भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होऊ व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या क्रिया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चले भये कृष्ण बार नहीं लाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्ण सभा सिर नावा । भोजन को अब आज्ञा पावा ॥

निरंजन ने कहा कि कलयुग में मनुष्य की अवधि थोड़ी ही है । पाण्डव यज्ञ की रचना करेंगे, जिसमें सभी ऋषिगण आयेंगे, पर उन सबके भोजन करने से भी यज्ञ पूर्ण नहीं होगा, क्योंकि कोई भी नाम के प्रताप को नहीं जानता है । कलयुग में कबीर दास मनुष्य रूप में आयेंगे । उनके शिष्य सुपच के प्रताप से ही यज्ञ पूर्ण होगा । तुमने रामावतार में बालि को मारा था, सो उसका व्याध रूप में जन्म होगा । तुम उसका बदला दो ताकि जीवों को कोई संशय न रहे । यह सुन कृष्ण जी वापिस द्वारिका नगरी आए ।

सो निरंजन के कहे अनुसार पाण्डवों ने यज्ञ करवाया । बंधुओं की हत्या हुई थी, इसलिए यज्ञ रचा गया । कृष्ण जी ने कहा कि भोजन का आमंत्रण दो ।

बैठे गन्धर्व देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥

सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥

सब ऋषि, मुनियों ने इच्छानुसार भोजन किया ।

भोजन भये घंट नहीं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सो मोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुरु महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥

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