह अहंकार रहता है कि हम ही मनुष्य हैं और बाकी पशु समान हैं, जिनके पास विद्या रूपी धन नहीं है। यह विद्या रूपी धन सबसे बड़ा है। वो सोचता है कि मैं इसी से ईश्वर को पा लूँगा। वो सोचता है कि मैं ही सबके सिर का ताज हूँ, मेरे द्वारा ही सारे काम होते हैं। फिर दूसरा तपस्या का अहंकार होता है। बिना अहंकार के कोई ऋषि नहीं होता है। वो सोचता है कि हमारा
दर्शन संसार के लिए हितकारी है। वो अपने को मुक्त और दूसरों को बँधा हुआ मानता है, अपने को सबसे बड़ा और दूसरों को छोटा समझता है। ये विद्या और तपस्या—दोनों के अहंकार बहुत बड़े हैं। फिर रूप का अहंकार नारी करती है। धन का अभिमानी कहता है कि दूसरों को ख़रीद लूँगा। फिर बल का अहंकार, ऊँचे कुल का अहंकार, कुटुंब, नौकर-चाकर का अहंकार भी यह मनुष्य मन में रखता है।
ये पाँचों बुरा काम करने वाले हैं; इसलिए यह मन बहुत ही बुरा है। साहिब कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर एक युद्ध चल रहा है। ये सभी मनुष्य को अंदर से संताप दे रहे हैं। कोई भी इनसे सावधान नहीं है। हम सब किसी रोग की दवा लेने जाते हैं, पर उसकी जड़ नहीं दूँढ़ते हैं। जितने भी रोग हैं, वो सब अन्दर के इन पाँच महारोगों से उत्पन्न होते हैं। ये सभी आत्मा के भीतर का आनन्द लूट रहे हैं। आत्मा अनजाने में इन ठगों द्वारा ठगी जा रही है। उसका प्रकाश लुप्त हो गया है। तुलसी साहिब चेता रहे हैं—
चश्म दिल से देख तू, क्या-क्या तमाशे हो रहे।
दिल सतां क्या-क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए।
इस दिल का हुजरा साफ़ कर, जाना के आने के लिए।
ध्यान औरों का उठा, उसको बिठाने के लिए।
एक दिल लाखों तमन्ना, उस पर भी ज्यादा हवस।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए॥
मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ।।
मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ।।
मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ।।
मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ।।
मन की अवस्थाएँ
मन की अवस्थाएँ
अब मन की अवस्थाओं को देखते हैं। मन की आठ अवस्थाएँ हैं; लेकिन मूल रूप से इसकी चार अवस्थाएँ हैं—सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत और तुरीया।
कई बार जब हम बेफिक्र होकर सो जाते हैं तो हमें गहरी नींद आ जाती है। उठने पर हमें थोड़ी देर तक कुछ याद नहीं आता कि हम कहाँ हैं, कौन हैं! यह सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। पेड़-पौधे इसी अवस्था में रहते हैं। इस अवस्था में आत्मा का वास नाभि में रहता है। यह अवस्था महा अज्ञानमय है। इसमें मन 90 प्रतिशत सक्रिय होता है, जबकि आत्मा 10 प्रतिशत चेतन होती है।
इसके बाद स्वप्नावस्था है। यह अवस्था भी बड़ी अज्ञानमय है, मूर्खमय है। इसमें आत्मा का वास कण्ठ में होता है। यह अवस्था एक धोखा है। इस अवस्था में हम कई ऐसे कार्य भी कर डालते हैं, जो हम जाग्रत में कभी भी नहीं कर सकते हैं। इसमें प्राप्त होने वाली वस्तुएँ धोखा मात्र हैं। कभी हम स्वप्न में राजा भी बन जाते हैं; पर जब 4-5 घण्टे बाद नींद खुलती है तो राज भी खत्म, फौज भी खत्म, अब अस्त्र-शस्त्र भी खत्म, महल भी खत्म। इस अवस्था में मन 75 प्रतिशत सक्रिय होता है और आत्मा 25 प्रतिशत चेतन होती है।
इसके बाद जाग्रत अवस्था है। इस अवस्था में आत्मा का वास आँखों में हो जाता है। संतों का मानना है कि यह अवस्था भी बड़ी अज्ञानमय है। इसमें प्राप्त होने वाली वस्तुएँ भी धोखा है। जैसे हम स्वप्न
