मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूकृटी के मध्य में स्थित हो। अर्जुन ने कहा—हे जनार्दन ! समुद्र का मंथन दुष्क्रिय है, असंभव है, तो भी संभव है। मैं उसके लिए भी चेष्टा कर सकता हूँ। मन के लिए नहीं करूँगा। यह नहीं आता काबू में। आकाश भंजना। आकाश को तोड़ना, शून्य को तोड़ना असाध्य है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करना मत बोलो। यह मैं किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता हूँ। वायु की गठान बाँधना असंभव है, तो भी चेष्टा कर लूँगा, पर मन को बस में करने का कभी नहीं बोलना; किसी भी कीमत पर इसको मैं बस में नहीं कर सकता; मैंने इसके लिए बहुत साधना की है, बहुत उपक्रम किया, बहुत चीज़ें की, पर यह नहीं हुआ। साहिब भी कह रहे हैं—
मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा ॥
यह अपने विधान के अनुसार काम करवा रहा है; आत्मा पर हावी है। वो अपने स्वभाव के अनुकूल कुछ नहीं कर पा रही है। मूल रूप से यह मन आपका बैरी है। बाज तीतर का बैरी है। कहावत है—कहाँ बाज और कहाँ तीतर। पक्षियों में सबसे तेज़ उड़ने वाला बाज है। बड़ा ज़ालिम है। और सबसे कम उड़ने वाला तीतर है। तो बाज को तीतर का शिकार करने में समय नहीं लगता है। आसान है। तीतर मोटा है, थोड़ा उड़कर फिर जमीन पर आ जाता है। मुर्गा भी तो उड़ता है; पर थोड़ी देर तक उड़कर फिर नीचे आ जाता है। बहुत कम। क्योंकि शरीर भारी है। बाज बड़ा तेज़ उड़ता है। चोंच से एक मिनट में गर्दन काट देता है। उसकी चोंच इतनी तेज़ है। यदि थोड़ा बड़ा है तो लोमड़ी को भी उठाकर ले जाता है।
इस तरह काल बाज रूपी है और जीव तीतर रूपी। ऐसा कोई नहीं, जिसे इसने मारा न हो। किसी भी साधना से यह काबू में नहीं आता है।