भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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सस इंद्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई बिनाशा ॥

राम जी ने कहा कि मेरा नाम राम है और मैं दशरथ जी का बेटा हूँ। मैं पास में ही अवधपुर में रहता हूँ। ऋषि ने कहा कि राम का अवतार हो गया। राम जी ने कहा कि हे ऋषिराज, मैं चाहता हूँ कि संसार में मेरी कीर्ति हो, मेरा नाम रहे। ऋषि ने कहा कि हे राम, संसार में जीवन थोड़ा ही है, इसलिए महलों को छोड़ो। राम जी ने ऋषि से पूछा कि आप अपना भेद कहें, बताएँ कि आपको तप करते हुए कितना समय हुआ है ? ऋषि ने कहा कि मेरा नाम लोमश ऋषि है। आठ पहर होते हैं तो एक दिन और रात होती है। जब कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष—दोनों पक्षों के सारे पहर पूरे हो जाते हैं यानी 12 महीनों के सारे पक्ष हो जाते हैं, एक साल हो जाता है, तो पितरों का एक दिन होता है। जब पितरों को एक साल हो जाता है तो देवताओं का एक दिन होता है। जब देवों के 12 साल हो जाते हैं तो एक मनु होता है। सात मनु नष्ट हो जाते हैं तब एक इंद्र होता है। सात इंद्र हो जाते हैं तब एक ब्रह्मा का नाश होता है।

सस ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥

सस विष्णु जब बीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥

जब सात ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, तब एक विष्णु जी का नाश होता है और जब सात विष्णु जी हो जाते हैं तब एक शिवजी का नाश होता है। सोरा रुद्र गति जब होई। तब इक रोम मम परे खसोई ॥ तातैं लोमस नाम है मोरा। करा समाध जीतबै है थोरा ॥

लोमस ऋषि ने कहा कि जब 16 शिवजी नष्ट हो जाते हैं, तब मेरा एक रोम नष्ट होता है।

जान्यो जन्म अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥

निराकार निरंजन, तासु मर्म न जान ॥

जीवन की अवधि थोड़ी जानकर तब राम जी स्वर्ग में चले गये। पर निराकार, निरंजन का भेद मालूम न पड़ा।

त्याग्यो राजपाट बंधु चारी। गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