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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

मो कहैं देहु साज प्रभु सोई। जाते रचना जगत की होई॥

निरंजन ने सहज से कहा कि परम पुरुष ने मुझे तीन लोक का राज्य तो दिया, पर मुझे रचना का भेद मालूम ही नहीं तो फिर कैसे करूँ। मुझे वो सामग्री तो दो, जिससे मैं रचना कर सकूँ।

तबही सहज लोक पगु धारा। कीन्ह दण्डवत् बारंबारा॥

सहज फिर परम पुरुष के पास गया और दण्डवत् प्रणाम किया।

अहो सहज कस इहवा आऊ। सो हमसों तुम सब्द सुनाऊ॥

परम पुरुष ने सहज से पूछा कि किस कारण से आए हो, सो मुझे बताओ।

कह्यो सहज तब धर्म की बाता। जो कछु धर्म कही विख्याता॥

तब सहज ने निरंजन की विनती सुना दी।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा। सुनो सहज तुम बचन हमारा।

कूर्म उदर आहि सब साजा। सो ले धरम करे निज काजा॥

विनती करे कूर्म सो जायी। माँगि लेइ तेहि माथ नवायी॥

परम-पुरुष ने तब निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि कि तुम्हारे बड़े भाई कूर्म के पास पाँच तत्त्व का बीज (जो सूक्ष्म रूप में था) है। तुम उसके पास जाकर प्रार्थना करना और पाँच तत्त्व का बीज ले लेना। उससे तुम शून्य में तीन-लोक बनाना।

चलि भौ धरम हरष तब बाढ़ो। मनहिं कीन गुमान अति गाढ़ो॥

जाय कूर्म के सन्मुख भयऊ। दंड परनाम एक नहिं कियऊ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई। तपत न तनि को अति शितलाई॥

करि गुमान देख्यो जब काला। कूर्म धीर अति है बलवाला॥

बारह पालंग कूर्म शरीरा। छै पालंग धरम बलवीरा॥

धावै चहुँ दिश रहै रिसाई। किहि विधि लीजे उत्पति भाई॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा। जाय कूर्म के सन्मुख भीरा॥

कीन्हो काल सीस नख घाता। उदरते निकसे पवन अघाता॥
तीन सीस के तीनहु अंशा। ब्रह्मा विष्णु महेश्वर बंशा॥
पाँच तत्त्व धरती आकाशा। चंद्र सूर्य उडगन रहिवासा॥
निसर्यो नीर अग्नि शशि सूर। निसर्यो नभ ढाकन महि अस्थूला॥
छीना सीस कूर्म को जबही। चले परसेव ठाँव पुनि तबही॥
जबही परसेव बुंद जल दीन्हा। उनचास कोट पृथ्वी को चीन्हा॥

निरंजन बड़े घमण्ड के साथ कूर्म जी के पास पहुँचा, लेकिन कूर्म जी से प्रार्थना नहीं की, और बल से पाँच तत्त्व का बीज उसी प्रकार उनसे छीन लिया, जैसे किसी के शरीर से खून खींचकर निकालते हैं। कूर्म जी शांत थे, उन्होंने सोचा कि यह कौन शैतान यहाँ आ गया है! निरंजन ने देखा कि कूर्म तो बहुत बलवान है। उनका शरीर उससे दुगुना था। निरंजन क्रोधित होकर उसके चारों ओर दौड़ने लगा कि कैसे इससे उत्पत्ति का सामान ले लूँ। उसने नख से उनके शीश पर प्रहार किया और तीन शीश काट कर खा लिए। तब उनके पेट से पाँच तत्त्व का सूक्ष्म बीज लेकर निरंजन शून्य में आया।

उधर कूर्म जी ने तब परम-पुरुष से पुकार की, कहा — यह किस शैतान को यहाँ भेज दिया है! इसने तो मेरे साथ बल का प्रयोग करके पाँच तत्त्व का बीज छीना है। परम-पुरुष ने कूर्म जी से कहा कि तुम शांत रहो, यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे माफ कर दो। लेकिन परम-पुरुष ने सोचा कि यह कैसा निरंजन उत्पन्न हुआ है!

पुरुष ध्यान पुनि कीन्ह निरंजन। युग अनेक किय संयम॥
स्वार्थ जानि सेवा तिन लाई। करि रचना बैठे पछताई॥
धर्मराय तब कीन्ह विचारा। कैसे लो त्रयपुर विस्तारा॥
स्वर्ग मृत्यु कीन्हो पाताल। बिना बीज किमि कीजै ख्याला॥
कौन भांति कस करब उपाई। किहि विधि रचों शरीर बनाई॥
कर सेवा माँगों पुनि सोई। तिहुँ परि जीवित मेरो होई॥

एक पाँच तब सेवा कियऊ। चौंसठ युग लों ठाढ़े रहेऊ।।

पाँच तत्त्व का बीज लेकर निरंजन ने उससे पाँच तत्त्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश) बनाए। जिस तरह कुम्हार मिट्टी से तरह-2 की वस्तुएँ बनाता है, उसी तरह निरंजन ने भी इन पाँच तत्त्वों से 49 करोड़ योजना पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, सप्त-पाताल, सप्त-लोक, सब बना दिया। ऐसे शून्य में कई दिन रहा, लेकिन जीव नहीं थे, इसलिए यह निर्जीव सृष्टि थी। निरंजन ने सोचा कि यदि जीव ही नहीं है तो फिर सृष्टि का क्या लाभ! अतः उसने पुनः 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया।

परम-पुरुष ने फिर सहज को भेजकर पूछा कि अब क्या चाहिए ?