में थे तो स्वप्न की सब चीजों को सच मान रहे थे, पर जागने पर सब समाप्त। इसी तरह जाग्रत अवस्था में प्राप्त होने वाली चीजें भी धोखा है। इस अवस्था में मूर्खता समायी है। हम कई बार ऐसे मूर्खमय कार्य कर डालते हैं कि बाद में पछताना पड़ता है। हम कहते हैं—यह क्या किया! अच्छा नहीं किया, ठीक नहीं किया। यदि सपना हमसे 4-5 घण्टे का सम्बन्ध रख रहा था तो यह सपना हमसे 70-80 साल तक का सम्बन्ध रख रहा है। इस अवस्था में माँ सच लग रही है, बाप सच लग रहा है, भाई सच लग रहा है, बहन सच लग रही है, रिश्ते-नाते सब कुछ तो सच-सच लग रहा है। इस अवस्था में आत्मा और मन का आधा-आधा जोर चलता है। नानक देव जी ने इस अवस्था को यूँ कहा है—
यो सपना पेखना, जग रचना तिम जान।
इसमें कछु साँचो नहीं, यह नानक साँची मान।
साहिब कह रहे हैं—
जागो लोगो मत सुवो, न करो नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार ॥
यहु ऐसा संसार है, जैसा सैंबल फूल।
दिन दस व्यौहार के, झूठे रंग न भूल ॥
इसके बाद तुरीया अवस्था आती है। इसमें मन की 25 प्रतिशत ताकत रह जाती है जबकि आत्मा 75 प्रतिशत चेतन हो जाती है। इस अवस्था में ऋषि मुनि आदि पहुँच जाते हैं। बाकी तीन अवस्थाएँ तो स्वाभाविक हैं, आती जाती रहती हैं, पर चौथी स्वाभाविक नहीं है। इसे जीवित मरना भी कहा गया है, यानी जीते जी मरकर इस अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। यह जीते जी मरना कोई ज़हर खाकर मरना नहीं है, आत्महत्या करना नहीं है। यह अध्यात्म की कहानी है, समाधि वाली बात है। पर कलयुग में कुछ अटपटी बातें हो रही हैं।
एक जगह अध्यात्म पर बातचीत हो रही थी। बीच में गधों का ज़िकर आ गया। एक संत ने फरमाया कि गधे भी समाधि लगाना सीख
चुके हैं। सब भौचक्के रह गये—“यह क्या कह रहे हो!” “हाँ! मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ। अभी-अभी खबर मिली है कि कुछ गधों ने जल में डूब कर जल-समाधि ले ली है। लेकिन अभी तक उन्हें समाधि का खिताब नहीं मिल पाया है। अभी इस पर बहस चल रही है कि यह सब कैसे हुआ।”
समस्या को सुलझाते हुए उसने फिर कहा—“पहले लोग ध्यान में खोकर समाधि लगाया करते थे। ऐसा करने से उनकी आयु में वृद्धि होती थी और वे अधिक-से-अधिक प्रभु का भजन कर पाते थे। आजकल यह काम थोड़ा मुश्किल हो गया है। समाधि का लगना आसान नहीं रहा। ऐसे में कुछ लोग विचार करके आसान-सी और बड़ी समाधि ले रहे हैं। शायद गधों ने भी किसी को ऐसी समाधि लेते देखा होगा। आखिर गधे तो ठहरे! बस लगा ली समाधि।”
समाधि का लेना कोई मज़ाक नहीं है। बड़ा ही कठिन कार्य है, यह। कोई अग्नि समाधि ले लेता है तो कोई जल-समाधि। अभी हमारा समाज इस दिशा में थोड़ा पिछड़ा हुआ है..... ज्यादा तरक्की नहीं हुई। अभी तक ट्रेन-समाधि, ट्रक-समाधि, आदि समाधियों वाले साधक उत्पन्न नहीं हुए। सुनने में आता है कि किसी ज़माने में जब लोग जिन्दगी से तंग आ जाते थे तो वे आत्म-हत्या कर लेते थे। आज लोग पहले से अधिक तंग हैं, पर आज पहले वाली कायरता लोगों में नहीं रही। पहले लोग खुदकुशी करके अपनी कायरता का परिचय देते थे। कोई जल में डूबकर मर जाता था तो कोई तेल छिड़क कर अपने को आग से खत्म कर देता था। आज आत्महत्या का स्थान समाधि ने ले लिया है। कोई जल-समाधि ले रहा है तो कोई अग्नि-समाधि। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कई लोग ज़हर खाकर तो कई लोग ट्रेन के नीचे आकर भी आत्महत्या कर रहे हैं, पर उन्हें समाधि का खिताब नहीं मिल पा रहा। शोधकर्ता बताते हैं कि ये खिताब कुछ खास लोगों के लिए ही सुरक्षित होते हैं। आम जनता को ये खिताब कतई नहीं दिये जा सकते; इसलिए उन्हें बड़ी देर से इंतजार है कि कब कोई बड़ा खास आदमी ज़हर-
