भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

सस इंद्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई बिनाशा ॥

राम जी ने कहा कि मेरा नाम राम है और मैं दशरथ जी का बेटा हूँ। मैं पास में ही अवधपुर में रहता हूँ। ऋषि ने कहा कि राम का अवतार हो गया। राम जी ने कहा कि हे ऋषिराज, मैं चाहता हूँ कि संसार में मेरी कीर्ति हो, मेरा नाम रहे। ऋषि ने कहा कि हे राम, संसार में जीवन थोड़ा ही है, इसलिए महलों को छोड़ो। राम जी ने ऋषि से पूछा कि आप अपना भेद कहें, बताएँ कि आपको तप करते हुए कितना समय हुआ है ? ऋषि ने कहा कि मेरा नाम लोमश ऋषि है। आठ पहर होते हैं तो एक दिन और रात होती है। जब कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष—दोनों पक्षों के सारे पहर पूरे हो जाते हैं यानी 12 महीनों के सारे पक्ष हो जाते हैं, एक साल हो जाता है, तो पितरों का एक दिन होता है। जब पितरों को एक साल हो जाता है तो देवताओं का एक दिन होता है। जब देवों के 12 साल हो जाते हैं तो एक मनु होता है। सात मनु नष्ट हो जाते हैं तब एक इंद्र होता है। सात इंद्र हो जाते हैं तब एक ब्रह्मा का नाश होता है।

सस ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥

सस विष्णु जब बीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥

जब सात ब्रह्मा नष्ट हो जाते हैं, तब एक विष्णु जी का नाश होता है और जब सात विष्णु जी हो जाते हैं तब एक शिवजी का नाश होता है। सोरा रुद्र गति जब होई। तब इक रोम मम परे खसोई ॥ तातैं लोमस नाम है मोरा। करा समाध जीतबै है थोरा ॥

लोमस ऋषि ने कहा कि जब 16 शिवजी नष्ट हो जाते हैं, तब मेरा एक रोम नष्ट होता है।

जान्यो जन्म अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥

निराकार निरंजन, तासु मर्म न जान ॥

जीवन की अवधि थोड़ी जानकर तब राम जी स्वर्ग में चले गये। पर निराकार, निरंजन का भेद मालूम न पड़ा।

त्याग्यो राजपाट बंधु चारी। गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥

आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारै ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फाँस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्यनाम नहिं पावै ॥

चारों भाई राजपाट छोड़ सरयू नदी में शरीर त्यागकर स्वर्ग को प्रस्थान कर गये । फिर इच्छा से दुबारा कृष्ण रूप में जन्म लिया । साहिब कह रहे हैं कि जिस राम को दुनिया जपती है, उनका ऐसा व्यवहार रहा । कई जीव मार दिये गये । यह काल बड़ा ही प्रचंड है, जो त्रिदेव को भी मार देता है । जब तक सत्य नाम की प्राप्ति नहीं हो जाती, जीव काल के जाल से मुक्त नहीं हो सकता है ।

आगे साहिब धर्मदास से कह रहे हैं—

सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊँ । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊँ ॥

कह रहे हैं कि अब मैं तुम्हें कृष्णावतार की बात बताता हूँ ।
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्त्र गोपी निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करें नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरि के गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्या सुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव बैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बल पौरुष जिहिं कै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आँखी ॥

चल्यो दैत्य आयो हरि पाहीं। सखा संग जहँ बाल कन्हाई ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही। चपट कै मार्यो है हरि ताही ॥

त्रेतायुग में रामजी ने एक स्त्री के वियोग का दुख सहा, इसलिए कृष्णावतार ने 16 हजार गोपियों को उत्पन्न किया और फिर स्वयं देवकी की कोख से जन्म लेकर आए। कंस को खबर हुई तो उसने कागासुर, पूतना आदि अनेक दैत्यों को भेजा, जिन्हें बाल कृष्ण ने मार गिराया।

बहु क्रीड़ा हरि कीन्हीं, जानत नाहिं न कोय ॥

अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वार्थी होय ॥

इस तरह कृष्ण जी ने संसारी जीवों की नजर में बड़ी लीलाएँ कीं।

मारत तासु वार न लावा। ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥

रावन कुंभकरन जा मारा। ताको जन्म शिशुपाल अवतारा ॥

चलत कृष्ण गोपिन किए शोभा। संग भले तब जादों लोगा ॥

मारन कौँ हरि मता जो ठाना। मधुरा से हरि कीन्ह पयाना ॥

मुष्ट चार और दोड़ खंडावा। सब असुरहिं कंस गुहरावा ॥

रंग भूमि नृप कंस बनावा। काल रंग भूमि ही आवा ॥

चल भए कृष्ण जहाँ कहँ तबही। कुबरी को सम्मान कियो जबही ॥

पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा। भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥

शिशुपाल, पाली हुई बकरी सहित बड़े-बड़ों को मारा। फिर गोपियों के साथ सांसारिक जीवों की नजर में लीलाएँ की और कंस द्वारा भेजे गये कई असुरों और पहलवानों को मारा। कंस की दासी कुबरी को पूर्व जन्म की भक्ति के कारण रति दान दिया।

कंस मार हरि गोकुल गएऊ। गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥

फिर कंस को मारा।

एक बार शिशुपाल भुवारा। कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥

मार्यो तबै दैत्य बल बीरा। निकसे प्राण जो छाड़ शरीरा ॥

सब के देखत कृष्ण जो खावा। तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥

सब के देखत ग्रास जो कीन्हा । तासों कहैं मुक्ति हरि दीन्हा ॥

शिशुपाल का संहार भी किया । इतने लोग मारे गये । यह सब देखते हुए भी जीवों को काल का स्वभाव पता न चला । दुनिया ने इसे मुक्ति मान लिया । मारे जाने पर दुनिया कहती है कि प्रभु ने मुक्ति दे दी ।

काल सबन को ग्रास्यो, वचन कह्यो समुझाय ॥

कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥

साहिब कह रहे हैं कि काल सबको ग्रसित कर लेता है, सबको मार डालता है, सबको खा जाता है । मैं कैसे समझाऊँ, कोई मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करता है ।

ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥

तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

जिस तरह कोई स्त्री पतिव्रत धर्म को छोड़कर दूसरे से प्रेम करती है, ऐसे ही यह संसार परम-पुरुष की भक्ति को छोड़ काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है । नाम के बिना यह जीव कैसे पार हो सकता है !

भूल परी सब दुनिया, पाखंड के व्यवहार ॥

मूल छाड़ि डारै गहै, कैसे उतरे पार ॥

सारी दुनिया पाखण्ड के व्यवहार में भूली हुई है और मूल को छोड़कर डालियों को पकड़े हुए हैं; फिर पार कैसे हो सकती है !

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिल व्यवहारा ॥

पांडव पाँच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥

मारन तासु को मतौ विचारा । पांडव कौरव नृप दोइ मारा ॥

दोनों में छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहिं जाना ॥

बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहाँ आई ॥

राजा द्रुपद स्वयंबर ठाना । तहाँ पारथ राहू संघाना ॥

दुर्योधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥

कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पाँच पति भावा ॥

तेहि मारन हेर मतौ विचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥

कौरव आई जो करहि लड़ाई। ताहि कृष्ण छल से मरवाई ॥
मार्यो करण गंगसुत द्रोना। सबको मारि कियो दल सूना ॥
मार्यो दुर्घोधन जो राई। अठारह क्षोहणी मार गिराई ॥

तब फिर कृष्ण जी ने बड़े चरित्र किये। पाँच पाण्डव उनकी बड़ी सेवा करते थे, जिन्हें वे बड़ा प्यार करते थे। फिर दोनों में वैर उत्पन्न किया गया। सब मारे गये, जिसे कोई समझ नहीं पाया। गंगासुत भीष्म, करण आदि कई छल से मारे गये।

पाँचों पांडव बचि रहे, औ बूझो सब झार ॥

धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥

पाँच पाण्डवों को छोड़कर बाकी सब मारे गये। यह सब काल का तमाशा था। तब कृष्ण जी को निरंजन ने बुलाया।

चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना। शून्य आदि जहँ शशि नहिं भाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ। तहाँ जाइ के स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर्धामी। सब तें न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया। पाँचों तत्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा। आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी। करहु दया तुम अन्तरयामी ॥
ततक्षण भई आकाश तें वाणी। अहो कृष्ण सबको उत्पानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी। सोई वचन सेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु। असुरन को विध्वंस के मारहु ॥

तब कृष्ण जी शून्य में वहाँ गये, जहाँ न सूर्य था न चाँद। वैकुण्ठ से भी आगे जाकर अलख निरंजन की स्तुति की और पूछा कि क्या चाहते हैं? तब आकाशवाणी हुई कि तुम्हें धरती का भार उतारने को भेजा गया है, असुरों का विध्वंस करने भेजा है।

मारहु यादव वंश कहाँ, मानो वचन रसाल ॥

गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल ॥

निरंजन ने कहा कि अब तुम यादव वंश का भी नाश करो और काल बनकर गोपियों का भी संहार करो, सबको मारो।

कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना ॥

कृष्ण जी ने कहा कि काल के आगे मेरा क्या स्थान है ?