निरंजन ने कहा—

तबै निरंजन विनती लायी। कै से रचना रचूँ बनायी।।
पुरुषहिं कहो जोरि युग पानी। मैं सेवक दुतिया नहिं जानी।।
पुरुष सो विनती करो हमारा। दीजे खेत बीज निज सारा।।
मैं सेवक दुतिया नहिं जानू। ध्यान पुरुष का निशि दिन आनू।।

निरंजन ने कहा कि बीज ही नहीं हैं तो सृष्टि कैसे करूँ। इसलिए बीज दो और जीव भी दो, जिन पर मैं राज्य कर सकूँ।

इच्छा कीन पुरुष तेहि बारा। अष्टंगी कन्या उपचारा।।
अष्ट बाहु कन्या होय आई। बायें अंग सो ठाढ़ रहाई।।
माथ नाई पुरुष सो कहई। अहो पुरुष आज्ञा कस अहई।।

परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं। आद्य-शक्ति ने परम-पुरुष को प्रणाम करते हुए पूछा कि उसे क्यों बनाया गया है ?

तबही पुरुष वचन परगासा। पुत्री जाहु धरम के पासा।।
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी। रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी।।

दीन्हो बीज जीव पुनि सोई। नाम सुहंग जीव कर होई॥
जीव सोहंगम दूसर नाहीं। जीव सो अंश पुरुष को आही॥

परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि हे पुत्री! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात् शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर-लोक की सृष्टि थी)। सोहंग जीव का ही नाम है।

चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे॥

रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के॥

परम पुरुष ने आदि-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना। आदि-शक्ति परम पुरुष को प्रणाम करके चल पड़ी।

उधर परम पुरुष ने निरंजन को सहज के हाथ संदेश भेजा कि मानसरोवर में जाओ। जो वस्तु तुमने माँगी दी, तुम तक पहुँचा दी है। पुरुष वचन सुन तबही गाजा। मान सरोवर आन विराजा॥ आवत कामिनि देख्यो जबही। धर्मराय मन हरष्यो तबही॥ कला अनन्त अंत कछु नाहीं। काल मगन हवै निरखत ताही॥ निरखत धरम सु भयो अधीरा। अंग अंग सब निरख शरीरा॥ धर्मराय कन्या कह ग्रासा। काल स्वभाव सुनो धर्मदासा॥

परम पुरुष के वचन सुन निरंजन मानसरोवर में आकर बैठ गया। जब उसने आदि-शक्ति को आते देखा तो बहुत खुश हुआ। आदि-शक्ति अनन्त कला और सौंदर्य से परिपूर्ण थी, सो काल पुरुष उसे देख मग्न हो गया, कामुक हो गया। उसने शक्ति को एक हाथ से पाँव और एक हाथ से शीश की तरफ से पकड़ा और निगल गया। तब से उसका नाम काल पुरुष अथवा काल निरंजन हुआ।

कीनो ग्रास काल अन्याई। तब कन्या चित विस्मय लाई॥

ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा॥

जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम पुरुष को पुकार की, कहा कि काल निरंजन ने मुझे खा लिया है।

तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥

फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।

पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार। मोसन काल कीन्ह अधिकारा॥

तीन शीश मम भच्छन कीन्हो। हो सतपुरुष दया भल चीन्हो॥

यही चरित्र पुरुष भल जानी। दीन्हो शाप सो कहों बखानी॥

लच्छ जीव नित ग्रासन करहू। सवा लच्छ नित प्रति बिस्तरहू॥

परम पुरुष को ध्यान आया कि इसने पहले भी कूर्म का पेट फाड़कर पाँच तत्व का बीज निकाला था और अब इसने आदि-शक्ति को निगल लिया है। परम पुरुष को बुरा लगा, उन्होंने निरंजन को शाप दे दिया, कहा कि एक लाख जीवों को तू रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख को उत्पन्न करेगा।

पुनि कीन्ह पुरुष तिवान, तिहि छन मेटि डारो काल हो।

कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो।

यहि मेटत सबै मिटिहैं, बचन डोल अडोलसां॥

परम पुरुष ने विचार किया कि मैं काल पुरुष को मिटा देता हूँ, क्योंकि यह तो जीवों को बड़ा कष्ट देगा, पर फिर ध्यान आया कि मैंने तो इसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है, यदि मिटा दिया तो एक तो मेरा शब्द कट जायेगा और फिर सभी 16 पुत्रों को एक नाल में पियेगा है, यदि एक को भी मिटाया तो सभी मिट जायेंगे।

