मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 75, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना ॥
कृष्ण जी ने कहा कि काल के आगे मेरा क्या स्थान है ?
तैं मम अंश मोहि में बासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहु तिनहि तुम अतिबल ॥
उपजत विनसत क्षीण भड़ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भड़ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो किया सो चहिहौ । जाको दिया राज महि करिहौ ॥
छाड़ो महि मंडल को भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब बेग शरीरू । आये अत्र अब दास कबीरू ॥
निरंजन ने कहा कि तुम मेरे अंश हो और काल रूप होकर संसार में निवास कर रहे हो । जो पापी जीव हैं, उन्हें छल, बल से, किसी भी तरह से मारो । पर अब कलियुग आ रहा है, जीवन की अवधि थोड़ी होगी, इसलिए अब तुम शीघ्र ही शरीर त्यागकर वापिस अपने धाम आ जाओ, क्योंकि अब धरती पर कबीरदास आने वाले हैं।
सुन कियो कृष्ण अचंभो, कै सो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरीर ॥
कबीर दास का नाम सुन कृष्ण जी आश्चर्यचकित हुए, कहा कि ये कबीर दास कौन हैं, मुझे बताओ, तब मैं शरीर का त्याग करूँ।
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहि अवधि है थोरा ॥
पांडव नन्दन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबही निवतजु आवही ॥
यज्ञ पूर्ण नहीं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहीं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू ॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूर्ण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