तैं मम अंश मोहि में बासा । काल रूप संसार निवासा ॥

पातक जीव जो रहै महाबल । मारहु तिनहि तुम अतिबल ॥

उपजत विनसत क्षीण भड़ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥

क्षीण शरीर अवधि भड़ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥

जस कछु कहो किया सो चहिहौ । जाको दिया राज महि करिहौ ॥

छाड़ो महि मंडल को भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥

तजो कृष्ण अब बेग शरीरू । आये अत्र अब दास कबीरू ॥

निरंजन ने कहा कि तुम मेरे अंश हो और काल रूप होकर संसार में निवास कर रहे हो । जो पापी जीव हैं, उन्हें छल, बल से, किसी भी तरह से मारो । पर अब कलियुग आ रहा है, जीवन की अवधि थोड़ी होगी, इसलिए अब तुम शीघ्र ही शरीर त्यागकर वापिस अपने धाम आ जाओ, क्योंकि अब धरती पर कबीरदास आने वाले हैं।

सुन कियो कृष्ण अचंभो, कै सो दास कबीर ॥

सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरीर ॥

कबीर दास का नाम सुन कृष्ण जी आश्चर्यचकित हुए, कहा कि ये कबीर दास कौन हैं, मुझे बताओ, तब मैं शरीर का त्याग करूँ।

कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहि अवधि है थोरा ॥

पांडव नन्दन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबही निवतजु आवही ॥

यज्ञ पूर्ण नहीं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहीं कोई ॥

कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू ॥

तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूर्ण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥

या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥

बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होऊ व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥
पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या क्रिया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चले भये कृष्ण बार नहीं लाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्ण सभा सिर नावा । भोजन को अब आज्ञा पावा ॥

निरंजन ने कहा कि कलयुग में मनुष्य की अवधि थोड़ी ही है । पाण्डव यज्ञ की रचना करेंगे, जिसमें सभी ऋषिगण आयेंगे, पर उन सबके भोजन करने से भी यज्ञ पूर्ण नहीं होगा, क्योंकि कोई भी नाम के प्रताप को नहीं जानता है । कलयुग में कबीर दास मनुष्य रूप में आयेंगे । उनके शिष्य सुपच के प्रताप से ही यज्ञ पूर्ण होगा । तुमने रामावतार में बालि को मारा था, सो उसका व्याध रूप में जन्म होगा । तुम उसका बदला दो ताकि जीवों को कोई संशय न रहे । यह सुन कृष्ण जी वापिस द्वारिका नगरी आए ।

सो निरंजन के कहे अनुसार पाण्डवों ने यज्ञ करवाया । बंधुओं की हत्या हुई थी, इसलिए यज्ञ रचा गया । कृष्ण जी ने कहा कि भोजन का आमंत्रण दो ।

बैठे गन्धर्व देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥

सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥

सब ऋषि, मुनियों ने इच्छानुसार भोजन किया ।

भोजन भये घंट नहीं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सो मोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुरु महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥

कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया। भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनि के दूत चले चहुँ देश। नहिं कोई भक्तन भेटें वेश। ॥
चले भीम तब लागि न बारा। चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई। निर्गुण भक्त यहाँ कोई रहई ॥
कहै सुपच निर्गुण को जानों। सतगुरु महिमा सदा बखानो ॥

सबने भोजन किया, पर यज्ञ को पूर्ण करने वाला घंटा नहीं बजा, जिससे राजा युधिष्ठिर को लज्जा हुई। उन्होंने कृष्ण जी से पूछा कि अब क्या किया जाए? कृष्ण जी ने कहा कि ऐसे भक्त की खोज करो, जो सद्गुरु की महिमा गाता हो। उसे विनय भाव के साथ ले आओ और भोजन खिलाओ। यह सुन युधिष्ठिर ने दूत को ऐसे भक्त को बुलाने भेजा। पर दूत को ऐसा कोई भक्त नहीं मिला। फिर भीम चले और चलते-चलते काशी जी में पहुँचे और वहाँ सुपच भक्त को देखा। सुपच सदा सद्गुरु की महिमा गाने वाला था।

कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करो मम संग ॥

चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥

भीम ने कहा कि हे हरिजन, कृपा करके वहाँ चलो, जहाँ हरि हैं।
कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ। कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा। यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई। कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई। तिनको भाखै काल कसाई ॥
कृष्णहि कहै काल की फांसी। कीन्ही आय भक्त की हांसी ॥
मार्यो नहिं पर तव भय माना। यह सुनकर बिहसे भगवाना ॥