डोलै वचन हमार, जो अब मेटा धरम को।

वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥

उसे मिटाने से शब्द कट जाता था, इसलिए शाप दिया कि अब

मेरे देश में नहीं आ सकेगा, मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा।

जोगजीत कहँ तबहि बुलावा। धर्म चरित सब कहि समुझाया॥

जोगजीत तुम बेगि सिधारो। धर्मराय को मारि निकारो॥

मानसरोवर रहन न पावै। अब यह देस काल नहिं आवै॥

धर्म के उदर माहिं है नारी। तासो कहो निज शब्द सम्हारी॥

उदर फारि के बाहर आवे। कूर्म उदर विदार फल पावै॥

धर्मराय सों कहो विलोई। वहै नारि अब तुम्हरी होई॥

जाकर रहो धर्म वहि देश। स्वर्ग मृत्यु पाताल नरेश॥

परम पुरुष ने योगजीत (कबीर साहिब) को बुलाया। वास्तव में परम पुरुष स्वयं ही योगजीत हुए। उन्होंने स्वयं को मथ ज्ञानी पुरुष कबीर साहिब को निकाला और कहा कि निरंजन को मानसरोवर से निकाल दो, अब वो मेरे देश में नहीं आयेगा। उसके पेट में आद्य-शक्ति है, उससे कहना कि मेरा ध्यान करके उसके पेट को फाड़ बाहर आ जाए ताकि निरंजन ने जो कूर्म का पेट फाड़ा था, उसे उसका फल मिल जाए और निरंजन से कहना कि वो स्त्री अब तुम्हारी हो गयी, तुमने जहाँ स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक और पाताल लोक की रचना की है, वहीं जाकर रहो, वहाँ के तुम राजा हो।

जोगजीत चल भे सिर नाई। मानसरोवर पहुँचे जाई॥

जोगजीत को देखा जबहीं। अति भो काल भयंकर तबहीं॥

पूछा काल कौन तुम आहू। कौन काज तुम यहाँ सिधाहू॥

परम पुरुष को प्रणाम कर योगजीत मानसरोवर में आए। जब निरंजन ने योगजीत को देखा तो बड़ा क्रोध किया, भयंकर हो गया, पूछा—कौन हो और यहाँ क्यों आए हो?

जोगजीत अस कहे पुकारी। अहो धर्म तुम ग्रासेहु नारी॥

आज्ञा पुरुष दीन्ह यह मोही। इहिते बेगि निकारो तोही॥

जोगजीत कन्या को कहिया। नारि काहे उदर महाँ रहिया॥

उदर फारि अब आवहु बाहर। पुरुष तेज सुमिरो तोहि ठाहर॥

योगजीत ने कहा कि तुमने आद्य-शक्ति को निगल लिया है, परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, तुम्हें यहाँ से निकालना है। तब योगजीत ने कन्या से कहा कि इसके पेट में क्यों बैठी हो, परम पुरुष की सुरति करके इसका पेट फाड़कर बाहर आ जाओ।

सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ। जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ॥
जोगजीत तब कीन्हे ध्याना। पुरुष प्रताप तेज उर आना॥
पुरुष आज्ञा भई तेहि काला। मारहु सुरति लिलार कराला॥
जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा। जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥

यह सुन निरंजन क्रोधित होकर लड़ने के लिए योगजीत के सम्मुख आया। योगजीत ने तब परम-पुरुष का ध्यान करके उनके तेज को लिया और निरंजन पर सुरति फेंकी, जिससे वो बेहोश होकर गिर पड़ा।

गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोक से न्यार हो॥
भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥
निरसि कन्या उदर ते, पुनि देख धर्महि अति डरी॥
अब नहिं देखों देस वह, कहो कौन विधि कहँवा परी॥

तब योगजीत ने उसकी भुजा पकड़कर उसे अमर लोक से नीचे शून्य में फेंक दिया। वहाँ योगजीत के डर से संभलकर उठा और उसके पेट से कन्या बाहर निकल आई। निरंजन को देख कन्या डरने लगी और सोचने लगी कि यहाँ कैसे आ गयी। अब उस देश में नहीं जा पाऊँगी।

कामिनी रही सकाय, त्रासित काल डर अधिका।

रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खड़ी॥

आद्य-शक्ति काल निरंजन से डरने लगी और शीश नवाकर वहाँ पास में खड़ी हो गयी।

कहे धर्म सुनु आदि कुमारी। अब जनि डरपो त्रास हमारी॥
पुरुष रचा तोहि हमरे काजा। इक मति होय करहु उपराजा॥
हम हैं पुरुष तुमहिं हो नारी। अब जनि डरपो त्रास हमारी॥

निरंजन ने शक्ति से कहा कि हे कुमारी, मुझसे मत डरो, परम पुरुष ने तुम्हें मेरे काम के लिए रचा है, इसलिए दोनों मिलकर राज्य करते हैं। मैं पुरुष हूँ और तुम मेरी नारी हो, मुझसे मत डरो।