समाधि, ट्रेन-समाधि ले और कब समाधियों की संख्या में वृद्धि हो; क्योंकि अभी तक जल-समाधि और अग्नि-समाधि के खिताब ही बाँटे गये हैं।
कहने का भाव है कि तुरीया अवस्था ऐसी कायरता से प्राप्त नहीं होती। इसमें इंगला और पिंगला को लय कर देते हैं। इसमें साधक सब चिंताओं से मुक्त हो जाता है, क्योंकि मन, बुद्धि आदि का निग्रह हो जाता है। नींद में है तो भी चिंताओं में डूबा है, पर इसमें चिंतामुक्त हो जाता है। इसमें जाने के बाद साधक आन्तरिक जगत् को देखने में सक्षम हो जाता है। पर यह भी माया की भ्रमांक अवस्था है।
इसके बाद तुरीयातीत अवस्था आती है, जिसमें योगी लोग पहुँच जाते हैं। इसमें आत्मा बहुत चेतन हो जाती है और मन मात्र जीवित होता है। वास्तव में यह भी भ्रम है।
तुरीयातीत से परे एक अवस्था है, जिसमें योगेश्वर लोग पहुँचते हैं। इसमें मन अत्यंत सूक्ष्म होता है, पर होता है।
इसमें बड़ा अद्भुत शरीर मिलता है। इस शरीर में हाथ नहीं होते हैं, लेकिन फिर भी साधक अपने कार्य करता है। इसमें पैर भी नहीं होते, पर फिर भी साधक चलता है। गोस्वामी जी इस अवस्था को बड़े सुन्दर ढंग से बता रहे हैं—
पद बिनु चलै, सुनै बिनु काना । कर बिनु कर्म, करै विधि नाना ।
आनन रहित, सकल रस भोगी । बिन वाणी, वक्ता बड़ योगी ।
तन बिन परस, नैन बिन दरसे । गहे ज्ञान सब शेख विशेषे ।
यह विधि सब अलौकिक करनी । महिमा जाए कबन विधि वरनी ॥
यह ऐसी अवस्था है कि यहाँ देखा, वहीं पहुँच जाता है। लेकिन इस अवस्था में भी आत्मा अपने मूल रूप में नहीं आ पाती है; इसलिए ये सब अवस्थाएँ भ्रमांक हैं। मन सूक्ष्म रूप में रहता है। इस तरह मन और माया का बड़ा विशाल भ्रम है, जिसमें बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, संन्यासी, तपस्वी आदि भी झूल रहे हैं।
तीन लोक में मन का राज
तीन लोक में मन का राज
तीन लोक में मनहिं विराजी, ताहि न चीहनत पंडित काजी
इस मन की सीमा देखते हैं। मन ब्रह्माण्ड का राजा है; अतः इसकी सीमा कोई छोटी नहीं है। भौतिक शक्तियों द्वारा इस मन से पार कभी भी नहीं पाया जा सकता। वैज्ञानिक लोग अभी मंगल ग्रह तक भी नहीं पहुँच पा रहे हैं। यदि वैज्ञानिक लोग पारपाइन्डर जैसे यान के माध्यम से स्वर्ग तक भी जाना चाहें तो पृथ्वी से स्वर्ग तक की दूरी को देखते हुए ऐसा यान करीब 500 साल में भी वहाँ नहीं पहुँच सकता, चाहे वो एक ही गति से क्यों न चलता रहे। यदि किसी पैदा हुए बच्चे को पूरी व्यवस्था के साथ उस यान में सुरक्षित भेज दिया जाए तो वह बच्चा बूढ़ा होकर मर भी जाएगा, लेकिन वहाँ नहीं पहुँच पाएगा। फिर मन की सीमा तो बड़ी विशाल है।
मन की सीमा को जानने के लिए इस ब्रह्माण्ड की संरचना को समझना होगा। जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है। हमारी जंघाओं के नीचे सात लोक हैं, जिन्हें सात पाताल भी कहा जाता है—अतल, वितल, सुतल, तलालत, महातल, रसातल और पाताल। इसके ऊपर फिर सात लोक और हैं। पहले गुदा द्वार पर सिद्ध-लोक है। यहाँ पर गणेश जी का वास है। यहाँ मात्र इच्छा से सब कार्य होते हैं। इसके बाद शिशिन्द्रिय पर ब्रह्म-लोक है। यहाँ ब्रह्माजी और सावित्री जी का वास है। सृजन का कार्य यहीं से है। इसके ऊपर फिर विष्णु लोक है, जो नाभि स्थान पर है। यहाँ विष्णु जी सहित लक्ष्मी जी का वास है। स्वर्ग