सुपच ने कहा कि प्रभु कैसे कह रहे हो! सब ही तो काल के रूप हैं। यह सुन भीम ने क्रोध किया और बुरा भला कहकर वापिस आ गया। वापिस आकर कृष्ण जी से कहा कि मैंने आपके भय से उसे मारा नहीं। यह सुन कृष्ण जी हँस पड़े।

जाव युधिष्ठिर वेद गै, तुम आनो गहि पांय ॥

आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥

तब कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को कहा कि तुम जाओ । उनकी आज्ञा सुनकर राजा युधिष्ठिर सुपच को बुलाने चल पड़ा ।

अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै काजू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राऊ । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठ हरषंता ॥
आवत श्वपच कृष्ण जब जाना । होय काय पूर्ण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पाऊँ । भोजन सादर आन जिवाऊँ ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूर्ण यज्ञ कृष्ण जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥

युधिष्ठिर ने वहाँ जाकर सुपच से कहा कि हे संत, अपराध को क्षमा करें और कृपा करके मेरे घर चलें, जिससे मेरा कल्याण हो । सुपच ने पूछा कि हे पाण्डव राजा, तुम्हारा वहाँ क्या काम है ? युधिष्ठिर ने कहा कि आप परमार्थी हैं, इसलिए मुझे विश्वास है कि आप मेरे काम के लिए चलेंगे । युधिष्ठिर की विनती सुन सुपच उनके साथ वहाँ आए तो राजा युधिष्ठिर ने उनके पाँव पखारे और आदर सहित भोजन के लिए बिठाया । भोजन करके सुपच जैसे ही खड़े हुए तो घंटा बजा और यज्ञ पूर्ण हुआ । कृष्ण जी ने यज्ञ पूर्ण जान तब द्वारिका को प्रस्थान किया ।

बूझो रे नर परानी, क्या सुपचै अधिकार ॥

गण गंधर्व मुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥

हे मनुष्य, समझ, आखिर सुपच में क्या खास था कि गण, गंधर्व, मुनि, देवता, ऋषि सबके भोजन खाने से जो घंटा नहीं बज सका, वो सुपच के खाने से ही बजा ।

सब के खाये घंट नहिं बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥

सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं। नामहि महिमा जानत नाहीं ॥
सुपच जान भल नाम प्रभाऊ। तातें पूरण यज्ञ कराऊ ॥
कृष्ण शक्ति में मुनि ऋषि झूला। जान बूझि कै पंडित भूला ॥
बूझौ संतो नाम हमारा। नाम बिना किमि उतरो पारा ॥

साहिब कह रहे हैं कि सबके खाने से घंटा नहीं बजा, क्योंकि कोई भी नाम की महिमा को नहीं जानता था। सुपच नाम के प्रताप को जानता था, इसलिए उसके भोजन करने से यज्ञ पूर्ण हुआ। कृष्ण जी, शक्ति आदि की भक्ति में संसार लगा है, पर हे संतो, हमारे नाम का रहस्य समझो; नाम के बिना कोई पार नहीं हो पायेगा।

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा। तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥
गोपी लैके जाऊँ मैं जहँवा। पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥
मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु। जाहु तुरंत गहर जनि लावहु ॥
चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा। गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥
आपस में जो करे लड़ाई। इक मारे एक मरजाई ॥
छप्पन कोटि जो सबै सिरानो। सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥
अष्ट कन्या लखी चित्रसार। तिनकहँ कृष्ण जो यहि विधि मारी ॥

कृष्ण जी ने तब अर्जुन को बुलाकर कहा कि तुम गोपियों को बुलाकर ले आओ, मैं उन्हें बैकुण्ठ में लेकर जाना है। तुम उन्हें मथुरा से ले आओ। अर्जुन धनुष बाण लेकर उन्हें लेने चल पड़ा। कृष्ण जी ने ऐसा किया कि वो सब एक दूसरे से लड़कर मर गये।

मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरियान ॥

तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥

इस तरह सबको मार दिया गया।

वधिक देव घात संघाना। बालि बैर को भाव जो जाना ॥
जम सब प्रान घेर लै गयेऊ। मार्यो कृष्ण मूर्छित भयेऊ ॥
निरंकार निरंजन राऊ। आपहि मारि जो ताहि नसाऊ ॥
बालि का बैर व्याध जब लीन्हा। यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥

तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीवल आप स्वार्थहि मारा । सो जीव अपनो किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि विधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥

तो इस तरह त्रेतायुग के बालि ने, जो द्वापर में बदला लेने के लिए व्याध का जन्म लिए हुए था, कृष्ण जी को तीर मारकर बदला ले लिया। यादव, गोपियों आदि सब मारे गये।

कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परपंच अपार ॥

कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि मैं अब स्वर्ग में जा रहा हूँ, यह संसार झंझट है, इसे छोड़ो।

गये पारथ जहाँ चारों भाई। चलौ वही जहाँ यादो राई ॥
कहै संदेश सुनो हो राऊ। यहाँवा मोर दरश नहीं पाऊ ॥
मृत मंडल नहीं मेटव मोही। छाड़ो महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ो राज पाट सब भाई। पुत्र राज देऊ सब जाई ॥
चारेऊ पांडव काल वश भयेऊ। राय युधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥
ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा। नाम बिना देखो अस चीन्हा ॥
देखत कृष्ण अपन तन त्यागा। चिता तासु की रचन जो लागा ॥
चन्दन काष्ठ तासु तन जारा। चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥
इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ। तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥
मूंधायो द्वार काहु नहीं जाना। ठक ठक उठै दिन रात प्रवीना ॥
शिशुपाल भुजा चार रहो जाही। मार्यो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥

राज्य का भार पुत्रों को सौंपकर पाँचों पाण्डव वहाँ चले, जहाँ कृष्ण थे। चार पाण्डव तो रास्ते में ही दम तोड़ गये, केवल युधिष्ठिर ही सहेद वहाँ तक पहुँच सके। कृष्ण जी ने अपना शरीर भी त्याग दिया और शिशुपाल की भुजा उखाड़ी थी, सो उसे भी बदला दिया।

दोड़ भुजा काष्ठ जेहि उरेहा। बैर न छूटे सो गहि देहा ॥
जो कोई जीव जोर कर मारा। तासु जन्म किमि हो निस्तारा ॥
राम कृष्ण तैं को बड़ आही। बैर घात तासों न रहाही ॥
कृषी करै किसान जस भाऊ। ऐसी दसों जन्म निर्माऊ ॥
दसों जनम ऐसे ही बीते। तासों कहै कि मुक्ति करीते ॥
बूझो नहिं चरित्र भगवाना। तीन युग गये काल नियराना ॥
है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा। तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥
आप स्वार्थी तिनहू मारे। ज्यों नकटी विश्वासही वारे ॥

राम और कृष्ण से भला कौन बड़ा है! पर उन्हें भी जीव हत्या का बदला देना पड़ा। फिर साधारण आदमी अगर किसी को मारता है तो उसका कल्याण कैसे हो सकता है! दसों अवतार ऐसे ही बीते, पर कोई भी तीन युग तक निरंजन का खेल नहीं समझ सका।

धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई। दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥
कल्प अनेक निरंजन राजा। आगे कैसा करि है साजा ॥
सो सब स्वामी मोहि जनाओ। उत्पत्ति प्रलय भाव बताओ ॥
उत्पत्ति प्रलय सुनौं तुम पाही। कहौ सबै जो संशय जाही ॥

धर्मदास जी ने पूछा कि निरंजन का राज्य तो अनेक कल्प तक है, फिर आगे वो कैसे सृष्टि को सँवारता है? मुझे उत्पत्ति और प्रलय का पूरा भेद दो, जिससे मेरा संशय मिट सके।

चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ। सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥
चारौं युग अंत जब होई। वर्षे अग्नि निरंजन सोई ॥
पृथ्वी जार करै सब पानी। रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥
रहै जो देव तैंतीस करोरी। रहै सब तपसी तपकी जोरी ॥
चंद्र सूर्य तारागण झारी। जबही देह तजै मुख चारी ॥
विष्णु बीतही दस अवतारा। नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥
यहि विधि बहत्तर चौकड़ी जाई। सेवा फल पावै अन्याई ॥
उत्पत्ति करै पुन प्रथम स्वभाऊ। ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥

रहट की तरह चारों युग चलते जाते हैं। चार युग का अंत हो जाता है तो फिर निरंजन आग बरसाता है। वो पानी-ही-पानी करके पृथ्वी का नाश कर देता है। पर ऐसे में स्वर्ग रहता है, तैंतीस करोड़ देवता भी रहते हैं, बड़े-बड़े तपस्वी रहते हैं। इस तरह 72 चौकड़ी (चार युग) बीत जाती है। यह निरंजन उत्पत्ति करके फिर-फिर प्रलय करता रहता है। क्योंकि यह परम-पुरुष की सेवा से ही राज्य का फल पा रहा है।

महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो ॥
लोमस ऋषि तब होय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥
तीन गुन पांच तत्व बीते दस चार सुत आकाश हो ॥
महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥
सब भक्षै निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै ॥
शिव कन्यानाम बिहाय, सब जी राखै आपमें ॥

जब निरंजन महाप्रलय करता है तब सूर्य, चाँद, जल, अग्नि आदि कुछ भी नहीं रहता। तब लोमश ऋषि का भी अंत हो जाता है। सब गुण और तत्व आकाश में लय हो जाते हैं। आदि शक्ति (माया) को भी निरंजन ग्रसित कर लेता है। इस तरह निरंजन सबको खा जाता है। कुछ भी शेष नहीं रह जाता। सब जीवों को वो अपने में रख लेता है।

सतगुरु दया जाहि पर होई। नाम प्रताप बाचै जन सोई ॥
निज घर हंसा करहि पयाना। और सकल जीव तहाँ समाना ॥
जाई रहैं जहाँ धर्महि द्वीपा। प्रथम करी जो लोक समीपा ॥
उत्पत्ति कारण सेवा करहीं। पुनि यहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥
भक्त अभक्त सबै पुनि खाई। सबको भक्षै निरंजन राई ॥
सो पुनि महिमा वेद बखाने। वेद पढ़े पर भेद न जाने ॥

साहिब कह रहे हैं कि जिसपर सदगुरु की दया हो जाती है, वो ही नाम के प्रताप से इस कठिन निरंजन से बचकर अपने घर प्रस्थान करता है। नहीं तो यह सबको खा जाता है और फिर अमर-लोक के आस-पास जाकर परम-पुरुष से पुकार करता है कि उसे दुबारा सृष्टि

करनी है। चाहे कोई भक्त है या अभक्त, यह किसी को भी नहीं छोड़ता है, सबको खा जाता है। फिर वेद पता नहीं किसकी महिमा कह रहे हैं! लोग वेदों को तो पढ़ रहे हैं, पर इस रहस्य को नहीं समझ पा रहे हैं।

जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी बने।
सेवा करै जेहि पुरुष की सो भक्षण प्रति दिन करे ॥
जानी कै बूझो नहिं के तो कहो समुझाय हो।
आदि अंत सबै ग्रसै अस निरंजन राय हो ॥

जिसपर भरोसा किया जाए, वही चोरी कर ले तो कैसी बात है! इस तरह जीव जिस काल निरंजन की भक्ति कर रहे हैं, वो ही उन्हें अंतकाल में खा जाता है। प्रत्यक्ष जानकर भी लोग समझ नहीं पा रहे हैं। मैंने बड़ा समझाया कि निरंजन सबको खा जायेगा, पर कोई समझ नहीं पा रहा है।

काल सबन को खाय, हरि हर ब्रह्मा से बसै।
बाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥

हरि, हर, ब्रह्मा आदि को भी निरंजन नहीं छोड़ेगा। एक नाम के बिना कोई भी जीव बच नहीं सकता है।

<!-- image: Decorative separator consisting of four stylized floral or geometric symbols. -->

हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ। रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥
ब्रह्मा को पूजै संसारा। सो जिव होय न भव के पारा ॥

मन के 12 पंथ

मन के 12 पंथ


कबीर पंथ की जितनी भी भक्तियाँ हैं, निरंजन के अधीन हैं। निरंजन को पराधीन किया साहिब ने तो प्रार्थना की, कहा कि धरती पर जाओगे तो यह चीज़ फैलाओगे। फिर तो सभी चले जायेंगे। फिर शब्द दिया है। धरती पर आत्माएँ रखनी हैं या नहीं?

जैसा कि पहले भी बताया कि कई बार निरंजन महाप्रलय भी करता है। पूरे ब्रह्माण्ड का नाश करता है। सभी ग्रह नक्षत्र को खत्म करके अपने में समाता है। पूरी आत्माओं को लेकर अमर-लोक के पास जाता है, परम-पुरुष को पुकार करता है, कहता है कि ये सारी आत्माएँ वापिस लो, मुझे नहीं बनानी है सृष्टि। वहाँ से आवाज़ आती है कि हे निरंजन, जाओ, दुबारा सृष्टि करो, तुमने वरदान पाया है, अब जाओ, फिर बनाओ।

कई बार सवाल उठता होगा कि इतनी मेहनत क्यों करनी है? पूरी दुनिया को साहिब मुक्ति दे सकते हैं। इसमें से उन्हें नहीं ले जाना है, जो दुनिया को पसन्द कर रहे हैं। निरंजन भी आखिर साहिब का ही तो बेटा है। निरंजन ने प्रश्न किया, कहा कि जो भी आपकी भक्ति में आ जायेगा, पार हो जायेगा। तो यह संसार खाली हो जायेगा। ले चलो फिर मुझे भी, खाली करो संसार। फिर कहा कि या जीवों को उलझन में रखो। तुम्हारे 12 पंथ मैं भी चलाऊँगा। साहिब ने कहा कि ठीक है। इसलिए उलझाव है।