कहे कन्या कैसे बोलहु बानी। भ्राता जेठ प्रथम हम जानी॥
कन्या कहै सुनो हो ताता। ऐसी विधि जनि बोलहु बाता॥
अब मैं पुत्री भई तुम्हारी। ताते उदर माँझ लियो डारी॥
जेठ बंधु प्रथमहि के नाता। अब तो अहो हमारे ताता॥
निरमल दृष्टि अब चितवहु मोही। नहिं तो पाप होय अब तोही॥

आदि-शक्ति ने कहा कि यह कैसी बात बोल रहे हो। पहले नाते से तो तुम मेरे बड़े भाई हो चुके हो, क्योंकि परम पुरुष के बच्चे हैं हम और दूसरे नाते से मैं तुम्हारी पुत्री हो गयी हूँ, क्योंकि तुमने मुझे पेट में डाल लिया था और वहाँ से मैं निकली हूँ, इसलिए तुम मेरे पिता हो गये हो। अब तुम मुझे निर्मल दृष्टि से देखो अन्यथा तुम्हें पाप लगेगा।
कहे निरंजन सुनो भवानी। यह मैं तोहि कहों सहिदानी॥
पाप पुण्य डर हम नहिं डरता। पाप पुण्य के हमहीं करता॥
पाप पुण्य हमहीं से होई। लेखा मोर न लेहै कोई॥
पाप पुण्य हम करम पसार। जो बूझो सो होय हमारा॥
ताते तोहि कहों समुझाई। सिख हमार लो सीस चढ़ाई॥
पुरुष दीन तोहि हम कहँ जानी। मानहु कहा हमार भवानी॥

निरंजन ने कहा कि मैं पाप पुण्य से नहीं डरता हूँ, क्योंकि पाप पुण्य का कर्ता मैं ही हूँ, मेरे पाप पुण्य का हिसाब लेने वाला कोई नहीं है और आगे मैं पाप पुण्य कर्मों का जाल ही फैलाऊँगा और जो इनमें उलझ जायेगा, वो कहीं नहीं जा पायेगा, हमारा ही रहेगा।

विहंसी कन्या सुन अस बाता। इक मतिहोय दोइ रंगराता॥
हरस वचन बोली मृदु बानी। नारी नीच बुधि रति विधि ठानी॥
रहस वचन सुन धरम हरषाना। भोग करन को मन में आना॥

आद्य-शक्ति तब हँसते हुए उसके साथ एकमत हो गयी,
उसकी बात मान ली और मीठी वाणी बोलकर गुप्त बात कही और
निरंजन के साथ रहने का निश्चय कर लिया।

भग न कन्या के हती, अस चरित कीन्ह निरंजना।
नख घात किये भग द्वार तत छिन, घाट उत्पति गंजना॥
नख रेष शोनित चला, तिहुँ को सब खास आरंभनी।
आदि उत्पति सुनहु धर्मनि, कोइ नहिं जानत जम मनी॥
त्रियवार कीन्ही रति तबै, भये ब्रह्मा विष्णु महेश हो।
जेठे विधि विष्णु लघु तिहि, तीजे शम्भू सेष हो॥
तेहि पीछे ऐसा भो लेखा। धर्मदास तुम करो विवेका॥
अग्नि पवन जल महि अकाशा। कूर्म उदर ते भयो प्रकाशा॥
पाँचों अंस ताहि सन लीन्हा। गुण तीनों सीसन सों कीन्हा॥
यहि विधि भये तत्व गुण तीनों। धर्मराय तब रचना कीनो॥

साहिब धर्मदाससे कहते हैं कि कूर्म जी के पेट से पाँच तत्व
निकले थे और उसके तीन शीश निरंजन ने खा लिये थे, उन्हीं से तीन
गुण—रजगुण (ब्रह्मा जी), सत्गुण (विष्णु जी), और तमगुण (शिवजी)
हुए। पाँच तत्व और तीन गुणों से निरंजन ने सब रचना की।

गुन तत सम कर देविहिं दीन्हा। आपन अंस उत्पन कीन्हा॥
बुंद तीन कन्या भग डारा। ता सँग तीनो अंस सुधारा॥
पाँच तत्व गुण तीनों दीन्हा। यहि विधि जग की रचना कीन्हा॥
प्रथम बुंद ते ब्रह्मा भयऊ। रज गुण पंच तत्व तेहि दयऊ॥
दूजो बुंद बिस्नु जो भयऊ। सत्गुण पंच तत्व तिन पयऊ॥

तीजे बृंद रुद्र उत्पाने । तमगुण पंच तत्व तेहि साने ॥
पंच तत्व गुण तीन खमीरा । तीनों जन को रच्यो शरीरा ॥

तीन गुण और पाँच तत्वों को मिलाकर निरंजन ने अपने पुत्र उत्पन्न किये और इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण देकर जगत् की रचना की । प्रथम रजगुण के साथ पाँच तत्व दिये, जिससे ब्रह्मा जी हुए और सतगुण के साथ पाँच तत्व दिये तो विष्णु जी हुए और तमगुण के साथ पाँच तत्व देने से शिवजी हुए । इस तरह पाँच तत्व और तीन गुण से तीनों शरीरों की रचना की ।