इसी को कहते हैं। फिर ऊपर हृदय स्थान पर शिव-लोक है। यहाँ शिवजी सहित पार्वती का वास है। इसी स्थान से ही 70 प्रकार की धुने पैदा होती हैं। जो कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग आवाज़ों में सुनाई देती हैं। संहार का कार्य यही से है। जब हमें गुस्सा आता है तो हृदय से ही आता है। इसके ऊपर कण्ठ स्थान पर शक्ति-लोक है। यहाँ पर आद्य-शक्ति का वास है। यही माया है। फिर आज्ञा चक्र पर आत्म-लोक है। यहाँ आत्मा रहती है। इसके ऊपर सहस्रसार चक्र पर निरंजन-लोक है। यहाँ इस ब्रह्माण्ड का राजा मन रहता है। यही काल-पुरुष है। सात-सात करोड़ योजन एक से एक चक्र पर दूरी है। इस प्रकार इस मन की बड़ी विशाल सीमा है।
यह संसार काल-पुरुष का देश है। यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी है, सब काल के दायरे में है।
यह हरदो यहाँ काल पुरुष के हैं हिजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहाँ तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस! तू हमारे देश में चल। आगे कह रहे हैं—
जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पावन्द हुवा तिफली जवानी व बुढ़ापा ॥
सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥
जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
कह रहे हैं कि यहाँ सब पर मौत का साया मण्डरा रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आग लगी हुई है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। इसलिए इस जलते हुए संसार को छोड़ और हमारे देश में चल।
यह पूरी दुनिया मन की है। मन इस संसार का राजा है,
इसलिए उसी की हुकूमत चल रही है।
जिसकी हुकूमत होती है, उसी का राज होता है, उसी का हुकूम चलता है। देखते हैं कि दुनिया में काल-पुरुष की हुकूमत चल रही है क्या? थोड़ा चिंतन करें तो लगेगा कि चल रही है। जिस भी पार्टी की सत्ता होती है, उसी का हुकूम चलता है। कैबिनेट में बड़े मनिस्टर होते हैं। बिजली के महकमें के लिए अलग मंत्री है, रक्षा के लिए अलग मंत्री है। लगता है कि पूरी हुकूमत चला रहे हैं। क्या इस तरह मन की हुकूमत हमारे अन्दर चल रही है? लग रहा है कि हम सबके अन्दर एक ऐसी सत्ता की हुकूमत चल रही है, जो हमेशा हमारे विरुद्ध चल रही है।
स्कूलों में सरकार की हुकूमत है। वो चाहें तो स्कूल 7 बजे खुलेंगे, वो चाहें तो 8 बजे खुलेंगे। इस तरह दुनिया में निरंजन की हुकूमत चल रही है। वो कैसे कर रहा है हुकूमत?
मनहिं निरंजन सब पर छाए ॥
उसकी ताकत है कि उसके हर आदेश का पालन होता है। आखिर कुछ जान सकते हैं कि कैसे चलता है? वो हरेक चीज़ करवा सकता है। कैसे? जैसे सी.एम. का शासन चल रहा है। मन की हुकूमत कैसे चलती है? यह ब्रेन को संदेश देता है। जितने भी मिनीस्टर हैं, सी.एम. के अधीन हैं। इस तरह मन के भी बड़े मिनीस्टर हैं। मन ने कहा कि फ़लाने को तमाचा मारो। यह आज्ञा कैसे पालन हुई? मन ने यह चीज़ बुद्धि को बताई। बुद्धि क्या है? यह बुद्धि भी मन है। उसने विचार किया कि गाली बकी थी इसने। बुद्धि ने क्रोध को बुलाया, कहा कि सुनो, यह
काम करना। गुस्से का मिनीस्टर है—क्रोध। संदेश दिया। उकसाना ज़रूरी था वहाँ। नहीं आता क्रोध तो नहीं मारना था। इनका कोई कसूर नहीं है। पुलिस वालों को आदेश मिला कि मारो तो उनका कसूर नहीं है, आदेश का पालन कर रहे हैं। इस तरह इनका कसूर नहीं है। इन्होंने आदेश माना। इसके भी एस.पी. हैं। इन्द्रियों पर देवता हैं; सब इसकी बात मान रहे हैं। मन ने कहा कि आम खाना है। हरेक बात का पालन होता है। मन ने कहा कि धन चाहिए। क्या कर रहा है? बॉस है, किनारे बैठकर नेटवर्क चला रहा है। माफिया है।
जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥
धन चाहिए। ऐसे नहीं आयेगा। बुद्धि ने लोभ को कहा—हाय पैसा, हाय पैसा। दिल में समा जायेगा। सरकार ने कहा कि फ़लाना काम करना है। सभी जुट जाते हैं कार्यकता। बुद्धि एक बार आदेश दे दे कि चाँटा मारना है, हाथ तैयार हो जायेंगे। यह काम हो जायेगा। पाँच चीज़ें विशिष्ट हैं। पाँचों इसमें बड़े मंत्री हैं। इनके सैकेट्री हैं, पूरा परिवार है। जो कहा, वो करना-ही-करना है, नहीं तो शांति नहीं है। चाहे-अनचाहे करना ही है, क्योंकि मन का आदेश है।
मोह आया। मोह का मिनीस्टर ब्रेन में बैठेगा, कहेगा कि बेटे के लिए यह कर, वो कर। आदमी सोचता है कि तारे तोड़ लाऊँ। मिनीस्टरों ने कार्यकर्ताओं को अधिकार दे रखे हैं। इस तरह इनके पास हथियार हैं, दिख नहीं रहे हैं।
मन जो चाहता है, वो करता है। यही दुश्मन बना देता है। इसकी तह में जायेंगे तो यह सेना बहुत है। मन की सेना बड़ी तगड़ी है।
जैसे सैकेट्री हैं, तहसीलदार हैं, कमीशनर हैं, थाना है, चौकियाँ हैं, फिर बाजारों में सिपाही खड़े हैं। पूरे एरिए को पकड़ा है। इस तरह मन तीन-लोक का राजा जो है। यह इसे सही में मिला है। पॉवर मिला है। काम, क्रोध आदि भी इसी के हैं।
मन का हर एक आदेश पालन किया जाता है। जो भी चाहता है,
करवा लेता है। इस मन की हुकूमत बहुत बड़ी है। मन एक संदेश देता है। सभी इंद्रियाँ इस आदेश का पालन करती हैं। मन के चार रूप हैं—मन, बुद्धि, चित और अहंकार। चारों ये मन के रूप हैं। यह बुद्धि आदेश देती है कि फ़लाने को तमाचे लगाने हैं तो हाथ, शरीर, आत्मा सभी उस मन की आज्ञा का अनुकरण करते हैं। मन के मिनीस्टर हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ। इनकी बड़ी सेना है। जैसे शासन संचालित होता है, ऐसे ही मन का पूरा नेटवर्क है। जो ऊपर से संदेश आया, नीचे तक सभी उस आदेश का पालन करते हैं। इस तरह मन के आदेश का सभी पालन करते हैं। उदाहरण के लिए बुद्धि ने कहा कि इसने हमें अच्छा नहीं कहा, इसे मारो। तो आदेश देती है। हाथ मारने के लिए तेज़ी से चल पड़ते हैं। फिर यह काम कैसे होता है? क्रोध के साथ हिंसा भी आ जाती है। हिंसा क्रोध की पत्नी है। अविचार उसका पुत्र है और घृणी उसकी बहू है। परिवार इतना खतरनाक है। हिंसा रानी कहती है कि मज़ा आ रहा है, मारो। इतना आनन्द आता है कि विवेक नहीं होता है। अविचार उसका पुत्र है। जब भी क्रोध आता है लगता है कि शांति तभी मिलेगी, जब मारेंगे। गुस्से में कभी गाली बकता है। शांति के लिए बकता है। सकून मिलता है। यह कैसा सकून था कि किसी को चोट पहुँचाने से शांति मिली! यह हिंसा क्रोध की पत्नी थी। तब अविचार भी आ जाता है, कुछ नहीं सोचने देता है। वो कहता है कि लगे रहो। फिर घृणा आ जाती है। परिवार खतरनाक है। देखते हैं तो हरेक इंसान में ये चीज़ें मिल रही हैं। इसका मतलब है कि मन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। साहिब ऐसे ही नहीं कह रहे—
तीन लोक में मनहिं विराजी। ताहि न चीहृत पंडित काजी ॥
<!-- image: Decorative floral separator -->अष्ट कमल पर मन धाए
अष्टदल कमल पर मन धाए
हरेक इंसान के अन्दर काल-पुरुष का एक नेटवर्क है। आपका चिंतन आपका नहीं है। हरेक इंसान के अन्दर मन के आठ बैंड हैं, अष्टदल कमल हैं। हृदय में आठ कोष्ठक हैं। वहाँ पर बीच में मन रहता है। एक बार किसी ने कहा कि बड़ी उदासी है। कहा कि कारण नहीं जान पा रही हूँ। कहा कि कोई ऐसी घटना भी नहीं हुई है, पर फिर भी बड़ी उदास हूँ। कहा कि कारण पता नहीं चल रहा है। कहा कि किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं हो रही है। मैंने कहा कि कारण है। यह हृदय के अष्ट कोष्ठक हैं। इनके बीच में मन रहता है।
