भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कै मोहि देहु लोक अधिकारा ।
कै मोहि देहु देश इक न्यारा ॥

निरंजन ने कहा — “मैं इतने से खुश नहीं हूँ। अब कृपा करके या तो इस अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर एक अलग से न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो, जहाँ मैं स्वतन्त्र रूप से बिना किसी रोक-टोक के अपना कार्य कर सकूँ।”

चले सहज सुनि धर्म के बाता। जाय पुरुष सो कहे विख्याता ॥
जो कछु धर्मराय अभिलाषी। तैसे सहज सुनाये भाषी ॥

निरंजन की बात सुनकर सहज वापिस परम पुरुष के पास आए और जो कुछ निरंजन ने कहा, वो सुना दिया।

सुन्यो सहज के वचन जबहीं, पुरुष बैन उच्चारेऊ।
धरम से संतुष्ट हैं हम, बचन मम हिय धारेऊ ॥
लोक तीनों ताहि दीन्हो, शून्य देश बसावहू।
करहु रचना जाय तहाँवा, सहज वचन सुनावहू ॥

परम पुरुष ने सहज के वचन सुनकर कहा कि मैं निरंजन से बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिए उसके पास जाकर कहो कि मैंने उसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है। वो शून्य में एक अलग देश बसा ले।
आय सहज तब वचन सुनावा। सत्य पुरुष जस सहि समुझावा ॥
सुनतहिं बचन धर्म हरषाना। कछुक हरष कछु विस्मय आना ॥

जब सहज ने निरंजन को परम पुरुष की आज्ञा सुनाई तो निरंजन बहुत खुश हुआ। पर उसे कुछ आश्चर्य भी था। तो कहा—
कहे धर्म सुनु सहज पियारा। कैसे रचौं करौं विस्तारा ॥
पुरुष दयाल दीन्ह मोहि राजू। जानू न भेद करौं किम काजू ॥
गम्य अगम्य मोहि नाहिं आयी। करो दया सो युक्ति बतायी ॥
विनती करो पुरुष सों मोरी। अहो भ्रात बलिहारी तोरी ॥
किहि विधि रचूँ नौ खंड बनाई। हे भ्राता सो आज्ञा पाई ॥