कहेउ बहुत बुझाय देविहि, गुप्त भये तब आहि हो ।

शून्य गुफहि निवास कीन्हो, भेद लह को ताहि हो ॥

वह गुप्त भा पुनि संग सबके, मन निरंजन जानिये ।

मन पुरुष ध्यान उच्छेद देवे, आपु परगट आनिये ॥

निरंजन गुप्त होकर शून्य में समा गया और मन रूप में सबके साथ हो गया । यही मन परम पुरुष का ध्यान नहीं करने देता है ।

यह 24 घंटे तपस्या कर रहा है । एक पल के लिए भी सो नहीं रहा है । 24 घंटे आपको भ्रमित कर रहा है । इस तरह इस मन से बड़ा तपस्वी भी कोई नहीं है ।

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मैं 'मन' ही सृष्टि से परे ररंकार हूँ ॥

मैं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ ।

मैं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ ।

मैं ही सप्त आकाश और सप्तसागर पाताल हूँ ।

मैं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ ।

मन के अवतार

मन के अवतार


संतो आवै जाय सो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिं वाके, ना कहूँ गया ना आया ॥
का मकसूद मच्छ कछ होई, संखासुर न संघारा ।
है दयाल द्रोह नहिं वाके, कहहु कवन को मारा ॥
वै करता नहिं वराह कहाये, धरनि धरो नहिं भारा ।
ई सभ काम साहब के नाहीं, झूठ कहै संसारा ॥
खंभ खोरि जो बाहर होई, ताहि पतिजे सभ कोई ।
हरनाकुस नख ओद्र विदारा, सो करता नहिं होई ॥
बावन रूप बलि को जांचे, जो जांचे सो माया ।
बिना विवेक सकल जग भरमे, माये जग भरमाया ॥
परसुराम छत्री नहिं मारे, ई छल माया कीन्हा ।
सतगुरु भेद भगति नहिं जाने, जीवहिं मिथ्या दीन्हा ॥
सिरजनहार न व्याही सीता, जल पखान नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एक कै सुमिरै, जो सुमिरै सो अंधा ॥
गोपी ग्वाल न गोकुल आया, करते कंस न मारा ।
है मेहरबान सभहिन को साहिब, नहिं जीता नहिं हारा ॥
वै करता नहिं बौध कहाये, नहीं असुर संहारा ।
ग्यनहीन करता के भरमे, माये जग भरमाया ॥
वै करता नहिं भया कलंकी, नहिं कलिग्रहिं मारा ।
ई छल बल सब माया कीन्हा, जत्त सभ टारा ॥

दस अवतार ईसवरी माया, करता कै जिन पूजा।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, उपजै खपै सो दूजा॥

जो जन्म लेता है और फिर मर जाता है, वो माया है; जो रक्षा करने वाला सच्चा साहिब है, उसकी मृत्यु नहीं होती है; वो इस संसार के आवागमन में नहीं आता। दुनिया ने अवतार को अपना सच्चा साहिब (परम-पुरुष) मान लिया। साहिब कह रहे हैं कि मत्स्य, कच्छप आदि अवतार धारण करने का मकसद ही क्या था! यानी सब उसके ही बच्चे थे तो कुछ के लिए रक्षक तो कुछ के लिए भक्षक क्यों बना, इसलिए कह रहे हैं कि उस साहिब ने संखासुर दैत्य को नहीं मारा, क्योंकि वो साहिब तो दयाल है, किसी से उनकी दुश्मनी नहीं है, सब आत्माएँ उसी की अंश हैं, फिर किसे मारेंगे, फिर किसे कष्ट देंगे!! यह मारना-काटना अच्छी बात नहीं है, क्रूरता है, हिंसात्मक कार्य है, इसलिए यह काम साहिब का नहीं है। वो साहिब बराह बनकर भी नहीं आया और न ही उसने धरती का बोझ ही उठाया। ये सब काम साहिब के नहीं हैं, पर दुनिया झूठे ही इसे साहिब के काम कहती है। फिर जो नरसिंह रूप में खंभा फोड़कर बाहर आए, सबने उसी को सच्चा साहिब मान लिया, पर हिरण्यकश्यप के पेट को नाखून से फाड़ने वाला भी साहिब नहीं था। फिर बावन रूप बनाकर जिसने राजा बलि से तीन पग धरती माँगी, वो भी साहिब नहीं था। वो साहिब किसी से कुछ नहीं माँगता। वो तो दाता है, माँगने वाला नहीं। इसलिए इन बातों पर विचार किये बिना सारा संसार भ्रमित हो गया, इन्हीं अवतारों को अपना सच्चा साहिब समझने लग गया। इस तरह उस निरंजन की माया ने सारे संसार को भ्रमित कर दिया। फिर वो परशुराम बनकर भी नहीं आया, क्षत्रियों को नहीं मारा। यह छल माया ने ही किया। सद्गुरु की भक्ति के रहस्य को जाने बिना लोगों ने अपना जीवन व्यर्थ कर दिया। आगे कह रहे हैं कि उस साहिब ने सीता से ब्याह नहीं किया। पिता पुत्री से विवाह कर ही कैसे सकता है! ना ही उसने समुद्र को पत्थरों से बाँधा। इसलिए वो मूर्ख है जो बिना