उत्तर दल पर जब मन जाई। दया धर्म तब उर में आई॥
जितनी देर मन वहाँ बैठेगा, आदमी को भक्ति-भाव हृदय में आयेगा। यह खुद-ब-खुद होगा। इसका मतलब है कि इंसान का चिंतन भी अपना नहीं है; अपना स्वभाव भी नहीं है। बहुत ताकतवर चीजें अन्दर में बैठकर के अपना काम कर रही हैं। उतनी देर आपमें वही विचार रहेंगे। ये विचार क्यों उत्पन्न हुए? आदमी नहीं जान पा रहा है।
दक्षिण दल पर जब मन जाता। महालोभ तब उर में आता॥
दक्षिण के कोष्ठक में जब मन जाकर के बैठेगा, बड़ा गुस्सा आयेगा; बिना मतलब की बातों पर गुस्सा आयेगा। स्वभाव तेज़ रहेगा; लड़ाई करने की इच्छा होगी। अच्छा या बुरा स्वभाव आत्मा का नहीं है। यह सब मन का खेल है। आप किसी से झगड़ा कर बैठेंगे। आपका स्वभाव उखड़ा होगा। आपमें बहुत क्रोध होगा उस समय।
कई आदमी ऐसी अवस्था में कहते हैं कि भाई, अभी मेरा मूड
ठीक नहीं है; अभी बात नहीं करो। यह क्या है मूड? यह मन की स्थिति है।
पश्चिम दल पर जब मन जाई। विषय वासना उर में आई ॥
जब पश्चिम के कोष्ठक पर मन जाकर के बैठता है तो आदमी में बहुत वासना आयेगी, विषय-विकारों का चिंतन आयेगा, फ़िजूल-2 बातें, अगली-पिछली बातें याद आयेंगी। आप सोचने लग जायेंगे। पर आपको यह पता नहीं चलेगा कि आपमें ये विचार उत्पन्न क्यों हो रहे हैं। यह भी मन का खेल है। इसको बड़े बड़े ज्ञानी-ध्यानी नहीं देख पा रहे हैं।
पूर्व दल पर जब मन जाई। हँसी भाव तब उर में आई ॥
पूर्व के पते पर जब मन का निवास हो जाता है तो हँसने की इच्छा होगी। फ़िजूल बातों पर भी आप हँसेंगे। इधर-उधर की बातों पर हँसेंगे। बस, आपका मूड होगा कि हँसू, हँसू। कभी-कभी ऐसी अवस्था बन जाती है। किसी को चलते देखोगे, तो भी हँसी आ जायेगी। कभी-कभी आप आदमी को ऐसी अवस्था में देखकर पूछते हैं कि भाई, बात क्या है? क्यों हँस रहे हो? वो खुद नहीं जानता है कि क्यों हँस रहा है। क्योंकि मन पूर्व-दल पर जाकर बैठा है। इसलिए उतनी देर आपको हँसना-ही-हँसना है। बिना मतलब की बातों पर भी हँसना-ही-हँसना है। आपको हँसी आयेगी। आपका स्वभाव ऐसा बनेगा।
आठ दिशाएँ हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण। फिर वायु, अग्नि, नैऋत, इशान—ये चार कोने वाली दिशाएँ भी हैं।
वायु दल पर जब मन जाई। लोभ भाव तब उर में आई ॥
इतनी देर लालच आयेगी। वो डेढ़-दो घण्टा, जितनी देर मन वहाँ रहा, यही प्लैनिंग रहेगी कि पैसा कहाँ से आए, यह करूँगा, वो करूँगा। आपमें ये ही सोच आती रहेगी। आपमें यह सोच क्यों आई? आपको कोई पता नहीं है। क्योंकि मन उस कोष्ठक पर जाकर बैठ गया है। जितनी देर भी वहाँ रहा, उतनी देर ये ही विचार आते रहेंगे। इसका
मतलब है कि आपके विचारों पर आपका नियंत्रण नहीं है। जैसा-जैसा मन चाहता है, आपको चलाता जा रहा है। इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
दुनिया का हरेक इंसान इस तरह मन के प्रवेग में बह रहा है। आत्मा का यह स्वभाव ही नहीं है। यह मन का स्वभाव है। यह ऐसा क्यों करता है? आगे देखते हैं।
अग्नि दल पर जब मन जाई। ईर्ष्या भाव तब उर में आई ॥
छठी दिशा है—अग्नि। तब ईर्ष्या, राग-द्वेष, निंदा आदि आयेगा। आप कभी-कभी देखते हैं कि घर के लोग किसी की निंदा में लग जाते हैं। डेढ़-दो घण्टे निंदा ही चलती रहती है। कभी आप ऊब भी जाते हैं कि यार, क्यों निंदा कर रहा है। वो किये जायेगा, किये जायेगा, पर उसे मालूम नहीं है। उसने निंदा करनी-ही-करनी है, क्योंकि उसका मन अग्नि कोष्ठक पर बैठा है।
इशान दल पर जब मन जाई। अहंकार तब उर में आई ॥
सातवीं दिशा इशान की तरफ जब मन जाता है तो अहंकार आयेगा, घमण्ड आयेगा। इतना घमण्ड आयेगा कि किसी को भी कुछ न गिनोगे।
नैऋत दल पर जब मन जाई। उदासीनता तब दिल में आई ॥
जिस समय नैऋत दिशा में मन जाता है, उदास बैठे रहेंगे। किसी से आपको बात करने की इच्छा नहीं होगी। कोई भी बात आपको अच्छी नहीं लगेगी। आप चाहेंगे कि आपसे कोई भी नहीं बोले। आप अन्दर से उदास-उदास ही रहेंगे।
अष्टदल कमल पर मन धाए, नाना नाच नचाए ॥
साहिब कह रहे हैं कि यह सबको नाच नचाए जा रहा है।
जो कोई कहे मैं मन को देखा, इसकी रूप न रेखा ॥
पलक पलक में वो दिखलाए, जो सपने नहीं देखा ॥
संतों मन का करो विवेका ॥
जब यह नैऋत दल पर जाता है तो उदास बैठे रहेंगे, शांत बैठे रहेंगे। किसी से बात करने की कोई इच्छा नहीं होगी। मैंने कहा कि बेटे, इस समय तुम्हारा मन उस नैऋत दल पर बैठा है, इसलिए तुम उदास हो। तब उदासी ही लगेगी। यह जितनी भी मन की हरकत है, किसी को भी समझ में नहीं आती है। इसलिए साहिब कह रहे हैं—
अष्टदल कमल पर मन धाए। नाना नाच नचाए॥
क्यों ऐसा कर रहा है ?
मन को कोई देख न पाए। नाना नाच नचाए॥
इसको कोई देख नहीं पा रहा है। यह नाना नाच नचाए जा रहा है।
इसको पकड़ सके कोई संता। पकड़ गहे इसको मगवन्ता॥
एक महापुरुष इसको समझता है। इसका मतलब है कि हृदय में यह बड़ा ही जबरदस्त नेटवर्क है। जैसे मोबाइल में भी आप देखते हैं कि मेसिज हैं; सेटिंग है; कई चीज़ें हैं। ओके करते जाओ तो अन्दर का पूरा मसला समझ में आता जायेगा। इस तरह मन के ये अष्ट कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव आपमें उत्पन्न करता है। क्यों करता है ? ताकि इसी में आप रमें रहें; आपका ध्यान इसी में लगा रहे; कभी आपका ध्यान परम-तत्व की तरफ नहीं जाए। यह मन की एक विशाल चालाकी है।
इसका मतलब है कि आपका स्वभाव आपकी उपज नहीं है। यह आत्मा नहीं है। आत्मदेव तो अपनी उर्जा केवल इनके साथ में लगाए हुए है। जैसा-जैसा भी मन चाह रहा है, आत्मदेव वैसा-वैसा किये जा रहा है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—
मन हँसे मन रोवे, मन जागे मन सोवे, मन देवे मन लेवे।
मन खाए मन पीये, मन गाए मन नाचे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, जगत बना है मन से॥
यह क्यों कर रहा है ? इसलिए कि आप अपनी आत्मा को अनुभव न कर पाएँ। इसलिए मन ये अवस्थाएँ बना रहा है। नचाता रहता
है, नचाता रहता है। इसलिए इसका कण्ट्रोल किसी साधना से नहीं हो सकता है, किसी योग से नहीं हो सकता है, किसी ध्यान से नहीं हो सकता है, किसी पठन-पाठन से नहीं हो सकता है। मन बहुत शक्तिशाली है।
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
सारी दुनिया मन-तरंग में भूली हुई है।
मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय ॥
इसलिए लोग मन की इस अवस्था को ठीक से नहीं समझ पाते हैं। ये आठ बैंड उसके हैं। आठ कोष्ठक हैं। आठ तरह का स्वभाव बनाता है। कभी आप गुस्से में होते हैं, कभी आप हँसी में होते हैं, कभी आप मजाक करने लगते हैं, कभी आप दुख में होते हैं, कभी आप चिंताओं में होते हैं, कभी आपमें उदण्डता आ जाती है, कभी आपमें लालच आ जाती है, कभी आपमें विषय-विकार की भावना आ जाती है, कभी उन्माद की भावना आती है, कभी विरोध करने लगते हैं, कभी आप विषाद करने लगते हैं।
मन ही लेवे, मन ही देवे, मन ही जागे मन ही सोवे।
मन का है यह सकल पसारा, मन से कोई नहीं न्यारा ॥
इस तरह—
मन तरंग में जगत भुलाना ॥
कोई भी आदमी अपनी ताकत से किसी भी कीमत पर कण्ट्रोल नहीं कर सकता है। इसी ने तो आत्मा को जकड़ा है। इसी स्वभाव, इसी व्यक्तित्व, इसी मन और माया के अधीन आप हैं। यह बड़ा कठिन है।
तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन ॥
साहिब कह रहे हैं—
जीव के संग मन काल को वासा। अज्ञानी नर गहे विश्वासा ॥
आपका बैरी है यह। बस, किसी में भी इतनी ताकत नहीं है कि इस चैनल से बाहर निकले, मन के नेटवर्क से बाहर निकल पाए। नहीं।
बहुत तगड़ा है। कालांतर में जितने भी ऋषि, मुनि, पीर-पैगंबर आदि हुए—
मन ही निरंजन सबै नचाए ॥
सबको नचा दिया। फिर क्या यह इंसान अपनी ताकत से इससे पार हो जायेगा। किसी भी कीमत पर नहीं हो पायेगा। क्योंकि—
मन को कोई देख न पाए ॥
दिखाई ही नहीं देता है। मन को कोई समझ ही नहीं पा रहा है। इस तरह यह—
नाना नाच नचाए ॥
कभी-कभी जीवन में ऐसी अवस्थाएँ आती हैं; आप कोई काम कर बैठते हैं, बाद में चिंतन करके आप पछताने लगते हैं कि क्यों कर दिया, क्यों कर दिया; यह तो मुझे नहीं करना चाहिए था। ऐसा क्यों? करने वाले भी आप थे, पछताने वाले भी आप हैं। यह क्या है? इस तरह साहिब वाणी में सतर्क करके कह रहे हैं—
दिल का हुजरा साफ कर, जाना के आने के लिए।
ध्यान औरों का उठा, उसको बिठाने के लिए ॥
एक दिल लाखों तमन्ना, उसपे भी ज्यादा हवस।
फिर ठिकाना है कहाँ, उसको बिठाने के लिए ॥
वाह भाई—
चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे।
दिल सतां क्या क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए ॥
बहुत जबरदस्त कहानियाँ यह मन जड़ रहा है। मन बहुत ख़तरनाक है। यह बहुत बड़ा बैरी है। यह मन की तरंग कैसी है? उदासी लाया। उदास रहोगे। खुशी लाया, खुश रहोगे। यह मन की तरंगों में जीवात्मा उलझा हुआ है। साहिब ने बहुत बड़ा अन्तःकरण का विज्ञान कहा। मन असाध्य भी है। वासुदेव कृष्ण ने जब अर्जुन से कहा कि सत्य और प्रेम ही जीवन के लिए पूर्ण नहीं हैं, अपनी आत्मा के साक्षात्कार के लिए
भूकृटी के मध्य में स्थित हो। अर्जुन ने कहा—हे जनार्दन ! समुद्र का मंथन दुष्क्रिय है, असंभव है, तो भी संभव है। मैं उसके लिए भी चेष्टा कर सकता हूँ। मन के लिए नहीं करूँगा। यह नहीं आता काबू में। आकाश भंजना। आकाश को तोड़ना, शून्य को तोड़ना असाध्य है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करना मत बोलो। यह मैं किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता हूँ। वायु की गठान बाँधना असंभव है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करने का कभी नहीं बोलना; किसी भी कीमत पर इसको मैं बस में नहीं कर सकता; मैंने इसके लिए बहुत साधना की है, बहुत उपक्रम किया, बहुत चीज़ें की, पर यह नहीं हुआ। साहिब भी कह रहे हैं—
मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा ॥
यह अपने विधान के अनुसार काम करवा रहा है; आत्मा पर हावी है। वो अपने स्वभाव के अनुकूल कुछ नहीं कर पा रही है। मूल रूप से यह मन आपका बैरी है। बाज तीतर का बैरी है। कहावत है—कहाँ बाज और कहाँ तीतर। पक्षियों में सबसे तेज़ उड़ने वाला बाज है। बड़ा ज़ालिम है। और सबसे कम उड़ने वाला तीतर है। तो बाज को तीतर का शिकार करने में समय नहीं लगता है। आसान है। तीतर मोटा है, थोड़ा उड़कर फिर जमीन पर आ जाता है। मुर्गा भी तो उड़ता है; पर थोड़ी देर तक उड़कर फिर नीचे आ जाता है। बहुत कम। क्योंकि शरीर भारी है। बाज बड़ा तेज़ उड़ता है। चोंच से एक मिनट में गर्दन काट देता है। उसकी चोंच इतनी तेज़ है। यदि थोड़ा बड़ा है तो लोमड़ी को भी उठाकर ले जाता है।
इस तरह काल बाज रूपी है और जीव तीतर रूपी। ऐसा कोई नहीं, जिसे इसने मारा न हो। किसी भी साधना से यह काबू में नहीं आता है।