भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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मन की तपस्या


सत्यपुरुष ने शब्दों से 16 पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तेज अंग से उत्पन्न मन भी हुआ। सब परम-पुरुष के उस अमर-लोक में आनन्द और शांति से रह रहे थे। पर तेज अंग से उत्पन्न होने से मन बाकी की तरह शांत नहीं था। उसने स्वार्थवश बहुत तप किया।

यहि विधि बहुत दिवस गये बीती। ता पीछे ऐसी भई रीती॥
धर्मराय अस कीन्ह तमासा। सो चरित्र बूझहु धर्मदासा॥
युग सत्तर सेवा तिन कीन्हा। इक पग ठाढ़ पुरुष चित दीन्हा॥
सेवा कठिन भांति तिन कीन्हा। आदि पुरुष हर्षित होय चीन्हा॥

अमर लोक में सबको आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके बाद पाँचवाँ पुत्र निरंजन परम पुरुष का ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एक पाँव पर खड़े होकर परम पुरुष का ध्यान किया। जब उसने इतना कठिन तप किया तो परम पुरुष प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा—

पुरुष अवाज़ उठी तब बानी। कहा जानि तुम सेवा ठानी॥

परम पुरुष ने पूछा कि इतनी घोर सेवा, तप क्यों कर रहे हो?

निरंजन ने कहा—

कहै धरम तब सीस नमायी। देहु ठौर जहँ बैठों जायी॥

निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं थोड़ा सा स्थान दे दो।

परम पुरुष ने कहा—