<table><tbody><tr><td>द्वादश</td><td>पंथ</td><td>काल</td><td>परमाना।</td></tr><tr><td>भूले</td><td>जीव</td><td>न</td><td>पाय</td><td>ठिकाना॥</td></tr></tbody></table>

इनमें से कोई बीजक की बात करेगा, कोई आत्मा को ही

परमात्मा कहेगा, कोई सतनाम की बात करेगा, कोई राम की भक्ति करेगा, कोई परम धाम की बात करेगा, कोई केवल हरिजनों की बात करेगा।

इसलिए ये सभी वंशगत चलेंगे। इनके लोग अमर लोक में नहीं जायेंगे; निरंजन के ही अधीन रहेंगे।

47 लाख साल के 4 युग होते हैं। 4 युग हो गये तो एक चौकड़ी हुआ। 100 बार चार युग हुए तो 100 चौकड़ी युग हुए। 100 के बाद हजार, फिर दस हजार, फिर लाख, फिर दस लाख, फिर करोड़, फिर दस करोड़, अरब, 10 अरब, फिर खरब, फिर नील, दस नील, पदम, दस पदम, संख्य, 10 संख्य, असंख्य, 10 असंख्य, फिर अनन्त।

4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं। यानी अरबों बार सृष्टि का नाश हो चुका है।

परम-पुरुष ने कहा कि इतना राज्य करना ही है। एक बार निरंजन ने कहा कि मुझे भी नाम दे दो। साहिब ने कहा कि यदि तुझे नाम दे दूँगा तो तू कभी छल नहीं कर सकेगा। छल छोड़ दिया तो आत्माएँ निकल जायेंगी।

अब यहाँ आदमी संस्पेंशन में आ जाता है। इसका मतलब है कि सत्पुरुष चाहते हैं कि सभी जीव न निकलें। और शाप दिया कि एक लाख जीव रोज़ खाना तो यह तो जीवों को ही कष्ट दिया। नहीं, यह कष्ट निरंजन को है। जब आपको चोट पहुँचती है तो यह आत्मा को कष्ट नहीं होता है। आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता है। यह कष्ट निरंजन को होता है। उसी को मुसीबत दी है। वो दर्द उसे होता है। यह समझाना कितना कठिन है।

कई जन्म आपने पहले निरंजन की भक्ति की है। कई जन्मों तक पुण्य कर्म किये। आप महा भाग्यवान हैं। अब आप सद्गुरु की शरण में पहुँचकर नाम प्राप्त किये। आप साधारण नहीं हैं। इसलिए आपका नम्बर लगा है। या फिर स्वयं संतजन कृपा कर देते हैं।

मन का तोड़

मन का तोड़


हर एक बीमारी का कोई न कोई इलाज, कोई न कोई तोड़ जरूर होता है। यह अलग बात है कि कोई बीमारी डॉक्टरों की पकड़ में नहीं आती या फिर किसी बीमारी का उन्हें इलाज नहीं मिल पाता जबकि किसी बीमारी का धीरे धीरे वो काट दूँढ़ निकालते हैं।

मन भी आत्मा पर एक बीमारी की तरह लगा हुआ है। सबका हृदय इसने गंदा करके रखा हुआ है। फिर यह बीमारी है भी बड़ी ताकतवर। क्या इसका भी कोई इलाज है? हमारे ऋषि, मुनि, पीर-पैगंबर किसी के पास इसका तोड़ नहीं था।

साहिब कह रहे हैं—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

निःसंदेह इस मन का कोई जोर आपपर नहीं चल रहा है। मन बेबस है। पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा-सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है। पर आप मन की पकड़ से आजाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं। ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। आपका ये चीजें कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं।

पुरुष शक्ति जब आन समाई। तब नहीं रोके काल कसाई ॥

कहा कि जब परम-पुरुष की ताकत आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम-पुरुष की

ताक़त आकर समाती है। तब काल का जोर नहीं चलता है।

मैंने जो कहा कि जो वस्तु मेरे पास है, वो कहीं नहीं है, प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है। 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है।

वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा। अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा। कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था। पर नहीं हो सका मन काबू में। इसलिए—

