भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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आज्ञा किये जाहु सुत तहवाँ। मानसरोवर दीप है जहवाँ॥

परम-पुरुष ने तब निरंजन को मानसरोवर स्थान दिया (मानसरोवर अमर-लोक का ही एक द्वीप है)।

चले धरम तब मानसरोवर। बहुत हरषचित करत कलौहर॥
मानसरोवर आये जहिया। भये आनन्द धरम पुनि तहिया॥
बहुरि ध्यान पुरुष को कीन्हा। सत्तर युग सेवा चित दीन्हा॥
यक पगु ठाढ़े सेवा लायी। पुरुष दयाल दया उर आयी॥

मानसरोवर पहुँच कर निरंजन बड़ा खुश हुआ और आनन्द से वहाँ रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद पुनः परम-पुरुष का ध्यान करने लगा। निरंजन ने पुनः 70 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरुष ने सेवा से प्रसन्न होकर पूछा कि अब क्या चाहते हो?

विकस्यो पुहुप उठ्यो जब बानी। बोलत वचन उठ्यो अधरानी॥
जाहु सहज तुम धरम के पास। अब कस ध्यान कीन्ह परगासा॥

परम-पुरुष ने तब सहज को निरंजन के पास भेजा, कहा—पूछो कि अब क्यों ध्यान कर रहे हो, क्या चाहते हो।

चले सहज तब सीस नवाई। धरमराय पहुँ पहुँ चे जाई॥
कहे सहज सुन भ्राता मोरा। सेवा पुरुष मान लइ तोरा॥
अब का माँगहु सो कह मोही। पुरुष अवाज दीन्ह यह तोही॥

सहज परम-पुरुष की आज्ञा पाकर उन्हें प्रणाम कर निरंजन के पास आए और कहा—हे भाई, परम-पुरुष तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हैं, इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भिजवाया है कि अब जो माँगना चाहते हो, मुझसे कहो।

निरंजन ने कहा—

<table border="0"> <tbody> <tr> <td>अहो</td> <td>सहज</td> <td>तुम</td> <td>जेठे</td> <td>भाई।</td> </tr> <tr> <td>करो</td> <td>पुरुष</td> <td>सो</td> <td>बिनती</td> <td>जाई॥</td> </tr> <tr> <td>इतना</td> <td>ठांव</td> <td>न</td> <td>मोहि</td> <td>सुहाई।</td> </tr> <tr> <td>अब</td> <td>मोहि</td> <td>बकसि</td> <td>देहहु</td> <td>ठकु राई॥</td> </tr> </tbody> </table>
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