इन बातों पर विचार किये भक्ति करता है। फिर वो साहिब गोपियों-ग्वालों को संग खेलने गोकुल में नहीं आया और न ही भक्षक वाले काम करके कंस को मारा। वो साहिब तो सब पर मेहरबान है, न किसी से जीतता है, न हारता है। वो साहिब बुद्ध बनकर भी नहीं आए, उन्होंने राक्षसों को भी नहीं मारा। सच्चे साहिब के ज्ञान बिना मनुष्य भ्रमित हो गया। माया ने सबको भ्रमित कर दिया। फिर वो कलकी अवतार लेकर भी नहीं आया, कलिंग के लोगों को नहीं मारा। यह सब छल तो माया ने ही किया, योगियों, यतियों, सत्यवादियों, सबको टरका दिया। जैसे बच्चा हवाई जहाज़ लेना चाहता है, जिद् करता है तो उसे झूठे, नकली खिलौने वाले जहाज़ से टरका दिया जाता है, ऐसे ही माया ने बड़े-बड़ों को झूठ से टरका दिया। दस अवतार जो हुए, वो सब निरंजन की माया थी (निरंजन को ही ईश्वर कहा जाता है, परमात्मा कहा जाता है), जिसे सारा संसार साहिब समझकर, परम सत्ता समझकर पूजता है। साहिब कह रहे हैं, हे लोगो! मेरी बात सुनो और उस पर विचार करो, जो इस संसार में माया का शरीर लेकर जन्म लेता है और मर जाता है, वो साहिब नहीं है, कोई और (निरंजन) है।

काल-पुरुष ने साहिब से विनती करके कलयुग में उनके नाम पर 12 पंथों को तो चलाने का शब्द लिया, क्योंकि कलयुग में ही साहिब बहुत जीवों को नाम देकर अमर-लोक पहुँचाते हैं। बाकी तीन युग साहिब थोड़े-थोड़े जीवों को ही ले जाते हैं। इन तीन युगों में निरंजन स्वयं संसार में अवतार धारण करके आता है और हीरो तथा रक्षक बनकर जीवों को भ्रमित करता है। जीव वहीं मग्न रहते हैं।

धर्मदास को अवतारों की कथा कहते हुए साहिब कह रहे हैं—
जबहिं राम लंका से आये। अयोध्या कोट उठावन लाये ॥
लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा। सुदिन जान कै तब निव दीन्हा ॥
उठत कोट सो भय अस शोरा। है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥
सुन अस वचन राम रघुराई। खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥

चहुँ दिश खनै जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥
लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥
भौँह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥
देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥
छाड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥

राम जी लंका से वापिस आ चुके थे, अपना राज काज कर रहे थे । एक समय अच्छा मुहूर्त जानकर वो लक्ष्मण के साथ एक जगह महल की नींव डलवा रहे थे । इतने में उन्हें लगा कि नीचे कुछ है । यह सोचकर राम जी ने खोदने की आज्ञा दी । खोदने पर वहाँ एक तपस्वी दिखाई दिया, जो तप कर रहा था । उसे देखकर सब डर गये कि कहीं यह शाप न दे दे । जब उसने समाधि छोड़कर आँख खोली तो राम जी ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया ।

बोलो वचन ऋषी तब, को हो को कहु मोहि ॥

रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सब तोहि ॥

ऋषि ने कहा कि तुम कौन हो, मुझसे कहो ? देखने में तो तुम राजा लगते हो ।

दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥
ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कब करब भुवारा ॥
हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥
कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाड़ो कोट कहा सुन मोरा ॥
राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥
लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म की को कह्यो प्रभाऊ ॥
आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहै सब कोई ॥
दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एक दिवस पित्रन को जाना ॥
वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥
बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो बखाना ॥
सस मनु जबही जाइ बिगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥

सस इंद्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई बिनाशा ॥

राम जी ने कहा कि मेरा नाम राम है और मैं दशरथ जी का बेटा हूँ। मैं पास में ही अवधपुर में रहता हूँ। ऋषि ने कहा कि राम का अवतार हो गया। राम जी ने कहा कि हे ऋषिराज, मैं चाहता हूँ कि संसार में मेरी कीर्ति हो, मेरा नाम रहे। ऋषि ने कहा कि हे राम, संसार में जीवन थोड़ा ही है, इसलिए महलों को छोड़ो। राम जी ने ऋषि से पूछा कि आप अपना भेद कहें, बताएँ कि आपको तप करते हुए कितना समय हुआ है ? ऋषि ने कहा कि मेरा नाम लोमश ऋषि है। आठ पहर होते हैं तो एक दिन और रात होती है। जब कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष—दोनों पक्षों के सारे पहर पूरे हो जाते हैं यानी 12 महीनों के सारे पक्ष हो जाते हैं, एक साल हो जाता है, तो पितरों का एक दिन होता है। जब पितरों को एक साल हो जाता है तो देवताओं का एक दिन होता है। जब देवों के 12 साल हो जाते हैं तो एक मनु होता है। सात मनु नष्ट हो जाते हैं तब एक इंद्र होता है। सात इंद्र हो जाते हैं तब एक ब्रह्मा का नाश होता है।