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे ॥

परम पुरुष की इच्छा से साहिब हर युग में निरंजन के लोक में आते हैं और जीवों को काल से कष्ट से छुड़ाकर अमर-लोक ले जाते हैं। पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा—नहीं। परम-पुरुष ने पूछा—क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है। जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है। तब परम-पुरुष ने कहा कि यह लो गुप्त वस्तु (नाम)। जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा।

तब परम-पुरुष को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से साहिब शून्य में निरंजन के लोक की ओर आए। जब साहिब आने लगे तो निरंजन झांझरी द्वीप में साहिब के सम्मुख आया, बोला—यहाँ क्यों आए हो? वापिस जाओ। यहाँ पर निरंजन और साहिब के मध्य बड़ी गोष्ठी हुई।

साहिब ने कहा—

तासो कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥

तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि वारि निज स्वाद करावहु॥
तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज़ा कीन्हा॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ॥

कहा कि हे निरंजन, तुमने बहुत छल, बल से जीवों को बाँधा हुआ है। तप्त शिला पर उन्हें अनेक कष्ट देकर आनन्द लूट रहे हो। परम पुरुष ने मुझे यहाँ भेजा है, मैं जीवों को यहाँ से छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊँगा।

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी॥
तिनसौ साठ पैठ उरझोरा। कैसे हंसन लेव उबेरा॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सबको उलझाया हुआ है। 360 ऐसे स्थान हैं, जहाँ निरंजन ने थोड़ी-थोड़ी शक्तियाँ रखी हुई हैं। उन्हीं को देख जीव उलझा हुआ है। निरंजन ने कहा कि कैसे छुड़ाओगे हंसों को? तब ज्ञानी अस बोले बानी। जमते जीव छुड़ावहुँ आनी॥
पुरुष नाम को कहुँ समझाई। जम राजा तब छोड़ि पराई॥
घाट घाट बैठे उरझोरा। हमरे शब्द ते होय निबेरा॥
सुन रे काल दुष्ट अन्याई। शब्द संग हंसा घर जाई॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास नाम है, जिसके सहारे हंस अमर लोक पहुँच जायेगा। अब तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे।

तब निरंजन ने कहा—

का ज्ञानी देहो अधिकारा। हमरो नाहिं छूटे जम जारा॥
पाँच पचीस तीन गुन आही। यह लै सकल शरीर बनाई॥
तामें पाप पुण्य का वासा। मन बैठा ले हमरी फाँसा॥
जहाँ तहाँ जग भरमावै। ज्ञान संधि कुछ रहन न पावै॥
एक शब्द की केतिक आशा। मेरे हैं चौरासी फाँसा॥

कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर नहीं ले जा सकते हो। मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप पुण्य में जीवों को बाँध दिया है। फिर मन रूप में खुद भी अन्दर समाया हुआ हूँ। किसी

को सोचने भी नहीं दे रहा हूँ कि क्या मामला है। तुम्हारा एक शब्द क्या करेगा, मैंने 84 लाख फॉसैं बनाई हुई हैं, एक में से निकाल दूसरी में फेंक देता हूँ।

बोले ज्ञानी शब्द विचारी। छूटे चौरासी की धारी।
छूटै पाँच पचीस गुण तीनों। ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हो॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा जबरदस्त नाम है, जिस घट में दे दूँगा, उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, वो आजाद हो जायेगा।

निरंजन ने कहा—

हे ज्ञानी का करो बढाई। हमते नाहिं छूट जीव जाई॥
इतने युग भये तुम देखा। ज्ञानी हंस न एको पेखा॥
का तुम करो का शब्द तुमारा। तीन लोक परलय कर डारा॥
साधु संत हम देखी रीति। परलय परे सकल जगग जीति॥
करम रेख बाँधै सब साधा। सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा॥

कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी हंस सतलोक पहुँचा। मैंने इतनी ताकत से जीवों को बाँधा हुआ है कि छूट नहीं सकते हैं। तुम और तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा। मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ।

निरंजन ने कई बार सृष्टि का प्रलय भी किया है। जलेबी बना देता है दुनिया की। ये सब काम साहिब के नहीं हैं।

तो निरंजने ने कहा कि इतने पर भी कर्मों में जीव को बाँधा हुआ हूँ। आम आदमी की क्या बात है, देवता, मुनि आदि सबको बाँधा हुआ है। एक भी हंस को जाने नहीं दूँगा।

ज्ञानी कहै काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबायी॥
हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा॥
नाम जपै अरु सुरति लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई॥
शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंसा होय अनूपा॥

साहिब ने कहा कि हे निरंजन, तब इनके पास सच्चा नाम नहीं था, तूने खा लिया। अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा और