मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंचल्यो दैत्य आयो हरि पाहीं। सखा संग जहँ बाल कन्हाई ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही। चपट कै मार्यो है हरि ताही ॥
त्रेतायुग में रामजी ने एक स्त्री के वियोग का दुख सहा, इसलिए कृष्णावतार ने 16 हजार गोपियों को उत्पन्न किया और फिर स्वयं देवकी की कोख से जन्म लेकर आए। कंस को खबर हुई तो उसने कागासुर, पूतना आदि अनेक दैत्यों को भेजा, जिन्हें बाल कृष्ण ने मार गिराया।
बहु क्रीड़ा हरि कीन्हीं, जानत नाहिं न कोय ॥
अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वार्थी होय ॥
इस तरह कृष्ण जी ने संसारी जीवों की नजर में बड़ी लीलाएँ कीं।
मारत तासु वार न लावा। ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥
रावन कुंभकरन जा मारा। ताको जन्म शिशुपाल अवतारा ॥
चलत कृष्ण गोपिन किए शोभा। संग भले तब जादों लोगा ॥
मारन कौँ हरि मता जो ठाना। मधुरा से हरि कीन्ह पयाना ॥
मुष्ट चार और दोड़ खंडावा। सब असुरहिं कंस गुहरावा ॥
रंग भूमि नृप कंस बनावा। काल रंग भूमि ही आवा ॥
चल भए कृष्ण जहाँ कहँ तबही। कुबरी को सम्मान कियो जबही ॥
पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा। भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥
शिशुपाल, पाली हुई बकरी सहित बड़े-बड़ों को मारा। फिर गोपियों के साथ सांसारिक जीवों की नजर में लीलाएँ की और कंस द्वारा भेजे गये कई असुरों और पहलवानों को मारा। कंस की दासी कुबरी को पूर्व जन्म की भक्ति के कारण रति दान दिया।
कंस मार हरि गोकुल गएऊ। गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥
फिर कंस को मारा।
एक बार शिशुपाल भुवारा। कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥
मार्यो तबै दैत्य बल बीरा। निकसे प्राण जो छाड़ शरीरा ॥
सब के देखत कृष्ण जो खावा। तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