सस ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥

सस विष्णु जब बीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥

जब सात ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, तब एक विष्णु जी का नाश होता है और जब सात विष्णु जी हो जाते हैं तब एक शिवजी का नाश होता है। सोरा रुद्र गति जब होई। तब इक रोम मम परे खसोई ॥ तातैं लोमस नाम है मोरा। करा समाध जीतबै है थोरा ॥

लोमस ऋषि ने कहा कि जब 16 शिवजी नष्ट हो जाते हैं, तब मेरा एक रोम नष्ट होता है।

जान्यो जन्म अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥

निराकार निरंजन, तासु मर्म न जान ॥

जीवन की अवधि थोड़ी जानकर तब राम जी स्वर्ग में चले गये। पर निराकार, निरंजन का भेद मालूम न पड़ा।

त्याग्यो राजपाट बंधु चारी। गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥

आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारै ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फाँस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्यनाम नहिं पावै ॥

चारों भाई राजपाट छोड़ सरयू नदी में शरीर त्यागकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गये । फिर इच्छा से दुबारा कृष्ण रूप में जन्म लिया । साहिब कह रहे हैं कि जिस राम को दुनिया जपती है, उनका ऐसा व्यवहार रहा । कई जीव मार दिये गये । यह काल बड़ा ही प्रचंड है, जो त्रिदेव को भी मार देता है । जब तक सत्य नाम की प्राप्ति नहीं हो जाती, जीव काल के जाल से मुक्त नहीं हो सकता है ।

आगे साहिब धर्मदास से कह रहे हैं—

सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊँ । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊँ ॥

कह रहे हैं कि अब मैं तुम्हें कृष्णावतार की बात बताता हूँ ।
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्त्र गोपी निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करें नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरि के गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्या सुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव बैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बल पौरुष जिहिं कै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आँखी ॥

चल्यो दैत्य आयो हरि पाहीं। सखा संग जहँ बाल कन्हाई ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही। चपट कै मार्यो है हरि ताही ॥

त्रेतायुग में रामजी ने एक स्त्री के वियोग का दुख सहा, इसलिए कृष्णावतार ने 16 हजार गोपियों को उत्पन्न किया और फिर स्वयं देवकी की कोख से जन्म लेकर आए। कंस को खबर हुई तो उसने कागासुर, पूतना आदि अनेक दैत्यों को भेजा, जिन्हें बाल कृष्ण ने मार गिराया।

बहु क्रीड़ा हरि कीन्हीं, जानत नाहिं न कोय ॥

अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वार्थी होय ॥

इस तरह कृष्ण जी ने संसारी जीवों की नजर में बड़ी लीलाएँ कीं।

मारत तासु वार न लावा। ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥

रावन कुंभकरन जा मारा। ताको जन्म शिशुपाल अवतारा ॥

चलत कृष्ण गोपिन किए शोभा। संग भले तब जादों लोगा ॥

मारन कौँ हरि मता जो ठाना। मधुरा से हरि कीन्ह पयाना ॥

मुष्ट चार और दोड़ खंडावा। सब असुरहिं कंस गुहरावा ॥

रंग भूमि नृप कंस बनावा। काल रंग भूमि ही आवा ॥

चल भए कृष्ण जहाँ कहँ तबही। कुबरी को सम्मान कियो जबही ॥

पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा। भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥

शिशुपाल, पाली हुई बकरी सहित बड़े-बड़ों को मारा। फिर गोपियों के साथ सांसारिक जीवों की नजर में लीलाएँ की और कंस द्वारा भेजे गये कई असुरों और पहलवानों को मारा। कंस की दासी कुबरी को पूर्व जन्म की भक्ति के कारण रति दान दिया।

कंस मार हरि गोकुल गएऊ। गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥

फिर कंस को मारा।

एक बार शिशुपाल भुवारा। कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥

मार्यो तबै दैत्य बल बीरा। निकसे प्राण जो छाड़ शरीरा ॥

सब के देखत कृष्ण जो खावा। तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥

सब के देखत ग्रास जो कीन्हा । तासों कहैं मुक्ति हरि दीन्हा ॥

शिशुपाल का संहार भी किया । इतने लोग मारे गये । यह सब देखते हुए भी जीवों को काल का स्वभाव पता न चला । दुनिया ने इसे मुक्ति मान लिया । मारे जाने पर दुनिया कहती है कि प्रभु ने मुक्ति दे दी ।

काल सबन को ग्रास्यो, वचन कह्यो समुझाय ॥

कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥

साहिब कह रहे हैं कि काल सबको ग्रसित कर लेता है, सबको मार डालता है, सबको खा जाता है । मैं कैसे समझाऊँ, कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता है ।

ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥

तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

जिस तरह कोई स्त्री पतिव्रत धर्म को छोड़कर दूसरे से प्रेम करती है, ऐसे ही यह संसार परम-पुरुष की भक्ति को छोड़ काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है । नाम के बिना यह जीव कैसे पार हो सकता है !

