भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 120 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

मो कहैं देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥

निरंजन ने सहज से कहा कि परम पुरुष ने मुझे तीन लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ। मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।

तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥

सहज फिर परम पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।

अहो सहज कस इहवा आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥

परम पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।

कह्यो सहज तब धर्म की बाता। जो कछु धर्म कही विख्याता॥

तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा। सुनो सहज तुम बचन हमारा।

कूर्म उदर आहि सब साजा। सो ले धरम करे निज काजा॥

विनती करे कूर्म सो जायी। माँगि लेइ तेहि माथ नवायी॥

परम-पुरुष ने तब निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि कि तुम्हारे बड़े भाई कूर्म के पास पाँच तत्त्व का बीज (जो सूक्ष्म रूप में था) है। तुम उसके पास जाकर प्रार्थना करना और पाँच तत्त्व का बीज ले लेना। उससे तुम शून्य में तीन-लोक बनाना।

चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो। मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो॥

जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ। दंड परनाम एक नहिं कियऊ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई। तपत न तनि को अति शितलाई॥

करि गुमान देख्यो जब काला। कूर्म धीर अति है बलवाला॥

बारह पालंग कूर्म शरीरा। छै पालंग धरम बलवीरा॥

धावै चहुँ दिश रहै रिसाई। किहि विधि लीजे उत्पति भाई॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा। जाय कूर्म के सन्मुख भीरा॥