भूल परी सब दुनिया, पाखंड के व्यवहार ॥

मूल छाड़ि डारै गहै, कैसे उतरे पार ॥

सारी दुनिया पाखण्ड के व्यवहार में भूली हुई है और मूल को छोड़कर डालियों को पकड़े हुए हैं; फिर पार कैसे हो सकती है !

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिल व्यवहारा ॥

पांडव पाँच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥

मारन तासु को मतौ विचारा । पांडव कौरव नृप दोइ मारा ॥

दोनों में छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहिं जाना ॥

बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहाँ आई ॥

राजा द्रुपद स्वयंबर ठाना । तहाँ पारथ राहू संघाना ॥

दुर्योधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥

कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पाँच पति भावा ॥

तेहि मारन हेर मतौ विचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥

कौरव आई जो करहि लड़ाई। ताहि कृष्ण छल से मरवाई ॥
मार्यो करण गंगसुत द्रोना। सबको मारि कियो दल सूना ॥
मार्यो दुर्घोधन जो राई। अठारह क्षोहणी मार गिराई ॥

तब फिर कृष्ण जी ने बड़े चरित्र किये। पाँच पाण्डव उनकी बड़ी सेवा करते थे, जिन्हें वे बड़ा प्यार करते थे। फिर दोनों में वैर उत्पन्न किया गया। सब मारे गये, जिसे कोई समझ नहीं पाया। गंगासुत भीष्म, करण आदि कई छल से मारे गये।

पाँचों पांडव बचि रहे, औ बूझो सब झार ॥

धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥

पाँच पाण्डवों को छोड़कर बाकी सब मारे गये। यह सब काल का तमाशा था। तब कृष्ण जी को निरंजन ने बुलाया।

चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना। शून्य आदि जहँ शशि नहिं भाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ। तहाँ जाइ के स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर्धामी। सब तें न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया। पाँचों तत्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा। आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी। करहु दया तुम अन्तरयामी ॥
ततक्षण भई आकाश तें वाणी। अहो कृष्ण सबको उत्पानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी। सोई वचन सेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु। असुरन को विध्वंस के मारहु ॥

तब कृष्ण जी शून्य में वहाँ गये, जहाँ न सूर्य था न चाँद। वैकुण्ठ से भी आगे जाकर अलख निरंजन की स्तुति की और पूछा कि क्या चाहते हैं? तब आकाशवाणी हुई कि तुम्हें धरती का भार उतारने को भेजा गया है, असुरों का विध्वंस करने भेजा है।

मारहु यादव वंश कहाँ, मानो वचन रसाल ॥

गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल ॥

निरंजन ने कहा कि अब तुम यादव वंश का भी नाश करो और काल बनकर गोपियों का भी संहार करो, सबको मारो।

कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना ॥

कृष्ण जी ने कहा कि काल के आगे मेरा क्या स्थान है ?

तैं मम अंश मोहि में बासा । काल रूप संसार निवासा ॥

पातक जीव जो रहै महाबल । मारहु तिनहि तुम अतिबल ॥

उपजत विनसत क्षीण भड़ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥

क्षीण शरीर अवधि भड़ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥

जस कछु कहो किया सो चहिहौ । जाको दिया राज महि करिहौ ॥

छाड़ो महि मंडल को भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥

तजो कृष्ण अब बेग शरीरू । आये अत्र अब दास कबीरू ॥

निरंजन ने कहा कि तुम मेरे अंश हो और काल रूप होकर संसार में निवास कर रहे हो । जो पापी जीव हैं, उन्हें छल, बल से, किसी भी तरह से मारो । पर अब कलियुग आ रहा है, जीवन की अवधि थोड़ी होगी, इसलिए अब तुम शीघ्र ही शरीर त्यागकर वापिस अपने धाम आ जाओ, क्योंकि अब धरती पर कबीरदास आने वाले हैं।

सुन कियो कृष्ण अचंभो, कै सो दास कबीर ॥

सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरीर ॥

कबीर दास का नाम सुन कृष्ण जी आश्चर्यचकित हुए, कहा कि ये कबीर दास कौन हैं, मुझे बताओ, तब मैं शरीर का त्याग करूँ।

कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहि अवधि है थोरा ॥

पांडव नन्दन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबही निवतजु आवही ॥

यज्ञ पूर्ण नहीं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहीं कोई ॥

कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू ॥

तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूर्ण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥

या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